Jungleman Ki Diary
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हम जिस संसार में रहते हैं वह साझे का संसार है। हमारी पृथ्वी तमाम जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों का साझा घर है। लेकिन सभ्यता के लम्बे अन्तराल में, मनुष्य ने यह ग़फ़लत पाल ली कि वही इसका अकेला मालिक है। इससे प्रकृति के साथ उसका सम्बन्ध लगातार जटिल होता गया, वह अपने आप तक सिमटता गया। यह सिलसिला आज भी रुका नहीं है। क्या यह सच नहीं कि आज मनुष्य की अपने आसपास के पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं और नदी-पहाड़ों से ही नहीं, दूसरे मनुष्यों से भी रिश्तों, संवादों और भावनाओं की साझेदारी लगातार घटती गई है? इस अलगाव ने पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को ही संकटग्रस्त कर दिया है। सचाई यह है कि मानव-जीवन की कोई भी तस्वीर केवल मानवों से पूरी नहीं होती। प्रकृति उन तस्वीरों में रंग भरती है। हमारे साथ इस धरती को साझा करने वाले तमाम पशु-पक्षी हमारी अधूरी कहानियों को पूरा करते हैं। हमारी स्मृति में उनकी यादें बसी होती हैं—बचपन का कोई पेड़, अपनी नदी का घाट, नासमझी में किसी पक्षी के साथ हुआ गुनाह, भावनाओं को कुरेदने वाली फूलों की कोई गन्ध, अनजान रास्तों पर सीखे गए ज़रूरी सबक़, किसी पेड़ के थाले में छिपाया गया पछतावा, हर पल जनम लेता जीवन। कुछ कहा-कुछ अनकहा! ‘जंगलमन की डायरी’ में ऐसी ही कुछ भावनाओं की पेशी हुई है। कुछ जवाब तलब किए गए हैं। जीवन के लिए ज़रूरी लेकिन ओझल होते जा रहे कुछ रंग यहाँ पहचाने जा सकते हैं। प्रकृति के साथ जीवन के साहचर्य की ये कहानियाँ, ऐसी प्रकृति-कथाएँ हैं जो हमारी दृष्टि और दुनिया दोनों को बड़ा करती हैं।
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हम जिस संसार में रहते हैं वह साझे का संसार है। हमारी पृथ्वी तमाम जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों का साझा घर है। लेकिन सभ्यता के लम्बे अन्तराल में, मनुष्य ने यह ग़फ़लत पाल ली कि वही इसका अकेला मालिक है। इससे प्रकृति के साथ उसका सम्बन्ध लगातार जटिल होता गया, वह अपने आप तक सिमटता गया। यह सिलसिला आज भी रुका नहीं है। क्या यह सच नहीं कि आज मनुष्य की अपने आसपास के पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं और नदी-पहाड़ों से ही नहीं, दूसरे मनुष्यों से भी रिश्तों, संवादों और भावनाओं की साझेदारी लगातार घटती गई है? इस अलगाव ने पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को ही संकटग्रस्त कर दिया है।
सचाई यह है कि मानव-जीवन की कोई भी तस्वीर केवल मानवों से पूरी नहीं होती। प्रकृति उन तस्वीरों में रंग भरती है। हमारे साथ इस धरती को साझा करने वाले तमाम पशु-पक्षी हमारी अधूरी कहानियों को पूरा करते हैं। हमारी स्मृति में उनकी यादें बसी होती हैं—बचपन का कोई पेड़, अपनी नदी का घाट, नासमझी में किसी पक्षी के साथ हुआ गुनाह, भावनाओं को कुरेदने वाली फूलों की कोई गन्ध, अनजान रास्तों पर सीखे गए ज़रूरी सबक़, किसी पेड़ के थाले में छिपाया गया पछतावा, हर पल जनम लेता जीवन। कुछ कहा-कुछ अनकहा! ‘जंगलमन की डायरी’ में ऐसी ही कुछ भावनाओं की पेशी हुई है। कुछ जवाब तलब किए गए हैं। जीवन के लिए ज़रूरी लेकिन ओझल होते जा रहे कुछ रंग यहाँ पहचाने जा सकते हैं। प्रकृति के साथ जीवन के साहचर्य की ये कहानियाँ, ऐसी प्रकृति-कथाएँ हैं जो हमारी दृष्टि और दुनिया दोनों को बड़ा करती हैं।
Book Details
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ISBN9789347265679
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Pages172
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: एक चिथड़ा सुख सुख की चाह लिये चलते हुए लोगों की कहानी है—सुख को जीतने के लिए भागते-दौड़ते लोगों की नहीं। इस उपन्यास के पात्र जो किसी-न-किसी तरह कहीं से उखड़े हुए हैं, कोई हताशा जिनके भीतर बिंधी है, अपने जीवन को कोई अर्थ देना चाहते हैं, अपने-आपको पा लेना चाहते हैं, पूरा होना चाहते हैं, ये लोग हमारी उस दुनिया का एक ज़्यादा उजला प्रति-संसार रचते हैं, जहाँ हर कोई ख़ुद को पूरा मानते हुए, जीवन को तलाश की तरह नहीं, युद्ध की तरह शुरू करते हैं। निर्मल वर्मा के लेखन में उतरते ही जो सुख हमें अपने पास खींच लेता है, उसका उत्स इसी जगह है; कि वह सुस्पष्ट-सुव्यवस्थित उपलब्धि की हमारी दुनिया के मामूलीपन का विस्तार नहीं है, उसका विपर्यय है। वह एक आईने की तरह हमारे सामने आता है जिसमें हम अपनी छूँछी कुंठाओं के उथलेपन को देख पाते हैं, उनसे मुक्त हो जाते हैं। ‘एक चिथड़ा सुख’ के पात्र अपनी अपूर्णताओं में यह और बेहतर ढंग से कर पाते हैं। दिल्ली इस उपन्यास का भूगोल है। यहाँ वह भी एक पात्र की तरह दिखाई देती है और अपने इन अति संवेदनशील रहवासियों को अपनी पृष्ठभूमि में और साफ़, वेध्य दिखा पाती है।
Boudam
- Author Name:
Fyodor Dostoyevsky
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- Description: Awating description for this book
Aadmi Swarg Mein
- Author Name:
Vishnu Nagar
- Book Type:

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Description:
यह धर्म-कर्म के बल पर अन्तत: स्वर्ग पहुँच गए आदमी की कथा है। वही धर्म-कर्म जिससे हम सब परिचित हैं, यानी अपने स्वार्थों की अमानवीय होने की हद तक हिफ़ाज़त करते हुए पूजा-पाठ का अटूट पालन; आदमी भी वही जिसे हमने अपनी 'सबसे प्राचीन सभ्यता' के काई-शैवाल को छानकर निकाला है, यानी अन्तर्तम से निहायत धर्मविरोधी एक 'धार्मिक' और ईश्वर-आस्था को भौतिक प्राप्तियों के लिए इस्तेमाल करनेवाला एक चालाक प्राणी। और स्वर्ग भी वही जिसकी कामना हिन्दू धर्म के चार पुरुषार्थों में गिनी जाती है।
इस उपन्यास के बहाने विष्णु नागर ने स्वर्ग, मनुष्य और धर्म—इन तीनों की व्याख्या की है। साथ में उस समाज की भी जिसे हमने नरक के सतत भय, ईश्वर की सर्वव्यापी मौजूदगी और तैंतीस करोड़ देवताओं की निरन्तर निगहबानी के बावजूद सफलतापूर्वक रचा। एक स्वभक्षी समाज। उपन्यास के नायक गेंदमल जी स्वर्ग में भी उसी समाज को ढूँढ़ने और बनाने की कोशिश करते हैं और भारतवर्ष की महान परम्पराओं की लाज रखते हुए बनाने में सफल भी होते हैं। यही नहीं, वहाँ के अधिपति का पद प्राप्त करते हैं।
विष्णु नागर ने कवि के रूप में सामाजिक और मानवीय सरोकारों की जो सहज व्याप्ति सम्भव की है, वही उनकी व्यंग्य कथाओं भी अन्यतम विषेषता है। इस उपन्यास में उन्होंने उसे एक बड़े कैनवस पर साधा है। धर्म और ईश्वर, और इनकी सामाजिक राजनीति हमेशा विष्णु जी का प्रिय विषय रही है। इस उपन्यास में उन्होंने इसका पूरा पाठ पेश किया है।
Varshavan Ki Roopkatha
- Author Name:
Vikas Kumar Jha
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Description:
‘वर्षा वन की रूपकथा’ कर्नाटक प्रान्त के शिमोगा ज़िले में बसे एक छोटे-से गाँव अगुम्बे की अन्तरंग-अप्रतिम कथा है। सघन वर्षा होने के कारण इसे भारत का दूसरा ‘चेरापूँजी’ कहा जाता है। कन्नड़ थिएटर और सिनेमा के महानायक शंकर नाग ने इस गाँव को अपने सीरियल ‘मालगुडी डेज़’ में अमर कर दिया है। दरअसल, अंग्रेज़ी के उद्भट लेखक आर.के. नारायण लिखित ‘मालगुडी डेज़’ पर सीरियल बनाने का निर्णय लेकर इस काल्पनिक ग्राम को साकार करने का स्वप्न सँजोए शंकर नाग जब घूमते-भटकते अगुम्बे पहुँचे, तो उन्हें छूटते हुए लगा कि यही तो है नारायण का अद्भुत मालगुडी! घने जंगल, पहाड़ और बादलों की अहर्निश मधुर युगलबन्दी के बीच स्थित मलनाड अंचल के इस गाँव के सरल-सहज लोगों से मिलकर शंकर नाग को लगा कि शूटिंग के लिए यहाँ उन्हें अलग से कोई सेट लगाने की भी ज़रूरत नहीं। पूरा गाँव ही इस सीरियल का क़ुदरती सेट है। शूटिंग के दौरान आर.के. नारायण भी जब एक बार अगुम्बे आए, तो विस्मित हुए बिना न रह सके। बहरहाल, ‘मालगुडी डेज़’ सीरियल के बने वर्षों बीत चुके हैं पर अगुम्बे अभी भी मालगुडी को अपनी आत्मा के आलोक में बड़े दुलार से बसाये हुए है। और यह यों ही नहीं है। बाज़ारवाद के इस भीषण पागल समय में यह गाँव मनुष्यता का एक ऐसा दुर्लभ हरित मंडप है, जहाँ के विनोदप्रिय निष्कलुष लोग समस्त कामनाओं और आतप को हवा में फूँककर उड़ाते हुए मौन उल्लास की सुरभि में निरन्तर मधुमान रहते हैं। जीवनानंद के पराग से पटी पड़ी है अगुम्बे की धरती। अगुम्बे की ख्याति दुनिया में ‘किंग कोब्रा’ के एकमात्र मुख्यालय के रूप में भी है। जंगल-पर्वत और झमझम बारिश के बीच निरन्तर आलोड़ित कर्नाटक के इस गाँव की जैसी धारासार तन्मय गाथा एक हिन्दी भाषी लेखक द्वारा लिखी गई है, वह पृष्ठ-दर-पृष्ठ चकित करती हुई साधारण मनुष्य के जीते-जागते स्वप्नजगत में अद्भुत रमण कराती है। तृप्त और दीप्त करती है।
‘सुन्दरता ही संसार को बचाएगी’ यह टिप्पणी हर समय, हर समाज, हर देश और हरेक भाषा के वास्ते महान साहित्यकार दोस्तोयेव्स्की की है। सुन्दरता का आशय मात्र किसी महारूपा स्त्री या महारूपा प्रकृति से ही नहीं है। सुन्दरता का मतलब ठेठ ‘अगुम्बेपन’ से भी है। प्रेम का चिरन्तन आनन्द, उसकी अटूट शक्ति और विह्वल करुणा भी विशुद्ध अगुम्बेपन में ही है।
Alama Kabutari
- Author Name:
Maitreyi Pushpa
- Book Type:

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Description:
मंसाराम कज्जा है और कदमबाई कबूतरी। नाजायज़ सन्तान है राणा—न कबूतरा न कज्जा। दोनों के बीच भटकता त्रिशंकु—संवेदनशील और स्वप्नदर्शी किशोर। अल्मा और राणा के बीच पनपते रागात्मक संबंधों की यह कहानी सिर्फ़ इतनी ही नहीं है कि राणा कल्पनालोक में रहता है और अल्मा जि़ंदगी के कठोर अनुभवों में पक रही है—वह हर स्थिति को सीढ़ी बनाकर दीवारें फाँदती कबूतरी है। 'अल्मा कबूतरी’ उस वास्तविक यथार्थ की जटिल नाटकीय कहानी है जो हमारे अनजाने ही आस-पास घटित हो रही है। अपनी उपस्थिति से हमें बेचैन करती है...
कभी-कभी सड़कों, गलियों में घूमते या अख़बारों की अपराध-सुर्ख़ियों में दिखाई देनेवाले कंजर, साँसी, नट, मदारी, सँपेरे, पारदी, हाबूड़े, बनजारे, बावरिया, कबूतरे—न जाने कितनी जन-जातियाँ हैं जो सभ्य समाज के हाशियों पर डेरा लगाए सदियाँ गुज़ार देती हैं—हमारा उनसे चौकन्ना सम्बन्ध सिर्फ़ कामचलाऊ ही बना रहता है। उनके लिए हम हैं कज्जा और 'दिकू’—यानी सभ्य-संभ्रांत परदेसी’, उनका इस्तेमाल करनेवाले शोषक—उनके अपराधों से डरते हुए, मगर उन्हें अपराधी बनाए रखने के आग्रही। हमारे लिए वे ऐसे छापामार गुरिल्ले हैं जो हमारी असावधानियों की दरारों से झपट्टा मारकर वापस अपनी दुनिया में जा छिपते हैं। कबूतरा पुरुष या तो जंगल में रहता है या जेल में...स्त्रियाँ शराब की भट्टियों पर या हमारे बिस्तरों पर...
अंग्रेज़ों के गज़टों-गज़ेटियरों में उनके नाम हैं 'अपराधी कबीले’ या सरकश जन-जातियाँ। मगर रामसिंह की माँ भूरी कबूतरी अपना सम्बन्ध जोड़ती है रानी पद्मिनी और राणा प्रताप से, शिवाजी और झाँसी की प्रति-रानी झलकारी बाई से—यानी उन सबसे जिन्होंने किसी साम्राज्य के आगे सिर नहीं झुकाया, भले ही इसके लिए वनवास की गुमनामी का ही वरण क्यों न करना पड़ा हो।
स्वतंत्र भारत में समाज की मुख्यधारा के किनारे फेंक दिए गए इन 'अदृश्य’ लोगों की लड़ाई आज भी जारी है, आज भी वे कमंद और सीढ़ियाँ लगाकर हमारी दुर्ग-दीवारों पर चढ़ते हें तो ऊपर बैठे हम तीर-कमान साधे उनका शिकार करने का सुख पाते हैं।
इन्हीं 'अपरिचित’ लोगों की कहानी इस बार उठाई है कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने 'अल्मा कबूतरी’ में। यह 'बुंदेलखंड की विलुप्त होती जनजातीय का समाज-वैज्ञानिक अध्ययन’ बिलकुल नहीं है, हालाँकि कबूतरा समाज का लगभग सम्पूर्ण ताना-बाना यहाँ मौजूद है—यहाँ के लोग-लुगाइयाँ, उनके प्रेम-प्यार, झगड़े, शौर्य इस क्षेत्र को गुंजान किए हैं।
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