Rang Raachi
(0)
Author:
Sudhakar AdeebPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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मीराँ अपना एकतारा और खड़ताल हाथों में लेकर बिना किसी भूमिका के गा उठीं— सिसोदिया वंश के राणा यदि मुझसे रूठ गए हैं तो मेरा क्या कर लेंगे?... मुझे तो गोविन्द का गुण गाना है।... राणा जी रूठकर अपना देश बाख लेंगे।” दूसरे शब्दों में, देश में व्याप्त कुप्रथाओं एवं रूढ़ियों की रक्षा कर लेंगे।...किन्तु “यदि हरि रूठ जाएँगे तो मैं कुम्हला जाऊँगी। अर्थात् मेरी भक्ति व्यर्थ चली जाएगी।” “मैं लोक-लज्जा की मर्यादा को नहीं मानती।... मैं निर्भय होकर अपनी समझ का नगाड़ा बजाऊँगी!... श्याम नाम रूपी जहाज़ चलाऊँगी... इस तरह मैं इस भवसागर को पार कर जाऊँगी!... मीराँ अपने साँवले गिरधर जी की शरण में हैं तथा उनके चरणकमलों से लिपटी हुई हैं!...” इस प्रकार मीराँ का यह सात्त्विक विद्रोह ही तो था। अपनी मान्यताओं के प्रति उनकी दृढ़ता का प्रतीक। तत्कालीन झूठी लोक-मर्यादाओं की बेड़ियाँ जो शताब्दियों से स्त्री के पैरों में स्वार्थी पुरुष ने विभिन्न नियम संहिताएँ रचकर अपने हितलाभ के लिए पहना रखी थीं। मीराँ चुनौती दे रही थीं, उस सामन्ती युग में स्त्रियों के सम्मुख कड़ी कुप्रथाओं, कुपरम्पराओं का। वह अपूर्व धैर्य के साथ सामना कर रही थीं लौह कपाटों के पीछे स्त्री को धकेलने और उसे पत्थर की दीवारों की बन्दिनी बनाकर रखने, पति के अवसान के बाद जीते जी जलाकर सती कर देने, न मानने पर स्त्री का मानसिक और दैहिक शोषण करने की पाशविक प्रवृत्तियों का। मीराँ का सत्याग्रह अपने युग का अनूठा एकाकी आन्दोलन था जिसकी वही अवधारक थीं, वही जनक थीं और वही संचालक। मीराँ ने स्त्रियों के संघर्ष के लिए जो सिद्धान्त निर्मित किए उन पर सबसे पहले वे ही चलीं।
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About the Book
मीराँ अपना एकतारा और खड़ताल हाथों में लेकर बिना किसी भूमिका के गा उठीं—
सिसोदिया वंश के राणा यदि मुझसे रूठ गए हैं तो मेरा क्या कर लेंगे?... मुझे तो गोविन्द का गुण गाना है।... राणा जी रूठकर अपना देश बाख लेंगे।” दूसरे शब्दों में, देश में व्याप्त कुप्रथाओं एवं रूढ़ियों की रक्षा कर लेंगे।...किन्तु “यदि हरि रूठ जाएँगे तो मैं कुम्हला जाऊँगी। अर्थात् मेरी भक्ति व्यर्थ चली जाएगी।”
“मैं लोक-लज्जा की मर्यादा को नहीं मानती।... मैं निर्भय होकर अपनी समझ का नगाड़ा बजाऊँगी!... श्याम नाम रूपी जहाज़ चलाऊँगी... इस तरह मैं इस भवसागर को पार कर जाऊँगी!... मीराँ अपने साँवले गिरधर जी की शरण में हैं तथा उनके चरणकमलों से लिपटी हुई हैं!...”
इस प्रकार मीराँ का यह सात्त्विक विद्रोह ही तो था। अपनी मान्यताओं के प्रति उनकी दृढ़ता का प्रतीक। तत्कालीन झूठी लोक-मर्यादाओं की बेड़ियाँ जो शताब्दियों से स्त्री के पैरों में स्वार्थी पुरुष ने विभिन्न नियम संहिताएँ रचकर अपने हितलाभ के लिए पहना रखी थीं। मीराँ चुनौती दे रही थीं, उस सामन्ती युग में स्त्रियों के सम्मुख कड़ी कुप्रथाओं, कुपरम्पराओं का। वह अपूर्व धैर्य के साथ सामना कर रही थीं लौह कपाटों के पीछे स्त्री को धकेलने और उसे पत्थर की दीवारों की बन्दिनी बनाकर रखने, पति के अवसान के बाद जीते जी जलाकर सती कर देने, न मानने पर स्त्री का मानसिक और दैहिक शोषण करने की पाशविक प्रवृत्तियों का। मीराँ का सत्याग्रह अपने युग का अनूठा एकाकी आन्दोलन था जिसकी वही अवधारक थीं, वही जनक थीं और वही संचालक। मीराँ ने स्त्रियों के संघर्ष के लिए जो सिद्धान्त निर्मित किए उन पर सबसे पहले वे ही चलीं।
Book Details
-
ISBN9789352210169
-
Pages448
-
Avg Reading Time15 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ईसा की प्रथम शताब्दी में महाकवि इलंगोवन रचित तमिल महाकाव्य ‘शिलप्पदिकारम्’ भारतीय साहित्य की एक अनमोल रचना है। प्रस्तुत उपन्यास उक्त महाकाव्य की कथावस्तु पर आधारित पहली हिन्दी कृति है, जिसमें दक्षिण भारत के ऐतिहासिक जीवन का विस्तृत और विश्वसनीय चित्रण हुआ है। तत्कालीन पृष्ठभूमि को सँजोने में लेखक ने इतिहास-ग्रन्थों का अवगाहन करके अपने चित्रणों को यथासम्भव प्रामाणिक बनाने की चेष्टा की है और इस प्रकार उक्त महाकाव्य पर आधारित होते हुए भी यह प्रायः एक स्वतंत्र रचना बन गई है। स्वयं लेखक के शब्दों में : ‘‘घिसी-पिटी थीम होने पर भी पापुलर उपन्यास के लिए मुझे वह अच्छी लगी; मैं अपने दृष्टिकोण से उसमें नवीनता देख रहा था।’’ मिली-जुली सरल भाषा में लिखे गए इस उपन्यास का यह छठा संस्करण पाठकों के सामने है, जो इसकी लोकप्रियता का अकाट्य प्रमाण है।
Dhoday Charitmanas
- Author Name:
Satinath Bhaduri
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आधुनिक भारतीय कथा - साहित्य में कहानी कहना बंगाल की कला है । प्रस्तुत रचना इस मान्यता का एक अच्छा उदाहरण है । धीरोदात्त नायक यहाँ नहीं है । है तो ढोड़ाय , जैसा मामूली नाम तैसा चरित , ततमा लोगों के पूरे सामाजिक संदर्भ में , जहाँ ' पक्की ' ( यानी पक्की सड़क ) आधुनिक जीवन और बाहरी तत्त्व को प्रतिकित करती है । यह ' पक्की ' ही पूरे उपन्यास को आदि से अंत तक जोड़े हुए है । जिस समाज में महज पक्की सड़क नयी रोशनी का प्रतीक हो , उसे आधुनिक संदर्भों में जोड़ना रचनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर ' कितना कठिन है , यह आसानी से समझा जा सकता है । पर प्रख्यात बंगला कथा - शिल्पी सतीनाथ भादुड़ी ने कलात्मक धीरज के साथ इस जोड़ को साधा है । यों एक बड़े कालगत अंतराल को कथाकार ने अपनी संवेदना से पूरा किया है । प्रसिद्ध बंगला उपन्यास ' ढोड़ाय चरितमानस ' हिंन्दी में प्रकाशित होने के पूर्व ही यहाँ विस्तृत चर्चा का विषय बना रहा है । तब हिंदी पाठक के मन में उसको लेकर अतिरिक्त उत्सुकता का होना स्वाभाविक है । ' मैला आँचल ' हिंदी के समकालीन क्लैसिकों में है । उसका मूल नक्शा यहाँ देखा जा सकता है , जिसे हिंदी के उपन्यासकार ने अपने ढंग से समृद्धतर किया है । यों हिंदी की आंचलिक कथा - धारा का एक स्रोत है । ' ढोड़ाय चरितमानस ' । इस दृष्टि से सामान्य से सामान्य पाठक और विशिष्ट से विशिष्ट शोधकर्ता के लिए यह कथा - कृति रोचक और उपयोगी सिद्ध होगी ।
Ateet Ke Chalchitra
- Author Name:
Mahadevi Verma
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‘अतीत के चलचित्र’ हिन्दी गद्य की एक अप्रतिम रचना है। इतने दिनों बाद आज भी संवेदना के वे धरातल अछूते और अपूर्व हैं जिनकी सृष्टि इन रेखाचित्रों द्वारा हुई थी। मानवीय सहानुभूति और संवेगों की गहनता के लिए इन्हें चिरकाल तक हिन्दी साहित्य का शीर्षस्थ पद प्राप्त रहेगा।
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