Berozgaar Engineer aur Gungi Gun ka Insaaf
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बेरोज़गार इंजिनियर और गूंगी गन का इंसाफ़ | लेखक: विश्वास शर्मा दिल्ली की उमस भरी अगस्त–सितंबर की रातें, झिर-झिर बरसात और गलियों की घुटन… इन्हीं के बीच चलती है यह कहानी— एक बेरोज़गार इंजीनियर, एक क़ातिल और एक पुलिसवाले की। बाबू दिलवाला जेल से सिर्फ़ तीन घंटे के लिए बाहर आया—मनचंदा का क़त्ल करने। लेकिन वह कभी लौट नहीं सका। किसने मारा उसे? उसकी प्रेमिका बेबी ने, मनचंदा ने, या हमेशा इंसाफ़ करने वाली गूँगी गन ने? पाठक को रहस्य का आधा सिरा पहले मिल जाता है, मगर किरदार अपनी ही तलाश में उलझे रहते हैं। सचाई की परतें धीरे-धीरे खुलती हैं और हर पन्ना दिल्ली के मौसम, बरसाती अँधेरे और बेचैन कर देने वाले माहौल से सराबोर है। यह उपन्यास केवल अपराधकथा नहीं है—यह अपने दृश्यात्मक और घटनात्मक प्रभाव से किसी फ़िल्म की तरह अनुभव कराता है।
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बेरोज़गार इंजिनियर और गूंगी गन का इंसाफ़ | लेखक: विश्वास शर्मा दिल्ली की उमस भरी अगस्त–सितंबर की रातें, झिर-झिर बरसात और गलियों की घुटन… इन्हीं के बीच चलती है यह कहानी— एक बेरोज़गार इंजीनियर, एक क़ातिल और एक पुलिसवाले की। बाबू दिलवाला जेल से सिर्फ़ तीन घंटे के लिए बाहर आया—मनचंदा का क़त्ल करने। लेकिन वह कभी लौट नहीं सका। किसने मारा उसे? उसकी प्रेमिका बेबी ने, मनचंदा ने, या हमेशा इंसाफ़ करने वाली गूँगी गन ने? पाठक को रहस्य का आधा सिरा पहले मिल जाता है, मगर किरदार अपनी ही तलाश में उलझे रहते हैं। सचाई की परतें धीरे-धीरे खुलती हैं और हर पन्ना दिल्ली के मौसम, बरसाती अँधेरे और बेचैन कर देने वाले माहौल से सराबोर है। यह उपन्यास केवल अपराधकथा नहीं है—यह अपने दृश्यात्मक और घटनात्मक प्रभाव से किसी फ़िल्म की तरह अनुभव कराता है।
Book Details
-
ISBN9789348497253
-
Pages216
-
Avg Reading Time7 hrs
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Age11-18 yrs
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Country of OriginIndia
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— प्रसिद्ध गीतकार कुँवर बेचैन का कलात्मक शैली में लिखा गया अनूठा ललित उपन्यास है—‘मरकतद्वीप की नीलमणि’। सच और कल्पना के सूत्रों में पिरोयी यह ‘मोनोलॉग’ जैसी कथाकृति—बाह्यजगत के बजाय अन्तर्जगत की कथा बयान करती है।
उपन्यास का केन्द्रीय पात्र कथानायिका मधु है, जो अपनी माँ को अपने आपबीती सुना रही है। भावनाओं की मंथर गतिमानता और उसका मद्धम स्पर्श यहाँ सिर्फ़ गुदगुदाता ही नहीं, आपको त्रासदियों में कई बार तन्हा भी छोड़ जाता है। यह त्रासदी सिर्फ़ मधु की निजी नहीं रह जाती। उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता है—इसके पात्रों के साथ पाठक की आत्मीय संलग्नता, जिसे उपन्यासकार की ललित शैली ने सम्भव बनाया है।
पाठक मणि के साथ भाव-लोक में इतना एकाकार हो उठता है कि उसे मणि का हर शब्द, हर अन्दाज़ अपना-सा लगता है। पाठक मणि के मनोजगत की यात्रा में शामिल होकर उसके साथ-साथ अपने भी अन्तरंग और सघन जीवनानुभवों के विभिन्न पहलुओं से रूबरू होता है। उपन्यास के हर शब्द में डूबता है, उतराता है। लेखक मूलतः कवि हैं सो उनकी शैली में कविता का प्रभाव पूरे कैनवस पर मौजूद है। इससे इसकी पठनीयता कई गुना बढ़ जाती है।
Anamdas ka Potha
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

- Description: आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उन विरल रचनाकारों में थे, जिनकी कृतियाँ उनके जीवन-काल में ही क्लासिक बन गईं। अपनी जन्मजात प्रतिभा के साथ उन्होंने शास्त्रों का अनुशीलन और जीवन को सम्पूर्ण भाव से जीने की साधना करके वह पारदर्शी दृष्टि प्राप्त की, जो किसी कथा को आर्ष-वाणी की प्रतिष्ठा देने में समर्थ होती है। ‘अनामदास का पोथा’ अथ रैक्व-आख्यान आचार्य द्विवेदी की आर्ष-वाणी का अपूर्व उद्घोष है। संसार के दु:ख-दैन्य ने राजपुत्र गौतम को गृहत्यागी, विरक्त बनाया था, लेकिन तापस कुमार रैक्व को यही दु:ख-दैन्य विरक्ति से संसक्ति की ओर प्रवृत्त करते हैं। समाधि उनसे सध नहीं पाती, और वे उद्विग्न की भाँति उठकर कहते हैं : ‘‘माँ, आज समाधि नहीं लग पा रही है। आँखों के सामने केवल भूखे-नंगे बच्चे और कातर दृष्टिवाली माताएँ दिख रही हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, माँ?’’ और माँ रैक्व को बताती हैं : ‘‘अकेले में आत्माराम या प्राणाराम होना भी एक प्रकार का स्वार्थ ही है।’’ यही वह वाक्य है जो रैक्व की जीवन-धारा बदल देता है और वे समाधि छोडक़र कूद पड़ते हैं जीवन-संग्राम में। ‘अनामदास का पोथा’ अथ रैक्व-आख्यान जिजीविषा की कहानी है। ‘‘जिजीविषा है तो जीवन रहेगा, जीवन रहेगा तो अनन्त सम्भावनाएँ भी रहेंगी। वे जो बच्चे हैं, किसी की टाँग सूख गई है, किसी का पेट फूल गया है, किसी की आँख सूज गई है—ये जी जाएँ तो इनमें बड़े-बड़े ज्ञानी और उद्यमी बनने की सम्भावना है।’’ तापस कुमार रैक्व उन्हीं सम्भावनाओं को उजागर करने के लिए व्याकुल हैं, और उसके लिए वे विरक्ति का नहीं, प्रवृत्ति का मार्ग अपनाते हैं।
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