Bhasha Evam Bhasha Vigyan
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Author:
Mahavir Saran JainPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
995
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इस पुस्तक में भाषा विज्ञान के विद्यार्थियों, छात्रों तथा अनुसन्धान कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत है। विगत पाँच दशकों में मैंने भाषाविज्ञान के क्षेत्र में देश तथा विदेशों में जो अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान कार्य किया है यह पुस्तक उसका परिणाम है। पुस्तक में संचार तथा संप्रेषण के संबंध में मानव भाषा के निर्माण और विकास के संबंध में, भाषा विज्ञान में विवेच्य भाषा के अभिलक्षण (परिभाषा) स्वरूप तथा विशेषताओं, भाषा-व्यवस्था एवं भाषा-व्यवहार, भाषा-संरचना एवं भाषिक प्रकार्य की विवेचना, भाषा तथा व्यक्ति और समाज/भाषा और विचार/भाषा और संस्कृति तथा भाषा और साहित्य के संबंध में, भाषा-क्षेत्र एवं भाषा के विविध रूपों के संबंध में विश्व के भाषा-परिवारों की विवेचना, भारत - यूरोपीय भाषा-परिवार के संबंध में विचार, भाषा विज्ञान के नामकरण, परिभाषा, स्वरूप एवं व्याप्ति अथवा अध्ययन-क्षेत्र के संबंध में, भाषा विज्ञान की अध्ययन पद्धतियाँ अथवा भाषा-अध्ययन की दिशाओं के संबंध में, भाषा विज्ञान के प्रमुख विभागों अथवा भाषा विज्ञान की प्रमुख शाखाओं के सम्बन्ध में विचार प्रस्तुत किया गया है। इसके अंतर्गत ध्वनि विज्ञान अथवा स्वन विज्ञान, स्वनिम विज्ञान, रूपिम विज्ञान, वाक्य विज्ञान तथा अर्थ विज्ञान, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान की शाखाओं में भाषा शिक्षण, अनुवाद विज्ञान, कोश विज्ञान प्रमुख हैं। भाषा विज्ञान से संबंधित अध्ययन विभाग हैं - मनोभाषाविज्ञान, मानवजाति, भाषा- विज्ञान, समाज भाषा विज्ञान, शैली विज्ञान । देवनागरी लिपि की विशेषताओं, वैज्ञानिकता एवं मानकीकरण के सम्बन्ध में विचार तथा प्रमुख वैयाकरणों एवं प्रमुख भाषा वैज्ञानिकों की विवेचना की गई है.... मुझे विश्वास है कि हिन्दी जगत में इस पुस्तक का स्वागत होगा.। महावीर सरन जैन इस पुस्तक में भाषा विज्ञान के विद्यार्थियों, छात्रों तथा अनुसन्धान कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत है। विगत पाँच दशकों में मैंने भाषाविज्ञान के क्षेत्र में देश तथा विदेशों में जो अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान कार्य किया है यह पुस्तक उसका परिणाम है। पुस्तक में संचार तथा संप्रेषण के संबंध में मानव भाषा के निर्माण और विकास के संबंध में, भाषा विज्ञान में विवेच्य भाषा के अभिलक्षण (परिभाषा) स्वरूप तथा विशेषताओं, भाषा-व्यवस्था एवं भाषा-व्यवहार, भाषा-संरचना एवं भाषिक प्रकार्य की विवेचना, भाषा तथा व्यक्ति और समाज/भाषा और विचार/भाषा और संस्कृति तथा भाषा और साहित्य के संबंध में, भाषा-क्षेत्र एवं भाषा के विविध रूपों के संबंध में विश्व के भाषा-परिवारों की विवेचना, भारत - यूरोपीय भाषा-परिवार के संबंध में विचार, भाषा विज्ञान के नामकरण, परिभाषा, स्वरूप एवं व्याप्ति अथवा अध्ययन-क्षेत्र के संबंध में, भाषा विज्ञान की अध्ययन पद्धतियाँ अथवा भाषा-अध्ययन की दिशाओं के संबंध में, भाषा विज्ञान के प्रमुख विभागों अथवा भाषा विज्ञान की प्रमुख शाखाओं के सम्बन्ध में विचार प्रस्तुत किया गया है। इसके अंतर्गत ध्वनि विज्ञान अथवा स्वन विज्ञान, स्वनिम विज्ञान, रूपिम विज्ञान, वाक्य विज्ञान तथा अर्थ विज्ञान, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान की शाखाओं में भाषा शिक्षण, अनुवाद विज्ञान, कोश विज्ञान प्रमुख हैं। भाषा विज्ञान से संबंधित अध्ययन विभाग हैं - मनोभाषाविज्ञान, मानवजाति, भाषा- विज्ञान, समाज भाषा विज्ञान, शैली विज्ञान । देवनागरी लिपि की विशेषताओं, वैज्ञानिकता एवं मानकीकरण के सम्बन्ध में विचार तथा प्रमुख वैयाकरणों एवं प्रमुख भाषा वैज्ञानिकों की विवेचना की गई है.... मुझे विश्वास है कि हिन्दी जगत में इस पुस्तक का स्वागत होगा.। महावीर सरन जैन
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इस पुस्तक में भाषा विज्ञान के विद्यार्थियों, छात्रों तथा अनुसन्धान कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत है। विगत पाँच दशकों में मैंने भाषाविज्ञान के क्षेत्र में देश तथा विदेशों में जो अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान कार्य किया है यह पुस्तक उसका परिणाम है।
पुस्तक में संचार तथा संप्रेषण के संबंध में मानव भाषा के निर्माण और विकास के संबंध में, भाषा विज्ञान में विवेच्य भाषा के अभिलक्षण (परिभाषा) स्वरूप तथा विशेषताओं, भाषा-व्यवस्था एवं भाषा-व्यवहार, भाषा-संरचना एवं भाषिक प्रकार्य की विवेचना, भाषा तथा व्यक्ति और समाज/भाषा और विचार/भाषा और संस्कृति तथा भाषा और साहित्य के संबंध में, भाषा-क्षेत्र एवं भाषा के विविध रूपों के संबंध में विश्व के भाषा-परिवारों की विवेचना, भारत - यूरोपीय भाषा-परिवार के संबंध में विचार, भाषा विज्ञान के नामकरण, परिभाषा, स्वरूप एवं व्याप्ति अथवा अध्ययन-क्षेत्र के संबंध में, भाषा विज्ञान की अध्ययन पद्धतियाँ अथवा भाषा-अध्ययन की दिशाओं के संबंध में, भाषा विज्ञान के प्रमुख विभागों अथवा भाषा विज्ञान की प्रमुख शाखाओं के सम्बन्ध में विचार प्रस्तुत किया गया है।
इसके अंतर्गत ध्वनि विज्ञान अथवा स्वन विज्ञान, स्वनिम विज्ञान, रूपिम विज्ञान, वाक्य विज्ञान तथा अर्थ विज्ञान, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान की शाखाओं में भाषा शिक्षण, अनुवाद विज्ञान, कोश विज्ञान प्रमुख हैं। भाषा विज्ञान से संबंधित अध्ययन विभाग हैं - मनोभाषाविज्ञान, मानवजाति, भाषा- विज्ञान, समाज भाषा विज्ञान, शैली विज्ञान ।
देवनागरी लिपि की विशेषताओं, वैज्ञानिकता एवं मानकीकरण के सम्बन्ध में विचार तथा प्रमुख वैयाकरणों एवं प्रमुख भाषा वैज्ञानिकों की विवेचना की गई है....
मुझे विश्वास है कि हिन्दी जगत में इस पुस्तक का स्वागत होगा.।
महावीर सरन जैन
इस पुस्तक में भाषा विज्ञान के विद्यार्थियों, छात्रों तथा अनुसन्धान कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत है। विगत पाँच दशकों में मैंने भाषाविज्ञान के क्षेत्र में देश तथा विदेशों में जो अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान कार्य किया है यह पुस्तक उसका परिणाम है।
पुस्तक में संचार तथा संप्रेषण के संबंध में मानव भाषा के निर्माण और विकास के संबंध में, भाषा विज्ञान में विवेच्य भाषा के अभिलक्षण (परिभाषा) स्वरूप तथा विशेषताओं, भाषा-व्यवस्था एवं भाषा-व्यवहार, भाषा-संरचना एवं भाषिक प्रकार्य की विवेचना, भाषा तथा व्यक्ति और समाज/भाषा और विचार/भाषा और संस्कृति तथा भाषा और साहित्य के संबंध में, भाषा-क्षेत्र एवं भाषा के विविध रूपों के संबंध में विश्व के भाषा-परिवारों की विवेचना, भारत - यूरोपीय भाषा-परिवार के संबंध में विचार, भाषा विज्ञान के नामकरण, परिभाषा, स्वरूप एवं व्याप्ति अथवा अध्ययन-क्षेत्र के संबंध में, भाषा विज्ञान की अध्ययन पद्धतियाँ अथवा भाषा-अध्ययन की दिशाओं के संबंध में, भाषा विज्ञान के प्रमुख विभागों अथवा भाषा विज्ञान की प्रमुख शाखाओं के सम्बन्ध में विचार प्रस्तुत किया गया है।
इसके अंतर्गत ध्वनि विज्ञान अथवा स्वन विज्ञान, स्वनिम विज्ञान, रूपिम विज्ञान, वाक्य विज्ञान तथा अर्थ विज्ञान, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान की शाखाओं में भाषा शिक्षण, अनुवाद विज्ञान, कोश विज्ञान प्रमुख हैं। भाषा विज्ञान से संबंधित अध्ययन विभाग हैं - मनोभाषाविज्ञान, मानवजाति, भाषा- विज्ञान, समाज भाषा विज्ञान, शैली विज्ञान ।
देवनागरी लिपि की विशेषताओं, वैज्ञानिकता एवं मानकीकरण के सम्बन्ध में विचार तथा प्रमुख वैयाकरणों एवं प्रमुख भाषा वैज्ञानिकों की विवेचना की गई है....
मुझे विश्वास है कि हिन्दी जगत में इस पुस्तक का स्वागत होगा.।
महावीर सरन जैन
Book Details
-
ISBN9789349180185
-
Pages452
-
Avg Reading Time15 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पुस्तक की शैली ललित निबन्धात्मक है। इसमें कथ्य को समझाने और गुत्थियों को सुलझाने के दौरान कठिन और शुष्क अंशों को सरल और रसयुक्त बनाने के लिहाज़ से मुहावरों, लोकोक्तियों, लोकप्रिय गानों की लाइनों, कहानी–क़िस्सों, चुटकुलों और व्यंग्य का भी सहारा लिया गया है। नमूने देखिए, स्त्रीलिंग ‘दाद’ (प्रशंसा) सब को अच्छी लगती है, पर पुर्लिंग ‘दाद’ (चर्मरोग) केवल चर्मरोग के डॉक्टरों को अच्छा लगता है।…‘मैल, मैला, मलिन’ सब ‘मल’ के भाई–बन्धु हैं…(‘साइकिल’ को) ‘साईकील’ लिखनेवाले महानुभाव तो किसी हिन्दी–प्रेमी के निश्चित रूप से प्राण ले लेंगे—दुबले को दो असाढ़। ...अरबी का ‘नसीब’ भी ‘हिस्सा’ और ‘भाग्य’ दोनों है। उदाहरण—आपके नसीब में ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हैं। (जबकि मेरे नसीब में मेरी पत्नी हैं।)
यह पुस्तक हिन्दी के हर वर्ग और स्तर के पाठक के लिए उपयोगी है।
Samkaleen Kavya Yatra
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

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मुक्तिबोध ने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में कहा है : ‘नहीं होती, कहीं भी खतम कविता नहीं होती/कि वह आवेग-त्वरिता काल-यात्री है।’ इसका एक प्रमाण यह भी है कि आधुनिक हिन्दी कविता अज्ञेय और स्वयं मुक्तिबोध के साथ ही समाप्त नहीं हो जाती और काल के साथ वेग से उसकी यात्रा जारी रहती है। जिस कवि की रचना का स्रोत उसका अपना जीवन होता है, उसका एक न एक दिन चुकना तय है, लेकिन जो कविता इतिहासाश्रित होती है, उसका प्रवाह अजस्र रहता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इतिहास केवल काल-बोध नहीं, देश-बोध भी है। प्रस्तुत पुस्तक में हिन्दी के सुपरिचित आलोचक डॉ. नंदकिशोर नवल ने विजयदेव नारायण साही से लेकर धूमिल तक की कविता का गहन, विशद और वस्तुपरक अध्ययन कर यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक हिन्दी कविता न केवल निरन्तर गतिशील है, बल्कि वह विकासशील भी है।
अज्ञेय-मुक्तिबोध-परवर्ती इस कविता की विशेषता यह है कि यह बहुआयामी और बहुवर्णी है, जिस कारण इसका अध्ययन जनवादिता अथवा कलावादिता की किसी संकीर्ण कसौटी पर नहीं हो सकता। नवल जी ने इन दोनों कसौटियों को अपर्याप्त मानकर सर्वप्रथम उस प्रतिमान पर प्रत्येक कवि की परीक्षा की है, जो उसकी कविता से प्राप्त होता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उन्होंने अपने मूल मानववादी दृष्टि को छोड़ दिया है। वस्तुतः इस दृष्टि में जन और कला दोनों की स्वीकृति है, पर वह इन दोनों की सीमाओं का अतिक्रमण भी करती है।
इस अध्ययन और मूल्यांकन का निष्कर्ष यह है कि हिन्दी कविता बड़े पेचीदे ढंग से कल्पना से यथार्थ की ओर, व्यक्ति से समय की ओर और असाधारण से साधारण की ओर विकसित हुई है। ‘समकालीन काव्य-यात्रा’ पाठकों के बीच लोकप्रियता प्राप्त कर अब संशोधित और परिष्कृत रूप में सामने आ रही है। निश्चय ही यह पुस्तक नवल जी के आलोचनात्मक लेखन की ही नहीं, समकालीन काव्यालोचन की भी एक उपलब्धि है।
Chakradhar Ki Sahitya dhara
- Author Name:
Balbhadra
- Book Type:

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Awating description for this book
Itihas Aur Aalochak-Drishti
- Author Name:
Ramswaroop Chaturvedi
- Book Type:

- Description:
साहित्य जीवन की पुनर्रचना है तो आलोचना साहित्य की पुनर्रचना है। साहित्य के इतिहास को तब जीवन, साहित्य और आलोचना की गति तथा उनके आपसी रिश्तों को समझना तथा व्याख्यायित करना है। रचना से पुनर्रचना के इन स्वचेतन होते क्रमिक चरणों में वैचारिकता का सम्पर्क बढ़ता जाए तो यह स्वाभाविक है। इस स्थिति में कह सकते हैं कि साहित्य का इतिहास अनुभव और विचार की अन्तर्क्रिया की पुनर्रचना है। और उसके लिए सबसे बड़ी समस्या और चुनौती यह है कि अपने स्वयं तो इतिहास की प्रक्रिया में अंगीकृत हो।
‘इतिहास और आलोचक-दृष्टि’ में हिन्दी साहित्य के इतिहास का एक नए स्तर पर अनुभावन और विवेचन सम्भव हुआ है। पूरे अध्ययन में दो प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलती हैं। एक ओर तो ख्यात आलोचकों के वैशिष्ट्य का रूप उभरता है, और दूसरी ओर उनके द्वारा विवेचित अलग-अलग इतिहास-युगों का चित्र स्पष्ट होता चलता है। इतिहास और आलोचना का हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में ऐसा सम्पृक्त और द्वन्द्वात्मक रूप पहली बार देखने को मिलता है। कविता-यात्रा और गद्य की सत्ता के विविध रूपों के विवेचन और भाषिक सर्जनात्मक अन्वेषण के बाद समीक्षक ने अगले चरण में इतिहास-आलोचना की विशिष्ट प्रक्रिया का यह अध्ययन प्रस्तुत किया है, जिस विकास-क्रम में उसकी प्रामाणिकता प्रशस्त होती है।
हिन्दी साहित्य के इतिहास का कोई भी अध्ययन इस कृति के द्वारा समृद्ध और समग्रतर होगा।
Vakya Sanrachana Aur Vishleshan : Naye Pratiman
- Author Name:
Badrinath Kapoor
- Book Type:

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हिन्दी की प्रकृति और प्रवृत्ति को जानना-समझना डॉ. बदरीनाथ कपूर का व्यसन रहा है। ‘बेसिक हिन्दी’, ‘परिष्कृत हिन्दी व्याकरण’, ‘हिन्दी व्याकरण की सरल पद्धति’ तथा ‘नवशती हिन्दी व्याकरण’ आदि पुस्तकें इसी व्यसन की सूचक हैं। ‘नवशती हिन्दी व्याकरण’ में कुछ नई प्रस्थापनाएँ भी की गई थीं जो परम्परा से हटकर थीं। प्रस्तुत पुस्तक क्रियाओं के सम्बन्ध में किए गए उनके चिन्तन का सुफल परिणाम है। उनका मानना है कि क्रियापदों में ही ऐसे सूत्र निहित हैं जिनके आधार पर वाक्य की संरचना की जा सकती है। उन्होंने इन सूत्रों को ‘क्रिया-निर्देश’ की संज्ञा दी है। कुल सूत्र चालीस हैं और पाँच-पाँच सूत्रों के इनके आठ सर्ग हैं। इन्हीं के आधार पर इस पुस्तक में हिन्दी वाक्यों की विशेषतः सरल वाक्यों की— संरचना करने का प्रयास किया गया है। इस पुस्तक में वाक्य-संरचना और विश्लेषण दोनों साथ-साथ दिये गए हैं जिससे स्पष्ट हो कि क्रिया-निर्देशों और नवशती हिन्दी व्याकरण की स्थापनाओं (दोनों) का उद्देश्य एक है। हिन्दी वाक्य-संरचना के नए प्रतिमान प्रस्थापित करनेवाली डॉ. बदरीनाथ कपूर की यह महत्त्वपूर्ण पुस्तक हिन्दी भाषा की सूत्रबद्धता को स्थापित करती है और सिद्ध करती है कि हिन्दी एक सुचिन्तित और सुनियोजित भाषा है। हिन्दी भाषा की अस्मिता और गरिमा की वृद्धि करनेवाली इस महत्त्वपूर्ण कृति का संयोजन वैज्ञानिक और गणितीय पद्धति पर हुआ है। छात्रों-अध्येताओं के लिए समान रूप से उपयोगी।
Hindi Ki Sahitiyak Sanskriti Aur Bhartiya Adhunikata
- Author Name:
Rajkumar
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हिन्दी की आधुनिक संस्कृति का विकास भारतीय सभ्यता को एक आधुनिक औद्योगिक राष्ट्र में रूपान्तरित कर देने के वृहत् अभियान के हिस्से के रूप में हुआ। इस प्रक्रिया में गांधी जैसे चिन्तकों के विचारों की अनदेखी तो की ही गई, मार्क्स के चिन्तन को भी बहुत ही सपाट और यांत्रिक ढंग से समझने और लागू करने का प्रयास किया गया। यह पुस्तक गांधी और मार्क्स का एक नया भाष्य ही नहीं प्रस्तुत करती, बल्कि भारतीय आधुनिकता की विलक्षणताओं को भी रेखांकित करने का उपक्रम करती है। आधुनिकता की परियोजना के संकटग्रस्त हो जाने और उत्तर-आधुनिक-उत्तर-औपनिवेशिक चिन्तकों द्वारा उसकी विडम्बनाओं को उजागर कर दिए जाने के उपरान्त गांधी और मार्क्स का ग़ैर-पश्चिमी समाज के परिप्रेक्ष्य में पुनर्पाठ एक राजनीतिक और रणनीतिक ज़रूरत है। इस ज़रूरत का एहसास भारतीय और पश्चिमी समाज वैज्ञानिकों के लेखन में इन दिनों बहुत शिद्दत से उभरकर आ रहा है। विडम्बना ये है कि हिन्दी की दुनिया ने अभी भी इस प्रकार के चिन्तन को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी है। इस दृष्टि से विचार करने पर आधुनिकता के साथ पूँजीवाद, उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद, विज्ञान, तर्कबुद्धि और लोकतंत्र का वैसा सम्बन्ध ग़ैर-पश्चिमी सभ्यताओं के साथ नहीं बनता है, जैसा पश्चिमी सभ्यताओं के साथ दिखाई पड़ता है। इस बात का एहसास गांधी को ही नहीं, हिन्दी नवजागरण के यशस्वी लेखक प्रेमचन्द को भी था। यह अकारण नहीं है कि प्रेमचन्द ने आधुनिकता से जुड़े हुए राष्ट्रवाद समेत सभी अनुषंगों की तीखी आलोचना की और उसके विकल्प के रूप में कृषक संस्कृति, देशज कौशल, शिक्षा और न्याय-व्यवस्था के महत्त्व पर ज़ोर दिया। देशज ज्ञान को महत्त्व देनेवाला व्यक्ति ज्ञान के स्रोत के रूप में सिर्फ़ अंग्रेज़ी के माहात्म्य को स्वीकार नहीं कर सकता था। इसलिए गांधी और प्रेमचन्द ने हिन्दी और भारतीय भाषाओं के उत्थान पर इतना ज़ोर दिया। लेकिन, हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति के अधिकांश में, भारतीय भाषाओं की अस्मिता और उनके साहित्य का अध्ययन भी यूरोपीय राष्ट्रों के साहित्य के वज़न पर किया गया। आधुनिक साहित्यिक विधाओं का चुनाव और विकास भी बहुत कुछ पश्चिमी देशों के साहित्य के निकष पर हुआ। यह सब हुआ जातीय साहित्य और जातीय परम्परा का ढिंढोरा पीटने के बावजूद। यह पुस्तक साहित्य के इतिहास-अध्ययन की इस प्रवृत्ति और साहित्यिक विधाओं के विकास की सीमाओं और विडम्बनाओं को भी अपनी चिन्ता का विषय बनाती है और सही मायने में अपनी जातीय साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा को एक उच्चतर सर्जनात्मक स्तर पर पुनराविष्कृत करने की विचारोत्तेजक पेशकश करती है।
—पुरुषोत्तम अग्रवाल
Bharatmata : Dhartimata
- Author Name:
Rammanohar Lohia
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प्रस्तुत पुस्तक 'भारतमाता-धरतीमाता' समाजवादी विचारक और चिन्तक
डॉ. राममनोहर लोहिया के सामाजिक, सांस्कृतिक (ग़ैर राजनीतिक) लेखों का संग्रह है जो लोहिया के सांस्कृतिक मन और सोच को उजागर करता है। संग्रह के सभी लेख मूल रूप में ग़ैर राजनीतिक हैं, लेकिन कहीं-कहीं राजनीति की झलक ज़रूर दिख जाती है, वह लोहिया की मजबूरी थी। रामायण, राम, कृष्ण तीर्थों और अन्य विषयों पर उनकी जो दृष्टि थी उनमें वे आधुनिक सन्दर्भ को जोड़ते थे, इसलिए कहीं-कहीं राजनीति की झलक मिलती है। संग्रह के सभी लेख लोहिया जी के जीवन-काल में सन् 1950 से 1965 तक के कालखंड के ही हैं, अत: बीच-बीच में आबादी आदि के जो आँकड़े प्रस्तुत किए गए हैं, वे उसी समय के हैं।प्रस्तुत पुस्तक निःसन्देह पठनीय और संग्रहणीय है।
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