Nar Naari
(0)
Author:
Krishna Baldev VaidPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
175
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Available
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यह उपन्यास कृष्ण बलदेव वैद के सबसे चर्चित और बहस तलब रचनाओं में से एक है। उन्होंने हिन्दी की मुख्यधारा से अकसर दूर ही रहते हुए भाषा को ऐसी कृतियाँ दी हैं जो शिल्प के हमारे साथ सोचने के तरीक़ों को भी विचलित करती रही हैं।</p> <p>‘नर नारी’ उपन्यास स्त्री की समूची सामाजिक<strong>, </strong>पारिवारिक और दैहिक इयत्ता को केन्द्र में रखता है<strong>, </strong>और उनसे जुड़े प्रश्नों पर एक संकुल भावभूमि के परिप्रेक्ष्य में विचार करता है। पितृसत्तात्मक सामाजिक तंत्र में सम्पत्ति के उत्तराधिकार<strong>, </strong>विवाह-संस्था की वैधता<strong>, </strong>यौन- शुचिता और इससे जुड़े कई विधि<strong>-</strong>निषेधों पर अत्यन्त ज़ोर दिया जाता है। पति-पत्नी<strong>, </strong>बहन-भाई<strong>, </strong>माँ-बेटे आदि सभी सम्बन्ध अन्तत: इन्हीं सब के सन्दर्भ में परिभाषित होते दिखते हैं।</p> <p>इनके बीच ही मौजूद है स्त्री-पुरुष का आदिम रिश्ता जो एक दूसरी की उपस्थिति को एक प्राकृतिक और समान भूमि पर परिभाषित करता है। बाँझ माँजी<strong>, </strong>रसीला<strong>, </strong>सीमा और मीनू आदि इस उपन्यास के ऐसे स्त्री पात्र हैं जिनका जीवन और दृष्टिकोण इन तमाम प्रश्नों पर अलग-अलग ढंग से प्रकाश डालता है।</p> <p>संवादों के बीच से ही दृश्यों को साकार करते हुए उपन्यास को पढ़ना जैसे अपने ही मन की भीतरी तहों की यात्रा करने जैसा है। लेखक कहीं पर न पात्रों का बाहरी विवरण देता है<strong>, </strong>न परिस्थितियों का<strong>, </strong>फिर भी सब जैसे पाठक की आँखों के सामने साकार होता चलता है। एक पठनीय और विचारणीय उपन्यास।</p> <p>
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यह उपन्यास कृष्ण बलदेव वैद के सबसे चर्चित और बहस तलब रचनाओं में से एक है। उन्होंने हिन्दी की मुख्यधारा से अकसर दूर ही रहते हुए भाषा को ऐसी कृतियाँ दी हैं जो शिल्प के हमारे साथ सोचने के तरीक़ों को भी विचलित करती रही हैं।</p>
<p>‘नर नारी’ उपन्यास स्त्री की समूची सामाजिक<strong>, </strong>पारिवारिक और दैहिक इयत्ता को केन्द्र में रखता है<strong>, </strong>और उनसे जुड़े प्रश्नों पर एक संकुल भावभूमि के परिप्रेक्ष्य में विचार करता है। पितृसत्तात्मक सामाजिक तंत्र में सम्पत्ति के उत्तराधिकार<strong>, </strong>विवाह-संस्था की वैधता<strong>, </strong>यौन- शुचिता और इससे जुड़े कई विधि<strong>-</strong>निषेधों पर अत्यन्त ज़ोर दिया जाता है। पति-पत्नी<strong>, </strong>बहन-भाई<strong>, </strong>माँ-बेटे आदि सभी सम्बन्ध अन्तत: इन्हीं सब के सन्दर्भ में परिभाषित होते दिखते हैं।</p>
<p>इनके बीच ही मौजूद है स्त्री-पुरुष का आदिम रिश्ता जो एक दूसरी की उपस्थिति को एक प्राकृतिक और समान भूमि पर परिभाषित करता है। बाँझ माँजी<strong>, </strong>रसीला<strong>, </strong>सीमा और मीनू आदि इस उपन्यास के ऐसे स्त्री पात्र हैं जिनका जीवन और दृष्टिकोण इन तमाम प्रश्नों पर अलग-अलग ढंग से प्रकाश डालता है।</p>
<p>संवादों के बीच से ही दृश्यों को साकार करते हुए उपन्यास को पढ़ना जैसे अपने ही मन की भीतरी तहों की यात्रा करने जैसा है। लेखक कहीं पर न पात्रों का बाहरी विवरण देता है<strong>, </strong>न परिस्थितियों का<strong>, </strong>फिर भी सब जैसे पाठक की आँखों के सामने साकार होता चलता है। एक पठनीय और विचारणीय उपन्यास।</p>
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Book Details
-
ISBN9788126723355
-
Pages223
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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श्रीमती शान्ति कुमारी बाजपेयी का उपन्यास ‘घुँघरू’ अर्द्धनारीश्वर की वाङ्मयी साधना में अर्पित एक पुष्प है। प्रकृति ने मानव को स्त्री और पुरुष—दो रूपों में अभिव्यक्ति दी है। इन दोनों स्वरूपों की क्षमताएँ, कार्यपद्धति और उपलब्धियाँ भिन्न-भिन्न हैं। परन्तु वे एक साथ मिलकर ही परिपूर्ण हो पाती हैं और सृष्टि में अपनी सार्थकता प्रकट करती हैं। पुरुष अपने पौरुष से सर्वस्व प्राप्त कर सकता है तो नारी अपने प्रेम से सर्वस्व त्याग कर सकती है। पुरुष का धर्म—साहस, सिद्धि और शक्ति है तो नारी का धर्म—ममता, विश्वास और सेवा है। पुरुष की सार्थकता अर्जन में और नारी की सार्थकता समर्पण में दिखाई पड़ती है। ये दोनों विभूतियाँ जब एक साथ मिलकर अपनी भूमिकाओं को चरितार्थ करती हैं तो विधाता की कल्याणी सृष्टि विकसित होकर मंगल के महासमुद्र में पर्यवसित होती है। दोनों के सम्मिलन में ही परिपूर्णता है—अर्द्धनारीश्वर स्वरूप का रहस्य यही है और प्रस्तुत उपन्यास में इसी की प्रतिष्ठा है।
भारतीय संस्कृति में जिन उदात्त मानवीय विभूतियों और मूल्यों की प्रतिष्ठा है, उनकी सार्थकता भी प्रस्तुत उपन्यास में दिखाई गई है। शिव बिना शक्ति के शव है और शक्ति जब उसके साथ मिलती है तो शिवत्व आश्चर्यजनक ढंग से संसार में अभिव्यक्त हो सकता है—भारतीय जीवन में पुरुष और नारी इसी भूमिका में प्रतिष्ठित किए गए हैं। प्रस्तुत उपन्यास के पात्र इसी रूप में जीकर लोक-कल्याण की साधना में निरत हैं। प्रेम का अत्यन्त उदात्त, संयत और धर्म से ध्रुव निश्चित स्वरूप यहाँ विद्यमान है जो आँसुओं से चरितार्थ होकर कल्याण के महासमुद्र में मिलता है। उपन्यास की भाषा-शैली और वर्णन सौष्ठव की अपनी गरिमा है जो अपने मन्तव्य को पूर्णरूपेण अभिव्यक्त करने में सफल है।
प्रस्तुत उपन्यास के द्वारा हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि तो होती ही है, साथ ही भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की अमर प्रतिष्ठा का भी यह अन्यतम साधन है। भारतीय मनीषा को इससे परितोष मिल सकेगा।
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ताजमहल के आँसू प्रेम का मार्मिक आख्यान है। उपन्यास की कथा दो स्तरों पर चलती है। एक स्तर पर है पूर्णेन्दु शेखर और मधुरिमा चटर्जी की प्रेम कहानी और दूसरा स्तर है पूर्णेन्दु शेखर, शेखर द्वारा रचित उपन्यास ‘ताजमहल’ के किरदारों का संसार। उपन्यास की कहानी दोनों स्तरों पर समानान्तर चलती है और पाठकों को कभी मुगल काल में ले जाती है तो कभी वर्तमान समय से साक्षात्कार कराती है। अतीत और वर्तमान के विस्तृत कैनवास पर रचित इस उपन्यास में पाठकों को बाँधे रखने की अद्भुत क्षमता है। इस लिहाज से यह उपन्यास पठनीयता को सुरक्षित रखते हुए शिल्पगत प्रयोग का अनूठा उदाहरण है।
अतीत से वर्तमान और इतिहास से कल्पना के बीच आवाजाही करता यह उपन्यास गहरे सामाजिक सरोकार और जनप्रतिबद्धता का भी परिचायक है। ताजमहल का डिजाइन बनाने वाले उस्ताद ईसा और शाहजहाँ की बेटी जहाँआरा की प्रेम कहानी को इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि इसमें एक कलाकार का अन्तर्द्वन्द्व और उसकी पीड़ा भी अभिव्यक्त हो जाती है। प्रेम-कथा के आवरण में सामाजिक यथार्थ को उजागर करने वाला यह उपन्यास निश्चय ही पाठकों को पसन्द आयेगा।
—डॉ. दिनेश कुमार
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