Hindi Katha Sahitya : Ek Drishti
Author:
Satyaketu SankritPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Unavailable
‘हिन्दी कथा साहित्य : एक दृष्टि’ का प्रयोजन हिन्दी कथा साहित्य की रचनात्मक यात्रा का आलोचनात्मक विवेचन है। सत्यकेतु सांकृत ने गम्भीर अध्ययन के उपरान्त हिन्दी कथा साहित्य की दोनों शाखाओं (उपन्यास तथा कहानी) की संरचना को परखा है। 20वीं सदी के अन्तिम चरण में हिन्दी उपन्यासों की क्या स्थिति थी, इसे स्पष्ट करते हुए लेखक ने उनके सरोकारों को भी टटोला है। प्रेमचन्द, रेणु, राहुल सांकृत्यायन और अन्य रचनाकारों की कथा-यात्रा का विवरण इस पुस्तक के विभिन्न आलेखों में है।</p>
<p>उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के साहित्य की थाह लगाते हुए सत्यकेतु एक उचित निष्कर्ष निकालते हैं, ‘प्रेमचन्द भारतीय पुनर्जागरण को उसके व्यापक सन्दर्भ में देखते थे। वे समझते थे कि देश को औपनिवेशिक ग़ुलामी से तभी मुक्ति मिल सकती है जब पूरा देश सामाजिक दृष्टि से लिंग-भेद, धर्म-भेद, जाति-भेद आदि अन्तर्विरोधों से मुक्त हो।’ विभिन्न रचनाओं का ऐसा सूत्रात्मक विश्लेषण पुस्तक को विशिष्ट बनाता है।</p>
<p>प्रायः आलोचनात्मक पुस्तकों में अनुसन्धान का पक्ष क्षीण होता है। पाठक अनुभव करेंगे कि भाषा-संरचना, सरोकार और समेकित प्रभाव को जाँचते हुए लेखक ने एक सन्तुलन रखा है। आलोचना और अनुसन्धान का यह मिश्रण पुस्तक का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। कथा साहित्य में रुचि रखनेवाले पाठकों व शोधार्थियों के लिए अत्यन्त उपयोगी पुस्तक है।
ISBN: 9788183615938
Pages: 172
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Aacharya Ramchandra Shukla Aur Hindi Aalochana
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

-
Description:
डॉ. रामविलास शर्मा हिन्दी के उन गिने-चुने आलोचकों में हैं जिन्होंने साहित्य का मूल्यांकन एक सुनिश्चित जनवादी दृष्टिकोण के आधार पर किया है। बहुत स्पष्ट, सुलझे हुए विचारों के सहारे अपने विश्लेषण में वे कहीं भी भटकते नहीं हैं और आदि से अन्त तक तटस्थता को अपने हाथ से नहीं जाने देते। इसीलिए चाहे उनके सबसे प्रिय कवि निराला हों या आदर्श आलोचक रामचन्द्र शुक्ल, जहाँ भी उन्हें कोई दोष दिखाई दिया है, उसकी दो-टूक आलोचना करने से वे नहीं चूके हैं।
प्रस्तुत कृति रामविलास जी द्वारा की गई आलोचना की आलोचना है, और इसलिए कुछ लोगों के विचार से यह केवल एक छात्रोपयोगी चीज़ है; लेकिन स्वयं रामविलास जी के शब्दों में, ‘‘शुक्लजी ने न तो भारत के रूढ़िवाद को स्वीकार किया, न पच्छिम के व्यक्तिवाद को। उन्होंने बाह्य-जगत् और मानव-जीवन की वास्तविकता के आधार पर नए साहित्य-सिद्धांतों की स्थापना की और उनके आधार पर सामन्ती साहित्य का विरोध किया और देशभक्ति और जनतंत्र की साहित्यिक परम्परा का समर्थन किया। उनका यह कार्य हर देश-प्रेमी और जनवादी लेखक तथा पाठक के लिए दिलचस्प होना चाहिए। शुक्ल जी पर पुस्तक लिखने का यही कारण है।’’
एक लम्बे अन्तराल के बाद इस महत्त्वपूर्ण आलोचना-कृति का यह संशोधित-परिवर्धित संस्करण शुक्लजी के अध्ययन के लिए एक नई दृष्टि देता है, जिससे स्पष्ट हो सकेगा कि ‘शुक्लजी अपने युग के हिन्दी-अहिन्दी विचारकों से कितना आगे थे और उनकी विचारधारा कितनी वैज्ञानिक है।’
Premchand : Kahani Ka Rahanuma
- Author Name:
Zafar Raza
- Book Type:

-
Description:
प्रेमचन्द की रचनाएँ आधुनिक भारत को समझने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं, क्योंकि उन्हीं के समय से भारतीय पुनर्जागरण का प्रारम्भ होता है, जिसके पैरों की आहट उनकी रचनाओं में महसूस होती है। राष्ट्रीय जीवन की परिवर्तनशीलता, क्रिया-प्रतिक्रिया, प्रगति एवं प्रतिक्रियावादिता, धर्म तथा मानवता की परछाइयाँ प्रेमचन्द की रचनाओं में झलकती हैं। प्रेमचन्द की अनुभूति नदी के किनारे खड़े किसी दर्शक के समान नहीं है वरन् उन्होंने राष्ट्रीय जीवन के गहरे पानी में उतरकर समस्याओं से बोझिल नैया को किनारे जाने में अपने सहयोगियों का हाथ बँटाया
था।...प्रेमचन्द के विषय में विभिन्न प्रकार के विचार व्यक्त किए गए हैं। किसी विचार में प्रेमचन्द प्राचीन भारत का गौरवगान करते हैं। कोई उन्हें किसानों तथा मज़दूरों का साथी बताता है, किसी के विचार में प्रेमचन्द गांधीवादी हैं, कोई उन्हें साम्यवादी कहता है। आधुनिक वैज्ञानिक तथा भौतिक स्रोतों को जीवन का आधार माननेवालों को प्रेमचन्द में पाश्चात्य चिन्तन दीख पड़ता है। कोई उनकी चर्चा आधुनिक भारतीय संवेदना की आधारभूमि मानता है। इस रंगारंगी में यह पुस्तक प्रेमचन्द के अध्ययन एवं अध्यापन को अधिक व्यापक करने के विचार से अपने मन्तव्य प्रस्तुत करती है।
Kathakar Premchand
- Author Name:
Zafar Raza
- Book Type:

-
Description:
भाई जाफ़र रज़ा प्रेमचन्द साहित्य के एक जाने-माने विद्वान् हैं। हिन्दी तथा उर्दू दोनों भाषाओं पर अपने समान अधिकार, शोध और गवेषणा में अपनी गहरी रुचि, और अपनी स्वच्छ समीक्षा-दृष्टि के आधार पर उन्होंने अपनी इस पुस्तक में प्रेमचन्द साहित्य के कई ऐसे पहलुओं को उजागर किया है, जिनसे हिन्दी संसार भी अभी यथेष्ट परिचित न था। उसी तरह उर्दू में प्रेमचन्द को हिन्दी से अपरिचित रहकर देखनेवालों ने बड़ी गुमराही पैदा की है और ऐसे अनेक पहलू आँख से ओझल हो गए हैं, जिनके बिना प्रेमचन्द साहित्य का ठीक-ठीक अध्ययन असम्भव हो जाता है। डॉक्टर जाफ़र रज़ा ने अपनी इस पुस्तक में बहुत-सी एतद्विषयक सूचनाएँ और आवश्यक तथ्य प्रस्तुत किए हैं, जो प्रेमचन्द-साहित्य के गम्भीर अध्ययन के लिए अपरिहार्य हैं।
भाई जाफ़र रज़ा ने प्रेमचन्द के उर्दू-हिन्दी उपन्यासों और कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करके प्रेमचन्द को ठीक से समझने के लिए नए रास्ते खोले हैं। उदाहरण के लिए प्रेमचन्द की रचना-प्रक्रिया को समझने के लिए उनकी रचनाओं के उर्दू और हिन्दी दोनों ही पाठों को देखना ज़रूरी है, क्योंकि उसके बिना लेखक के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। भाई जाफ़र रज़ा ने शुद्ध पाठों को अपनी खोज, विभिन्न पाठों की समस्याओं और नई रचनाओं की अपनी खोज के आधार पर प्रेमचन्द के साहित्य और उसकी रचना प्रक्रिया को समझने की दिशा में बड़ा सुन्दर कार्य किया है। इतना निर्विवाद है कि उनकी यह पुस्तक प्रेमचन्द-सम्बन्धी आलोचना-साहित्य को उनकी एक विशिष्ट देन है।
—अमृत राय, इलाहाबाद गणतंत्र दिवस, 1983
Chintamani : Vol. 3
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

-
Description:
चिन्तामणि का यह तीसरा भाग आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अब तक असंकलित ऐसे इक्कीस निबन्धों का अनूठा संग्रह है जो पुरानी पत्रिकाओं में बिखरे रहने और अप्राप्य पुस्तकों की भूमिका के रूप में प्रकाशित होने के कारण प्राय: दुर्लभ रहे हैं। इन निबन्धों में गोरखपुर के ‘स्वदेश’ में प्रकाशित ‘क्षात्रधर्म का सौन्दर्य’ और ‘प्रेमा’ में प्रकाशित ‘प्रेम आनन्द–स्वरूप है’ ऐसे निबन्ध हैं जिनकी जानकारी भी लोगों को नहीं है। ‘हंस’ के आत्मकथा अंक में प्रकाशित ‘प्रेमघन की छाया स्मृति’ भी ऐसा ही निबन्ध है जो लगभग अचर्चित रहा है, जबकि आचार्य के आरम्भिक जीवन की झाँकी के लिए वह अनमोल दस्तावेज़ है। ‘साहित्य’ और ‘उपन्यास’ शीर्षक आरम्भिक निबन्धों से जहाँ शुक्ल जी के एतद्विषयक अनुपलब्ध विचार पहली बार प्रकाश में आते हैं, वहाँ 1909 की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘कविता क्या है’ इसी शीर्षक के सर्वविदित परवर्ती निबन्ध के प्रथम प्रारूप की हैसियत से ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। इसी प्रकार ‘कल्पना का आनन्द’ यद्यपि हाईस्कूल के एक छात्र का अनुवाद है, फिर भी आचार्य शुक्ल के ‘काव्य में प्राकृतिक दृश्य’ तथा ‘रसात्मक बोध के विविध रूप’ जैसे प्रौढ़ निबन्धों के लिए वह नींव का पत्थर है।
भूमिकाओं में यदि ‘विश्व प्रपंच’ की भूमिका आचार्य शुक्ल के जीवन–दर्शन के वैज्ञानिक पक्ष को जानने के लिए अनिवार्य दस्तावेज़ है तो ‘शेष स्मृतियाँ’ की ‘प्रवेशिका’ उनकी ऐतिहासिक अनुसन्धान में रुचि तथा गति के लिए। साहित्य–चिन्तक शुक्ल जी हिन्दी भाषा—मुख्यत: काव्यभाषा की भाषावैज्ञानिक तथा व्याकरणिक समस्याओं में कितनी अन्तर्दृष्टि रखते थे, इसका प्रमाण है ‘बुद्धचरित की भूमिका’ में ब्रजभाषा, अवधी और खड़ी बोली के स्वरूप का व्यतिरेकी विश्लेषण। इन भूमिकाओं के अतिरिक्त दो ऐतिहासिक भाषण भी संकलित हैं जिनसे आचार्य के व्यक्तित्व का एक नया पक्ष सामने आता है। इस प्रकार यह पुस्तक एक चिरकांक्षित आवश्यकता की पूर्ति का सारस्वत प्रयास है, जिसके महत्त्व का आभास सम्पादक की शोधपूर्ण भूमिका से हो सकता है।
Aadhunik Hindi Kavyalochna Ke Sau Varsh
- Author Name:
Pushpita Awasthi
- Book Type:

-
Description:
काव्यालोचना के सौन्दर्यशास्त्र और भाषा के वर्तमान परिदृश्य को उर्वर बनाने में एक साथ कम से कम तीन पीढ़ियाँ सक्रिय दिखाई देती हैं जिनमें विभिन्न तरह की प्रेरणाएँ, प्रक्रियाएँ देखी जा सकती हैं। काव्य-आलोचना का अद्यतन परिदृश्य विभिन्न-दृष्टियों के ताने-बाने से निर्मित है।
कविता अपनी रचना में ही कैसे अपना नया काव्यशास्त्र रचती-रचती है? कविता और काव्यालोचना का सौन्दर्य कैसे बनता है? जीवनानुभवों और मनस्तत्वों की भाषा में कैसी बुनावट है? क्या कारण है कि तुलसी-जायसी के व्याख्याता आचार्य शुक्ल कबीर से सहानुभूति-सह-अनुभूति नहीं महसूस करते? लेखिका इस पुस्तक में आधुनिक हिन्दी कविता और काव्यालोचना का नया सौन्दर्यशास्त्र सृजन करने के क्रम में समीक्षा की भाषा के अलावा ऐसे कई सवालों से भी दो-चार हुई हैं।
हिन्दी काव्यालोचना के सौ वर्ष की गहन पड़ताल करनेवाली यह पुस्तक कविता के अध्येताओं, शोधार्थियों व काव्य-प्रेमियों के लिए उपयोगी है।
Nyay Ka Sangharsh
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

-
Description:
न्याय की धारणा और समाज की व्यवस्था के समान रूखे विषय की विवेचना को भी रंजक बना देना इन लेखों की सार्थकता है। भाषा प्रवाह के ऊपर तैरते हुए विद्रूप की तह में सिद्धान्तों की शिलाएँ मौजूद हैं। मनोरंजन और विद्रूप का अभिप्राय रूखे और गम्भीर विषय को रोचक बना देना ही है। इन लेखों को पढ़कर आपके होंठों पर जो मुस्कराहट आएगी, वह आत्म-विस्मृत और आनन्दोल्लास की न होकर क्षोभ, परिताप और करुणा की होगी।
इन लेखों में लेखक ने आत्म-विस्मृत समाज को क़लम की नोक से गुदगुदाकर जगाने की चेष्टा की है और समाज को करवट बदलते न देखकर कई जगह उसने क़लम की नोक समाज के शरीर में गड़ा दी है।
—नरेन्द्र देव
'Jhansi Ki Rani' Ka Tulanatmak Anusheelan
- Author Name:
Richa Dwivedi
- Book Type:

-
Description:
ऐतिहासिक घटनाओं या चरित्रों पर उपन्यास लेखन कल्पना के तत्त्वों के बिना सम्भव नहीं है लेकिन यही वह चीज़ है जो उपन्यासकार की दृष्टि और सामर्थ्य का भी पता देती है। उपन्यास मूलत: एक ललित विधा है जिसे पाठक सूचनाओं और ज्ञान के लिए नहीं मन-रंजन के लिए पढ़ता है और उससे चेतना के स्तर पर समृद्ध होता है। ऐतिहासिक उपन्यास इस स्तर पर अपने पाठक से कुछ भिन्न अपेक्षाएँ रखता है। वह उससे इतिहास को लेकर जागरूकता भी चाहता है।
ऐतिहासिक उपन्यास लिखते समय लेखक सूचनाओं को अपनी कथा में कैसे पिरोता है, यही शैली उस कृति की श्रेष्ठता को तय करती है। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को लेकर संयोग से दो बड़े लेखकों द्वारा लिखे गए उपन्यास हमारे पास हैं और दोनों अपनी प्रस्तुति, अपनी शैली और ऐतिहासिक तथ्यों के प्रयोग की नितान्त भिन्न शैली अपनाते हैं। एक को लिखा है हिन्दी के बहुपठित ऐतिहासिक उपन्यासकार वृन्दावनलाल वर्मा ने तो दूसरे को बांग्ला में जन-संघर्षों की कथाएँ लिखनेवाली महाश्वेता देवी ने जिसका हिन्दी अनुवाद भी प्रकाशित है।
यह पुस्तक इन दोनों उपन्यासों में इतिहास की प्रस्तुति का तुलनात्मक अध्ययन है। इस शोध का प्रस्थान-बिन्दु यह धारणा है कि एक ही ऐतिहासिक घटना से सम्बन्धित कलात्मक सच समान हो, यह ज़रूरी नहीं। उनमें समरूपता सम्भव है एकरूपता नहीं। यही बात इन दोनों उपन्यासों के अध्ययन से स्पष्ट होती है। वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यास में जहाँ लालित्य प्रधान है, वहीं महाश्वेता जी ने तथ्यात्मकता पर ज़ोर दिया है। वर्मा जी हमें कथा में बहाए लिए जाते हैं और महाश्वेता जी का उपन्यास हमें ऐतिहासिक तथ्यों के साथ लगातार जगाए रहता है। उसमें एक वस्तुनिष्ठता है।
यह पुस्तक इन दोनों कृतियों का सांगोपांग अध्ययन है।
Poorva-Rang
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

-
Description:
“ऐसे युग में जहाँ मान्यताएँ विवादग्रस्त और अनिश्चित हों, ऐन्द्रिय विषय ही निश्चित हैं और उन्हीं का यथातथ्य चित्रण सम्भव भी है। यही वजह है कि आज के अधिकांश किशोर तथा किशोर-मति कवि प्राकृतिक चित्रों की खोज में विकल हैं। झंझटों से बाहर निकलने का यह आसान तरीक़ा है। समाज से कम झंझट प्रकृति में है और प्रकृति में भी इन्द्रियग्राह्य प्रभावों के चित्रण में सबसे कम झंझट है।” नामवर जी ने यह टिप्पणी 1957 में 'कवि' पत्रिका के 'विशिष्ट कवि' शीर्षक स्तम्भ में मुक्तिबोध से अन्य कवियों की तुलना करते हुए की थी। उल्लेखनीय है कि इस काल-खंड में उन्होंने श्री विष्णुचन्द्र शर्मा द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘कवि' के लिए ‘कविमित्र' नाम से काफ़ी समय तक एक स्तम्भ लिखा था जिसमें वे समकालीन कविता और कवियों पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ करते थे। इस संकलन में उनमें से ज़्यादातर को ले लिया गया है।
पुस्तक में शामिल अन्य आलेख भी ज़्यादातर पाँचवें दशक में लिखे गए थे जिनमें से कुछ प्रकाशित हैं और कुछ अप्रकाशित। ऐसे अधूरे आलेख भी यहाँ जुटाए गए हैं जो किसी कारण से पूरे नहीं लिखे जा सके और जिन्हें काशीनाथ जी ने अपने पास सहेजकर रखा था। कहना न होगा कि इस पुस्तक में उस दौर के नामवर जी से हमारा परिचय होगा जब वे अपनी स्थापनाओं को आकार दे रहे थे और जिन्हें हमने बाद में आई उनकी पुस्तकों में देखा।
Kuchh Purvgrah
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

-
Description:
वर्षों से हिन्दी आलोचना में जो नाम छाए रहे हैं, उनमें एक नाम निश्चय ही अशोक वाजपेयी का है। कविता के लिए उनका पूर्वग्रह अब कुख्यात ही है। उन्होंने उसकी आलोचना, प्रकाशन और प्रसार के लिए जितने व्यापक और सुचिन्तित रूप से काम किया है, उतना शायद ही किसी ने किया हो।
1970 में उनकी पहली आलोचना-पुस्तक ‘फिलहाल’ ने हिन्दी आलोचना को तेज़ी और सार्थक आलोचना-भाषा दी थी जिसका व्यापक प्रभाव आज तक देखा जा सकता है। ‘फिलहाल’ के कई संस्करण निकलना इस बात का प्रमाण है कि समकालीन कविता की आलोचना में उसे एक उद्गम-ग्रन्थ की मान्यता मिली है।
इस बीच अशोक वाजपेयी ने 1974 से भोपाल से बहुचर्चित आलोचना पत्रिका ‘पूर्वग्रह’ का सम्पादन और प्रकाशन आरम्भ किया। हिन्दी की समकालीन साहित्य-संस्कृति में इस प्रयत्न का ऐतिहासिक महत्त्व है। इस पुस्तक की अधिकांश सामग्री ‘पूर्वग्रह’ में ही प्रकाशित हुई है। कम लिखकर भी कारगर हस्तक्षेप कर पाने में वे सक्षम हैं, यह इसका प्रमाण है।
कविता, साहित्य और संस्कृति के लिए अपनी गहरी आसक्ति को अशोक वाजपेयी असाधारण स्पष्टता और सूक्ष्म संवेदनशीलता के साथ व्यक्त करते हैं। हालाँकि हर हालत में अपने को ही सही मानने का उन्हें कोई मुग़ालता नहीं है। उनकी आलोचना आज की सृजनात्मकता को समझने और आगे बढ़ाने का एक उत्कट और विचारसम्पन्न प्रयत्न है। वे जो प्रश्न उठाते हैं या चुनौतियाँ सामने रखते हैं, वे आज की परिस्थितियों में केन्द्रीय हैं और उन्हें नज़रअन्दाज़ करना सम्भव नहीं है।
Mere Samay Ke Shabda
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

-
Description:
केदारनाथ सिंह हमारे समय के सुप्रतिष्ठित कवि हैं। उन्होंने समय-समय पर विभिन्न साहित्यिक विषयों पर विश्लेषणपूर्ण लेख लिखे हैं। कई बार तर्कपूर्ण विचारप्रवण टिप्पणियाँ की हैं। एक शीर्षस्थ कवि का यह गद्य-लेखन संवेदना व संरचना की दृष्टि से अनूठा है। ‘मेरे समय के शब्द’ में केदारनाथ सिंह की रचनाशीलता का यह सुखद आयाम उद्घाटित हुआ है।
प्रस्तुत पुस्तक में कविता की केन्द्रीय उपस्थिति है। हिन्दी आधुनिकता का अर्थ तलाशते हुए सुमित्रानन्दन पंत ज्ञेय, नागार्जुन, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, रामविलास शर्मा और श्रीकान्त वर्मा आदि के कविता-जगत की थाह लगाई गई है। इस सन्दर्भ में ‘आचार्य शुक्ल की काव्य-दृष्टि और आधुनिक कविता’ लेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
इसके अनन्तर पाँच खंड हैं—‘पाश्चात्य आधुनिकता के कुछ रंग’, ‘कुछ टिप्पणियाँ’, ‘व्यक्ति-प्रसंग’, ‘स्मृतियाँ’ और ‘परिशिष्ट’। पहले खंड में एजरा पाउंड, रिल्के और रेने शा की कविता पर विचार करने के साथ समकालीन अंग्रेज़ी कविता का मर्मान्वेषण किया गया है। दूसरे खंड में विभिन्न विषयों पर की गई टिप्पणियाँ लघु लेख सरीखी हैं।
‘व्यक्ति-प्रसंग’ के दो लेख त्रिलोचन और नामवर सिंह का आत्मीय आकलन हैं। अज्ञेय, श्रीकान्त वर्मा
और सोमदत्त की ‘स्मृतियाँ’ समानधर्मिता की ऊष्मा से भरी हैं। ‘परिशिष्ट’ में तीन साक्षात्कार हैं। एक उत्तर में केदारनाथ सिंह कहते हैं, ‘...नई पीढ़ी को एक नई मुक्ति के एहसास के साथ लिखना चाहिए और अपने रचनाकर्म में सबसे अधिक भरोसा करना चाहिए अपनी संवेदना और अपने विवेक पर।’
यह पुस्तक शब्द की समकालीन सक्रियता में निहित संवेदना और विवेक को भलीभाँति प्रकाशित करती है।
Aage Andhi Gali Hai
- Author Name:
Prabhash Joshi
- Book Type:

-
Description:
‘आगे अन्धी गली है’ में विख्यात पत्राकार प्रभाष जोशी द्वारा ‘प्रथम प्रवक्ता’ और ‘तहलका’ में छपे कॉलम संकलित हैं।
प्रभाष जोशी ने हिन्दी पत्रकारिता में कॉलम लेखन को एक नया रूप देने के साथ ही उसे विविधता भी प्रदान की। ‘जनसत्ता’ में लिखे उनके कॉलम ‘कागद कारे’ के समानान्तर ‘प्रथम प्रवक्ता’ का कॉलम ‘लाग लपेट’ तथा ‘तहलका’ का ‘शून्य काल’ भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ‘कागद कारे’ में प्रभाष जी ने अपनी संवेदना के आधार पर समय को परिभाषित किया है जबकि ‘लाग लपेट’ और ‘शून्य काल’ में अपने गांधीवादी विचार और तर्क से समकालीन परिदृश्य की पहचान निश्चित की है।
इस पुस्तक में प्रभाष जोशी के अन्तिम दो वर्षों का लेखन संकलित है। पुस्तक की भूमिका में प्रभाष जोशी की ज़िन्दगी के अन्तिम छह दिनों का संवेदनात्मक वृत्तान्त भी दिया गया है। जीवन के अन्तिम सप्ताह में प्रभाष जोशी अपने लेखन, सामाजिक सक्रियता और विसंगतियों के विरुद्ध व्याख्यान की घुमन्तू दिनचर्या में बेहद व्यस्त थे। पुस्तक के सम्पादकीय में उसका क्रमशः ब्यौरा दिया गया है। भागमभाग के बीच भी क्रिकेट से दीवानगी की हद तक उनका लगाव हमें आश्चर्य से भर देता है।
यह पुस्तक प्रभाष जी के अन्तिम दिनों के वैचारिक मानस को समझने की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
Manak Hindi Ke Shuddh Prayog : Vol. 3
- Author Name:
Ramesh Chandra Mahrotra
- Book Type:

-
Description:
सशक्त अभिव्यक्ति के लिए समर्थ हिन्दी चाहिए।
इस नए ढंग के व्यवहार–कोश में पाठकों को अपनी हिन्दी निखारने के लिए हज़ारों शब्दों के बारे में बहुपक्षीय भाषा–सामग्री मिलेगी। इसमें वर्तनी की व्यवस्था मिलेगी, उच्चारण के संकेत–बिन्दु मिलेंगे, व्युत्पत्ति पर टिप्पणियाँ मिलेंगी, व्याकरण के तथ्य मिलेंगे, सूक्ष्म अर्थभेद मिलेंगे, पर्याय और विपर्याय मिलेंगे, संस्कृत का आशीर्वाद मिलेगा, उर्दू और अंग्रेज़ी का स्वाद मिलेगा, प्रयोग के उदाहरण मिलेंगे, शुद्ध–अशुद्ध का निर्णय मिलेगा।
पुस्तक की शैली ललित निबन्धात्मक है। इसमें कथ्य को समझाने और गुत्थियों को सुलझाने के दौरान कठिन और शुष्क अंशों को सरल और रसयुक्त बनाने के लिहाज़ से मुहावरों, लोकोक्तियों, लोकप्रिय गानों की लाइनों, कहानी–क़िस्सों, चुटकुलों और व्यंग्य का भी सहारा लिया गया है। नमूने देखिए, स्त्रीलिंग ‘दाद’ (प्रशंसा) सब को अच्छी लगती है, पर पुर्लिंग ‘दाद’ (चर्मरोग) केवल चर्मरोग के डॉक्टरों को अच्छा लगता है।…‘मैल, मैला, मलिन’ सब ‘मल’ के भाई–बन्धु हैं…(‘साइकिल’ को) ‘साईकील’ लिखनेवाले महानुभाव तो किसी हिन्दी–प्रेमी के निश्चित रूप से प्राण ले लेंगे—दुबले को दो असाढ़। ...अरबी का ‘नसीब’ भी ‘हिस्सा’ और ‘भाग्य’ दोनों है। उदाहरण—आपके नसीब में ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हैं। (जबकि मेरे नसीब में मेरी पत्नी हैं।)
यह पुस्तक हिन्दी के हर वर्ग और स्तर के पाठक के लिए उपयोगी है।
Kabeer Soor Tulsi
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखकों तथा आलोचकों ने भक्ति के सन्दर्भ में अनेक टिप्पणियाँ दी हैं। किसी ने इसे ईसाइयत की देन बताई है तो किसी ने इस्लाम की उपज। कोई इसे हिन्दू जाति की हताशा तथा निराशा से जोड़ता है तो अन्य कोई दक्षिण भारत की देन कहता है। इन सबसे हटकर भक्ति प्रवाह भारतीय आध्यात्मिक चेतना का नैसर्गिक विकास है। भक्ति काव्यधारा की मूल प्रकृति में कहीं भी पराजय की कुंठाग्रस्तता नहीं है और न ही उसमें कहीं कोई क्षेत्रवाद ही दिखाई पड़ता है। यह इन सबके ऊपर सामाजिक समानता, प्रेम, हृदय-से हृदय को जोड़कर मानव जाति को आत्यन्तिक मंगलवाद की व्यवस्था से समृद्ध करनेवाली कविता है। इस आलोचनात्मक कृति का मूल मन्तव्य भी इसी से जुड़ा है।
कबीर-सूर-तुलसी इन तीनों कवियों में वर्तमान भक्ति की केन्द्रीय चेतना को इंगित करते हुए उनके कृतित्व का एक बार पुनर्विश्लेषण किया गया है ताकि भक्ति की लोकानुभूति से इनकी कविता की आस्वादनभूमि का मर्म समझाया जा सके। ‘हरिस्मरण’ तथा ‘कलाविलास’ के प्रवाह-संगम पर रची गई भक्ति-कविता की अपूर्वता की विवेचना ही इस आलोच्य कृति का मन्तव्य है।
Anuvad aur Uttar aadhunik avdharnaye
- Author Name:
Shrinarayan Sameer
- Book Type:

-
Description:
अच्छा अनुवाद या कहें कि बेहतर अनुवाद हमेशा पाठ-भाषा के कलेवर से प्रस्थान होता है। उसका यह प्रस्थान मूल से निश्चित रूप से परिवर्तित और परिवर्द्धित होता है। उत्तर-आधुनिकता ने अनुवाद में मूल से परिवर्तन तथा परिवर्द्धन की पारम्परिक धीमी प्रक्रिया को एकदम से तेज़ कर दिया है। इससे अनुवाद के चाल-चरित्र में बदलाव आया है। विश्वग्राम के मौजूदा दौर में अनुवाद के क्षेत्र में आया बदलाव उसकी सीमा नहीं, बल्कि शक्ति और सामर्थ्य मानना चाहिए। ऐसे ही अनुवाद की अब माँग और धूम है।
प्रस्तुत पुस्तक में अनुवाद के इसी बदले रूप और रचाव पर भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद और सूचनाक्रान्ति के परिप्रेक्ष्य में विचार किया गया है। इस क्रम में अनुवाद को उसके अनुप्रयुक्त पक्षों के आसंग से भी समझने का प्रयास किया गया है। यद्यपि इस प्रयास में तर्क और विचार का आलोचनात्मक ताप पुस्तक में यत्र-तत्र-सर्वत्र है, फिर भी अनुवाद के सरोकारों को लेकर यह पुस्तक जो ललित विमर्श रचती है, वह नायाब और बेजोड़ है। इसे एक बार पढ़ना अपने समय के संघात, समाज की जद्दोजहद और सभ्यता की करवट से रूबरू होना है। साथ ही भाषा के तक़ाज़े को आत्मा की अतल गहराइयों से महसूस करना है। पुनरपि, वैश्वीकरण के दौर में भाषा, आकांक्षा और राजनीति के सरोकारों को समझना तथा पक्षधरता को बेबाक और मानवीय बनाना भी है।
Chintamani : Vol. 1
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

-
Description:
“यदि वाणी की शक्ति ईश्वर का सबसे उत्तम प्रसाद है; यदि भाषा की उत्पत्ति बहुत-से विद्वानों द्वारा ईश्वर से मानी गई है? यदि शब्दों द्वारा अन्तःकरण के गुप्त रहस्य प्रकट किए जाते हैं; चित्त की वेदना को शान्ति दी जाती है; हृदय में बैठा हुआ शोक बाहर निकाल दिया जाता है; दया उत्पन्न की जाती है और बुद्धि चिरस्थायी बनाई जाती है; यदि बड़े ग्रन्थकारों द्वारा बहुत-से मनुष्य मिलकर एक बनाए जाते हैं; जातीय लक्षण स्थापित होता है; भूत और भविष्य तथा पूर्व और पश्चिम एक-दूसरे के सम्मुख उपस्थित किए जाते हैं; और यदि ऐसे लोग मनुष्य जाति में अवतार-स्वरूप माने जाते हैं—तो साहित्य की अवहेलना करना और उसके अध्ययन से मुख मोड़ना कितनी बड़ी भारी कृतघ्नता है।”
—‘साहित्य’ शीर्षक निबन्ध से
Bhagat Singh Ki Pistaul Ki Khoj
- Author Name:
Jupinderjit Singh
- Book Type:

- Description: शहीद भगत सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। हम सब जानते हैं कि उन्होंने 17 दिसंबर, 1928 को ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जे.पी. सांडर्स की हत्या अमेरिका में बने एक .32 कोल्ट पिस्टल से की थी। लेकिन हम यह नहीं जानते कि उसके बाद उस पिस्टल का क्या हुआ और कैसे यह स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गई थी। हम यह भी नहीं जानते कि उस हुतात्मा ने फिर कभी किसी की हत्या क्यों नहीं की। वह पिस्टल 86 वर्षों तक इतिहास की परतों में और सरकारी दस्तावेजों के अनुसार तब तक गुम ही रही, जब तक कि इस पुस्तक के लेखक ने उस हथियार के सफर का पता नहीं लगा लिया और उसे लोगों के सामने लेकर नहीं आए। क्या थी उस पिस्टल की रहस्यमयी कहानी ? कैसे भगत सिंह शायद महात्मा गांधी से भी बड़े अहिंसा के पुजारी थे, यह जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें ।
Ritikavya: Mulyankan Ke Naye Ayam
- Author Name:
PRABHAKAR SINGH
- Book Type:

- Description: रीतिकाव्य साहित्य और संवेदना का सौन्दर्यबोधीय और कलात्मक सृजन है। कोई भी जाति, सौन्दर्य और शृंगार से विलग होकर न तो जीवन के प्रति आकर्षण पैदा कर सकती है न विचारों में तेज। रीतिकाव्य मनुष्य की ऐहिकता को कला और सौन्दर्य के वैभव में सिरजने वाला काव्य है। हिन्दी- उर्दू कविता की साझा भाषायी संस्कृति भी इसी युग में प्रतिफलित हुई। साहित्येतिहास और आलोचना लेखन के विकास में 'रीतिकाव्य' को प्रायः उपेक्षित दृष्टि से ही आकलित किया गया। आलोचना और इतिहास लेखन के आरम्भिक दौर में 'रीतिकाव्य' को औपनिवेशिक विक्टोरियाई नैतिकता के चश्मे से ही देखा गया। द्विवेदी युग में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने रीतिविरोधी आलोचना का ऐसा अभियान चलाया कि हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और रामविलास शर्मा जैसे प्रगतिशील आलोचक भी मूल्यांकन की इस विरोधी परम्परा को पोषित-पल्लवित करते नजर आते हैं। ये आलोचक रीतिकालीन कवियों के काव्य मर्म की तो प्रशंसा करते हैं लेकिन ऐतिहासिक मूल्यांकन करते समय रीतिकाव्य को दरबारी मानसिकता को पोषित करने वाला सामन्ती साहित्य कहकर उसे जनविरोधी कविता के खाँचे में डाल देते हैं। भारतीय चिन्तन परम्परा के वर्चस्ववादी और औपनिवेशिक नैतिकता के संश्लेष से निर्मित इस 'इतिहास दृष्टि' से उबरकर ही 'रीतिकाव्य' के साहित्य की सही पड़ताल की जा सकती है। यह पुस्तक रीतिकाव्य में विन्यस्त कला, सौन्दर्य और सृजन के वैभव को इतिहास की निरन्तरता में मूल्यांकित करने का प्रयास है। पुस्तक में रीतिकाव्य विषयक इतिहास, लेखन और आलोचना दृष्टि पर पुनर्विचार के साथ रीतिकाव्य के परिवेश, प्रवृत्ति और उसकी कविताई को साहित्य के नये विमर्शो और मूल्यों के साथ परखने की कोशिश है। पुस्तक में नामवर सिंह, मैनेजर पाण्डेय, नित्यानन्द तिवारी जैसे वरिष्ठ पीढ़ी के आलोचकों के साथ युवा पीढ़ी के आलोचकों में श्रीप्रकाश शुक्ल, कृष्णमोहन और आशीष त्रिपाठी के आलेख रीतिकाव्य को मूल्यांकित करने की नयी दृष्टि प्रदान करते हैं।
Samaya Sakshi Hai
- Author Name:
Manu Sharma
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Muktibodh Sahitya Mein Nayi Pravrittiyan
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

-
Description:
अपनी कविताओं में विचारों के आवेग को मुक्तिबोध अपने आत्मचित्रों से सन्तुलित और संवर्धित करते हुए उसमें हर बार एक नया रंग भरते चलते हैं। इस रूप में मुक्तिबोध आधुनिक यूरोपीय चित्रकारों की चित्रशैली और चित्रछवियों के अत्यन्त निकट हैं। कविताएँ केवल शब्दों और लयों और विचारों से ही नहीं सजतीं, कविता में बीच-बीच में प्रकट होनेवाले वे आत्मचित्र हैं जो उनके अन्तर्कथ्य को तराशते हैं। उनका यह आत्म उतना ही क्षत-विक्षत, उतना ही रोमानी, उतना ही यातनादायी है जितना खड़ी बोली के दूसरे कवियों का।
मुक्तिबोध कम्युनिस्ट होते हुए भी ललकार के कवि नहीं हैं, ललकार के भीतर की मजबूरी के कवि हैं। यही वह भविष्य दृष्टि है जो उन्हें हिन्दी के दूसरे कवियों से अलग करती है। वे बाहर देखते ज़रूर हैं लेकिन आत्मोन्मुख होकर। उनकी नज़र बाहरी दुनिया के तटस्थ काव्यात्मक कथन में नहीं है, बल्कि बाहरी दुनिया के भीतरी टकरावों में है। इसीलिए वे हिन्दी के एक अलग और अनोखे क़िस्म के कवि हैं जिनकी तुलना किसी से नहीं।
Bhojpuri Sanskriti Ki Sant Kavita
- Author Name:
Udai Pratap Singh
- Book Type:

- Description: ित्यिक समृद्धि, सामाजिक सौहार्द और आध्यात्मिक ऊँचाई की दृष्टि से भोजपुरी भाषी क्षेत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसी भूमि पर संस्कृत में काव्य-महाकाव्य रचे गए तो पालि में भगवान बुद्ध के उपदेशों का संचरण हुआ। नदियों के प्रवाह ने इस क्षेत्र को उर्वर बनाया तो साधु-सन्तों की अध्यात्म-सनी वाणियों ने लोकहृदय में भक्ति की मशाल जला दी। राजनैतिक व वैचारिक गुलामी का दृढ़ता से मुकाबला करने वाला यह क्षेत्र सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यन्त सम्पन्न रहा है। यह क्षेत्र हर कालखंड में अध्यात्म की पताका सुदूर तक फहराता रहा है। इतिहास, संस्कृति व सभ्यता के न जाने कितने अज्ञात व विस्मयकारी पृष्ठ भोजपुरी माटी में छिपे हुए हैं। यह पुस्तक उसी दिशा में एक प्रयास है। भोजपुरी बोली-बानी में सन्तों ने गाया और गुनगुनाया है। अत: भोजपुरी में सन्तों का प्रभूत साहित्य प्राप्त होता है। सन्त शिरोमणि कबीर और भक्त-शिरोमणि रैदास की यह जन्मभूमि है तो कीनाराम जैसे भक्त और योगी की तपोभूमि भी है। नाथपन्थ, रामानन्द, कबीर व रैदास पन्थ यहीं विकसित व पल्लवित हुए। दरियापन्थ, अघोरपन्थ, सतनामी सम्प्रदाय, शिवनारायणी पन्थ, सन्तमतानुयायी आश्रम, गड़वाघाट और महर्षि सदाफल देव का विहंगम योग जैसे सम्प्रदायों का प्रभाव भोजपुरी भाषी क्षेत्र में सुदूर तक विस्तृत है। सन्त बानियों की अध्यात्म वर्षा सदियों से इस क्षेत्र को हरी-भरी करती रही ह
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book