Marang Gomke Jaipal Singh Munda
Author:
Ashwani Kumar 'Pankaj'Publisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 360
₹
450
Unavailable
कौन थे जयपाल सिंह मुंडा? इनका भारतीय स्वतंत्रता और नए भारत के निर्माण में राजनीतिक-बौद्धिक योगदान क्या था? वे जिस आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, उसकी आकांक्षाएँ क्या थीं? इस बारे में आजादी के सत्तर साल बाद भी इतिहास चुप है। एक तरफ गांधी-नेहरू, जिन्ना, अंबेडकर सहित अनेक राजनीतिज्ञों पर सैंकड़ों पुस्तकें हैं, पर जयपाल सिंह मुंडा पर एक भी नहीं है। यह कितनी हैरत की बात है कि झारखंड आंदोलन में कूदने से पहले और देश के संविधान निर्माण सभा में लाखों आदिवासियों के लिए निडरता से दहाड़नेवाले जिस आदिवासी ने देश के लिए आई.सी.एस. छोड़ी, जिसकी कप्तानी में भारत ने पहला हॉकी का ओलंपिक स्वर्ण जीता, जिसने अफ्रीका और भारत के कॉलेजों में अध्यापन के दौरान अपनी शिक्षकीय योग्यता से प्रभु वर्ग को प्रभावित किया, जो गुलाम भारत में किसी ब्रिटिश कंपनी में सर्वोच्च पद पर काम करनेवाला पहला भारतीय (वह भी आदिवासी) था, जिससे पढ़ने के लिए भारत के राजा-रजवाड़े लालायित रहते
थे, जो ऑक्सफोर्ड से अर्थशास्त्र में गोल्डमेडलिस्ट था, हॉकी में एकमात्र भारतीय ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ खिलाड़ी था और जो कॉलेज के दिनों में विभिन्न सभा-सोसायटियों का नेतृत्वकर्ता संयोजक-अध्यक्ष था, उसे इस लायक भी नहीं समझा गया कि उसकी चर्चा हो।
—इसी पुस्तक से
ISBN: 9789353223533
Pages: 184
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: राधाकुमुद मुखर्जी ने भारतीय इतिहास के अनेक पक्षों पर अपनी लेखनी चलाई है, लेकिन ख़ास तौर से प्राचीन संस्कृति, प्राचीन कला और धर्म तथा राजनीतिक विचार उनके अध्ययन और लेखन के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. मुखर्जी ने प्राचीन भारतीय इतिहास का परिचय सरल-सुबोध शैली में दिया है। प्रारम्भ में भारतीय इतिहास पर भूगोल के प्रभाव का विवेचन करते हुए उन्होंने इसकी मूलभूत एकता के तत्त्वों का आकलन किया है। इसमें उन तत्त्वों को उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया है जो देश की एकता को सदियों से पुष्ट करते रहे हैं और जिनके कारण ही बृहत्तर भारत का निर्माण सम्भव हो सका। यहाँ यह द्रष्टव्य है कि अपने सारे विवेचन में उन्होंने राष्ट्रीयता और जनतंत्र की नैतिक आधारशिला के रूप में अखिल भारतीय दृष्टिकोण को ही प्रमुखता दी है और उनका विवेचन सर्वत्र एक धर्मनिरपेक्ष वैज्ञानिक दृष्टि से परिपुष्ट है। प्रो. मुखर्जी ने यहाँ प्रागैतिहासिक काल से लेकर हर्षवर्धन के बाद तक के इतिहास को अपने विवेचन का विषय बनाया है और इस लम्बी अवधि के इतिहास की राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों का अध्ययन करने के साथ-ही-साथ उस काल की सामाजिक-सांस्कृतिक उपलब्धियों को भी संक्षिप्त और सुगठित तरीक़े से इस पुस्तक में समेटा है। प्रो. मुखर्जी की यह पुस्तक एक ओर अपनी प्रामाणिकता के कारण विद्वानों के लिए उपयोगी है तो दूसरी ओर भाषा-शैली की सरलता तथा रोचकता के कारण विश्वविद्यालयी छात्रों तथा इतिहास में रुचि रखनेवाले सामान्य लोगों के लिए भी उपयोगी है।
Madhyakalin Bharat Ka Arthik Itihas
- Author Name:
Sunil Kumar Singh
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Description:
यह पुस्तक नवीनतम स्रोत सामग्री को सन्दर्भित करते हुए लिखी गई है। लेखक ने बड़ी कुशलता के साथ सन्दर्भ ग्रन्थों को समन्वयित किया है कि विशेषज्ञों के अलावा साधारण पाठकों को भी आख्यान बोधगम्य हो सके।
इस पुस्तक में मुगलों की नई काराधान व्यवस्था के आने से कृषि के क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली संकटपूर्ण परिस्थितियों को उजागर किया है। लेखक का मानना है कि इस संकट के बावजूद ग्रामीण घरों में सूत कातने और कपड़ा बुनने की परम्पराएँ कायम रहीं। किन्तु मुग़ल नीतियों का दूरगामी परिणाम यह हुआ कि कृषि और शिल्प दो अलग-अलग व्यवसायों के रूप में नज़र आने लगे। अध्याय के अन्त में लेखक ने परम्परागत शिल्पों को स्वतन्त्र व्यवसाय के रूप में प्रस्तुत कर लम्बे अरसे से चली आ रही भ्रान्तियों को दूर किया है। शिल्प उत्पादन के सम्बन्ध में विस्तृत वृत्तान्त मिलता है।
दक्षिण भारत के राजस्व इतिहास को समाहित कर इस पुस्तक को पूर्णतः समावेशी बना दिया गया है। पाँचवें अध्याय में मध्यकालीन कराधान की व्यवस्था, शहरी उत्पादन, सिक्कों के प्रकार और प्रसार का उल्लेख है। मध्यकालीन भारत में नाप-तौल की प्रणालियों, मजदूरी और उत्पादकों पर विदेशी पूँजी के बढ़ते दबाव से सम्बन्धित है। लेखक ने तालिकाओं और आँकड़ों की सहायता से व्यापार और व्यवसायों के समक्ष बढ़ती चुनौतियों को स्पष्ट किया है।
विश्वास है कि सुधी पाठकों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे पाठकों को यह रचना समान रूप से पसन्द आएगी।
ललित जोशी
प्रोफेसर, इतिहास विभाग
DHYEYA YATRA (SET OF 2 VOL.)-(PB)
- Author Name:
Ed. M. Kant +2
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1857 : Awadh Ka Muktisangram
- Author Name:
Akhilesh Mishra
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- Description: यशस्वी पत्रकार और विद्वान लेखक अखिलेश मिश्र की यह पुस्तक एक लुटेरे साम्राज्यवादी शासन के ख़िलाफ़ अवध की जनता के मुक्ति-युद्ध की दस्तावेज़ है। अवध ने विश्व की सबसे बड़ी ताक़त ब्रिटेन का जैसा दृढ़ संकल्पित प्रतिरोध किया और इस प्रतिरोध को जितने लम्बे समय तक चलाया, उसकी मिसाल भारत के किसी और हिस्से में नहीं मिलती। पुस्तक 1857 की क्रान्ति में अवध की साँझी विरासत हिन्दू-मुस्लिम एकता को भी रेखांकित करती है। इस लड़ाई ने एक बार फिर इस बात को उजागर किया था कि हिन्दू-मुस्लिम एकता की बुनियादें बहुत गहरी हैं और उन्हें किसी भेदनीति से कमज़ोर नहीं किया जा सकता। आन्दोलन की अगुवाई कर रहे मौलवी अहमदुल्लाह शाह, बेगम हजरत महल, राजा जयलाल, राणा वेणीमाधव, राजा देवी बख्श सिंह में कौन हिन्दू था, कौन मुसलमान? वे सब एक आततायी साम्राज्यवादी ताक़त से आज़ादी पाने के लिए लड़नेवाले सेनानी ही तो थे। इस मुक्ति-संग्राम का चरित प्रगतिशील था। न केवल इस संग्राम में अवध ने एक स्त्री बेगम हजरत महल का नेतृत्व खुले मन से स्वीकार किया, बल्कि हर वर्ग, वर्ण और धर्म की स्त्रियों ने इस क्रान्ति में अपनी-अपनी भूमिका पूरे उत्साह से निभाई, चाहे वह तुलसीपुर की रानी राजेश्वरी देवी हों अथवा कुछ वर्ष पूर्व तक अज्ञात वीरांगना के रूप में जानी जानेवाली योद्धा ऊदा देवी पासी। अवध के मुक्ति-संग्राम की अग्रिम पंक्ति में भले ही राजा, ज़मींदार और मौलवी रहे हों, लेकिन यह उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ रहे किसानों और आम जनता का जुझारूपन था जिसने सात दिनों के भीतर अवध में ब्रिटिश शासन को समाप्त कर दिया था। यह पुस्तक 1857 के जनसंग्राम के कुछ ऐसे ही उपेक्षित पक्षों को केन्द्र में लाती है। आज 1857 के जनसंग्राम को याद करना इसलिए ज़रूरी है कि इतिहास सिर्फ़ अतीत का लेखा-जोखा नहीं, वह सबक भी सिखाता है। आज भूमंडलीकरण के इस दौर में जब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की लूट का जाल आम भारतीय को अपने फन्दे में लगातार कसता जा रहा है, ईस्ट इंडिया कम्पनी से लोहा लेनेवाले, उसे एक संक्षिप्त अवधि के लिए ही सही, पराजित करनेवाले वर्ष 1857 से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।
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