Hindutva Ka Ganarajya : Sangh Aur Bhartiya Loktantra
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Author:
Rama Shankar Singh, Badri NarayanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
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बद्री नारायण 'हिन्दुत्व का गणराज्य' में लगातार विस्तार करते संघ परिवार के उद्देश्यों और रणनीतियों पर एक विहंगम दृष्टि डालते हैं। वे बताते हैं कि मौजूदा भारत में वह शायद अकेली शक्ति है जो एक व्यापक और सामूहिक नैरेटिव की अहमियत को समझती है। ... जो लोग हिन्दुत्व की राजनीतिक अपील को समझना चाहते हैं, उनको यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए। —राजीव भार्गव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बर्फ़ की उस चट्टान की तरह है जिसका सिर्फ़ ऊपरी हिस्सा हमें दिखाई देता है, उसका वास्तविक प्रभाव लेकिन उस हिस्से से प्रसरित होता है जो दिखाई नहीं देता। 2014 के आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी को नेता के रूप में चुनने से लेकर 2019 के चुनाव अभियान तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रभाव निर्णायक रहा है। राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के उत्थान के पीछे भी उन्हीं की ताक़त है। यह जरूरी और आँख खोल देनेवाली किताब बताती है कि आएएसएस के शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संगठनों का विशाल नेटवर्क भारतीय चेतना में कैसे इतनी गहरी पैठ बना रहा है, और कैसे लामबन्दी की अपनी नई तकनीकों से उसने दलितों, पिछड़ी जातियों, आदिवासियों और हाशिये के अन्य जन-गण को अपने साथ जोड़कर भारत के एक बड़े तबके को हिन्दुत्व की तरफ़ खींचा है। यही वह सामाजिक समीकरण है जिसका लाभ भाजपा चुनावी राजनीति से जाति को बहिष्कृत किए बिना भी उठा पाती है। ज़मीनी स्तर पर किए गए व्यापक शोध-सर्वेक्षण और आरएसएस कार्यकर्ताओं से किए गए साक्षात्कारों की रोशनी में यह अध्ययन बहुत स्पष्ट रूप में बताता है कि कैसे देश में एक नई जनता गढ़ी जा रही है जो भारतीय लोकतंत्र के भविष्य का निर्धारण करनेवाली है।
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बद्री नारायण 'हिन्दुत्व का गणराज्य' में लगातार विस्तार करते संघ परिवार के उद्देश्यों और रणनीतियों पर एक विहंगम दृष्टि डालते हैं। वे बताते हैं कि मौजूदा भारत में वह शायद अकेली शक्ति है जो एक व्यापक और सामूहिक नैरेटिव की अहमियत को समझती है। ... जो लोग हिन्दुत्व की राजनीतिक अपील को समझना चाहते हैं, उनको यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए।
—राजीव भार्गव
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बर्फ़ की उस चट्टान की तरह है जिसका सिर्फ़ ऊपरी हिस्सा हमें दिखाई देता है, उसका वास्तविक प्रभाव लेकिन उस हिस्से से प्रसरित होता है जो दिखाई नहीं देता। 2014 के आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी को नेता के रूप में चुनने से लेकर 2019 के चुनाव अभियान तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रभाव निर्णायक रहा है। राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के उत्थान के पीछे भी उन्हीं की ताक़त है।
यह जरूरी और आँख खोल देनेवाली किताब बताती है कि आएएसएस के शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संगठनों का विशाल नेटवर्क भारतीय चेतना में कैसे इतनी गहरी पैठ बना रहा है, और कैसे लामबन्दी की अपनी नई तकनीकों से उसने दलितों, पिछड़ी जातियों, आदिवासियों और हाशिये के अन्य जन-गण को अपने साथ जोड़कर भारत के एक बड़े तबके को हिन्दुत्व की तरफ़ खींचा है। यही वह सामाजिक समीकरण है जिसका लाभ भाजपा चुनावी राजनीति से जाति को बहिष्कृत किए बिना भी उठा पाती है।
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Book Details
-
ISBN9789360864972
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अब सौ साल का हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दरअसल है क्या? इसकी काया के पीछे छुपी माया क्या है? अब जबकि संघ से जुड़ी एक पार्टी सत्ता पर मज़बूती से क़ाबिज़ है, यह भारत को किस दिशा में ले जा रहा है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके ग़ौरतलब जवाब देवनूर महादेव ने आर.एस.एस. : काया और माया में दिए हैं। मिथकों को आधुनिकता के और लोकवार्ताओं को गहरी राजनीतिक अन्तर्दृष्टि के बरअक्स रखकर देखने-परखने से हासिल इन जवाबों को पेश करते हुए, अपने ख़ास अन्दाज़ में वे पाठकों से आग्रह करते हैं : जब आर.एस.एस. का मायावी दानव भेष बदलकर हमारे दरवाज़े पर आता है, तब हमें उसकी बातों में नहीं आना चाहिए। ‘आज नक़द कल उधार’ की तर्ज़ पर हमें भी ग्रामवासियों की तरह अपने दरवाज़ों पर ‘नाले बा’ (कल आना) लिख देना चाहिए! कन्नड़ सहित अनेक भाषाओं में बिक्री के कीर्तिमान बना चुकी यह असाधारण किताब सांस्कृतिक आलोचना और ऐतिहासिक व्याख्या के साथ-साथ राजनीतिक कार्रवाई का आह्वान भी है।
Loktantra Ki Chaukidari
- Author Name:
Steven Levitsky and Daniel Ziblatt +1
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लोकतंत्र कैसे ख़त्म होता है? अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए हम क्या कर सकते हैं? इतिहास हमें क्या सिखाता है? इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र जितना ख़तरे में है, पहले कभी नहीं रहा। समूचे इतिहास से सबक लेते हुए—चिली में पिनोशे की ख़ूनी सत्ता से लेकर चुपचाप ढहते तुर्की में एर्दुआं की सरकार तक—हार्वर्ड के प्रोफ़ेसर स्टीवेन लेवित्सकी और डेनियल ज़िब्लाट यह समझाते हैं कि लोकतंत्र क्यों नाकाम हो जाते हैं, ट्रम्प जैसे नेता कैसे उसे नष्ट करते हैं और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए हम में से हर एक व्यक्ति क्या कर सकता है। विशेषज्ञों की राय जो भी लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिन्तित है उसे यह सहज, सरल किताब पढ़नी चाहिए। जो चिन्तित नहीं हैं, उन्हें तो ज़रूर पढ़नी चाहिए। दारोन एसेमोगलू ‘व्हाई नेशंस फ़ेल’ के लेखक और 2024 के नोबेल पुरस्कार विजेता लेवित्सकी और ज़िब्लाट ने कितनी कुशलता से यह दलील रखी है कि हम सबको इस देश के रुझानों पर चिन्तित होना चाहिए, अमेरिकी संविधान का ज़बर्दस्त प्रशंसक होने के नाते मेरे लिए यह पढ़ना हताशाजनक था। ‘यह यहाँ नहीं हो सकता’ वाली धारणा लेवित्सकी और ज़िब्लाट के विश्लेषण में नहीं टिकती...क्या शानदार लिखा है। डेनियल डब्ल्यू. ड्रेज़नर ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ उत्कृष्ट, विद्वत्तापूर्ण, पठनीय, चिन्ताजनक और सन्तुलित निक कोहेन ‘ऑब्ज़र्वर’
Sindhu Sabhyata
- Author Name:
S. Irfan Habib +2
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‘भारत का लोक इतिहास’ शृंख्ला की यह दूसरी पुस्तक सिन्धु सभ्यता के बारे में है। इसे इस शृंखला की पहली पुस्तक ‘प्रागैतिहास’ की अगली कड़ी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। सिन्धु सभ्यता के और विस्तृत विवरण के अलावा इसमें अन्य समकालीन और उसके बाद की संस्कृतियों का सर्वेक्षण भी किया गया है। साथ ही भारत के मुख्य भाषा परिवारों के उद्भव पर विमर्श भी इसमें शामिल है। सिन्धु घाटी और सीमावर्ती क्षेत्रों में आरम्भिक कांस्य युग और उसके सांस्कृतिक पहलू तथा सिन्धु सभ्यता की व्यापकता, जनसंख्या, कृषि, हस्तशिल्प, व्यापार, क़स्बों और शहरों की बनावट के साथ इसमें जनता, समाज और राज्यसत्ता आदि का भी प्रमाण-आधारित विश्लेषण किया गया है। तालिकाओं, चित्रों और विस्तृत सन्दर्भ-ग्रन्थ सूचियों के साथ यह पुस्तक शृंखला की अन्य पुस्तकों की ही तरह संग्रहणीय और पठनीय सिद्ध होगी।
Gandhi Ka Saintalis
- Author Name:
Pushya Mitra
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‘गांधी का सैंतालीस’ यानी आज़ादी के साल में गांधी की कथा। वैसे तो यह कहानी गांधी के जीवन के आख़िरी साल की है, जो अक्टूबर, 1946 में उनकी नोआखाली यात्रा से शुरू होती है और वहाँ से बिहार, दिल्ली, कलकत्ता और फिर दिल्ली आकर जनवरी, 1948 में उनकी शहादत के साथ ख़त्म होती है। मगर यह उनके आख़िरी साल का रोज़नामचा नहीं है, यह उनकी आख़िरी लड़ाई की कहानी है। डायरेक्ट एक्शन के बाद भारत में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए, जो बँटवारे के फ़ैसले पर मुहर लगने के बाद और बढ़ गए। इन दंगों ने लाखों की जान ली और करोड़ों को विस्थापित होने के लिए मजबूर कर दिया। उस समय एक गांधी ही थे, जो नफ़रत की इस आग को बुझाने में लगे थे। उन्हें बस एक ही चिन्ता थी कि इस देश की आत्मा कैसे बचे; वह देश जो पिछले तीस साल से अहिंसक तरीक़े से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, आज़ादी के ठीक पहले हिंसा से भर उठा था। लोग अपने पड़ोसियों के ख़ून के प्यासे हो गए थे। इस लड़ाई में 77 साल के गांधी ने अपना सब कुछ झोंक दिया—नंगे पाँव यात्रा करते, पीड़ितों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते, उनके हृदय में साहस भरते और दंगाइयों को सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करने के लिए प्रेरित करते हुए। उन्होंने संवाद, साहस और प्रेम के औज़ारों से यह लड़ाई लड़ी और अपने आख़िरी हथियार शहादत के ज़रिये इस महान लक्ष्य को हासिल किया। यह भी कहना ज़रूरी है कि यह कहानी गांधी के जीवन के इस सर्वश्रेष्ठ दौर की गौरवगाथा भर नहीं है। कोशिश की गई है कि यह कहानी हमारे सामने एक बोधपाठ की तरह खुले ताकि हम देख सकें कि क्या गांधी की इस आख़िरी लड़ाई के तौर-तरीक़ों में कुछ ऐसा भी है जिसे हम आज के भारत में प्रयोग कर सकें!
Vedic Kaal
- Author Name:
S. Irfan Habib +3
- Book Type:

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‘भारत के लोक इतिहास’ श्रृंखला के इस खंड का विषय 1500 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व के बीच का काल-खंड है जिसके तहत ऋग्वेद और उसके बाद के ग्रन्थों को क्रमशः व्यवस्थित किया गया है और उस युग के भूगोल, प्रव्रजन, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और समाज के साथ-साथ धर्म और दर्शन आदि पहलुओं का अन्वेषण किया गया है। लेखकों की कोशिश रही है कि उक्त आदिग्रन्थों के माध्यम से तत्कालीन जन-जीवन की पुनर्रचना कर आम पाठकों के लिए उसे बोधगम्य बनाया जाए। इस प्रक्रिया में लैंगिक और वर्ग-आधारित सामाजिक विभाजनों को ख़ास तौर पर देखने की कोशिश की गई है। पुस्तक के एक अध्याय में पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर प्रमुख क्षेत्रीय संस्कृतियों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया गया है। इतिहास में लोहे का आगमन एक महत्त्वपूर्ण घटना है जो इसी युग में सम्पन्न हुई थी, सो उसका वर्णन किंचित् विस्तार से हुआ है। साथ ही जाति व्यवस्था के आरम्भ पर भी इस पुस्तक में अपेक्षित प्रकाश डाला गया है। मूल ग्रन्थों के उद्धरणों, तार्किक व्याख्याओं और विश्लेषणों, अनेक प्रामाणिक चित्रों और नक़्शों से समृद्ध यह पुस्तक न सिर्फ़ रुचिकर, बल्कि पाठकों को विचारोत्तेजक भी लगेगी।
Prarthna-Pravachan : Vols. 1-2
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
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त्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपे
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