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बीसवीं सदी में आलोचना की अनेक धारणाओं का विकास हुआ है जिनमें भाषागत और शैलीगत आलोचना, अस्तित्ववादी आलोचना, मिथकीय आलोचना को गिना जाता है। इनके मूल में आधुनिकता की चुनौती है और इनमें आपसी विरोध भी है। हर धारणा की अपनी-अपनी उपलब्धियाँ और सीमाएँ भी हैं जिनका विश्लेषण और विवेचन अनेक दृष्टियों से किया गया है। आलोचना की इन धारणाओं और दृष्टियों का अपना-अपना इतिहास और विकास है जिनकी राह से गुज़रकर एक बात रोशन होने लगती है कि इनका विकास कविता को लेकर अधिक हुआ है, उपन्यास, कहानी और नाटक को लेकर कम। यह शायद इसलिए कि कविता में आधुनिकता की चुनौती का अधिक सामना किया गया है और इसकी आलोचना की परम्परा भी अधिक लम्बी है। नाटक की आलोचना की परम्परा भी काफ़ी पुरानी है। उपन्यास और कहानी की विधा हाल की है और हाल में उपन्यास और कहानी की आलोचना के अन्दाज़ और मिज़ाज भी बदले हैं। आधुनिकता के बोध ने अरस्तू आदि के सिद्धान्तों पर नई रोशनी भी डाली है; लेकिन भारतीय काव्यशास्त्र पर रोमांटिक बोध की छाप तो लग चुकी है, आधुनिकता की दृष्टि से इसका फिर से आँका जाना अभी शेष है। इस तरह आलोचना फिर से अपने अस्तित्व को क़ायम रखने के लिए, अपनी अस्मिता को जानने-पहचानने के लिए अनेक दिशाओं में भटकने की गवाही दे रही है। इस पुस्तक में समकालीन आलोचना में आधुनिकता की खोज, उसे समझने और रेखांकित करने के प्रयासों का जायज़ा लिया गया है। चार प्रमुख साहित्यिक विधाओं की आलोचना का ऐतिहासिक और वैचारिक विश्लेषण करते हुए यह जानने की कोशिश की गई है, कि हिन्दी की आलोचना आधुनिकता को किस रूप में और किस हद तक पहचान पा रही है।

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बीसवीं सदी में आलोचना की अनेक धारणाओं का विकास हुआ है जिनमें भाषागत और शैलीगत आलोचना, अस्तित्ववादी आलोचना, मिथकीय आलोचना को गिना जाता है। इनके मूल में आधुनिकता की चुनौती है और इनमें आपसी विरोध भी है। हर धारणा की अपनी-अपनी उपलब्धियाँ और सीमाएँ भी हैं जिनका विश्लेषण और विवेचन अनेक दृष्टियों से किया गया है।

आलोचना की इन धारणाओं और दृष्टियों का अपना-अपना इतिहास और विकास है जिनकी राह से गुज़रकर एक बात रोशन होने लगती है कि इनका विकास कविता को लेकर अधिक हुआ है, उपन्यास, कहानी और नाटक को लेकर कम। यह शायद इसलिए कि कविता में आधुनिकता की चुनौती का अधिक सामना किया गया है और इसकी आलोचना की परम्परा भी अधिक लम्बी है। नाटक की आलोचना की परम्परा भी काफ़ी पुरानी है। उपन्यास और कहानी की विधा हाल की है और हाल में उपन्यास और कहानी की आलोचना के अन्दाज़ और मिज़ाज भी बदले हैं।

आधुनिकता के बोध ने अरस्तू आदि के सिद्धान्तों पर नई रोशनी भी डाली है; लेकिन भारतीय काव्यशास्त्र पर रोमांटिक बोध की छाप तो लग चुकी है, आधुनिकता की दृष्टि से इसका फिर से आँका जाना अभी शेष है। इस तरह आलोचना फिर से अपने अस्तित्व को क़ायम रखने के लिए, अपनी अस्मिता को जानने-पहचानने के लिए अनेक दिशाओं में भटकने की गवाही दे रही है।

इस पुस्तक में समकालीन आलोचना में आधुनिकता की खोज, उसे समझने और रेखांकित करने के प्रयासों का जायज़ा लिया गया है। चार प्रमुख साहित्यिक विधाओं की आलोचना का ऐतिहासिक और वैचारिक विश्लेषण करते हुए यह जानने की कोशिश की गई है, कि हिन्दी की आलोचना आधुनिकता को किस रूप में और किस हद तक पहचान पा रही है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
1975
Weight
360 grams
ISBN-13
9788183618731
Pages
184
Reading time
~6 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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