Bharat Mein Angrezi Raj Aur Marxvaad : Vol. 1
Author:
Ramvilas SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 1200
₹
1500
Unavailable
मार्क्सवादी हिन्दी आलोचना और भाषाविज्ञान विषयक युगान्तकारी कृतित्व की कड़ी में डॉ. रामविलास शर्मा की यह एक और उपलब्धि-कृति है। दो खंडो़ में प्रकाशित इतिहास विषयक इस ग्रन्थ का यह पहला खंड है।</p>
<p>छह अध्यायों में विभक्त इस खंड की मुख्य प्रस्थापना यह है कि भारतीय जनता की समाजवादी चेतना उसकी साम्राज्यविरोधी चेतना का ही प्रसार है। इसे साहित्य और राजनीति, दोनों के विश्लेषण और आवश्यक प्रमाणों सहित इस खंड में स्पष्ट किया गया है। इसके पहले अध्याय में रामविलास जी ने विश्व बाज़ार क़ायम करनेवाली ब्रिटिश-नीति की विवेचना की है और सिद्ध किया है कि भारत इसी का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा था। तभी तो भारतीय माल को ब्रिटिश बाज़ार में बेचनेवाले अंग्रेज़ व्यापारी कुछ ही वर्षों के बाद ब्रिटिश माल को भारतीय बाज़ारों में बचने योग्य हो गए। दूसरे अध्याय में गदर, गदर पार्टी और क्रान्तिकारी दल की चर्चा करते हुए जयप्रकाश नारायण, जवाहरलाल नेहरू और मार्क्सवादियों के तत्सम्बन्धी दृष्टिकोण की समीक्षा की गई है। तीसरे अध्याय में लाला हरदयाल, जयप्रकाश और नेहरू की मार्क्सवादी धारणाओं का विवेचन हुआ है। चौथा अध्याय ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण उस हिन्दी साहित्य को सामने रखता है जो 1917 में रूसी क्रान्ति से पूर्व लिखा जाकर भी मार्क्सवादी विचारधारा से सम्बद्ध है। पाँचवें अध्याय में डॉ. शर्मा ने स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए समझौतावादी और क्रान्तिकारी, दोनों रुझानों का विश्लेषण करते हुए उन पर किसान-मज़दूर-संगठनों के प्रभाव का आकलन किया है और छठे अध्याय में, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भारतीय क्रान्तिकारी उभार पर मुस्लिम सम्प्रदायवाद की शक्ल में किए गए साम्राज्यवादी हमले की भीतरी परतों की गहरी पड़ताल की है।</p>
<p>संक्षेप में डॉ. रामविलास शर्मा का यह ग्रन्थ अंग्रेज़ी राज के दौरान भारतीय जनता की साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष-चेतना और उसके विरुद्ध रची गई पेचीदा साज़िशों का पहली बार प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
ISBN: 9788126703661
Pages: 566
Avg Reading Time: 19 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
इस पुस्तक में उस युग की कहानी है जिस पर लिखित दस्तावेज़ों से कोई रोशनी नहीं पड़ती। यह पुस्तक ‘भारत का लोक इतिहास’ (पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया) नामक एक बड़ी परियोजना का हिस्सा है, लेकिन इसे एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में भी देखा जा सकता है। तीन अध्यायों की इस पुस्तक के पहले अध्याय में भारत की भूगर्भीय संरचनाओं, मौसम में परिवर्तन तथा प्राकृतिक पर्यावरण (वनस्पति और प्राणी जगत) की उस हद तक चर्चा की गई है, जहाँ तक हमारे प्रागैतिहास और इतिहास को समझने के लिए प्रासंगिक है।
दूसरे अध्याय में मानव जाति की कहानी को पूरी दुनिया के सन्दर्भ में और फिर उसके अन्दर भारत के सन्दर्भ में पेश किया गया है। उसके औज़ार समूहों में परिवर्तन को औज़ार निर्माता लोगों के प्रकार के साथ जोड़कर देखा गया है। तीसरा अध्याय मूल रूप से खेती के विकास और उसके साथ-साथ शोषणकारी सम्बन्धों की शुरुआत का वर्णन करता है।
इस पुस्तक में इस बात की कोशिश की गई है कि ताज़ातरीन सूचनाएँ उपलब्ध प्रामाणिक ग्रन्थों और पत्रिकाओं से ही उद्धृत की जाएँ। यह भी कोशिश की गई है कि चीज़ों को ‘लोक-लुभावन’ तथा आडम्बरपूर्ण बनाए बग़ैर शैली को सरलतम रखा जाए। तकनीकी शब्दों के प्रयोग को न्यूनतम रखा गया है और यह भी प्रयास किया गया है कि प्रत्येक तकनीकी शब्द का प्रयोग करते समय वहीं पर उसकी एक परिभाषा प्रस्तुत कर दी जाए। प्रत्येक अध्याय के अन्त में एक पुस्तक सूची टिप्पणी भी दी गई है जहाँ उस विषय पर और अधिक सूचना देनेवाली महत्त्वपूर्ण पुस्तकों और लेखों को संक्षिप्त टिप्पणियों के साथ दर्ज किया गया है।
Pracheen Bharat
- Author Name:
Radhakumud Mukherji
- Book Type:

- Description: राधाकुमुद मुखर्जी ने भारतीय इतिहास के अनेक पक्षों पर अपनी लेखनी चलाई है, लेकिन ख़ास तौर से प्राचीन संस्कृति, प्राचीन कला और धर्म तथा राजनीतिक विचार उनके अध्ययन और लेखन के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. मुखर्जी ने प्राचीन भारतीय इतिहास का परिचय सरल-सुबोध शैली में दिया है। प्रारम्भ में भारतीय इतिहास पर भूगोल के प्रभाव का विवेचन करते हुए उन्होंने इसकी मूलभूत एकता के तत्त्वों का आकलन किया है। इसमें उन तत्त्वों को उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया है जो देश की एकता को सदियों से पुष्ट करते रहे हैं और जिनके कारण ही बृहत्तर भारत का निर्माण सम्भव हो सका। यहाँ यह द्रष्टव्य है कि अपने सारे विवेचन में उन्होंने राष्ट्रीयता और जनतंत्र की नैतिक आधारशिला के रूप में अखिल भारतीय दृष्टिकोण को ही प्रमुखता दी है और उनका विवेचन सर्वत्र एक धर्मनिरपेक्ष वैज्ञानिक दृष्टि से परिपुष्ट है। प्रो. मुखर्जी ने यहाँ प्रागैतिहासिक काल से लेकर हर्षवर्धन के बाद तक के इतिहास को अपने विवेचन का विषय बनाया है और इस लम्बी अवधि के इतिहास की राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों का अध्ययन करने के साथ-ही-साथ उस काल की सामाजिक-सांस्कृतिक उपलब्धियों को भी संक्षिप्त और सुगठित तरीक़े से इस पुस्तक में समेटा है। प्रो. मुखर्जी की यह पुस्तक एक ओर अपनी प्रामाणिकता के कारण विद्वानों के लिए उपयोगी है तो दूसरी ओर भाषा-शैली की सरलता तथा रोचकता के कारण विश्वविद्यालयी छात्रों तथा इतिहास में रुचि रखनेवाले सामान्य लोगों के लिए भी उपयोगी है।
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