Bhasha Vigyan : Shyam Sundar Das
Author:
Shyam Sundar DasPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 480
₹
600
Available
Bhasha Vigyan : Shyam Sundar Das
ISBN: 9789389742336
Pages: 252
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Hindi : Kuchh Nai Chunotiya
- Author Name:
Kailash Nath Pandey
- Book Type:

-
Description:
सुप्रसिद्ध कथाकार, ललित निबन्धकार डॉ. विवेकीराय अपनी एक सुप्रसिद्ध पुस्तक में
लिखते हैं कि—“डॉ. कैलाशनाथ पाण्डेय का लेखन गम्भीर विषयों का स्पर्श करता है। आप मूलत: भाषा-
वैज्ञानिक हैं।” ज़ाहिर है, कोई भी भाषा-वैज्ञानिक किसी भी भाषा पर निरपेक्ष दृष्टि से विचार करता है। डॉ.
पाण्डेय ने भी इस पुस्तक में वही किया है। इनका मानना है कि बाज़ार के दबाव के कारण कुछ समय के
लिए हिन्दी भले ही फलकजद हो जाए, किन्तु तमाम तरह के अन्तर्विरोधों के बावजूद आज भी यह इस देश
के बहुत बड़े जन समुदाय की लचीली और उदार भाषा है।
विस्तारवादी अंग्रेज़ी की अफ़ीम फाँक उसमें ऊभने-चूभनेवाले भले ही हिन्दी को ख़ालिस देसी और निठल्ली-
पिछड़ी, गँवारू-अवैज्ञानिक भाषा घोषित करने की मुनादी करें, पर यह सच है कि अपनी ताक़त के बल पर
इसने नई बन रही दुनिया में अपनी पुख़्ता और मुकम्मल जगह बना ली है। सच तो यह है कि हिन्दी ही
नहीं, प्रत्येक भारतीय भाषा को आज अमेरिका की भूमंडलीय शक्ति और ब्रिटेन की साम्राज्यवादी तथा
पूँजीवादी व्यवस्था की पोषक, संवेदना-रहित अंग्रेज़ी से जूझना पड़ रहा है। इस आयातित विदेशी भाषा के
साथ कई तरह के क्रूर और अनैतिक सम्बन्धों के अंधड़ भी इस देश में आ गए हैं। यही समय-समय पर
हिन्दी से ताल ठोंक उसे चुनौती देते रहते हैं। अत: ऐसी स्थिति में आज ज़रूरत है, हमें यह सोचने की, कि
स्वतंत्रता संग्राम की सांस्कृतिक, भू-राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर तेज़ आवर्त्त वाली भाषा हिन्दी का
स्वरूप कैसे बचा रह सके?
Hindi Kahani : Prakriya Aur Path
- Author Name:
Surendra Chaudhary
- Book Type:

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Description:
कहानी को रचनाकर्म के साथ-साथ जीवन से जुड़ा मानकर लेखक एक निरन्तरता में इन्हें देखने की चेष्टा करता है। बदलती हुई प्रवृत्तियों और प्रक्रियाओं को वह इसका बाधक भी नहीं मानता है। उसका विश्वास है कि अनुभव की संश्लिष्टता ही रचना में आकर अपना अर्थ भी खोलती है और स्वयं उस अनुभव को भी बड़ा बनाती है।
अपनी प्रथम पुस्तक में उसकी यह शुरुआत हिन्दी आलोचना में चर्चा का विषय बन गई थी। ‘नई कहानी’ के उस दौर में इस पुस्तक के सम्बन्ध में यह चर्चा कम उत्साहवर्द्धक न थी।
वर्षों बाद भी लेखक की यह पुस्तक अपनी प्रासंगिकता ही बनाए नहीं रखती, बल्कि बदलते हुए इस कथा-दौर में कुछ पूर्वाशित प्रश्न खड़े करने के लिए भी स्मरण की जाती रही है। पाठ भाग में एक कहानी भी जोड़ी गई है। संक्षेप में कहा जाए तो हिन्दी कहानी की रचना-प्रक्रिया पर यह एक मुकम्मल किताब है।
Bharat Aur Europe : Pratishruti Ke Kshetra
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

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Description:
भारत और यूरोप दो ध्रुवान्तों का नाम है, एक-दूसरे से जुड़कर भी दो अलग-अलग वास्तविकताएँ। खींचकर या सिकोड़कर उन्हें मिलाया नहीं जा सकता। लेखन के प्रति ईमानदार रचनाकार के लिए इस वास्तविकता को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके बिना न सिर्फ़ युग-यथार्थ की पहचान असम्भव हो जाएगी बल्कि उसे उसकी विविधता के साथ रचना में अभिव्यक्त भी नहीं किया जा सकेगा, क्योंकि कोई भी लेखक सत्य की एकांगिता के सहारे यथार्थ का मुक्त द्रष्टा नहीं हो सकता।
‘भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र’ निर्मल जी के अपरम्परित सोच और निष्कर्षों को अपेक्षाकृत विकसित रूप में निरूपित करती है। भारत और यूरोप की अपनी-अपनी चिन्तन-परम्परा के मूल आधारों को व्याख्यायित करते हुए वे यहाँ उस रचनात्मकता की आलोचना करते हैं, जो अपने स्वाभाविक आधारों की उपेक्षा करती है। उनके अनुसार कला और साहित्य की प्रासंगिकता का सवाल अपनी सांस्कृतिक परम्परा से कटकर हल नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में उनके ही शब्दों को उद्धृत किया जाए तो “भारतीय परम्परा में कला और दुनिया के यथार्थ के बीच का सम्बन्ध हमेशा से ही कुछ पवित्र माना जाता रहा है। उसमें एक तरह की आवेगपूर्ण मांसलता रही है और मांसलता ऐन्द्रिक होने के बावजूद एक प्रकार की ईश्वरीय दिव्यता में आलोकित होती है...”
इस पुस्तक में शामिल ‘भारतीय संस्कृति और राष्ट्र’, ‘भारतीय जीवन की निराशाएँ’, ‘क्या साहित्य समाज से कट चुका है?’ और ‘आलोचना के भटकाव’ जैसे प्रश्नाकुल निबन्ध हमारी आज की चिन्ताओं तक आते हैं।
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