Begum Meri Vishwas : Vol. 1-2
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Author:
Bimal Mitra, Virendranath MandalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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भारत में अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना के कालखंड पर आधारित एक वृहत् महागाथा जो हमें सन् 1757 के बंगाल के प्रसिद्ध प्लासी के युद्ध के बीच लाकर खड़ा कर देती है।</p> <p>सिराजुद्दौला, क्लाइव और मराली—तीनों के माध्यम से दो शती पूर्व के बंगाल के इतिहास से दर्ज घटनाएँ अपने आप आँखों के सामने बिखर जाती हैं।</p> <p>सिद्ध कथाशिल्पी बिमल मित्र की जादूगर लेखनी ने इस कथा द्वारा यह सत्य उद्घाटित किया है कि मानव-चरित्र कभी नहीं बदलता। दो सौ वर्ष पूर्व जो लोग थे, वे दूसरे नामों से आज भी वर्तमान हैं और यह भी सत्य मूर्त हो उठा है कि देश के कर्णधारों के कारण ही देश का पतन नहीं होता, बल्कि जनसाधारण का सामूहिक चरित्र-दोष के कारण होता है।</p> <p>बिमल मित्र के इस ऐतिहासिक उपन्यास की नायिका बेगम मेरी विश्वास थी एक साधारण हिन्दू रमणी। सिराजुद्दौला के विलास-व्यसन की माँग पूरी करने के लिए जिन परिस्थितियों के बीच उसका जीवन व्यतीत हुआ, उसी आधार पर यह अनूठी कहानी लिखी गई है। सिराजुद्दौला के जीवन की कुछेक प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में मेरी विश्वास तथा और भी कुछेक नर-नारियों की विचित्र जीवन-कथा इस उपन्यास की उपजीव्य है। सिराजुद्दौला के व्यर्थ जीवन के विषादमय चित्र, उसके दुश्चरित्र सहयोगी, नवाब अलीवर्दी की बेगम सिराजुद्दौला की नानी तथा और अनेकानेक पार्श्व-चरित्रों के समावेश एवं 'चेहल-सुतून' की अन्दरूनी ज़िन्दगी के चित्र द्वारा अठारहवीं शताब्दी के मध्य के बंगाल की जीवन-यात्रा की एक अपूर्व छवि फूट पड़ी है। मेरी विश्वास के असाधारण व्यक्तित्व ने इस चित्र को महिमामंडित किया है।</p> <p>इस उपन्यास में इतिहास के साथ कल्पना का विरोध नहीं, समन्वय घटित हुआ है।</p> <p> </p> <p>‘बेगम मेरी विश्वास’ में मराली विश्वास गाँव-देहात की एक ग़रीब लड़की है लेकिन कालचक्र के प्रभाव से भारत के इतिहास को बदलने में प्रमुख भूमिका निभाती है। घटना-चक्र से यही मराली विश्वास सिराजुद्दौला के हरम में पहुँचकर मरियम बेगम हो जाती है और बाद में क्लाइव के पास पहुँचकर बन पाती है मेरी। हिन्दू, मुसलमान और ईसाई—तीन विभिन्न धर्मों के संगम की प्रतीक बन जाती है एक मामूली-सी लड़की।</p> <p>दो इतिहास पुरुष—सिराजुद्दौला और क्लाइव के बीच थी एक नायिका—मराली यानी बेगम मेरी विश्वास, दोनों शत्रुओं का समान रूप से विश्वास जीतनेवाली।
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भारत में अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना के कालखंड पर आधारित एक वृहत् महागाथा जो हमें सन् 1757 के बंगाल के प्रसिद्ध प्लासी के युद्ध के बीच लाकर खड़ा कर देती है।</p>
<p>सिराजुद्दौला, क्लाइव और मराली—तीनों के माध्यम से दो शती पूर्व के बंगाल के इतिहास से दर्ज घटनाएँ अपने आप आँखों के सामने बिखर जाती हैं।</p>
<p>सिद्ध कथाशिल्पी बिमल मित्र की जादूगर लेखनी ने इस कथा द्वारा यह सत्य उद्घाटित किया है कि मानव-चरित्र कभी नहीं बदलता। दो सौ वर्ष पूर्व जो लोग थे, वे दूसरे नामों से आज भी वर्तमान हैं और यह भी सत्य मूर्त हो उठा है कि देश के कर्णधारों के कारण ही देश का पतन नहीं होता, बल्कि जनसाधारण का सामूहिक चरित्र-दोष के कारण होता है।</p>
<p>बिमल मित्र के इस ऐतिहासिक उपन्यास की नायिका बेगम मेरी विश्वास थी एक साधारण हिन्दू रमणी। सिराजुद्दौला के विलास-व्यसन की माँग पूरी करने के लिए जिन परिस्थितियों के बीच उसका जीवन व्यतीत हुआ, उसी आधार पर यह अनूठी कहानी लिखी गई है। सिराजुद्दौला के जीवन की कुछेक प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में मेरी विश्वास तथा और भी कुछेक नर-नारियों की विचित्र जीवन-कथा इस उपन्यास की उपजीव्य है। सिराजुद्दौला के व्यर्थ जीवन के विषादमय चित्र, उसके दुश्चरित्र सहयोगी, नवाब अलीवर्दी की बेगम सिराजुद्दौला की नानी तथा और अनेकानेक पार्श्व-चरित्रों के समावेश एवं 'चेहल-सुतून' की अन्दरूनी ज़िन्दगी के चित्र द्वारा अठारहवीं शताब्दी के मध्य के बंगाल की जीवन-यात्रा की एक अपूर्व छवि फूट पड़ी है। मेरी विश्वास के असाधारण व्यक्तित्व ने इस चित्र को महिमामंडित किया है।</p>
<p>इस उपन्यास में इतिहास के साथ कल्पना का विरोध नहीं, समन्वय घटित हुआ है।</p>
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<p>‘बेगम मेरी विश्वास’ में मराली विश्वास गाँव-देहात की एक ग़रीब लड़की है लेकिन कालचक्र के प्रभाव से भारत के इतिहास को बदलने में प्रमुख भूमिका निभाती है। घटना-चक्र से यही मराली विश्वास सिराजुद्दौला के हरम में पहुँचकर मरियम बेगम हो जाती है और बाद में क्लाइव के पास पहुँचकर बन पाती है मेरी। हिन्दू, मुसलमान और ईसाई—तीन विभिन्न धर्मों के संगम की प्रतीक बन जाती है एक मामूली-सी लड़की।</p>
<p>दो इतिहास पुरुष—सिराजुद्दौला और क्लाइव के बीच थी एक नायिका—मराली यानी बेगम मेरी विश्वास, दोनों शत्रुओं का समान रूप से विश्वास जीतनेवाली।
Book Details
-
ISBN9789390625406
-
Pages848
-
Avg Reading Time28 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारत की राष्ट्रभाषा होने के बावजूद जनसाधारण के हिन्दी सम्बन्धी ज्ञान को पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। शैक्षिक जीवन में पाठ्य–पुस्तकों आदि के सन्दर्भ में भी हिन्दी के शब्दार्थ, शब्द और वाक्य–प्रयोग आदि को लेकर विद्यार्थियों को सदैव समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसी के मद्देनज़र इस कोश में विद्वान कोशकार का बल विस्तार के बजाय भाषा की व्यावहारिक उपयोगिता पर रहा है।
पाठ्यक्रम तथा रोज़मर्रा जीवन, मीडिया माध्यमों आदि में प्रयुक्त होनेवाले आवश्यक शब्दों, उनके अर्थों, उनकी व्याकरणगत स्थिति तथा प्रयोगों से सम्पन्न यह कोश विद्यार्थियों, साहित्यप्रेमियों, अनुवादकों, भाषाकर्मियों व भाषा–अधिकारियों के लिए समान रूप से उपयोगी है। इसके अलावा इसमें रामायण, महाभारत, बुद्धचरित, प्रमुख पर्वतमालाओं, नदियों, पशु–पक्षियों तथा देवी–देवताओं से सम्बन्धित शब्दावलियों को अलग से सँजोया गया है।
Pocket Hindi Dictionary
- Author Name:
Virendranath Mandal
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इस कोश में अनेक नए शब्दों, प्रमुख पर्वतमालाओं, नद-नदियों, पशु-पक्षी की बोली, हिन्दुओं के प्रमुख देवी-देवता और उपयोगी संक्षेपणों के साथ उच्चारण तथा व्याकरण-प्रयोग...आदि महत्त्वपूर्ण संयोजन है, एक बेहद उपयोगी कोश।
Punarutthan
- Author Name:
Leo Tolstoy +1
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आधुनिक इतिहास में यदि किसी विचारक-लेखक की ख्याति उसकी ज़िन्दगी में ही पूरी दुनिया में फैल चुकी थी और जीते-जी ही वह एक मिथक बन गया था, तो वे लेव तोल्स्तोय ही थे। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर जिस तरह बाल्ज़ाक छाए हुए थे, उसी तरह उत्तरार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर तोल्स्तोय का प्रभाव-साम्राज्य फैला हुआ था।
‘पुनरुत्थान’ एक नए प्रकार का उपन्यास था जिसमें पात्रों के गहन आत्मसंघर्ष और रूपान्तरण के साथ ही, सेंट पीटर्सबर्ग के दरबार के लोगों और ग्रामीण कुलीनों से लेकर किसानों, क़ैदियों और साइबेरिया-निर्वासन पर जा रहे क़ैदियों के चरित्रों के माध्यम से तत्कालीन रूस के समूचे वैविध्यपूर्ण सामाजिक परिदृश्य को एक इतिहासकार-सदृश वस्तुपरकता और अधिकार के साथ उपस्थित कर दिया गया है। कात्यूशा का मुक़दमा और उसमें जूरी सदस्य के रूप में नेख्लूदोव की उपस्थिति सामाजिक अन्याय पर आधारित जीवन की निरर्थकता और न्यायतंत्र की कुरूपता को एकदम नंगा कर देती है।
‘पुनरुत्थान’ में तोल्स्तोय सरकार, न्यायालय, चर्च, कुलीन भूस्वामियों के विशेषाधिकारियों, भूमि के निजी स्वामित्व, मुद्रा, जेलों और वेश्यावृत्ति की मर्मभेदी आलोचना करते हैं। घनी और शक्तिशाली लोगों द्वारा उत्पीड़ित निम्न वर्गों के प्रति सहानुभूति-प्रदर्शन पर उपन्यास तीखा व्यंग्य करता है। किसानों, क्रान्तिकारियों और निर्वासित अपराधियों सहित सामान्य जनसमुदाय का चित्रण करते हुए तोल्स्तोय का ज़ोर इस बात पर है कि उत्पीड़न और अधिकारहीनता ने आमजन की आत्मिक शक्तियों को पंगु बना डाला है।
Yeh Kothewaliya
- Author Name:
Amritlal Nagar
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आज के भारतीय समाज में वेश्याओं के जीवन का हिन्दी या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में, यह पहला विश्लेषणात्मक अध्ययन है। श्री अमृतलाल नागर ने बहुत समीप से और बहुत ही सहानुभूति से इस जीवन को देखा है, जिसे आम तौर पर रंगीन और ऐयाशी से पूर्ण समझा जाता है, लेकिन जो संघर्ष और निराशाओं से वैसे ही भरा है, जैसे कि अन्य सामान्य जीवन। इस अध्ययन में किसी उपन्यास से भी अधिक रोचकता है और सत्य पर आधारित होने के करण इसकी प्रमाणिकता अद्धितीय है। भारतीय समाज के अध्येताओं के लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक।
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