Seemayen Tootati Hain
(0)
Author:
Shrilal ShuklaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
299
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दुर्गादास को एक हत्या के जुर्म में जनमक़ैद हो गई है। उसके बाद ही मानवीय सम्बन्धों की हत्या के प्रयास और उन सम्बन्धों की सर्वोपरिता की यह कथा शुरू होती है। इसमें जिस बहुरंगी संसार की रचना हुई है, वहाँ वास्तविक संसार जैसा ही उलझाव है। उसकी विशृंखलता में एक ओर कोई तारानाथ पारम्परिक विश्वासों के सहारे व्यवस्था खोजने की कोशिश करता है और उस प्रक्रिया में अपने को खड़ा करने की ताक़त पाता है, दूसरी ओर कोई विमल किसी भी स्थिति के लिए अपने को पहले से तैयार न पाकर सिर्फ़ कुछ होने की प्रतीक्षा करता रहता है। और धर्म, प्रेम और अपराध-जैसी तर्कातीत वृत्तियों में बँधी हुई ज़िन्दगी इस अव्यवस्थित उलझाव से निरन्तर जूझती रहती है। अपराध-कथा के-से प्रवाहवाली यह रचना वास्तव में वृहत्तर जीवन की कथा है जो पाठक को सहज अवरोह के साथ अन्त तक लाते-लाते उसे मानवीय नियति की अप्रत्याशित गहराइयों में उतार देती है।</p> <p>सुविख्यात उपन्यास ‘राग दरबारी’ की रचना के पाँच साल बाद प्रकाशित होनेवाला श्रीलाल शुक्ल का यह उपन्यास उनकी अन्य कृतियों से सर्वथा भिन्न है और उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा के कई ऐसे आन्तरिक स्रोतों का परिचय देता है जिनका उपयोग हिन्दी कथा-साहित्य में प्रायः विरल है।
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दुर्गादास को एक हत्या के जुर्म में जनमक़ैद हो गई है। उसके बाद ही मानवीय सम्बन्धों की हत्या के प्रयास और उन सम्बन्धों की सर्वोपरिता की यह कथा शुरू होती है। इसमें जिस बहुरंगी संसार की रचना हुई है, वहाँ वास्तविक संसार जैसा ही उलझाव है। उसकी विशृंखलता में एक ओर कोई तारानाथ पारम्परिक विश्वासों के सहारे व्यवस्था खोजने की कोशिश करता है और उस प्रक्रिया में अपने को खड़ा करने की ताक़त पाता है, दूसरी ओर कोई विमल किसी भी स्थिति के लिए अपने को पहले से तैयार न पाकर सिर्फ़ कुछ होने की प्रतीक्षा करता रहता है। और धर्म, प्रेम और अपराध-जैसी तर्कातीत वृत्तियों में बँधी हुई ज़िन्दगी इस अव्यवस्थित उलझाव से निरन्तर जूझती रहती है। अपराध-कथा के-से प्रवाहवाली यह रचना वास्तव में वृहत्तर जीवन की कथा है जो पाठक को सहज अवरोह के साथ अन्त तक लाते-लाते उसे मानवीय नियति की अप्रत्याशित गहराइयों में उतार देती है।</p>
<p>सुविख्यात उपन्यास ‘राग दरबारी’ की रचना के पाँच साल बाद प्रकाशित होनेवाला श्रीलाल शुक्ल का यह उपन्यास उनकी अन्य कृतियों से सर्वथा भिन्न है और उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा के कई ऐसे आन्तरिक स्रोतों का परिचय देता है जिनका उपयोग हिन्दी कथा-साहित्य में प्रायः विरल है।
Book Details
-
ISBN9788171788279
-
Pages209
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: "कथा साहित्य के अंतर्गत कानन, अपर्णा, लीला कमल, बाँसों का झुरमुट तथा नाट्य-साहित्य के अंतर्गत अशोक वन, सत्यकाम, जिंदगी, आदमी, प्रतिध्वनि, देवी, नील झील आदि कृतियाँ जानकीवल्लभ शास्त्री के रचनाकार के उस प्रबुद्ध-सिद्ध गद्यकार पक्ष को उजागर करती है, जो अनेक कवियों के लिए एक कसौटी है। शास्त्रीजी का संस्मरण-साहित्य हिंदी साहित्य की वह अमूल्य निधि है, जिसके बीच से नहीं गुजरना एक सहज-सरल सारगर्भित भाव-निधि से वंचित रह जाना है। स्मृति के वातायन, निराला के पत्र, नाट्य-सम्राट् श्री पृथ्वीराज कपूर, हंसबलाका, कमर्क्षेत्रे: मरुक्षेत्रे, एक असाहित्यिक की डायरी और अष्टपदी आदि संस्मरण-साहित्य शास्त्रीजी का वैयक्तिक राग नहीं, जीवन का विराट् संदर्भ तथा चिंतन-मनन का संवेदनात्मक वह आरोह-अवरोह है, जिसमें पाठक स्वयं को आंतरिक और बाह्य रूपों में देख-समझ और जान सकता है। वैयक्तिक संदर्भों तथा अनुभूतियों को भी शास्त्रीजी ने जिस कुशलता से साहित्य बना दिया है, यह उनके चिंतनशील, मननशील एवं संवेदनशील सर्जक व्यक्तित्व की अन्यतम उपलब्धि है। आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री एक सजग, अनुरागी, पारदर्शी और सूक्ष्मदर्शी विश्लेषक-आलोचक भी हैं। इनके समीक्षा-साहित्य रचनात्मक, क्रियाशील और मूल्यांकनपरक विद्वान् आचार्य का साक्षात्कार कराता है। वैसे इनकी आलोचना महज आलोचना नहीं, रचनात्मक-आलोचना है। "
Punjab Ki Lokkathayen
- Author Name:
Phulchand Manav
- Book Type:

- Description: पंजाब की लोककथाएँ प्रेम और अनुराग के संबंधों में धड़कती शाश्वत कहानियाँ हैं। इसलिए कि भारत की आजादी से पहले, पाकिस्तान में स्थित क्षेत्रों में भी ये गूँज छोड़ रही हैं। लोकगीतों में इनके संदर्भ उभरते हैं—टप्पे, सिट्ठणियाँ, बोलियाँ, गिद्दे अथवा भाँगड़े के साथ हमें स्पंदित कर जाते हैं। 1966 में पंजाब से अलग होकर हरियाणा व हिमाचल के अस्तित्व में आने के बाद भी जो पंजाब आज है, उसमें लोककथाओं की भरपूर विरासत है। यहाँ मालवा, माँझा, दोआबा और पुआध अपनी मूल रंगत में दिपदिपा रहे हैं। सांस्कृतिक संपदा और पारंपरिक कथा-क्षेत्र में प्रेम-प्यार और लोक की लुभावनी गाथाएँ सुना रहे हैं। लोक-व्यवहार, लोक-परंपरा से लेकर लोक-गीतों में भी हमारे यहाँ कहानियों की भरमार है। हीर-रांझा, सस्सी-पुन्नू, शीरी-फरहाद या सोहनी-महिवाल से आगे कामकंदला जैसी सैकड़ों प्रेमकथाएँ हैं, जिनमें लोक-रंग गहरा उभरा है और इन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी हम सुनते आए हैं। पंजाबी भाषा के किस्साकारों ने अपनी रचनाओं में काव्य कौतुक दिखाकर दर्जनों चिट्ठे-किस्से, प्यार-गाथाओं एवं लोककथाओं के छपवाएँ हैं। शिव कुमार बटालवी की लूणा पूर्ण भगत को बयान करती लोककथा ही तो है। हिंदी पाठक पंजाब की लोककथाओं का आनंद ले पाएँ, प्रस्तुत संकलन इसी उद्देश्य से तैयार हुआ है।
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