Hindi Dalit Sahitya : Samvedana Aur Vimarsh
Author:
P.N. SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 380
₹
475
Available
दलित रचनाकार और विमर्शकार चाहे जितना भी शहादती तेवर अपनाएँ, अपने पूर्व के कम्युनिस्टों की तुलना में इन्होंने सुरक्षित विकेट पर ही खेला है। अपराध-बोध से पीड़ित पारम्परिक चेतना सुरक्षात्मक रही है अथवा चुप। प्रगतिशील चेतना ने भी विरोध न कर दलित साहित्य संवेदना के कतिपय अतिरेकों के विरुद्ध मात्र सावधान किया है। इसकी आलोचना मित्रवत् रही है।</p>
<p>प्रथम आधुनिक दलित होने का गौरव पटना के दलित कवि ‘हीरा डोम’ को दिया जा सकता है जिनकी एक कविता ‘अछूत की शिकायत’, सरस्वती में 1914 में प्रकाशित हुई थी। इसमें दलित पीड़ा का मार्मिक अंकन है। 1914 में अपने जाति-नाम ‘डोम’ का उल्लेख उनके दलितवादी स्वर का भी परिचायक है।</p>
<p>...कुल मिलाकर, इसके राजनीतिक क्षितिज पर जो घटित हुआ है, लगभग वही इसके साहित्यिक फलक पर भी। अब दलित बुद्धिधर्मी पारम्परिक जातिबद्ध सोच से मुक्त किसी रैडिकल सामाजिक विवेक एवं नैतिकता के अग्रधावक नहीं लगते। इसी कारण ये अपने नव-अगड़ों की शिनाख़्त से बचते हैं। आरम्भिक सर्जनात्मक विस्फोट के बाद दलित कविता ने अपने लिए कोई नया पथ अन्वेषित करने की चिन्ता नहीं दिखाई।
ISBN: 9789389243567
Pages: 190
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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आपको याद न दिलाना होगा कि आचार्य कृष्णचन्द्र भट्टाचार्य ने स्वातंत्र्य आन्दोलन के समय विचार के स्वातंत्र्य—स्वराज—का उद्घोष किया था। अंग्रेज़ी में किया था, जो विचार की भाषा बन चली थी। और है। पर उनके कथन में सहज ही ऊह्य और व्यंजित था कि ऐसे स्वराज का मार्ग अपनी भाषा के ही द्वार की माँग करता है।
प्रस्तुत निबन्ध में उन्होंने काण्ट के दर्शन का नितान्त स्वतंत्र स्थापन-प्रतिपादन किया है जो अपनी तरह से विलक्षण है। इसके लिए उन्होंने भाषा भी अपनी ही ली है। जहाँ तक मैं जानता हूँ, बांग्ला में यह उनकी अकेली रचना है। पर इस एक रचना से ही स्पष्ट है कि वे अपने शेष चिन्तन को भी बांग्ला में विदग्ध अभिव्यक्ति दे सकते थे। उनके इस एक प्रौढ़ लेखन में भाषा की सम्भावनाओं का स्पष्ट, समृद्ध इंगित है।
आचार्य संस्कृत के निष्णात पण्डित थे। उनकी पदावली यहाँ स्वभावत: पुराने परिनिष्ठित शब्दों की ओर मुड़ती है पर इस मार्ग पर वे स्वभावत: ही नहीं, 'स्वरसेन’ चलते दिखते हैं। पुरानी पदावली रूढ़ ही नहीं है—जो कि कोई भी पदावली होती है—उसमें महत् लोच है। आचार्य इस पदावली को एक नई दिशा, नई व्याप्ति, नया आयाम देते हैं।
Anuvad : Siddhant Avam Vyavahar
- Author Name:
Dr. Jayanti Prasad Nautiyal
- Book Type:

- Description: यद्यपि अनुवाद विषय पर अभी तक लगभग पन्द्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, परन्तु सभी की विषय-व्याप्ति अलग-अलग है। विद्यार्थियों को एक ही स्थान पर अनुवाद सम्बन्धी समस्त जानकारी आसान व संक्षिप्त रूप में मिल सके, यह पुस्तक इस उद्देश्य से लिखी गई है। हिन्दी को राजभाषा के रूप में केन्द्रीय सरकार के उपक्रमों, सरकारी कार्यालयों तथा बैंकों में लागू कर दिए जाने से हिन्दी अनुवादक एवं हिन्दी अधिकारी पदों हेतु लिखित परीक्षा में अनुवाद भी दिया जाता है। अत: लिखित परीक्षा देनेवाले अभ्यर्थियों को भी अनुवाद हेतु अधिकतम जानकारी प्राप्त हो सके, इसे भी ध्यान में रखकर कुछ नए अध्याय जोड़े गए हैं। इसके अलावा यह पुस्तक उनके लिए भी उपयोगी होगी जो अनुवाद के क्षेत्र में नए-नए हैं अथवा आरम्भिक स्तर पर अनुवाद शिक्षण से जुड़े हैं, जैसे—बीएड, पाठ्यक्रम व भाषाविज्ञान में डिप्लोमा जैसे विषयों में भी अनुवाद विषय रखा जाता है, अत: इसके स्तर को भी ध्यान में रखकर यह पुस्तक लिखी गई है।
Otan Lage Kapas
- Author Name:
Prabhash Joshi
- Book Type:

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Description:
‘देश व्यवसाय नहीं है और किसी भी प्रगतिशील आधुनिक लोकतांत्रिक देश की पत्रकारिता सिर्फ़ व्यवसाय नहीं हो सकती।...जब तक कौशल के साथ पत्रकारिता लोगों को सही और तथ्यपरक जानकारी देने और निर्भीकता से अपना दृष्टिकोण रखने का माध्यम बनी रहेगी तब तक वह सिर्फ़ व्यवसाय के लेन-देन वाले धंधे में नहीं बदल सकती।’
नवम्बर 1991 में ‘जनसत्ता’ के कोलकाता आगमन पर लिखी गईं प्रभाष जी की ये पंक्तियाँ आज कितनी प्रासंगिक और अनुकरणीय हैं, कहने की ज़रूरत नहीं है। पत्रकारिता के इन आधारभूत मूल्यों को उन्होंने हमेशा बल दिया। जब ज़रूरत हुई सत्ता का विरोध किया, जब ठीक लगा तारीफ़ भी की।
राजीव गांधी के कामकाज का विरोध करते हुए जोशी जी ने ‘एक देवदूत का दलदल से बिदकना’ लिखा तो सोनिया गांधी को जबरन राजनीति में सक्रिय करने के कांग्रेस-जनों के प्रयास को उन्होंने ‘एक सफेद आँचल में दुबकना’ लिखा। अर्थव्यवस्था के खुलेपन का विरोध करते हुए उन्होंने लिखा कि ‘ईमानदारी से कहो कि हम गलत थे’।
‘ओटन लगे कपास’ पुस्तक को दो खंडों में बाँटा गया है। पहले खंड में केवल 13 लेख शामिल हैं। 17 नवम्बर, 1983 को ‘जनसत्ता’ उनके नेतृत्व में शुरू हुआ। पहले खंड की शुरुआत उसमें प्रकाशित उनकी पहली टिप्पणी से की गई है। दिल्ली के बाद चंडीगढ़, मुम्बई, कोलकाता और रायपुर में जनसत्ता के संस्करण प्रकाशित होने शुरू हुए। चंडीगढ़ के अलावा चारों संस्करणों के पहले दिन के लेख इस पुस्तक में हैं।
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की लम्बी हड़ताल और दिवराला सती कांड से जुड़े लेख भी इस खंड में हैं। सबसे अनोखा लेख ‘मूरख जनम गमायो’ है, जिसे उन्होंने अपनी अलिखित आत्मकथा की भूमिका माना है। इसमें उन्होंने पत्रकार और पत्रकारिता के माहौल पर लिखा है। पुस्तक के दूसरे खंड में उनके सम्पादकीय छोड़ने तक की उन रचनाओं को शामिल किया गया है, जो अब तक किसी पुस्तक में नहीं आ पाई थीं।
Humsafaron Ke Darmiyan
- Author Name:
Shamim Hanfi
- Book Type:

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Description:
आधुनिक उर्दू कविता के बारे में यह छोटी-सी किताब मेरे कुछ निबन्धों पर आधारित है। समकालीन साहित्य और उससे सम्बन्धित समस्याएँ मेरी सोच और दिलचस्पी का ख़ास विषय रही हैं। पिछले पचास-साठ बरसों में मैंने इस विषय पर कम से कम साठ-सत्तर निबन्ध लिखे होंगे। उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के बहुत से शायरों को मैंने अपने आलोचनात्मक अध्ययन का बहाना बनाया यानी कि ग़ालिब से लेकर आज तक की शायरी में मेरी गहरी दिलचस्पी रही है।
यहाँ आगे बढ़ने से पहले एक और सफ़ाई देना चाहता हूँ। पारम्परिक प्रगतिवाद, आधुनिकतावाद और उत्तर-आधुनिकतावाद में मेरा विश्वास बहुत कमज़ोर है। मैं समझता हूँ कि हमारी अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परम्परा के सन्दर्भ में ही हमारे अपने प्रगतिवाद, आधुनिकतावाद और उत्तर-आधुनिकता की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए। हमारा जीवन हमारे समय के पश्चिमी जीवन और सोच-समझ की कार्बन कॉपी नहीं है। जिस तरह हमारा सौन्दर्यशास्त्र या Aesthetic Culture अलग है, उसी तरह हमारी प्रोग्रेसिविज़्म (Progressivism) और Modernity या ज़दीदियत भी अलग है। मैंने इसी दृष्टिकोण के साथ आधुनिक युग के अधिकतर शायरों को समझने की कोशिश की है।
ये निबन्ध मेरी दो किताबों—'हमसफ़रों के दरमियाँ’ (सह-यात्रियों के बीच) और 'हमनफ़सों की बज़्म में’ (यार-दोस्तों की सभा में) से लिए गए हैं। इनमें मेरा विषय बननेवाले शायरों का स्वभाव, चरित्र, चेतना और रूप-रंग अलग-अलग हैं। मैं समझता हूँ कि आधुनिकतावाद को इसी भिन्नता और बहुलता का प्रतीक होना चाहिए।
—शमीम हनफी (प्रस्तावना से)
''हालाँकि हिन्दी में उर्दू साहित्य के आधुनिक दौर के अधिकांश शायरों से ख़ासी वाक़िफ़यत रही है, उन पर स्वयं उर्दू में जो विचार और विश्लेषण हुआ है, उससे हमारा अधिक परिचय नहीं रहा है। शमीम हनफी स्वयं शायर होने के अलावा एक बड़े आलोचक के रूप में उर्दू में बहुमान्य हैं। उनके कुछ निबन्धों के इस संचयन के माध्यम से उर्दू की आधुनिक कविता की कई जटिलताओं, तनावों और सूक्ष्मताओं को जान सकेंगे और कई बड़े उर्दू शायरों की रचनाओं का हमारा रसास्वादन गहरा होगा। हमें यह संचयन प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता है।”
—अशोक वाजपेयी
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