Jagdish Chandra Mathur Rachanawali : Vol. 1-4
Author:
Jagdish Chandra MathurPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 4000
₹
5000
Available
जगदीशचन्द्र माथुर सृजनात्मक प्रतिभा के धनी थे। वे 14–15 वर्ष की आयु से ही लिखने लगे थे। नाटककार के रूप में विख्यात माथुर जी ने अपनी विशिष्ट शैली में चरित लेख, ललित निबन्ध और नाट्य–निबन्ध भी लिखे हैं। लेखन में उनकी इतनी रुचि थी कि जिन विभागों में उन्होंने काम किया उनकी समस्याओं के सम्बन्ध में भी बराबर लिखा। उनकी आरम्भिक रचनाएँ उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं—‘चाँद’, ‘भारत’, ‘माधुरी’, ‘सरस्वती’ और ‘रूपाभ’ में छपती थीं।
बिहार में शिक्षा सचिव के पद पर काम करते हुए उन्होंने कई सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थाओं की स्थापना की और उनमें गहरी रुचि ली। अपने विचारों और मूल्यों में श्री माथुर ग्रामीण और नागर, लोक और शास्त्रीय संस्कारों व परम्पराओं के समन्वय के पक्षधर थे। इस पक्षधरता का स्वर उनके साहित्य में पूर्णत: मुखर है। उन्होंने अपनी रचनाओं की प्रकृति, रचना–प्रक्रिया और अपने विचारों एवं विश्वासों के बारे में पुस्तकों की भूमिकाओं में बहुत–कुछ लिखा है, जो उनके साहित्य को समझने में सहायक है।
प्रस्तुत रचनावली उनके सम्पूर्ण रचनाकर्म को एक स्थान पर समेटने का प्रयास है। जगदीशचन्द्र माथुर रचनावली के इस खंड को चार भागों में बाँटा गया है। इसमें उनके एकांकी तथा दो कठपुतली नाटक संकलित हैं। पहले भाग में ‘मेरे सर्वश्रेष्ठ रंग एकांकी’, दूसरे में उनके दो एकांकी ‘भोर का तारा’ और ‘ओ मेरे सपने’, तथा तीसरे भाग में पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित स्फुट एकांकी हैं, इनमें ‘मेरी बाँसुरी’ और ‘लव–कुश’ जैसी आरम्भिक रचनाएँ हैं। चौथे व अन्तिम भाग में ‘कुँवर सिंह की टेक’ और ‘गगन सवारी’ दो कठपुतली नाटकों को रखा गया है।
ISBN: 9788183613170
Pages: 1536
Avg Reading Time: 51 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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बाद के तीस वर्ष उन्होंने धर्मलाभ और पुण्यलाभ के निमित्त सारे संसार पर न्योछावर कर दिए।
उपन्यास के कथानक, उपन्यासों के पात्रों, राजनगरों, राजधानियों, राज्यशैलियों, प्रचलित परम्पराओं, पात्रों के नामों, सामाजिक स्थितियों, परिस्थितियों, सामान्य नागरिकों की मन:स्थितियों, यात्राओं, धर्मसभाओं, न्यायालयों, नारी जगत की संवेदनाओं, ईर्ष्याओं, वैर-बदलों, उपसर्गों, परीषहों, मन्दिरों, मदिरालयों आदि का अध्ययन करने पर लगता है कि मनस्वी डॉ. रत्नेश ने पचासों उपन्यासों को इस एक उपन्यास में महावीर को अपना कथानायक बनाकर लिखने की कोशिश की है। श्री रत्नेश अपनी प्रवाहमयी भाषा के लिए जाने जाते हैं। उस काल के अनुरूप संवादों और व्यवहारगत भाषा का ध्यान उन्होंने बराबर रखा है।
डॉ. राजेन्द्र रत्नेश की पुस्तक ‘वर्द्धमान’ का समग्र लेखन जैन आगम, जैन इतिहास, जैन पुराण और जैन मान्यताओं के अध्ययन तथा आधारभूमि पर है। डॉ. रत्नेश ने अपनी आयु का स्वर्णकाल एक जैन श्रमण या जैन मुनि के रूप में जिया है। उन्होंने साधु जीवन और मुनि जन्म का शैलीगत पालन किया है। आज वे एक सद्गृहस्थ और मेधावी पत्रकार तथा लेखक हैं। अपने दीर्घ अनुभव और अध्ययन से वे यदि 'वर्द्धमान' जैसा मात्र पठनीय ही नहीं, अपितु मननीय ग्रन्थ अपने समाज को सौंपते हैं तो यह बहुत सुखद फलित है।
Salt And Pepper
- Author Name:
Achal Mogla
- Book Type:

- Description: Salt and Pepper is a collection of 7 thought-provoking short stories that attempt to touch the reader's heart. In today’s world, where time has become a scarcity and maintaining relationships is an art, the stories written here explore various emotions like sacrifice, love, hatred, and helplessness through their multiple characters in various forms. The feelings in the stories add a tinge of colours in numerous shades and add to the life recipe. This precisely a similar situation where just salt and Pepper, when added to food, change their taste altogether if in less or more. Sometimes the addition of both ingredients in the right proportions creates a perfect recipe, and if either one of them, salt or Pepper, is added in excess or fewer amounts can alter the taste of a recipe entirely. All the stories are bonded together where in the standard part are the range of emotions that are depicted, and the characters, while living out their lives daily, also go through the turmoil that their adventures bring along with them. The characters are complex, intriguing and yet beautiful in their way. A wife’s struggle and hard work for maintaining her pride and dignity intact.., a soldier’s sacrifice for his country and his family are coming to terms with that, a gift made by a young girl of her love without any conditions/strings attached, story of 2 people in love being United again by fate under different situations, misunderstanding between 2 people how it brings them closer to each other…..
His Flawless Love
- Author Name:
Pragna Rao
- Book Type:

- Description: Marriage! Is it a tradition? A legal agreement? A biological need? Or something besides all these? Tragedy strikes Isha’s life when she loses her fiancée to destiny. But happiness comes back into her life in the form of a good man who becomes her husband. However, the struggles of her memories and present situation go on, taking a toll on her new married life. Unable to carry on, she separates from her husband. And yet, the distance between them reminds her of her husband's unconditional love. She understands the significance of the marital vows and returns to be his best companion. Though destiny unceasingly challenges her, it also makes her stronger. Who wins the battle ultimately? Destiny or love?
Loktantra, Rajneeti Aur Dharma
- Author Name:
A. Surya Prakash
- Book Type:

- Description: यह पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार श्री ए. सूर्य प्रकाश के विगत अनेक वर्षों के दौरान प्रकाशित उनके लेखों का संग्रह है। उनके अधिकांश लेखों में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विषयों का उल्लेख रहता है, जो एक लंबी अवधि के दौरान सामने आए और भारत की राजनीति एवं शासन को प्रभावित किया। संविधान की कार्यप्रणाली और आजादी के बाद से ही लोकतंत्र के विस्तार में उनकी विशेष अभिरुचि रही है। इस कारण ही इस पुस्तक में ऐसे अध्याय शामिल हैं, जिनमें संवैधानिक विषयों, संसद की कार्यप्रणाली, न्याय-प्रणाली, कार्यपालिका और मीडिया की विशेष रूप से चर्चा की गई है। लेखक का मत है कि ऐतिहासिक तथ्यों को नकारना नेहरूवादी और मार्क्सवादी विचारधारा के लोगों का शौक रहा है। इन लोगों की ओर से लाई गई विकृतियों को वर्तमान राष्ट्रीय राजनीति के दौर में चुनौती दिए जाने और ठीक किए जाने की जरूरत है। इसकी झलक उनके लेखों में भी मिलती है, जिनमें धर्मनिरपेक्ष बनाम छद्म-निरपेक्ष की लगातार जारी बहस के साथ ही इस विषय पर छिड़े संग्राम की चर्चा है कि क्या राष्ट्रवादी है और क्या राष्ट्रविरोधी। किसी भी सूरत में, चाहे मुद्दा कोई भी हो, और बहस कितनी ही भीषण क्यों न हो, उनका मानना है कि यह सबकुछ संविधान के दायरे में ही होना चाहिए।
Sukhi Ghar Society
- Author Name:
Vinod Das
- Book Type:

- Description: v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main">‘सुखी घर सोसाइटी’ उपन्यास महानगर मुम्बई के उपनगर स्थित एक रिहाइशी परिसर का ऐसा वृत्तान्त है जिसमें क़स्बे के एक मुहल्ले की तरह विविधवर्णी जीवन की आपाधापी है, वहीं उसमें महानगर के अन्तर्द्वन्द्व, रहवासियों की हताशाएँ और उनके दैनिक संघर्ष की छोटी-छोटी ऐसी मार्मिक कथाएँ भी हैं जो रिसते ज़ख़्मों की तरह हमेशा उनके भीतर दुखती रहती हैं। लेकिन इसकी कथा-भूमि केवल महानगर तक सीमित नहीं है। इसमें गाँव से उखड़े हाशियों पर रहनेवालों की व्यथा-कथाएँ भी हैं जो महानगर पर्यटन के लिए नहीं, रोजी-रोटी के लिए आते हैं और हर दिन वहाँ तिल-तिल मरते हुए अपने गाँव लौटने का सपना देखते रहते हैं। विस्थापन की टीस, पानी की किल्लत, समय पर काम के लिए पहुँचने के लिए लोकल ट्रेन की रगड़ा-रगड़ी, बदबूदार सीवर की जानलेवा सफ़ाई, बार में नाचती देह बेचने की मजबूरी, स्थानीय भाषा न बोल पाने पर पिटाई-धुनाई जैसी तमाम ज़िल्लतों और घृणा के बीच मनुष्य अपने भीतर प्रेम सरीखी कोमल अनुभूति को किस तरह बचाता है, यह उपन्यास इसका अद्भुत आख्यान है। इसमें जहाँ मुम्बई के इतिहास की हल्की झलक है, वहीं देश की दरकती हुई लोकतान्त्रिक व्यवस्था का वर्तमान भी है। उपन्यास में वर्तमान और इतिहास की सहज आवाजाही हमें विस्मित करती है। इसे पढ़ते हुए जहाँ बार-बार इस बात की पुष्टि होती है कि इतिहास को बीते समय का कंकाल मानने से इसकी स्याह छायाएँ कई बार वर्तमान की ज़मीन को भी ऊसर बनाती हैं। हालाँकि, इसके कथ्य में समय की अनुभूति इतनी गहरी है कि वह ऐतिहासिकता भी रचती चलती है। सोसाइटी के बहुसंख्य फ़्लैटों की तरह इसकी कथा में विविध चरित्रों का रंगारंग संसार गुंफित है। इस उपन्यास का हर अध्याय अपने आप में एक स्वतंत्र कहानी पढ़ने का विरल अनुभव देता है जबकि हर अध्याय अपने में स्वायत्त होने के बावजूद अपने पूर्व के अध्याय की कोख से निकला भी लगता है। कहना न होगा कि काव्यात्मक भाषा में अपने समय की धड़कनों को जीवित यथार्थ की तरह अपनी रक्त की धमनियों में पढ़ना आज के अमानवीय दौर में मनुष्य बने रहने के लिए एक सकारात्मक कारवाई है जिसकी सृजनात्मक कसौटी पर विनोद दास का यह उपन्यास पूरी तरह खरा उतरता है।
Sardhana Ki Begham
- Author Name:
Rangnath Tiwari
- Book Type:

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Description:
ऐतिहासिक उपन्यास में अपने समय की कहानी होती है जिसमें विराट काल-पुरुष के आँसू और मुस्कान, समय की सीमा को लाँघकर अविकल रूप से छलकते रहते हैं।
‘सरधाना की बेग़म’ एक ऐतिहासिक उपन्यास है जिसमें बेग़म समरू और आयरिश सोल्जर जॉर्ज थॉमस की रूहानी कशमकश साकार हो उठी है।
‘सरधाना की बेग़म’ एक अजीबो-ग़रीब शख़्सियत। सियासत जिसके ख़ून में रची-बसी थी और मक्कारी जिसके वजूद का हिस्सा। मैदाने-जंग में वह जब मर्दाना भेष में अपनी कवायदी फ़ौज और लाव-लश्कर के साथ उतरती तो अच्छे-अच्छों के छक्के छूट जाते।
दिल्ली का बादशाह शाहआलम उसे अपनी बेटी कहता और शाहआलम के वकील-ए-मुतल्लक (वजीर) माधोजी सिन्धिया उसे अपनी समशिरा बहन अर्थात् सगी बहन कहते और जिससे राखी बँधवाते।
‘‘संगीत उसकी साँसों में था
और नृत्य की लय उसके तन-बदन में
सूफ़ी तसव्वुफ़ उसका ईमान था
और ईसा मसीह की प्रेम-संवेदना
उसकी कहानी इकादत’’
जाट, मराठा, पठान, जर्मन, फ़्रांसीसी, आयरिश तथा अंग्रेज़ जांबाज़ों के हौसलों को बार-बार चकमा देकर अपनी बहादुरी और हुस्नोजमाल का भरम क़ायम रखनेवाली क़यामत का नाम है—‘सरधाना की बेग़म’, जिसके ज़िक्र के बिना अठारहवीं शताब्दी के उत्तरी भारत की अन्दरूनी कहानी अधूरी रह जाती है।
Beech Mein Vinay
- Author Name:
Swayam Prakash
- Book Type:

-
Description:
अपनी प्रगतिशील रचना-दृष्टि के लिए सुपरिचित कथाकार स्वयं प्रकाश की विशेषता यह है कि उनकी रचना पर विचारधारा आरोपित नहीं होती, बल्कि जीवन-स्थितियों के बीच से उभरती और विकसित होती है, जिसका ज्वलन्त उदाहरण है यह उपन्यास। ‘बीच में विनय’ की कथा-भूमि एक क़स्बा है, एक ऐसा क़स्बा जो शहर की हदों को छूता है। वहाँ एक डिग्री कॉलेज है और है एक मिल। कॉलेज में अंग्रेज़ी के एक प्रोफ़ेसर हैं भुवनेश—विचारधारा से वामपंथी, मार्क्सवादी सिद्धान्तों के ज्ञाता। दूसरी तरफ़ मिल-मज़दूरों की यूनियन के एक नेता हैं—कॉमरेड कहलाते हैं, ख़ास पढ़े-लिखे नहीं। मार्क्सवाद का पाठ उन्होंने जीवन की पाठशाला में पढ़ा है। और इन दो ध्रुवों के बीच एक युवक है विनय—वामपंथी विचारधारा से प्रभावित। प्रोफ़ेसर भुवनेश उसे आकर्षित करते हैं, कॉमरेड उसका सम्मान करते हैं और उसे स्नेह देते हैं। वह दोनों के बीच में है लेकिन वे दोनों यानी कॉमरेड और प्रोफ़ेसर...तीन-छह का रिश्ता है उनमें—दोनों एक-दूसरे में, एक-दूसरे की कार्यशैली को नापसन्द करते हैं। विनय देखता है दोनों को और शायद समझता भी है कि यह साम्यवादी राजनीति की विफलता है। लेकिन उसके समझने से होता क्या है...
क़स्बे की धड़कती हुई ज़िन्दगी और प्राणवान चरित्रों के सहारे स्वयं प्रकाश ने यह दिखाने की कोशिश की है कि वहाँ के वामपंथी किस प्रकार आचरण कर रहे थे। लेकिन क्या उनका यह आचरण उस क़स्बे तक ही सीमित है? क्या उसमें पूरे देश के वामपंथी आन्दोलन की छाया दिखाई नहीं देती है? स्वयं प्रकाश की सफलता इसी बात में है कि उन्होंने थोड़ा कहकर बहुत कुछ को इंगित कर दिया है। संक्षेप में कहें तो यह उपन्यास भारत के साम्यवादी आन्दोलन की कारकर्दगी पर एक विचलित कर देनेवाली टिप्पणी है। एक उत्तेजक बहस। एक जड़ताभंजक और निर्भीक हस्तक्षेप।
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