🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Gurukul : Ek Adhoori Kahani : Vol. 1

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

ऊपरी तौर पर एकरैखिक प्रतीत होनेवाला यह उपन्यास कथ्य और विषयवस्तु के लिहाज़ से हमें कई स्तरों पर सम्बोधित करता है। मूलतः यह ज्ञान के उद्भव और सम्प्रेषण के अभाव को महसूस करते हुए उसकी सर्जना का प्रयास करता है। दुनियादारी के प्रिज़्म से दुनिया की विविधता को जानने और पहचानने वाला कर्नल हर शाम पार्थ को सम्बोधित करता है। हर दिन एक नई सुर्ख़ी, हर दिन एक नया उद्घाटन और हर दिन वयस्कता का एक-एक क़दम चढ़ता हुआ पार्थ। यहाँ पार्थ हमारे मध्यवर्गीय समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधि है जो अपनी दैनिक चर्या से बाहर अक्सर नहीं देख पाता और नतीजतन उस दुनिया और व्यवस्था के बारे में उसकी कोई निर्णायक राय नहीं बन पाती जो उसकी नियति को निर्धारित करती है। कर्नल एक-एक करके उसको न्याय व्यवस्था, आतंकवाद, कारपोरेट जगत, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध आदि पर इधर की स्थितियों से अवगत कराता है। अन्त में वह आता है पुरुष समलैंगिकता के प्रश्न पर जिस पर आज भी भारतीय समाज और क़ानून दोहरा पैमाना लागू करता है। वह इस नज़रिए को ख़ारिज करते हुए समलैंगिकों, समलैंगिक पुरुषों की सामाजिक स्थिति, उनके भीतरी-बाहरी अकेलेपन और दूसरी पीड़ाओं को रेखांकित करता है और कहता है कि यह लोग न अपराधी हैं, न समस्या। इन्हें दंड की नहीं, समझे जाने की ज़रूरत है।

Read more

₹ 295

236 20% off

Unavailable

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

This Book is out of stock
Frequently bought together
Gurukul : Ek Adhoori Kahani : Vol. 1 This book ₹236
Atirikta Sataren Anita Rakesh ₹250
3 books selected ₹840 ₹781
This Book is out of stock

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

ऊपरी तौर पर एकरैखिक प्रतीत होनेवाला यह उपन्यास कथ्य और विषयवस्तु के लिहाज़ से हमें कई स्तरों पर सम्बोधित करता है। मूलतः यह ज्ञान के उद्भव और सम्प्रेषण के अभाव को महसूस करते हुए उसकी सर्जना का प्रयास करता है। दुनियादारी के प्रिज़्म से दुनिया की विविधता को जानने और पहचानने वाला कर्नल हर शाम पार्थ को सम्बोधित करता है। हर दिन एक नई सुर्ख़ी, हर दिन एक नया उद्घाटन और हर दिन वयस्कता का एक-एक क़दम चढ़ता हुआ पार्थ।

यहाँ पार्थ हमारे मध्यवर्गीय समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधि है जो अपनी दैनिक चर्या से बाहर अक्सर नहीं देख पाता और नतीजतन उस दुनिया और व्यवस्था के बारे में उसकी कोई निर्णायक राय नहीं बन पाती जो उसकी नियति को निर्धारित करती है। कर्नल एक-एक करके उसको न्याय व्यवस्था, आतंकवाद, कारपोरेट जगत, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध आदि पर इधर की स्थितियों से अवगत कराता है।

अन्त में वह आता है पुरुष समलैंगिकता के प्रश्न पर जिस पर आज भी भारतीय समाज और क़ानून दोहरा पैमाना लागू करता है। वह इस नज़रिए को ख़ारिज करते हुए समलैंगिकों, समलैंगिक पुरुषों की सामाजिक स्थिति, उनके भीतरी-बाहरी अकेलेपन और दूसरी पीड़ाओं को रेखांकित करता है और कहता है कि यह लोग न अपराधी हैं, न समस्या। इन्हें दंड की नहीं, समझे जाने की ज़रूरत है।

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2008
Weight
128 grams
ISBN-13
9788183612272
Pages
112
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
13 × 21 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp