Samkalin Hindi Kahani : Antrang Parichay
Author:
C. M. YohannanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 320
₹
400
Unavailable
कहानी सदा लोकप्रिय रही है। इससे सम्बन्धित आन्दोलनों में भी पर्याप्त उछल-कूद रही है। ‘नयी कहानी’, ‘अकहानी’, ‘सहज कहानी’, ‘सक्रिय कहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘समान्तर कहानी’ फिर परवर्ती ‘सहज कहानी’ आदि आन्दोलनों ने कहानी को आलोचना के केन्द्र में बनाए रखा है, परन्तु कहानी तो कहानी होती है। इतना आवश्यक है कि विधा के आकर्षण को बनाए रखने के लिए इसके कलात्मक पक्ष में बदलाव आता रहता है। प्रस्तुति में अन्तर का बदलाव कहानी को रोचक बनाता है। प्रस्तुति का द्वन्द्व ही वस्तुत: किसी भी रचना को महान बनाता है। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में रचित कहानियाँ विषयवस्तु एवं कला की दृष्टि से तो ध्यान आकर्षित करती हैं परन्तु साथ ही बाज़ारवाद, भ्रष्टाचार, स्वार्थवाद, ढिंढोरावाद आदि प्रवृत्तियों के कारण जीवन-शैली के बदलाव को भी रेखांकित करती हैं।</p>
<p>प्रस्तुत पुस्तक इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक की कहानियों पर विस्तृत तथा सारगर्भित आलोचनात्मक टिप्पणी है। यह हिन्दी कहानी की दीर्घकालीन यात्रा का आलोचनात्मक सोपान है जो बिना खेमेबाज़ी के, सहज-सार्थक भाव से इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक के कहानीकारों एवं रचनाओं पर बेबाक, निष्पक्ष टिप्पणी करता है तथा कहानी-यात्रा के विकास को दक्षतापूर्वक सहेजता है।
ISBN: 9788180317774
Pages: 184
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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...परम्परा कोई विच्छिन्न क्रम नहीं है। उसका स्वाभाविक विकास निरन्तर होता रहता है। कई बार उसमें बड़े निर्णायक उभार दिखाई देते हैं, लेकिन वे स्वत: स्वतंत्र नहीं होते। वे बड़े वैचारिक द्वन्द्व के, सांस्कृतिक उथल–पुथल के प्रतिबिम्ब मात्र होते हैं। अनेक बार अतिरिक्त उत्साह के कारण हम बिना जाने ही अपनी परम्परा से विरासत में प्राप्त ज्ञान को व्यर्थ और अनुपयोगी मान बैठते हैं, जिससे हम उस शक्ति से वंचित हो जाते हैं जो हमारे साहित्य और सांस्कृतिक जगत की प्राण–धारा है।
डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी ने अपने आलोचनात्मक ग्रन्थ ‘भारतीय काव्यशास्त्र के नए क्षितिज’ में इसी शक्ति को, इसी प्राण–धारा को सुरक्षित रखने का गम्भीर प्रयास किया है। पुरातन मनीषा आज के साहित्यालोचन की कहाँ तक सहयात्री हो सकती है, यही मूल चिन्ता लेखक के सम्पूर्ण विश्लेषण में व्याप्त है।
लेखक ने अपने मंतव्य को कोरे सैद्धान्तिक कथनों में प्रकट न करके साहित्य के गम्भीर विश्लेषण के माध्यम से प्राचीन आचार्यों के वैचारिक मन्थन को सारग्राही, प्रौढ़ और आवश्यक सिद्ध किया है। यद्यपि विद्वान लेखक ने विभिन्न काव्य–सम्प्रदायों के आचार्यों का चिन्तन गवेषणापूर्ण ढंग से विश्लेषित किया है, किन्तु सर्वाधिक शक्तिशाली काव्य–सिद्धान्त के रूप में आचार्य आनन्दवर्द्धन रस–ध्वनि मत की अत्यन्त विशद और गूढ़ विवेचना को केन्द्र में रखा है।
आधुनिक काव्यशास्त्र के क्षेत्र में सक्रिय आलोचकों और समीक्षकों की सोच की व्यापक पड़ताल, उनके मतों की भारतीय सन्दर्भों में समीक्षा के द्वारा लेखक ने पुरातन चिन्तन की सार्थकता को सिद्ध करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। इसी के साथ पौरस्त्य और पाश्चात्य की वैचारिकता के प्रस्थान बिन्दु, इलियट, क्रोचे आदि मनीषियों के अवदान की चर्चा ने ग्रन्थ की उपादेयता और बढ़ा दी है।
Ghananad Ka Kavya
- Author Name:
Ramdev Shukla
- Book Type:

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Description:
घनानन्द के काव्य में भावस्थितियों के विकास का कोई क्रम बना-बनाया नहीं मिलता, किन्तु उनके शृंगार-काव्य में उसे ढूँढ़ना कठिन भी नहीं है। प्रिय के असाधारण रूप के प्रति आश्रय की रीझ, पूर्वराग की आवेगदशा, असाधारण सुख के अतिरेक के साथ रंकवत लालसा की सीत्कार और ‘शुद्ध सामीप्य’ जैसी तन्मयता वाला संयोग और उस संयोग के बाद स्वभावतः तीव्र विरहानुभूति, यह सब कुछ उनके काव्य में है।
घनानन्द में अतृप्ति है तो इस स्तर की है। इसके आधार पर इनको प्रेम का सुख न प्राप्त कर सकनेवाला भाग्यहीन नहीं घोषित किया जा सकता।
प्रेम के ऐसे विलक्षण अनुभव के बाद ही घनानन्द का विरह इतना तीव्र आवेगमय, इतना करुण और इतना गम्भीर हो सका है कि संसार की दृष्टि में प्रेम के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक मीन और पतंग इनके सामने कायर और कपूत होकर हर जाते हैं।
घनानन्द के काव्य के शिल्प-पक्ष के सम्बन्ध में भी ऐसे ही निष्कर्ष निकाले गए हैं : ‘कवि की प्रवृत्ति अपने हृदय की परत खोलने की अधिक होती है, अपनी उक्ति को सजाने-सँवारने की कम।’
Aalochana Se Aagey
- Author Name:
Sudhish Pachauri
- Book Type:

- Description: उत्तर-आधुनिकतावाद हिन्दी में अब एक निर्णायक विमर्श बन चला है और उत्तर-संरचनावादी ‘पाठ’ की रणनीतियाँ हिन्दी साहित्य की उपलब्ध व्याख्याओं में नए-नए विपर्यास और उपद्रव पैदा कर रही हैं। विखंडनवादी पाठ-प्रविधियों ने हिन्दी में नव्य-समीक्षा को रिटायर कर दिया है। ‘आलोचना’ पद भी, अपनी व्यतीत आधुनिकतावादी प्रकृति और उत्तर-संरचनावादी रणनीतियों की मार के चलते, संकटग्रस्त होकर संदिग्ध हो चला है। ये दिन आलोचना के ‘विमर्श’ में बदल जाने के दिन हैं। विमर्श जो ‘अर्थ’ का ‘उत्पादन’ ही नहीं करते, उन्हें ‘संगठित’ भी करते हैं और अनिवार्यत: सत्तात्मक होते हैं। विमर्श वस्तुत: आलोचना का विखंडन है, इसीलिए आलोचना से आगे है। सुधीश पचौरी ने उत्तर-आधुनिकतावादी और उत्तर-संरचनावादी विमर्शों को हिन्दी में स्थापित किया है। लगभग दो दशक के सभी अग्रगामी विमर्श, इन उत्तर-आधुनिकतावादी और उत्तर-संरचनावादी पदावलियों से उलझते-सुलझते चलते हैं। समाजशास्त्रों में इन्हें लगातार जगह मिल रही है। साहित्य अध्ययन में, पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों में और शोधों में ये विमर्श निर्णायक होने लगे हैं। ये वर्तमान की माँग हैं और उसका भवितव्य भी। सुधीश पचौरी की यह किताब हिन्दी के जागरूक पाठकर्ताओं के लिए एक ज़रूरी किताब है।
Ramrajya Ki Katha
- Author Name:
Yashpal
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Description:
इस देश की जनता ने ब्रिटिश साम्राज्यशाही के शोषण और दासता से मुक्ति के लिए बहुत लम्बे समय तक संघर्ष किया है। भारत की जनता के इस संघर्ष का नेतृत्व भारतीय मुख्यतः राष्ट्रीय कांग्रेस के हाथ में था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व प्रकट तौर पर गांधी जी के हाथ में था, इसलिए कांग्रेस की नीति गांधीवाद के सत्य-अहिंसा के सिद्धान्तों के अनुकूल रही है। भारतीय जनता के संघर्ष का उद्देश्य कांग्रेसी राज बना देने के लिए गांधी जी ने उसे 'रामराज्य' का नाम दे दिया था। कांग्रेस के राज्य को रामराज्य का नाम देने का प्रयोजन था—भगवान राम को सत्य, न्याय और अहिंसा द्वारा अपने सभी दफ़्तरों, अदालतों और जेलों में ‘अहिंसा के अवतार’ गांधी जी के चित्र लटकाकर इन चित्रों के ही नीचे निराकुश और निस्संकोच रूप में धाँधली और दमन करना।
सम्भवतः कांग्रेसी सरकार गांधीवाद को सत्य प्रमाणित करने के लिए संसार को यह दिखाना चाहती रही कि रामराज्य की व्यक्तिगत स्वामित्व की और स्वामी वर्ग द्वारा दास वर्ग पर दया कर उसका पालन करने की नीति समाजवाद की अपेक्षा अधिक सत्य है।
Visthapan Ka Sahityik Vimarsh
- Author Name:
Achala Pandey
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- Description: आज पूरी पृथ्वी ‘ग्लोबल वार्मिंग' की चपेट में है, जिसका प्रमुख कारण औद्योगीकरण भी है। जितनी मजबूरी आधुनिक जीवन के लिए औद्योगीकरण है उससे अधिक ज़रूरी जीवन के लिए पर्यावरण है। यदि जीवन पर संकट उत्पन्न होगा तो किसी भी तरह के उद्योग की प्रासंगिकता समाप्त हो जाएगी। यह सन्दर्भ-ग्रन्थ इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि औद्योगीकरण से उत्पन्न जो समस्या है, वह जीवन के प्रति कितनी भयावह है। पूँजीवाद एवं औद्योगीकरण के आविर्भाव के साथ विकास के अवसर, प्रकारान्तर से उसकी गति भी बढ़ी। नई अर्थव्यवस्था पुरानी सामन्तवादी अर्थव्यवस्था से गुणात्मक रूप से भिन्न थी, क्योंकि इसमें एक ही जगह पर बहुसंख्यक व्यक्ति एक ही प्रकार का कार्य करते थे। शनैः-शनै: उसके आसपास अन्य कार्य करने हेतु उपक्रम लगते गए और इस प्रकार उद्योगों का एक संकुल एक वृहत् क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से अस्तित्व में आया। स्पष्ट है कि ऐसे संकुल तभी विकसित हुए होंगे, जब उन भूखंडों, जहाँ पर उद्योग लगे होने के स्वामी वहाँ से विस्थापित हुए हाँगे। इन नवीन उद्योगों में कार्य करने हेतु श्रमिक निश्चित ही दूसरी जगहों से विस्थापित होकर ही आए होंगे। इन समस्याओं के कारण विशुद्ध विस्थापन के तथ्य को नहीं माना जा सकता। समस्याओ के लिए निश्चित ही कहीं-न-कहीं पूँजीवाद एवं औद्योगीकरण उत्तरदायी थे। इसलिए विस्थापन की समस्या की सम्यक् विवेचना हेतु आवश्यक विस्थापन अपने आप में अत्यन्त सारगर्भित, बहुअर्थी अवधारणा है।
Tulsi : Mulyankan (lok)
- Author Name:
Rammurti Tripathi
- Book Type:

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Description:
प्रस्तुत मूल्यांकनमाला हिन्दी के विशिष्ट और श्रेष्ठ आलोचकों द्वारा लिखी गई सामग्री का एकत्र महत्वपूर्ण संकलन है जो रचनाकार और उसकी कृतियों का अनेक कोणों से एक समग्र और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। हिन्दी साहित्य के अध्येताओं, आलोचकों और विद्यार्थियों के लिए यह सामग्री पुस्तकाकार संपादित प्रकाशित होकर सामने आ रही है।
तुलसीदास विश्व के श्रेष्ठतम कवियों में हैं। अपने ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को ही नहीं सामाजिक मूल्यों को भी सम्प्रेषित किया है। अनुभव की अद्वितीयता और भाषा की सरलता की दृष्टि से रामचरितमानस उनके कवि व्यक्तित्व को राष्ट्रीय व्यक्तित्व में बदल देता है। उनकी विनम्रता ही उनकी महानता का प्रमाण है। अपने समकालीन साहित्य के प्रति अति सजग तुलसी, लोकजीवन से प्राप्त अनुभव को सामान्यीकृत करके जनता के सलाहकार बन गये हैं।
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