Nirala Ki Kavityan Aur Kavyabhasha
Author:
Rekha KharePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Available
प्रस्तुत पुस्तक में काव्यभाषा के संवेदनात्मक स्तर पर रचना-प्रक्रिया के जटिल और संश्लिष्ट स्वरूप के परीक्षण का प्रयत्न किया गया है। निराला की स्थिति सभी छायावादी कवियों में विशिष्ट रही है। उनका काव्य-व्यक्तित्व सबसे अधिक गत्यात्मक, प्रखर तथा अन्वेषी रहा है, जिसका जीवन्त साक्ष्य प्रस्तुत करती है उनकी काव्यभाषा। काव्यभाषा को लेकर निराला के मानस में रचनात्मक बेचैनी उनके विविध और गतिशील भाषा-स्वरों में देखी जा सकती है। व्यक्ति के रूप में तो एक लम्बे अरसे तक वे उपेक्षित रहे, कवि के रूप में भी उनकी प्रतिभा को सही रूप में बहुत समय तक नहीं पहचाना गया। बाहर मैं कर दिया गया हूँ। ‘भीतर, पर, भर दिया गया हूँ’, में कवि के इस मानसिक द्वन्द्व की ध्वनि सुनी जा सकती है।
ISBN: 9789352210640
Pages: 208
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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उन्हीं के शब्दों में : नवाँ दशक नए तक पहुँचने की आँधीनुमा चाल का काल है। इस काल में बहुत कुछ अतीत का अंग होकर अप्रासंगिक होने के लिए अभिशप्त है। यहाँ एक स्थिति दूसरी स्थिति को बहुत तीव्रता से अपदस्थ कर रही है। यह सांस्कृतिक स्पन्दनों, मानवीय सम्बन्धों और पृथ्वी के नए सिरे से परिभाषित होने की घड़ी है। यह 'विचारधारा पर विचार' का समय है। यह वैश्वीकरण के तीव्र प्रवाह में अपनी जड़ें और प्राचीन रुचियाँ गँवाकर बाज़ार में गड्डमड्ड हो जाने का वर्तमान है। इस दौर का साहित्य मूलत: बाज़ार में रहकर बाज़ार-विरोध या अधिक तर्कयुक्त ढंग से कहें तो बाज़ारवाद-विरोध का साहित्य है।
इस महादृश्य में हिन्दी कविता ने अपने काम को बहुत फैला लिया। उसने अपने दायरे से बाहर देखना शुरू किया। उसने अपनी और अपने से गुज़र रहे जन की आँखें पीछे की ओर भी उत्पन्न कीं और इस प्रकार वास्तविक शत्रुओं की शिनाख़्त की। उसका काम कम से चलना बन्द हो गया। वह हाशियों तक फैलती चली गई। वह गति के साथ रही और यथार्थ के भी। वह सही अर्थों में समकालीन रही और उसने अपने ठीक पहले की कविता से बहुत अलग नज़र आने के कार्य भार को भी तरजीह दी।
अविनाश मिश्र ने इन आलेखों में इस निर्णायक कविता-समय को उसी समग्रता में पकड़ा है जिसकी ज़रूरत इस कार्यभार के लिए थी। पूर्व-कथन के रूप में एक लम्बा आलेख इस पुस्तक के लिए उन्होंने विशेष तौर पर लिखा है जिसमें बीसवीं सदी के अन्तिम वर्षों में सामने आए कवियों पर एक विहंगम दृष्टि डाली है। पुनः उन्हीं के शब्दों में हिन्दी आलोचना पर यह भी एक आक्षेप है कि वह प्राय: प्रतिष्ठित को प्रतिष्ठित और उपस्थित को उपेक्षित करती/रखती है। इस अर्थ में यह आलोचना-पुस्तक पूर्णत: उपस्थित को सम्बोधित है।
Gandhi Aur Kala Tatha Anya Nibandh
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Raman Sinha
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- Description: भारतीय कलाओं, उनकी परम्पराओं और भाव-पक्ष पर सुनियोजित ढंग से विचार करने वाली ‘गांधी और कला तथा अन्य निबन्ध’ पुस्तक डॉ. रमण सिन्हा के समय-समय पर लिखे गए निबन्धों और व्याख्यानों का संकलन है। ‘गांधी और कला’ शीर्षक सुदीर्घ निबन्ध इसकी विशेष उपलब्धि है जिसमें कलाओं को लेकर गांधी की दृष्टि और विभिन्न कलाओं में गांधी व उनके विचारों के अंकन को अलग-अलग कोणों से देखा गया है। कलाओं की आन्तरिक परस्परता को भारतीय कला-दृष्टि की विशिष्टता बताते हुए यह पुस्तक उन कला-रूढ़ियों को भी रेखांकित करती चलती है जो वक़्त-वक़्त पर विदेशी लोगों के आगमन के साथ भारत की कला-धारा में समाहित होती रहीं, और उसे नया रूप देती रहीं। मध्यकालीन भारतीय कला और संस्कृति पर विचार करते हुए लेखक कहते हैं कि भारतीय चित्रकला के इतिहास में मुग़ल शैली का उद्भव एक युगान्तरकारी घटना सिद्ध हुई, जिसमें दो संस्कृतियों ने एक-दूसरे के साथ आदान-प्रदान का सम्बन्ध कायम किया तथा देशी का विदेशी के साथ व परम्परा का नवाचार के साथ संवाद बना। ‘तुलसीदास का प्रतिमा-निरूपण’, ‘कविता और राग’ तथा ‘हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत : लौकिक या पारलौकिक?’ आदि निबन्धों के अलावा अभिनय के माध्यम से अपने आत्म का अन्वेषण करनेवाले फ़िल्मकार ऋतुपर्ण घोष पर केद्रित एक आलेख भी इसमें शामिल है जो इस कला-विवेचन को हमारे आज के कला-बोध से जोड़ता है।
Aadhunik Bhasha Vigyan Ke Siddhant
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Ramkishor Sharma
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- Description: प्रस्तुत पुस्तक में भाषा-प्रयोग के विविध पक्षों का वैज्ञानिक परिचय देने का प्रयत्न किया गया है। भाषाविज्ञान के क्षेत्र में प्राचीन मान्यताओं एवं विचारों की वर्तमान उपयोगिता क्या है तथा उनके आधार पर नवीन दिशाओं में जो कार्य हुआ है, उन सभी को समाहित करने की चेष्टा की गई है। विदेशी चिन्तकों द्वारा विश्व की अनेक भाषाओं को ध्यान में रखकर जो अध्ययन प्रस्तुत किया गया है, उसमें हिन्दी भाषा का समावेश नगण्य है। इस पुस्तक में नवीन सिद्धान्तों का आकलन तथा विवेचन करते समय 'हिन्दी' को केन्द्र में रखा गया है। अनूदित पुस्तकों को छोड़कर नवीन विषयों पर समग्रत: भाषा का सैद्धान्तिक विवेचन प्रस्तुत करने वाली पुस्तकों का प्राय: अभाव है। इसी अभाव की पूर्ति के लिए इस पुस्तक की रचना की गई है।
Jo Gopi Madhu Ban Gayi
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Rameshraaj
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- Description: श्रीकृष्ण और राधा के अलौकिक प्रेम को लेकर, यमक अलंकार से युक्त एक अद्भुत दोहा-शतक
Ashok Ke Phool
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
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Description:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी भारतीय मनीषा के प्रतीक और साहित्य एवं संस्कृति के अप्रतिम व्याख्याकार माने जाते हैं और उनकी मूल निष्ठा भारत की पुरानी संस्कृति में है। लेकिन उनकी रचनाओं में आधुनिकता के साथ भी आश्चर्यजनक सामंजस्य पाया जाता है।
‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ और ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ जैसी यशस्वी कृतियों के प्रणेता आचार्य द्विवेदी को उनके निबन्धों के लिए भी विशेष ख्याति मिली। निबन्धों में विषयानुसार शैली का प्रयोग करने में इन्हें अद्भुत क्षमता प्राप्त है। तत्सम शब्दों के साथ ठेठ ग्रामीण जीवन के शब्दों का सार्थक प्रयोग इनकी शैली का विशेष गुण है।
भारतीय संस्कृति, इतिहास, साहित्य, ज्योतिष और विभिन्न धर्मों का उन्होंने गम्भीर अध्ययन किया है जिसकी झलक पुस्तक में संकलित इन निबन्धों में मिलती है। छोटी-छोटी चीज़ों, विषयों का सूक्ष्मतापूर्वक अवलोकन और विश्लेषण-विवेचन उनकी निबन्ध-कला का विशिष्ट व मौलिक गुण है।
निश्चय ही उनके निबन्धों का यह संग्रह पाठकों को न केवल पठनीय लगेगा, बल्कि उनकी सोच को एक रचनात्मक आयाम प्रदान करेगा।
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