Abhishapt
Author:
Dr. Kislay PandayPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
रणविजय ने अपने आपको प्रीलिम्स परीक्षा की तैयारी में पूरी तरह से झोंक दिया, जिसका नतीजा यह हुआ कि प्रीलिम्स की परीक्षा में वह अव्वल रहा। इस नतीजे ने उसका मनोबल और बढ़ा दिया। वह और भी उत्साह के साथ मुख्य परीक्षा की तैयारी में जुट गया। अपनी पहली उपलब्धि जब उसने अपने पिता जागीर सिंह को बताई तो वे खुशी के मारे फूले नहीं समाए, और जब यही खबर जागीर सिंह ने रणविजय की माँ को बताई तो उनकी आँखें खुशी से छलछला आईं।
तभी वह वार्ड बॉय हाथ में कुछ सामान लेकर हमारे पास आया। उसने रणविजय का नाम लिया तो मैंने हामी भर दी। जिसके बाद उसने वे चीजें हमारे बगल में रख दीं, जिसमें लकड़ी का एक डंडा था, जिसे रणविजय अपने आखिरी दिनों में सहारे के लिए इस्तेमाल करता था। एक पॉलिथिन में उसके कुछ कपड़े थे। एक डायरी थी, जिसमें शायद उसने कुछ नोट्स लिखे थे और एक पोटली जैसी कोई चीज थी, जिस पर रणविजय की माँ की निगाहें जाकर टिक गई थीं। उन्होंने उसी पल उस पोटली को उठा लिया और उसे सीने से लगाकर रोने लगीं। मैं समझ गया, शायद यह वही पोटली थी, जिसमें वे हर बार खाने के रूप में अपना प्यार बाँधकर अपने बेटे को देती थीं। बेटा खुद तो चला गया, मगर वह खाली पोटली माँ के लिए छोड़ गया, जिसे वे शायद दोबारा कभी नहीं भर पाएँगी।
—इसी पुस्तक से
अत्यंत भावपूर्ण उपन्यास, जिसके मुख्य पात्र के जीवन को लेखक ने खुद नए सिरे से जिया है। यह एक पुस्तक न होकर जीवन-दर्शन साबित होगी।
ISBN: 9789355210944
Pages: 160
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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पुस्तक के पहले खंड में पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, ऋषभ चरण जैन तथा मुनीश्वर दत्त अवस्थी की कहानियों के अलावा जिन कथाकारों की कहानियाँ शामिल हैं, उनके नाम हैं—यशपाल, लक्ष्मीचंद्र वाजपेयी ‘चन्द्र’, मुक्त, लीलावती बी.ए., जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’, आचार्य चतुर सेन शास्त्री, विश्वंभर नाथ शर्मा ‘कौशिक’ तथा प्रेम बंधु । इस खंड में ब्रजेन्द्र नाथ गौड़ का उपन्यास ‘पैरोल पर’ भी संकलित है। इस उपन्यास ने स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में क्रांतिकारियों के बीच नया उत्साह पैदा कर दिया था। आशा है, ये रचनाएँ स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी रचनाशीलता पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित करेंगी।
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- Description: सितारे रात में ही चमकते हैं या कहें कि हर सितारे का एक अँधेरा भी होता है। लेकिन दर्शक की नज़र अक्सर सितारों पर ही जाती है, उनके अँधेरों पर नहीं। यह प्रक्रिया हमारी फ़ितरत से भी सम्बन्ध रखती है, और सीमा से भी। शोभा डे इसी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करती हैं। वे उन अँधेरों को भी उघाड़कर देखती हैं, जिन्हें रोशनी ने छुपाया हुआ है। विडम्बना यह कि लेखिका की आँख से देखे और दिखाए गए ये अँधेरे 'बॉलीवुड' की जिन सच्चाइयों को उजागर करते हैं, उन्हें अक्सर ही 'गॉसिप' कहकर नकार दिया जाता है। लेखिका ने इस पुस्तक में मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया के जिन चरित्रों को चित्रित किया है, वे अमूर्त नहीं हैं। उन्हें पहचाना जा सकता है—ख़ासकर इसकी केन्द्रीय चरित्र आशा रानी को। यथार्थ और लेखकीय कल्पना के बावजूद उसे हम जीवित-जाग्रत अभिनेत्री के रूप में भी पहचान सकते हैं, और एक प्रतीकात्मक चरित्र के रूप में भी। उसके इर्द-गिर्द और भी कितने ही तारों-सितारों की पहचान की जा सकती है। दरअसल यह एक ऐसी रंगीन दुनिया है, जिसका उद्दाम आकर्षण किसी भी कलाकार को किसी भी हद तक ले जा सकता है। देह इस दुनिया में सिर्फ़ उपभोग और ऊँचाई पर पहुँचने का माध्यम है। निषेध और नैतिकता यहाँ सिर्फ़ शब्द हैं। स्त्री है, जो बिछी हुई है और पुरुष है, जो तना हुआ है। कहना न होगा कि अंग्रेज़ी से अनूदित शोभा डे की यह कृति हिन्दी पाठकों के लिए एक नया अनुभव होगा। अलग-अलग फ़िल्मी चरित्रों की पेशगोई के बावजूद इसे एक दिलचस्प उपन्यास की तरह पढ़ा जा सकता है।
Nanya
- Author Name:
Prabhu Joshi
- Book Type:

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Description:
प्रभु जोशी, हिन्दी गल्प जगत् के ऐसे अनूठे कथा-नागरिक हैं, जो सूक्ष्मतम संवेदनाओं के रेशों से ही, विचार और संवेदना के वैभव का वितान रचते हैं, जिसमें रचना का स्थापत्य, अपने परिसर में, समय के भूगोल को चतुर्दिक् घेर लेता है। यही वजह है कि उनकी लम्बी और औपन्यासिक आभ्यन्तर वाली लगभग सभी कथा-रचनाएँ, वर्गीकृत सामाजिकता के अन्तर्विरोधों के दारुण दु:खों को अपने कथ्य का केन्द्रीय-सूत्र बनाकर चलती आई हैं।
प्रस्तुत कथा-कृति ‘नान्या’, औपनिवेशिक समय के विकास-वंचित अंचल के छोटे से गाँव में एक अबोध बालक के ‘मनस के मर्मान्तक मानचित्र’ को अपना अभीष्ट बनाती हुई, भाषा के नाकाफ़ीपन में भी अभिव्यक्ति का ऐसा नैसर्गिक मुहावरा गढ़ती है कि भाषा के नागर-रूप में, तमाम ‘तद्भव’ शब्द अपने अभिप्रायों को उसी अनूठेपन के साथ रखने के लिए राज़ी हो जाते हैं, जो लोकभाषा की एक विशिष्ट भंगिमा रही है। कहने कि ज़रूरत नहीं कि हिन्दी गद्य में, मालवांचल की भाषिक सम्पदा से पाठकों का परिचय करानेवाले प्रभु जोशी निर्विवाद रूप से पहले कथाकार रहे हैं, जिनकी ग्राम-कथाओं के ज़रिए पाठकों ने सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध में इस क्षेत्र के यथार्थ को उसकी समूची जटिलता के साथ जाना। जबकि इस अंचल से आनेवाले पूर्ववर्तियों से यह छूटता रहा था।
अबोधता के इस अकाल समय में ‘नान्या’ की यह दारुण कथा जिस गल्पयुक्ति से चित्रित की गई है, उसमें प्रभु जोशी का कुशल गद्यकार, दृश्य-भाषा से रची गई कथा-अन्विति को, पर्त-दर-पर्त इतनी घनीभूत बनाता है कि पूरी रचना में कथा-सौष्ठव और औत्सुक्य की तीव्रता कहीं क्षीण नहीं होती। कहना न होगा कि यह हिन्दी गल्प की पहली ऐसी कृति है, जिसमें बाल-कथानायक के सोचने की भाषा के सम्भव मुहावरे में, इतना बड़ा आभ्यन्तर रचा गया है। इसमें उसकी आशा-निराशा, सुख-दु:ख, संवेदना के परिपूर्ण विचलन के साथ बखान में उत्कीर्ण हैं, जहाँ लोक-स्मृति का आश्रय, पात्र की बाल-सुलभ अबोधता को, और-और प्रामाणिक भी बनाता है। कहानी में यह वह समय है, जबकि नगर और ग्राम का द्वैत इतना दारुण नहीं था, और लोग ग्राम से पलायन में जड़-विहीन हो जाने का भय अनुभव करते थे। कथा में एक स्थल पर दादी की कथनोक्ति में यह सामाजिक सत्य जड़ों से नाथे रखने के लिए तर्क पोषित रूप में व्यक्त भी होता है कि ‘जब कुण्डी में पाणी, कोठी में नाज, ग्वाड़ा में गाय, और हाथ में हरकत-बरकत होय तो, गाँव का कांकड़ छोड़ के हम सेरगाम क्यों जावाँ?’
बहरहाल, नान्या अपनी दादी और बड़े ‘बा’ के बीच ही मानसिक गठन की प्रश्नाकुलता से भिड़ता हुआ, यक़ीनों की विचित्र और उलझी हुई गाँठों में, और-और उलझता हुआ, हमें रुडयार्ड किपलिंग, चेख़व और दॉस्तोयेव्स्की के बाल-पात्रों की त्रासदियों का पुनर्स्मरण कराता हुआ, करुणा और संवेदना की सार्वभौमिकता के वृत्त के निकट ला छोड़ता है। प्रभु जोशी के कथाकार की दक्षता इस बात में भी है कि ‘नैरेटर’ की उपस्थिति कलात्मक ढंग से ‘कैमोफ्लेज्ड’ कर दी गई है। नान्या की यह कथा, अपने भीतर के एकान्त में घटनेवाले आत्मसंवाद का रूप ग्रहण करती हुई इतनी पारदर्शी हो जाती है कि पाठक एक अबोध की त्रासदी के पास निस्सहाय-सा, व्यथा के वलय में खड़ा रह जाता है। कथा, काल-कीलित होते हुए भी, सार्वभौमिक सत्य की तरह हमारे समक्ष बहुत सारे मर्मभेदी प्रश्न छोड़ जाती है। विस्मय तो यह तथ्य भी पैदा करता है कि कथाकृति, काल के इतने बड़े अन्तराल को फलाँग कर, साहित्य के समकाल से होड़ लेती हुई अपनी अद्वितीयता का साक्ष्य रखती है।
Kaale Kos
- Author Name:
Balwant Singh
- Book Type:

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Description:
बलवन्त सिंह का रचनाकार न तो अतिरिक्त सामाजिकता से आक्रान्त रहता है और न ही कला और शिल्प के दबावों से आतंकित। अपनी सतत जागरूक और सचेत निगाह से वे अपने कथा-चरित्रों और कथा-भूमि के सबसे विश्वसनीय यथार्थ तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। शिल्प और संवेदना का द्वन्द्व उनकी रचनाओं में प्रशंसनीय सन्तुलन के साथ प्रकट होता है।
उनकी औपन्यासिक कृतियाँ अपने कलेवर में महा-काव्यात्मक गरिमा से परिपूर्ण होती हैं। दूसरी तरफ़ उनके पात्र भी अपने जीवन के चौखटे में अपनी भरपूर ऊर्जा के साथ प्रकट होते हैं। वे नुमाइशी और कृत्रिम नहीं होते, बल्कि जिन्दगी की अनिश्चितता और अननुमेयता से जूझते हुए, हाड़-मांस के साधारण, खुरदुरे लोग होते हैं जिनका वैशिष्ट्य एक ख़ास संलग्नता के साथ देखने पर ही दिखाई देता है। बलवन्त सिंह की रचनाएँ इस संलग्नता से बख़ूबी पगी हुई होती हैं।
‘काले कोस’ की पृष्ठभूमि में भी ऐसे ही लोगों की छवियाँ दिखाई देती हैं। पंजाब की धरती की ख़ूशबू में रसे-बसे और अपनी कमज़ोरियों-ख़ूबियों से जूझते ये लोग देर तक पाठक की स्मृति में अपनी जगह बनाए रखते हैं। यह कहानी पंजाब के बँटवारे से शुरू होकर फ़सादों में ख़त्म हो जाती है। लेकिन इस ख़त्म हो जाने के साथ ही पाठक के मन में जो कुछ छोड़ जाती है, वह एक ऐसी टीस है जो आज तक ख़त्म नहीं हो पाई है।
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