Bharat Mein Angrezi Raj Aur Marxvaad : Vol. 1
About the book
मार्क्सवादी हिन्दी आलोचना और भाषाविज्ञान विषयक युगान्तकारी कृतित्व की कड़ी में डॉ. रामविलास शर्मा की यह एक और उपलब्धि-कृति है। दो खंडो़ में प्रकाशित इतिहास विषयक इस ग्रन्थ का यह पहला खंड है। छह अध्यायों में विभक्त इस खंड की मुख्य प्रस्थापना यह है कि भारतीय जनता की समाजवादी चेतना उसकी साम्राज्यविरोधी चेतना का ही प्रसार है। इसे साहित्य और राजनीति, दोनों के विश्लेषण और आवश्यक प्रमाणों सहित इस खंड में स्पष्ट किया गया है। इसके पहले अध्याय में रामविलास जी ने विश्व बाज़ार क़ायम करनेवाली ब्रिटिश-नीति की विवेचना की है और सिद्ध किया है कि भारत इसी का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा था। तभी तो भारतीय माल को ब्रिटिश बाज़ार में बेचनेवाले अंग्रेज़ व्यापारी कुछ ही वर्षों के बाद ब्रिटिश माल को भारतीय बाज़ारों में बचने योग्य हो गए। दूसरे अध्याय में गदर, गदर पार्टी और क्रान्तिकारी दल की चर्चा करते हुए जयप्रकाश नारायण, जवाहरलाल नेहरू और मार्क्सवादियों के तत्सम्बन्धी दृष्टिकोण की समीक्षा की गई है। तीसरे अध्याय में लाला हरदयाल, जयप्रकाश और नेहरू की मार्क्सवादी धारणाओं का विवेचन हुआ है। चौथा अध्याय ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण उस हिन्दी साहित्य को सामने रखता है जो 1917 में रूसी क्रान्ति से पूर्व लिखा जाकर भी मार्क्सवादी विचारधारा से सम्बद्ध है। पाँचवें अध्याय में डॉ. शर्मा ने स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए समझौतावादी और क्रान्तिकारी, दोनों रुझानों का विश्लेषण करते हुए उन पर किसान-मज़दूर-संगठनों के प्रभाव का आकलन किया है और छठे अध्याय में, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भारतीय क्रान्तिकारी उभार पर मुस्लिम सम्प्रदायवाद की शक्ल में किए गए साम्राज्यवादी हमले की भीतरी परतों की गहरी पड़ताल की है। संक्षेप में डॉ. रामविलास शर्मा का यह ग्रन्थ अंग्रेज़ी राज के दौरान भारतीय जनता की साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष-चेतना और उसके विरुद्ध रची गई पेचीदा साज़िशों का पहली बार प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। सुविख्यात समालोचक, भाषाविद् और इतिहासवेत्ता डॉ. रामविलास शर्मा प्रणीत अप्रतिम इतिहासग्रन्थ ‘भारत में अंग्रेज़ी राज और मार्क्सवाद’ का यह दूसरा खंड है। अपनी महत्ता में यह ग्रन्थ लेखक की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृतियों—‘निराला की साहित्य साधना’ तथा ‘भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी’—के समकक्ष ऐतिहासिकता लिए हुए है। पुस्तक के पहले खंड की तरह रामविलास जी ने इस खंड को भी छह अध्यायों में नियोजित किया है। इसके पहले दोनों अध्याय क्रान्ति और सामाजिक विकास के सन्दर्भ में मार्क्स की स्थापनाओं का विवेचन करते हैं और तीसरे अध्याय में मार्क्स की उन धारणाओं का विश्लेषण है, जो भारत में अंग्रेज़ी राज से सम्बद्ध हैं। चौथा अध्याय फ़्रांसीसी यात्री बर्नियर से लेकर रजनी पाम दत्त तक कई भारतीय चिन्तकों के उन विचारों को रेखांकित करता है; जो भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास पर प्रामाणिक प्रकाश डालते हैं। पाँचवाँ अध्याय भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के विभिन्न उतार-चढ़ावों का बेबाक विश्लेषण करता है, जिससे वर्तमान स्थितियों पर भी सार्थक सोच की शुरुआत की जा सकती है। छठे अध्याय में सत्ता-हस्तान्तरण तथा भारत-कॉमनवेल्थ-सम्बन्धों का गम्भीर विवेचन हुआ है। संक्षेप में, यह ग्रन्थ भारतीय इतिहास के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और विवादास्पद कालखंड का सर्वथा नया मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। भारत के वर्तमान और भावी स्वरूप के सन्दर्भ में इससे हमें जो दृष्टि प्राप्त होती है, उससे आज तक का जाना हुआ इतिहास अपने मिथ्या की अनेकानेक केंचुलियाँ उतारकर पूरी तरह निरावरण हो उठता है। यह प्रक्रिया पाठक को न सिर्फ़ लेखक के विराट वैज्ञानिक इतिहासबोध के मूल तक ले जाती है, बल्कि अर्थतंत्र से लेकर भाषा, संस्कृति और स्वदेशी को धुरी बनाकर एक नए भारत के निर्माण की आकांक्षा को भी अनुभूत कराती है।
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About the Book
मार्क्सवादी हिन्दी आलोचना और भाषाविज्ञान विषयक युगान्तकारी कृतित्व की कड़ी में डॉ. रामविलास शर्मा की यह एक और उपलब्धि-कृति है। दो खंडो़ में प्रकाशित इतिहास विषयक इस ग्रन्थ का यह पहला खंड है।
छह अध्यायों में विभक्त इस खंड की मुख्य प्रस्थापना यह है कि भारतीय जनता की समाजवादी चेतना उसकी साम्राज्यविरोधी चेतना का ही प्रसार है। इसे साहित्य और राजनीति, दोनों के विश्लेषण और आवश्यक प्रमाणों सहित इस खंड में स्पष्ट किया गया है। इसके पहले अध्याय में रामविलास जी ने विश्व बाज़ार क़ायम करनेवाली ब्रिटिश-नीति की विवेचना की है और सिद्ध किया है कि भारत इसी का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा था। तभी तो भारतीय माल को ब्रिटिश बाज़ार में बेचनेवाले अंग्रेज़ व्यापारी कुछ ही वर्षों के बाद ब्रिटिश माल को भारतीय बाज़ारों में बचने योग्य हो गए। दूसरे अध्याय में गदर, गदर पार्टी और क्रान्तिकारी दल की चर्चा करते हुए जयप्रकाश नारायण, जवाहरलाल नेहरू और मार्क्सवादियों के तत्सम्बन्धी दृष्टिकोण की समीक्षा की गई है। तीसरे अध्याय में लाला हरदयाल, जयप्रकाश और नेहरू की मार्क्सवादी धारणाओं का विवेचन हुआ है। चौथा अध्याय ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण उस हिन्दी साहित्य को सामने रखता है जो 1917 में रूसी क्रान्ति से पूर्व लिखा जाकर भी मार्क्सवादी विचारधारा से सम्बद्ध है। पाँचवें अध्याय में डॉ. शर्मा ने स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए समझौतावादी और क्रान्तिकारी, दोनों रुझानों का विश्लेषण करते हुए उन पर किसान-मज़दूर-संगठनों के प्रभाव का आकलन किया है और छठे अध्याय में, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भारतीय क्रान्तिकारी उभार पर मुस्लिम सम्प्रदायवाद की शक्ल में किए गए साम्राज्यवादी हमले की भीतरी परतों की गहरी पड़ताल की है।
संक्षेप में डॉ. रामविलास शर्मा का यह ग्रन्थ अंग्रेज़ी राज के दौरान भारतीय जनता की साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष-चेतना और उसके विरुद्ध रची गई पेचीदा साज़िशों का पहली बार प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
सुविख्यात समालोचक, भाषाविद् और इतिहासवेत्ता डॉ. रामविलास शर्मा प्रणीत अप्रतिम इतिहासग्रन्थ ‘भारत में अंग्रेज़ी राज और मार्क्सवाद’ का यह दूसरा खंड है। अपनी महत्ता में यह ग्रन्थ लेखक की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृतियों—‘निराला की साहित्य साधना’ तथा ‘भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी’—के समकक्ष ऐतिहासिकता लिए हुए है।
पुस्तक के पहले खंड की तरह रामविलास जी ने इस खंड को भी छह अध्यायों में नियोजित किया है। इसके पहले दोनों अध्याय क्रान्ति और सामाजिक विकास के सन्दर्भ में मार्क्स की स्थापनाओं का विवेचन करते हैं और तीसरे अध्याय में मार्क्स की उन धारणाओं का विश्लेषण है, जो भारत में अंग्रेज़ी राज से सम्बद्ध हैं। चौथा अध्याय फ़्रांसीसी यात्री बर्नियर से लेकर रजनी पाम दत्त तक कई भारतीय चिन्तकों के उन विचारों को रेखांकित करता है; जो भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास पर प्रामाणिक प्रकाश डालते हैं। पाँचवाँ अध्याय भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के विभिन्न उतार-चढ़ावों का बेबाक विश्लेषण करता है, जिससे वर्तमान स्थितियों पर भी सार्थक सोच की शुरुआत की जा सकती है। छठे अध्याय में सत्ता-हस्तान्तरण तथा भारत-कॉमनवेल्थ-सम्बन्धों का गम्भीर विवेचन हुआ है।
संक्षेप में, यह ग्रन्थ भारतीय इतिहास के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और विवादास्पद कालखंड का सर्वथा नया मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। भारत के वर्तमान और भावी स्वरूप के सन्दर्भ में इससे हमें जो दृष्टि प्राप्त होती है, उससे आज तक का जाना हुआ इतिहास अपने मिथ्या की अनेकानेक केंचुलियाँ उतारकर पूरी तरह निरावरण हो उठता है। यह प्रक्रिया पाठक को न सिर्फ़ लेखक के विराट वैज्ञानिक इतिहासबोध के मूल तक ले जाती है, बल्कि अर्थतंत्र से लेकर भाषा, संस्कृति और स्वदेशी को धुरी बनाकर एक नए भारत के निर्माण की आकांक्षा को भी अनुभूत कराती है।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 4th
- Publication year
- 1982
- Weight
- 856 grams
- ISBN-13
- 9788126703661
- Pages
- 566
- Reading time
- ~19 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14.5 × 22 cm
- Language
- Hindi
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