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Nirlep Narayan

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यह उपन्यास श्रावक उमरावमल ढढ्ढा की जीवनी पर आधारित है। श्री ढढ्ढा का जीवन सीधा, सादा और सरल था। रायबहादुर सेठ के पौत्र और एक बड़ी हवेली के मालिक होकर भी उन्होंने आमजन का जीवन जिया। पुरखों द्वारा छोड़ी गई करोड़ों की सम्पत्ति अपने भोग-विलास पर ख़र्च नहीं करके दान कर दी। उनके पुरखे अंग्रेज़ों के बैंकर थे। उनका व्यवसाय इन्दौर, हैदराबाद तक फैला था। महारानी अहल्याबाई के राखीबंद भाई उनके पुरखे थे। उन्होंने पुरखों की सम्पत्ति को छुए बिना नौकरी करके अपना जीवन-यापन किया। श्री ढढ्ढा वस्तुत: एक अकिंचन अमीर थे। वे सचमुच ही निर्लेप नारायण थे। उमरावमल ढढ्ढा मानते थे कि मैं सबसे पहले इनसान हूँ, बाद में हिन्दुस्तानी। उसके बाद जैन। जैन के बाद श्वेताम्बर। स्थानकवासी परम्परा का श्रावक। वे सम्यक् अर्थों में महावीर मार्ग के अनुगामी और अनुरागी थे। वे हमेशा अपनी बात अनेकान्त की भाषा में कहते थे। अनेकान्त को समझाने का उनका फ़ार्मूला बड़ा सीधा था। वे कहते थे कि 'ही' और ‘भी' में ही अनेकान्त का सिद्धान्त छिपा है। मेरा मत ‘ही’ सच्चा है, यह एकान्तवाद है जबकि अनेकान्त कहता है कि मेरा मत ‘भी’ सच्चा है और आपका मत ‘भी’ सच्चा हो सकता है। उन्होंने पुरखों के छोड़े करोड़ों रुपयों के धन को छुआ ही नहीं। वकालत, वृत्तिका और व्यवसाय—इन सब में उन्हें वांछित सफलता नहीं मिली। वकालत इसलिए छोड़ दी कि झूठ की रोटी वे नहीं खा सकते थे। वृत्तिका भी गिरते स्वास्थ्य की वजह से लम्बी नहीं चली। व्यवसाय में घाटे पर घाटे लगे। जो कुछ पास में बचा, वह दान-पुण्य में लुटा दिया। उन्होंने अमीरी को छोड़ ग़रीबी को अपनाया। जब भी कोई ढढ्ढा हवेली की भव्यता को देखता तो उसकी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह जातीं कि इतनी बड़ी हवेली का स्वामी एक सीधी-सादी ज़िन्दगी जी रहा है।

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About the Book

यह उपन्यास श्रावक उमरावमल ढढ्ढा की जीवनी पर आधारित है।
श्री ढढ्ढा का जीवन सीधा, सादा और सरल था। रायबहादुर सेठ के पौत्र और एक बड़ी हवेली के मालिक होकर भी उन्होंने आमजन का जीवन जिया। पुरखों द्वारा छोड़ी गई करोड़ों की सम्पत्ति अपने भोग-विलास पर ख़र्च नहीं करके दान कर दी। उनके पुरखे अंग्रेज़ों के बैंकर थे। उनका व्यवसाय इन्दौर, हैदराबाद तक फैला था। महारानी अहल्याबाई के राखीबंद भाई उनके पुरखे थे। उन्होंने पुरखों की सम्पत्ति को छुए बिना नौकरी करके अपना जीवन-यापन किया। श्री ढढ्ढा वस्तुत: एक अकिंचन अमीर थे। वे सचमुच ही निर्लेप नारायण थे।

उमरावमल ढढ्ढा मानते थे कि मैं सबसे पहले इनसान हूँ, बाद में हिन्दुस्तानी। उसके बाद जैन। जैन के बाद श्वेताम्बर। स्थानकवासी परम्परा का श्रावक। वे सम्यक् अर्थों में महावीर मार्ग के अनुगामी और अनुरागी थे।

वे हमेशा अपनी बात अनेकान्त की भाषा में कहते थे। अनेकान्त को समझाने का उनका फ़ार्मूला बड़ा सीधा था। वे कहते थे कि 'ही' और ‘भी' में ही अनेकान्त का सिद्धान्त छिपा है। मेरा मत ‘ही’ सच्चा है, यह एकान्तवाद है जबकि अनेकान्त कहता है कि मेरा मत ‘भी’ सच्चा है और आपका मत ‘भी’ सच्चा हो सकता है।

उन्होंने पुरखों के छोड़े करोड़ों रुपयों के धन को छुआ ही नहीं। वकालत, वृत्तिका और व्यवसाय—इन सब में उन्हें वांछित सफलता नहीं मिली। वकालत इसलिए छोड़ दी कि झूठ की रोटी वे नहीं खा सकते थे। वृत्तिका भी गिरते स्वास्थ्य की वजह से लम्बी नहीं चली। व्यवसाय में घाटे पर घाटे लगे। जो कुछ पास में बचा, वह दान-पुण्य में लुटा दिया।

उन्होंने अमीरी को छोड़ ग़रीबी को अपनाया। जब भी कोई ढढ्ढा हवेली की भव्यता को देखता तो उसकी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह जातीं कि इतनी बड़ी हवेली का स्वामी एक सीधी-सादी ज़िन्दगी जी रहा है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2017
Weight
296 grams
ISBN-13
9788126730414
Pages
132
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22.5 cm
Language
Hindi

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