Penalty Corner Evam Anya Kahaniyan
Author:
Ashwani Kumar 'Pankaj'Publisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Unavailable
"‘पेनाल्टी कॉर्नर’ की कहानियाँ झारखंड के औपनिवेशिक शोषण-दमन और उससे उपजी सामाजिक-सांस्कृतिक विसंगतियों-विकृतियों को बेहद बारीकी से रेखांकित करती हैं। झारखंड के जनजीवन को संदर्भित करनेवाली ऐसी रचनाएँ और रचनाकार बहुत विरले हैं—हिंदी में तो और भी कम। दरअसल बहुत से रचनाकार यहाँ की जमीनी हकीकत से जुड़ ही नहीं पाते। संभवतः औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेष उन्हें ऐसा करने नहीं देते। ‘पेनाल्टी कॉर्नर’ की कहानियाँ अश्विनी कुमार पंकज को उन रचनाकारों से भिन्न पाँत में खड़ा करती हैं—एक शिखर की तरह, नैदिन गार्डीमर की तरह।
‘पेनाल्टी कॉर्नर’ की कहानियों का फलक बहुत विस्तृत है। इसमें एक ओर गिरिडीह-धनबाद की परित्यक्त कोयला-खदान हैं तो दूसरी ओर जादूगोड़ा का विकलांग-बाँझ कर देनेवाला प्रदूषित परिवेश। एक तरफ सिमडेगा, जलडेगा, बानो, मनोहरपुर के घाट-पहाड़, बाजार-हाट हैं तो दूसरी तरफ राँची-टाटा के चमचमाते फाइव-स्टार होटल। गरीबी और अमीरी का असह्य कंट्रास्ट। भाषा का रेंज भी उतना ही विस्तृत है, जितना इसका फलक। ठेठ गाँव-घर की हिंदी-नागपुरी से लेकर लेटेस्ट अंग्रेजी तक—‘चेंज योर माइंड इन राइट डायरेक्शन।’ अतिरिक्त प्रयास के बिना कथ्य के साथ सादा-सा शिल्प सहज रूप से कहानियों में आया है। एक नैसर्गिक आदिवासी परिवेश का प्रस्तुतिकरण सादगी-मौलिकता- सहजता के साथ।
—विसेश्वर प्रसाद केशरी
"
ISBN: 9789386870797
Pages: 144
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: बांग्लादेश के आठवें संसदीय चुनाव के दौरान और उसके तुरन्त बाद वहाँ के हिन्दू समुदाय पर अत्याचार-उत्पीड़न का जो दौर चला, सलाम आज़ाद की यह औपन्यासिक कृति उसी का दस्तावेज़ है। बांग्लादेश बनने के बाद वहाँ के हिन्दू कई बार अत्याचार के शिकार हुए हैं लेकिन इस बार सुनियोजित ढंग से उन पर अत्याचार-उत्पीड़न का जो चक्र चला, उसके आगे पिछली घटनाएँ नगण्य हैं। बांग्लादेश से हिन्दुओं को नेस्तनाबूद कर वहाँ उग्र इस्लामी तथा तालिबानी राजसत्ता क़ायम करने के मक़सद से इस्लामी कट्टरपंथियों की मदद से बने चार दलीय गठबन्धन की छत्रच्छाया में हिन्दू नागरिकों पर चौतरफ़ा अत्याचार किया गया। पिता के सामने बेटी के साथ और माँ-बेटी को पास-पास रखकर बलात्कार किया गया। बलात्कारियों की पाशविकता से सात साल की बच्ची से लेकर साठ साल की वृद्धा तक को रिहाई नहीं मिली। लेकिन क्यों और कहाँ से आई यह बर्बरता? एक समुदाय के ख़िलाफ़ क्यों चला यह अत्याचार का दौर?—इसी का जवाब ढूँढ़ा गया है इस उपन्यास में।
keertigaan
- Author Name:
Chandan Pandey
- Book Type:

-
Description:
उन्माद के जाल की पैमाइश में जुटे एक पत्रकार की उथल-पुथल भरी ज़िन्दगी की कथा है—‘कीर्तिगान’, जो उस वक़्त और उलझ जाती है जब भीड़-हत्याओं और उनसे जुड़े लोगों से मिलते हुए उसके लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष का भेद मिट जाता है। उसकी दुनिया उन लोगों से भर जाती है जो या तो इस दुनिया में नहीं हैं या उन भीड़-हत्याओं से जुड़े हैं।
उसकी ज़िन्दगी का एक सिरा उस स्त्री से जुड़ता है जो भीड़-हत्याओं की रिपोर्टिंग के अभियान में उसके साथ काम कर रही है और ऐसी हर घटना के साथ अपने उस अतीत के निकट पहुँच जाती है जिसकी ज़मीन एक त्रासदी की स्याही से अब तक गीली है।
अपनी नौकरी को बचाए रखने भर के लिए इस अभियान से जुड़ा पत्रकार और अपने काम को पसन्द करने वाली उसकी सहकर्मी, दोनों की अपनी-अपनी त्रासदियाँ उस समय व्यक्तिगत नहीं रह जातीं जब वे रिपोर्टिंग के दौरान समाज में अकल्पनीय ढंग से जड़ जमा चुकी उन्मादी मानसिकता से रू-ब-रू होते हैं।
इसमें जीवन से वाचक का पुनर्जागृत प्रेम है और विकसित होती हुई एक प्रेम कहानी भी, जिनसे कथा विरल ढंग से पठनीय हो उठती है।
Jhoola Nat
- Author Name:
Maitreyi Pushpa
- Book Type:

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Description:
गाँव की साधारण–सी औरत है शीलो—न बहुत सुन्दर और न बहुत सुघड़...लगभग अनपढ़—न उसने मनोविज्ञान पढ़ा है, न समाजशास्त्र जानती है। राजनीति और स्त्री–विमर्श की भाषा का भी उसे पता नहीं है। पति उसकी छाया से भागता है। मगर तिरस्कार, अपमान और उपेक्षा की यह मार न शीलो को कुएँ–बावड़ी की ओर धकेलती है, और न आग लगाकर छुटकारा पाने की ओर। वशीकरण के सारे तीर–तरकश टूट जाने के बाद उसके पास रह जाता है जीने का नि:शब्द संकल्प और श्रम की ताक़त एक अडिग धैर्य और स्त्री होने की जिजीविषा...उसे लगता है कि उसके हाथ की छठी अँगुली ही उसका भाग्य लिख रही है...और उसे ही बदलना होगा।
‘झूला नट’ की शीलो हिन्दी उपन्यास के कुछ न भूले जा सकनेवाले चरित्रों में एक है। बेहद आत्मीय, पारिवारिक सहजता के साथ मैत्रेयी ने इस जटिल कहानी की नायिका शीलो और उसकी ‘स्त्री–शक्ति’ को फ़ोकस किया है–––
पता नहीं ‘झूला नट’ शीलो की कहानी है या बालकिशन की! हाँ, अन्त तक, प्रकृति और पुरुष की यह ‘लीला’ एक अप्रत्याशित उदात्त अर्थ में ज़रूर उद्भासित होने लगती है।
निश्चय ही ‘झूला नट’ हिन्दी का एक विशिष्ट लघु उपन्यास है…।
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