Vaikalpik Bharat Ki Talash
Author:
RavibhushanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 556
₹
695
Available
आज़ादी के बाद हमने एक नया भारत बनाने की योजनाएँ बनाई थीं। एक शोषणविहीन, स्वतंत्र, आत्मनिर्भर, समतामूलक भारत जहाँ न कोई किसी की दया का मोहताज हो, न किसी को किसी से भय हो, न धर्म के नाम पर लोग मरें, न जाति के नाम पर कोई समाज की मुख्यधारा से बाहर रहे। लेकिन ऐसा हो न सका।</p>
<p>कुल मिलाकर हम उतना आगे नहीं बढ़ सके, जितना अपेक्षित था। हममें से अनेक आज भी उस आज़ादी को तरस रहे जो उनके पुरखों ने गांधी, भगत सिंह की मौजूदगी में सोची थी। लोग बीमार हैं और अस्पतालों में उनके लिए जगह नहीं है, वो जिन्हें अपने उद्धारक प्रतिनिधियों के रूप में चुनकर संसद और विधानसभाओं में भेजते हैं, वो अगले दिन उन्हें पहचानने से इनकार कर देते हैं, जिस व्यवस्था के दायरे में वे अपने घर-परिवार के सपने बुनते हैं, वह एक दिन सिर्फ़ अपने लिए काम करती नज़र आती है।</p>
<p>वैकल्पिक भारत कोई दिमाग़ी शग़ल नहीं है। ज़रूरत है। जिन्हें अपने अलावा किसी भी और की चिन्ता है, वे सब इस ज़रूरत को महसूस करते हैं। रविभूषण सजग आलोचक और सरोकारों के साथ जीनेवाले विचारक हैं। इस पुस्तक में उनके उन आलेखों को शामिल किया गया है जो उन्होंने पिछले दिनों एक चिन्तनशील नागरिक और बौद्धिक के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए लिखे हैं।</p>
<p>पुस्तक का विषय-क्रम देश के समय को एक-एक चरण में पार करते हुए आज तक आता है। दादाभाई नौरोजी, विवेकानन्द से शुरू करते हुए वे आज़ादी, बाद की सत्ता और समाज के चरित्र पर आते हैं और अन्त राष्ट्रवाद पर करते हैं। वही राष्ट्रवाद जो आज उन तमाम ताक़तों का मुखौटा बना हुआ है जिन्हें अपने अलावा किसी भी और का बोलना पसन्द नहीं। जो हिंसा को अपने अस्तित्व का पर्याय मानते हैं, और जिन्हें जाने क्यों लगने लगा है कि यह देश सिर्फ़ उनका है।
ISBN: 9789387462434
Pages: 248
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Stree Adhyayan Ki Buniyad
- Author Name:
Pramila K.P.
- Book Type:

-
Description:
इस पुस्तक में स्त्री-विमर्श के शुरुआती इतिहास, और विश्व में विभिन्न चरणों में उसका विकास कैसे हुआ, इसका तथ्यात्मक ब्योरा दर्ज किया गया है। तदुपरान्त हिन्दी साहित्य, विशेषतया कहानी में आज यह विमर्श किस तरह व्यक्त हो रहा है, उसका भी बेबाक विश्लेषण किया गया है।
अठारहवीं सदी में यूरोप में शुरू हुआ नारीवादी चिन्तन कई धाराओं में विकास की मौजूदा स्थिति तक पहुँचा है। उदारवादी नारीवाद समाज के व्यापक सरोकारों को समेटकर चलता है तो उग्रवादी नारीवाद सामाजिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन का हिमायती रहा है। इनके साथ मार्क्सवादी तथा अश्वेत नारीवाद की धाराएँ भी रहीं, और समाजवादी नारीवाद भी देखने में आया। ग़रज़ कि उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में जो चिन्ता समूचे विश्व में सबसे व्यापक रही, वह स्त्री की अस्मिता, उसके अधिकारों के इर्द-गिर्द स्थित रही और इसका परिणाम है कि आज कुछ चिन्तक 21वीं सदी को स्त्रियों की सदी कह रहे हैं और नारीवादी विमर्श अलग-अलग समाजों में यौन-राजनीति के अलग-अलग पहलुओं को समझने के लिए जूझ रहा है।
यह पुस्तक इस विमर्श के बनने-बढ़ने के इतिहास को जानने-समझने में बेहद सहायक होगी।
Bhartendu Harishchandra Aur Hindi Navjagaran Ki Samasyayeen
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

-
Description:
लब्धप्रतिष्ठ प्रगतिशील आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने इस पुस्तक में आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के जीवन और साहित्य-सम्बन्धी जीवन्त तत्त्वों को ऐसे रूप में प्रस्तुत किया है कि आज की अनेक समस्याओं का भी समाधान मिल सके। भारतेन्दु-युगीन हिन्दी नवजागरण की समस्याओं पर विस्तार से विचार करते हुए इस पुस्तक में यह प्रतिपादित किया गया है कि भारतेन्दु हिन्दी की जातीय परम्परा के संस्थापक हैं और मुख्यतः उनकी बताई हुई दिशा में चलकर ही हमारा साहित्य उन्नति कर सकेगा।
पुरानी पत्र-पत्रिकाओं एवं दुर्लभ पुस्तकों में दबे पड़े अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्यों को पहली बार प्रकाश में लाकर डॉ. शर्मा ने भारतेन्दु का सर्वथा मौलिक चित्र पुनर्निर्मित किया है, जो बहुतों के लिए चौंकाने वाला सिद्ध हो चुका है।
दो अध्यायों में भारतेन्दु के नाटकों पर विस्तार से विचार करने के साथ, उनकी कविता, उपन्यास, आलोचना, निबन्धकला एवं पत्रकारिता का भी आलोचनात्मक परिचय दिया गया है। इस संस्करण के लिए विशेष रूप से लिखित ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ’ शीर्षक एक नए अध्याय ने पुस्तक को और भी संग्रहणीय बना दिया है।
वास्तव में भारतेन्दु साहित्य सम्बन्धी सभी पक्षों की प्रामाणिक जानकारी के लिए यह अकेली पुस्तक पर्याप्त है।
Hum Aniketan
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Pashchatya Sahitya Chintan
- Author Name:
Nirmala Jain
- Book Type:

- Description: पश्चिम में साहित्य-चिन्तन की सुदीर्घ परम्परा को हिन्दी के पाठकों के लिए प्रामाणिक और सहज ग्राह्य रूप में सुलभ कराने की दिशा में प्रस्तुत ग्रन्थ एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। प्लेटो से बीसवीं शताब्दी तक पाश्चात्य काव्य-चिन्तन में योगदान देनेवाले सभी महत्त्वपूर्ण विचारकों और प्रवृत्तियों का प्रामाणिक विवेचन इस रचना की विशेषता है; अकादमिक अनुशासन से एक साथ युक्त और मुक्त विश्लेषण-पद्धति इसका प्रमुख आकर्षण है। ग्रन्थ की सामग्री का आधार मूल स्रोत है। बक़ौल प्लेटो : ‘सत्य के अनुकरण का अनुकरण ग्रन्थ की विश्वसनीयता तथा लेखिका की प्रतिबद्धता’ का कारण भी यही है। प्रस्तुत कृति से इस विषय के सुधी पाठकों की बहुत बड़ी आवश्यकता की पूर्ति होती है।
Hindi Kahani : Antarvastu ka shilp
- Author Name:
Rahul Singh
- Book Type:

-
Description:
स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी के महत्त्वपूर्ण रचनाकारों के बहाने यह किताब कहानी आलोचना के इलाके की एक बड़ी कमी को पूरा करती है। कविता और उपन्यासों को लेकर छिटपुट ढंग से ही सही आलोचना का जैसा एक स्टैंड बनता है, कहानी को लेकर वैसा व्यवस्थित विचार अक्सर सामने नहीं आ पाता है। ऐसे में यह पुस्तक अपने तरीके से आजादी बाद के एक अहम कालखंड के कहानीकारों और उनकी रचनात्मकता के साथ कहानी के सामान्य परिदृश्य का एक दिलचस्प और अर्थवान खाका खींचती है।
वे कहानीकार जिन्होंने अपने कौशल से कहानी की क्षमता को बढ़ाया, अपने समय के सवालों से दो-चार हुए, और जो भारतीय समाज के बहुमुखी बदलाव को सफलतापूर्वक पकड़ सके, ऐसे सभी प्रमुख कथाकार यहाँ चर्चा के केन्द्र में हैं। जनवादी विचार से समृद्ध संजीव और स्वयं प्रकाश हों, भाषा को कलात्मक सूझ से बरतने वाले प्रियंवद और आनन्द हर्षुल हों, कहानी विधा की गहरी समझदारी रखनेवाले लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित रहे अरुण प्रकाश और नवीन सागर हों, दलित स्वानुभव से कहानी को समृद्ध करने वाले ओमप्रकाश वाल्मीकि हों या कहानी के क्षितिज पर परिघटना की तरह प्रकट होने वाले उदय प्रकाश, शिवमूर्ति, अखिलेश और योगेन्द्र आहूजा हों, सभी का एक आस्वादपरक क्रिटीक इस पुस्तक में शामिल है।
इन सभी कथाकारों ने अपने-अपने मोर्चे से मानवीय मूल्यों के पक्ष में लगातार संघर्ष किया, समय को समझने और समझाने के लिए घटनाओं और चरित्रों की एक बड़ी आकाशगंगा रची। निस्सन्देह आने वाले वक्त में उनकी रचनाएँ बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के भारत को समझने में दस्तावेजों की तरह काम आएँगी। प्रखर युवा आलोचक राहुल सिंह ने यहाँ संकलित एक-एक आलेख में प्रयास किया है कि प्रत्येक लेखक की अपनी विशेषताओं के रेखांकन के साथ उनके दौर के सामाजिक-राजनीतिक मिजाज को भी पकड़ा जा सके, और यह वे सफलतापूर्वक कर सके हैं।
Soor-Sahitya
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

-
Description:
“श्री हजारीप्रसाद भक्ति-तत्त्व, प्रेम-तत्त्व, राधाकृष्ण-मतवाद आदि के सम्बन्ध में जो भी उल्लेख-योग्य, जहाँ कहीं से पा सके हैं, उसे उन्होंने इस ग्रन्थ में संग्रह किया है और उस पर भली-भाँति विचार किया है, विचार का फलाफल उन्होंने स्पष्ट भाषा में ही लिखा है, इसका फल यह हुआ कि पुस्तक आराम के साथ, निश्चित, और आलस भाव से पढ़ने लायक़ नहीं हुई है। पद-पद पर चिन्ता और विचार करने की ज़रूरत है।
भारतीय धर्ममत के इतिवृत्त की आलोचना भी एक विपद है। एक, सब कुछ को अति प्राचीन सिद्ध करने की प्रवृत्ति और दूसरी, सब कुछ को अति अर्वाचीन सिद्ध करने की ज़िद। दोनों तरफ़ के इन दो पाषाण-संकटों के भीतर तरंग संकुल खर-स्रोत धरा में से भी द्विवेदी जी जो नैया खेकर घाट पर भिड़ा सके हैं, यह उनके लिए कम प्रशंसा की बात नहीं है।...”
—भूमिका से
Acharya Hazari Prasad Dwivedi Ki Jai Yatra
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी आलोचना के शिखर-पुरुष नामवर सिंह और उनके प्रेरणा-पुंज गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी मिलकर एक ऐसा प्रकाश-युग्म निर्मित करते हैं जिसकी रोशनी में बीसवीं सदी की न सिर्फ़ आलोचना-दृष्टि, बल्कि सम्पूर्ण रचना-दृष्टि अपना पथ प्रशस्त करती है।
यह पुस्तक इस युग्म की मनीषा का संयुक्त प्रक्षेपण है; इसमें नामवर सिंह की दृष्टि में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी आलोकित होते हैं और आचार्य द्विवेदी के आलोक में नामवर जी की इतिहास-प्रवर्तक आलोचक मेधा प्रकाशित। ये निबन्ध सिर्फ़ आलोचना से सम्बन्ध नहीं रखते, इनमें उपन्यास-सुलभ पठनीयता भी है और संस्मरण, रेखाचित्र और जीवनी जैसी जिज्ञासा-प्रेरक विवरणात्मकता भी। विचार, जैसाकि स्वाभाविक है, निरन्तर इन आलेखों की रीढ़ भी है, मांस भी और
त्वचा भी।
नामवर सिंह के व्यक्तित्व, दृष्टि और प्रतिभा का सबसे सघन और उज्ज्वल प्रतिफलन आचार्य द्विवेदी से सम्बन्धित लेखन में हुआ है, लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि वास्तव में आचार्य द्विवेदी ने जिस तरह बाणभट्ट के माध्यम से अपना अन्वेषण किया था, उसी तरह नामवर सिंह ने आचार्य द्विवेदी के माध्यम से अपनी दूसरी परम्परा की खोज की।
Jayasi : Ek Nai Drishti
- Author Name:
Raghuvansh
- Book Type:

-
Description:
प्रस्तुत पुस्तक जायसी साहित्य के अध्ययन-चिन्तन में एक नई दृष्टि की शुरुआत करती है। धर्म, दर्शन और आचरण की मूल्यपरक रचना-प्रक्रिया मानवीय संस्कृति की आन्तरिक प्रकृति है—इस ज्ञान के साथ उन्होंने पाया है कि इसी की अभिव्यक्ति मनुष्य की कलाओं और साहित्य में होती है।
प्रस्तुत पुस्तक के विभिन्न प्रकरणों में जायसी के जीवन, दार्शनिक चिन्तन, उनकी आध्यात्मिक दृष्टि, साधना की भाव-भूमि, मानवीय जीवन के सारे परिवेश के साथ उसके मूल्य प्रक्रिया के विविध पक्षों को विवेचित करने में लेखक ने सर्वथा नई दृष्टि से काम लिया है।
जायसी साहित्य के अध्येताओं के लिए डॉ. रघुवंश की यह पुस्तक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और उपयोगी है।
Hindi : Kuchh Nai Chunotiya
- Author Name:
Kailash Nath Pandey
- Book Type:

-
Description:
सुप्रसिद्ध कथाकार, ललित निबन्धकार डॉ. विवेकीराय अपनी एक सुप्रसिद्ध पुस्तक में
लिखते हैं कि—“डॉ. कैलाशनाथ पाण्डेय का लेखन गम्भीर विषयों का स्पर्श करता है। आप मूलत: भाषा-
वैज्ञानिक हैं।” ज़ाहिर है, कोई भी भाषा-वैज्ञानिक किसी भी भाषा पर निरपेक्ष दृष्टि से विचार करता है। डॉ.
पाण्डेय ने भी इस पुस्तक में वही किया है। इनका मानना है कि बाज़ार के दबाव के कारण कुछ समय के
लिए हिन्दी भले ही फलकजद हो जाए, किन्तु तमाम तरह के अन्तर्विरोधों के बावजूद आज भी यह इस देश
के बहुत बड़े जन समुदाय की लचीली और उदार भाषा है।
विस्तारवादी अंग्रेज़ी की अफ़ीम फाँक उसमें ऊभने-चूभनेवाले भले ही हिन्दी को ख़ालिस देसी और निठल्ली-
पिछड़ी, गँवारू-अवैज्ञानिक भाषा घोषित करने की मुनादी करें, पर यह सच है कि अपनी ताक़त के बल पर
इसने नई बन रही दुनिया में अपनी पुख़्ता और मुकम्मल जगह बना ली है। सच तो यह है कि हिन्दी ही
नहीं, प्रत्येक भारतीय भाषा को आज अमेरिका की भूमंडलीय शक्ति और ब्रिटेन की साम्राज्यवादी तथा
पूँजीवादी व्यवस्था की पोषक, संवेदना-रहित अंग्रेज़ी से जूझना पड़ रहा है। इस आयातित विदेशी भाषा के
साथ कई तरह के क्रूर और अनैतिक सम्बन्धों के अंधड़ भी इस देश में आ गए हैं। यही समय-समय पर
हिन्दी से ताल ठोंक उसे चुनौती देते रहते हैं। अत: ऐसी स्थिति में आज ज़रूरत है, हमें यह सोचने की, कि
स्वतंत्रता संग्राम की सांस्कृतिक, भू-राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर तेज़ आवर्त्त वाली भाषा हिन्दी का
स्वरूप कैसे बचा रह सके?
Kathakar Kamleshwar Aur Hindi Cinema
- Author Name:
Ujjwal Agrawal
- Book Type:

-
Description:
कमलेश्वर के साहित्यिक अवदान का विवेचन बारम्बार हुआ है, किन्तु दृश्य-
श्रव्य माध्यम में उनके योगदान पर दृष्टि नहीं डाली गई। यहाँ तक कि उनके टेलीविज़न धारावाहिकों पर यदा-कदा दृष्टिपात हुआ, लेकिन वर्तमान में सबसे प्रभावशाली कला माध्यम में उनके विराट योगदान को लगभग अनदेखा ही किया गया।
प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध कमलेश्वर के हिन्दी सिनेमा में विराट योगदान को रेखांकित करता है। इस तरह यह अप्रतिम कथाकार कमलेश्वर और हिन्दी सिनेमा के रचनात्मक अन्तर्सम्बन्धों का पहला विवेचनात्मक अध्ययन है। रिसर्च इन ह्यूमिनिटीज ऑफ़ इंडियन यूनिवर्सिटीज में हिन्दी से सम्बन्धित शोध में यह विषय अब तक अनुपस्थित है।
Shabd Aur Deshkal
- Author Name:
Kunwar Narain
- Book Type:

-
Description:
कवि और चिन्तक के रूप में कुँवर नारायण का हस्तक्षेप हिन्दी साहित्य में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वस्तुतः वे कविर्मनीषी के रूप में सर्वसमादृत हैं।
‘शब्द और देशकाल’ पुस्तक कुँवर नारायण की विचार-सम्पदा का एक अनूठा उदाहरण है। इसमें विभिन्न विशिष्ट अवसरों पर दिए गए उनके व्याख्यानों के साथ कुछ लेख भी उपस्थित हैं। भाषा, साहित्य, समाज, मीडिया, अनुवाद और अन्य प्रश्नों पर केन्द्रित उनके विचार ध्यानपूर्वक पढ़े जाने की माँग करते हैं। कुँवर जी की केन्द्रीय चिन्ता जीवन को समरस बनाने की है। इस क्रम में शाश्वत सन्दर्भों के साक्ष्य उभरते हैं। साथ ही, वर्तमान विश्व जिस अन्याय-अनाचार से त्रस्त है, उसके मानवीय समाधान की दिशाएँ भी प्रशस्त होती हैं।
‘साहित्य के सामाजिक सरोकार के माने’ में कुँवर जी कहते हैं, ‘इतना ही काफ़ी नहीं कि साहित्य जीवन के दैनिक और व्यावहारिक पक्ष से ही अपनी पहचान बनाए। अगर समाज का आत्मिक और नैतिक पक्ष भी नहीं उभरता तो साहित्य का काम अधूरा रह जाएगा।’
कुँवर नारायण बहुअधीत रचनाकार हैं। यही कारण है कि उनका लेखन देश और काल की सीमित और सुविदित परिधियों का विस्तार करता है। ‘विश्व विवेक’ के साथ चिन्तन करनेवाले कुँवर नारायण के ये आलेख पाठक को तात्त्विक रूप से बसंशोधित और समृद्ध करते हैं। स्मृति, विचार, रचना और बोध के विरुद्ध खड़े समय-समाज के सम्मुख कुँवर जी एक मानवीय पक्ष उद्घाटित करते हैं। पढ़े और गुने जाने योग्य एक संग्रहणीय पुस्तक।
Path Sampadan Ke Siddhant
- Author Name:
Kanhaiya Singh
- Book Type:

- Description: प्राचीन कवियों के पाठों का जैसा वैज्ञानिक सम्पादन चाहिए, वैसा हिन्दी में कम हुआ है। जायसी और तुलसी के पाठ-सम्पादन के महत्त्वपूर्ण कार्य हुए हैं। अन्य कवियों के पाठों के अभी इतने सन्तोषजनक परिणाम नहीं मिले हैं। भाषा विषयक शोध, ऐतिहासिक शोध तथा रचनाकार की साहित्यिक सैद्धान्तिक समालोचना के लिए सर्वप्रथम उसकी रचना का मूलपाठ स्थिर होना आवश्यक होता है। इस पुस्तक में पाठ-सम्पादन के सिद्धान्त और अन्य सहायक विषयों की चर्चा की गई है।
Muktibodh Ki Kavitaai
- Author Name:
Ashok Chakradhar
- Book Type:

-
Description:
मुक्तिबोध के कला-सिद्धान्त कविता को एक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया मानते हैं, उनकी कविताई इसका जागता जीता प्रमाण है। उनकी कविताई में भ्रमों से परिपूर्ण युगीन यथार्थ का जीवन-जाल तो मिलता है, पर उसकी बुनावट में रचनागत अर्थ का कोई भ्रम नहीं है।
जो महानुभाव कविता को प्राय: एक कलात्मक या शिल्पात्मक प्रक्रिया समझते हैं, उनके लिए तो मुक्तिबोध की कविताएँ निश्चित रूप से ‘जटिल’, ‘अधूरी’, ‘आत्मपरक अभिव्यक्ति’, ‘भयानक’ या ‘ऊबड़-खाबड़’ हो सकती हैं, किन्तु यदि हम मुक्तिबोध की रचना-प्रक्रियापरक समझ से परिचित हो लें और उनके सूत्र—‘कला एक सामाजिक प्रक्रिया है’—को आधार मानकर उनकी रचनाओं में जाने की कोशिश करें, तो प्रत्यक्ष पाते हैं कि मुक्तिबोध शब्द के असामाजिक प्रयोग के कवि नहीं थे। हाँ, इतना तो है ही कि उनके कथ्य की सार्थकता तभी पकड़ में आ पाती है, जब हम कविता के बारे में उनके स्वयं के दृष्टिकोण से रूबरू हो लें। ऐसा अगर हम कर लें तो उस ग़लती से भी बचा जा सकता है जो मुक्तिबोध के सन्दर्भ में जाने या अनजाने होती आ रही है।
इस पुस्तक में मुक्तिबोध की सैद्धान्तिक समीक्षाई के आधार पर उनकी छोटी-बड़ी ग्यारह प्रमुख कविताओं की व्यावहारिक समीक्षा की गई है। साथ ही एक साफ़-सुथरा रास्ता बनाने की कोशिश है कि जिस रास्ते पर चलकर मुक्तिबोध की कविताई तक पहुँचा जा सकता है।
अशोक चक्रधर मुक्तिबोध की कविताओं पर कार्य करनेवाले प्रारम्भिक लेखकों में गिने जाते हैं। यही कारण कि उनकी यह पुस्तक आज भी पाठकों के बीच अपने कई कारणों से अत्यन्त उपयोगी बनी हुई है।
Hindi Upanyas Ka Stree-Path
- Author Name:
Rohini Agrawal
- Book Type:

-
Description:
कहा जाता है कि आज की ज़मीन पर खड़े होकर पुरानी कृतियों का पाठ नहीं किया जाना चाहिए, ख़ासकर स्त्री एवं दलित दृष्टि से क्योंकि उस समय समाज स्त्री एवं दलित प्रश्नों को लेकर न इतना संवेदनशील था, न सजग। यह भी तर्क दिया जाता है कि लेखक अपने युग की वैचारिक हदबन्दियों के बीच रहकर ही अभिव्यक्ति की राह चुनता है। मुझे इस मान्यता पर आपत्ति है। एक, यदि युगीन वैचारिक हदबन्दियाँ ही रचना की घेरेबन्दी करती हैं, तब वह कालजयी कृति कैसे हुई? दूसरे, यदि साहित्यकार रचयिता/स्रष्टा है तो उसे अपनी गहन अन्तर्दृष्टि, उन्नत भावबोध और प्रखर कल्पना द्वारा वह सब साक्षात् करना है जो उसके अन्य समकालीनों की कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से बाहर छूट रहा है। सृजन के समय अन्तर्दृष्टि के पंखों पर सवार लेखक जब कल्पनाशीलता के आकाश में विचरण करता है तो सोलहों आने लेखक होता है। मुक्ति की आकांक्षा से दिपदिपाती उसकी चेतना जड़ता और पराधीनता, बन्धन और व्यवस्थागत दबावों का निषेध कर व्यक्ति को ‘मनुष्य’ रूप में देखने लगती है।
मनुष्य को केन्द्र में रखनेवाला, मनुष्य-संसार की गति, ऊर्जा और सपनों से स्पन्दित होनेवाला साहित्य निर्वैयक्तिक हो ही नहीं सकता। एक ठोस सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान मनुष्य और समाज की तरह साहित्य और साहित्यकार की भी है। लाख छुपाने की कोशिश करे इंसान, बड़े-बड़े दावों और डींगों के बीच अपनी क्षुद्रताओं और शातिरबाज़ियों को रंचमात्र भी नहीं छुपा पाता। लेखक भी इसका अपवाद नहीं।
पात्रों-स्थितियों-घटनाओं के ज़रिए बेशक वह नए वक़्त की आहटें लेने में सजग भाव से सन्नद्ध रहे, लेकिन इन्हें पाटती दरारों के बीच वह अभिव्यक्त हो ही जाता है। प्रेमचन्द से बहुत पहले पहली स्त्री शिक्षिका सावित्रीबाई फुले पर सड़े अंडे-टमाटर फेंककर स्त्रीद्वेषी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता रहा है पुरुष-समाज।
यह पुस्तक प्रतिष्ठित रचनाकारों के दायित्वपूर्ण योगदान को धुँधलाने की धृष्टता नहीं, आलोचना के पुंसवादी स्वर के बरअक्स स्त्री-स्वर को धार देने की कोशिश है। यों भी साहित्य शब्दों-पंक्तियों-पन्नों-जिल्द में बँधी हदबन्दियों का मोहताज नहीं कि लाइब्रेरियों में पड़ा सड़ता रहे। जब वह एक नई समाज-संस्कृति, विचार या चरित्र बनकर लौकिक जगत के बीचोबीच आ बैठता है, तब उसे नई चुनौतियों और नए बदलावों के बीच निरन्तर अपने को प्रमाणित भी करते रहना पड़ता है।
Rajbhasha Hindi Aur Asmitabodh
- Author Name:
Umesh Chaturvedi
- Book Type:

- Description: इस समय भाषा को लेकर बड़ा कोलाहल है। इसकी बड़ी वजह राजनीतिक पहचान की कामना में निहित जटिल संरचना है। जब-जब सत्ता का हिस्सा बंटने-बंटाने की गतिविधियां तेज होती हैं वे सारे तत्त्व खोजकर खड़े किए जाते हैं, जिनसे ‘अपने पक्ष’ का संघर्ष तेज हो सके। जैसे हिंदी को यों तो उर्दू के साथ मौसी की तरह कहते लोकप्रिय मंचों के मुहावरेकार तालियां लूटते हैं, लेकिन राजनीतिक लूट के वक्त यही वर्ग विशेष की पहचान निरूपित होने लगती है। चूंकि भाषा, मातृ भाषा, राष्ट्र भाषा जैसे प्रश्न भारत के संदर्भ में बहुत संवेदनशील रहे हैं, इसलिए हर कोई अपने अपने हिसाब से इन्हें सुलझाने का दावा करता है। क्षेत्रीय अस्मिताएं, स्थानीय राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं, अखिल भारतीय सांस्कृतिक स्वरूप, प्रशासनिक ताना बाना तथा इतिहास की छायाएं, सब मिलकर कभी कभी कारुणिक स्थिति बना देते हैं। ऐसे माहौल में जबकि राजा शिवप्रसाद और भारतेंदु से लेकर गांधी, लोहिया तक वैचारिक रूप से हमारे पास मौजूद हैं, फिलहाल कई तरह के वर्ग भाषा को लेकर सक्रिय हैं। एक वे हैं जो लुप्त होती भाषाओं के साथ उनकी सामाजिकी पर गहन शोध चिंतन कर रहे हैं। कुछ हैं जो ऊंची-ऊंची सभा-गोष्ठियों, मेलों, मंचों से शौर्यपूर्वक अपने पक्ष रेखांकित करते रहते हैं। कुछ वे हैं,जो समय-समय पर उठने वाले प्रश्नों को संबोधित कर उनकी जटिलताओं से आमजन को परिचित कराने की कोशिश करते हैं। उमेश चतुर्वेदी ने यह तीसरा रास्ता उचित ही चुना है। वे समय-समय पर हिंदी से जुड़ी ताजा हलचल का सत्य तलाशने की कोशिश करते हैं। इस तलाश में बड़ी स्थितियों के कारकों का परीक्षण हो जाता है और आम पाठक तक उलझी हुई रस्सी का सिरा भी खुल जाता है। जैसा कि सिद्ध है,आंदोलित कर देने वाली शब्दसेवा, आंदोलनकारी मुद्रा से हमेशा बेहतर होती है। उमेश चतुर्वेदी के हिंदी भाषा संबंधी आलेखों का यह संग्रह न सिर्फ इस उद्देश्य की पूर्ति करेगा, बल्कि उन सबको भी गहरा संतोष देगा जो आंदोलनकारी मुद्रा में नहीं, धरातल की सकर्मक क्रियाओं में आस्था रखते हैं। -यशवंत व्यास
Manak Hindi Ke Shuddh Prayog : Vol. 3
- Author Name:
Ramesh Chandra Mahrotra
- Book Type:

-
Description:
सशक्त अभिव्यक्ति के लिए समर्थ हिन्दी चाहिए।
इस नए ढंग के व्यवहार–कोश में पाठकों को अपनी हिन्दी निखारने के लिए हज़ारों शब्दों के बारे में बहुपक्षीय भाषा–सामग्री मिलेगी। इसमें वर्तनी की व्यवस्था मिलेगी, उच्चारण के संकेत–बिन्दु मिलेंगे, व्युत्पत्ति पर टिप्पणियाँ मिलेंगी, व्याकरण के तथ्य मिलेंगे, सूक्ष्म अर्थभेद मिलेंगे, पर्याय और विपर्याय मिलेंगे, संस्कृत का आशीर्वाद मिलेगा, उर्दू और अंग्रेज़ी का स्वाद मिलेगा, प्रयोग के उदाहरण मिलेंगे, शुद्ध–अशुद्ध का निर्णय मिलेगा।
पुस्तक की शैली ललित निबन्धात्मक है। इसमें कथ्य को समझाने और गुत्थियों को सुलझाने के दौरान कठिन और शुष्क अंशों को सरल और रसयुक्त बनाने के लिहाज़ से मुहावरों, लोकोक्तियों, लोकप्रिय गानों की लाइनों, कहानी–क़िस्सों, चुटकुलों और व्यंग्य का भी सहारा लिया गया है। नमूने देखिए, स्त्रीलिंग ‘दाद’ (प्रशंसा) सब को अच्छी लगती है, पर पुर्लिंग ‘दाद’ (चर्मरोग) केवल चर्मरोग के डॉक्टरों को अच्छा लगता है।…‘मैल, मैला, मलिन’ सब ‘मल’ के भाई–बन्धु हैं…(‘साइकिल’ को) ‘साईकील’ लिखनेवाले महानुभाव तो किसी हिन्दी–प्रेमी के निश्चित रूप से प्राण ले लेंगे—दुबले को दो असाढ़। ...अरबी का ‘नसीब’ भी ‘हिस्सा’ और ‘भाग्य’ दोनों है। उदाहरण—आपके नसीब में ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हैं। (जबकि मेरे नसीब में मेरी पत्नी हैं।)
यह पुस्तक हिन्दी के हर वर्ग और स्तर के पाठक के लिए उपयोगी है।
Premchand : Ek Talaash
- Author Name:
Shriram Tripathi
- Book Type:

-
Description:
‘प्रेमचन्द : एक तलाश’ रचनात्मक आलोचना का एक अनूठा उदाहरण है। आलोचक श्रीराम त्रिपाठी ने वस्तुत: हिन्दी और उर्दू में समानरूपेण समादृत अमर कथाशिल्पी मुंशी प्रेमचन्द को उनकी रचनाओं में तलाश किया है।
‘प्रस्तावना’ में श्रीराम त्रिपाठी लिखते हैं—जिस तरह कबीर हिन्दू–मुस्लिम के नहीं, समाज के निम्नतम, मगर मेहनतकश लोगों के साथ हैं, उसी तरह प्रेमचन्द हैं। वे न हिन्दी के हैं, न उर्दू के। वे हिन्दी–उर्दू के हैं। देवनागरी लिपि का मतलब हिन्दी नहीं होता और न फ़ारसी लिपि का मतलब उर्दू। प्रेमचन्द को समझने के लिए उनके श्रेष्ठतम से रू-ब-रू होना पड़ेगा। यह तभी सम्भव है, जब दोनों भाषाओं की रचनाओं की तुलना करके श्रेष्ठतम को छाँटकर अलग किया जाए और वही दोनों भाषाओं में अनुवादित होकर नहीं, लिप्यन्तरित होकर पहुँचे। मसलन, ‘ईदगाह’, ‘नमक का दारोग़ा’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ का उर्दू रूप निश्चित तौर पर हिन्दी रूप से श्रेष्ठ है। फिर, क्यों न हिन्दी पाठकों को वही मुहैया कराया जाए। आजकल हिन्दी की रचनाओं में धड़ल्ले से देशज, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी के शब्द आते हैं और ज़रूरत पड़ने पर उनके अर्थ फुटनोट में दे दिए जाते हैं, तो प्रेमचन्द के साथ ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता।
पुस्तक की सामग्री तीन खंडों में है—लिप्यन्तर, तुलना और समीक्षा। उपसंहार के अन्तर्गत भी अत्यन्त उपयोगी सामग्री है। उदाहरणार्थ, पुस्तक में विवेचित कहानियों की उर्दू व हिन्दी में प्रथम प्रकाशन की सूचना। साथ ही, इन कहानियों में आए उर्दू शब्दों के अर्थ। निस्सन्देह, प्रेमचन्द की रचनात्मक मानसिकता को समझने में यह पुस्तक एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
Bharat Itihas Aur Sanskriti
- Author Name:
Gajanan Madhav Muktibodh
- Book Type:

-
Description:
भारत : इतिहास और संस्कृति मुक्तिबोध की बहुचर्चित कृति है। 1962 में प्रकाशित होते ही यह विवादों में घिर गई थी। तत्कालीन मध्य प्रदेश शासन ने ‘भद्रता और नैतिकता के विरुद्ध’ ठहराते हुए इस पुस्तक को प्रतिबन्धित कर दिया था। पुस्तक पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में मुकदमा चला जिसने 1963 में निर्णय दिया कि पुस्तक के 10 आपित्तजनक अंशों को हटाकर ही इसका पुनर्प्रकाशन किया जा सकता है।
अदालती फैसले का पूरा सम्मान करते हुए आपत्तिजनक अंशों को हटाकर यह पुस्तक अब अपने समग्र रूप में प्रस्तुत है। मुक्तिबोध की इच्छा थी कि कम-से-कम सामान्य रूप में यह पुस्तक जनता के समक्ष रहे। प्रस्तुत संस्करण में यह प्रयत्न किया गया है कि जिस स्वरूप में यह लिखी गई थी हू-ब-हू उसी स्वरूप में पाठकों के सामने आए। समग्र पुस्तक का जो अनुक्रम मुक्तिबोध ने बनाया था अध्यायों के क्रम भी उसी के अनुसार रखे गए हैं।
मुक्तिबोध के अनुसार, यह इस अर्थ में इतिहास की पुस्तक नहीं है जैसाकि अमूमन इतिहास में राजाओं, युद्धों और राजनीतिक उलट-फेरों का विवरण रहता है। युद्धों और राजवंशों के ब्योरों में न अटककर उन्होंने अपने समाज और संस्कृति के विकास-पथ को अंकित करने पर जोर दिया है। वस्तुत: यह कृति मुक्तिबोध के उस सोच का परिणाम है जो अपने समूचे इतिहास और जातीय परम्परा के यथर्थवादी मूल्यांकन से पैदा हुआ था।
पुस्तक को लेकर उठे विवाद से जुड़े सभी महत्त्वपूर्ण दस्तावेज परिशिष्ट में रखे गए हैं; जिनमें पुस्तक के विरुद्ध पारित प्रस्ताव, मध्यप्रदेश शासन का प्रतिबन्ध आदेश, मुक्तिबोध का स्पष्टीकरण, हाई कोर्ट का निर्णय आदि शामिल हैं। इनसे पुस्तक का पूरा परिप्रेक्ष्य स्पष्ट होता है। साथ ही स्वातंत्र्योत्तर भारत में इतिहास की समझ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवालों पर भी रोशनी पड़ती है, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने इस पुस्तक के पहली बार प्रकाशित होने के समय थे।
Marx, Trotsaki Aur Ashiyayi Samaj
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

-
Description:
पुराने इतिहास का विवेचन वर्तमान काल की राजनीति से कहीं-न-कहीं जुड़ा होता है। इस इतिहास से देश के छात्रों और अध्यापकों को गहरी दिलचस्पी है। ऐसे काफ़ी लोग हैं जो साहित्य का अध्ययन करते हुए उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि को समझना चाहते हैं। जो लोग मार्क्सवादी ढंग से इतिहास का विश्लेषण करना चाहते हैं, उनकी संख्या बराबर बढ़ रही है। किन्तु शिक्षा केन्द्रों में अधिकतर मेलोत्ती, ऐंडरसन और बैरिंगटन मूर जैसे लेखकों की कृतियाँ ही उन्हें सुलभ होती हैं। इनके प्रभाव से वे मार्क्सवाद और त्रोत्स्कीवाद में भेद नहीं कर पाते। आशा है, इस तरह का भेद करने के लिए कुछ आवश्यक सामग्री उन्हें इस पुस्तक में मिलेगी।
यह पुस्तक पुराने इतिहास के प्रति सही दृष्टिकोण अपनाने के अलावा आज की अन्तरराष्ट्रीय परिस्थिति के विश्लेषण में भी सहायक हो सकती है।
Premchand Ke Upanyason Mein Samkalinta
- Author Name:
Rajnikant
- Book Type:

-
Description:
प्रेमचन्द के उपन्यासों में जिन राष्ट्रीय, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक आदि समस्याओं का चित्रण है, वे आज भी वर्तमान समाज में व्याप्त हैं। केवल उन समस्याओं के रूप या बाहरी मुखौटे मात्र बदल गए हैं, पर वास्तव में वे समस्याएँ आज भी मूल में वैसी ही हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में तीन खंड हैं। पहले खंड में उपन्यास के तत्त्वों का विवेचन हुआ है। इसके अन्तर्गत प्रधानत: कथानक पर प्रकाश डाला गया है इसके पश्चात् प्रथम खंड के दूसरे भाग में ‘प्रासंगिकता’ शब्द के तात्पर्य को स्पष्ट किया गया है।
द्वितीय खंड में प्रेमचन्द के सभी प्रमुख उपन्यासों का विवेचन किया गया है। इसके अन्तर्गत उन सभी उपन्यासों के ‘कथानक’ एवं ‘प्रासंगिकता’ का अध्ययन किया गया है।
तृतीय एवं अन्तिम खंड में प्रेमचन्द के सभी उपन्यासों की प्रासंगिकता का समग्र मूल्यांकन किया गया है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book