Sangh Aur Sarkar
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2014 और 2019 के चुनाव नतीजे संघ को सुकून दे रहे थे, क्योंकि तीन पीढ़ी खपाने के बाद उसकी वैचारिक उड़ान को पंख लग गए थे। इस मुकाम तक पहुँचने के लिए संघ को 1998- 2004 में अपनी ही सरकार से टकराव मोल लेना पड़ा था। आर्थिक और राजनैतिक मसलों पर वाजपेयी सरकार के समय लड़ाई सार्वजनिक थी। असमंजस के माहौल में हुए 2004 के आम चुनाव में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई; अगले एक दशक तक पार्टी में जबरदस्त कोहराम मचा। तमाम झंझावातों के बाद 2009 में आडवाणी पी.एम. इन वेटिंग बने। लेकिन कलह ऐसी थी, मानो 15वीं नहीं 16वीं लोकसभा की लड़ाई हो रही हो। इसी बीच संघ में पीढ़ी परिवर्तन हुआ और मोहन भागवत सरसंघचालक बने, फिर विचार-परिवार में भी पीढ़ी परिवर्तन का खाका बना। भाजपा में दूसरी पीढ़ी में जद्दोजहद के बाद विचारधारा के प्रहरी के तौर पर नरेंद्र मोदी उभरे । संघ की सलाह पर पार्टी मोदी युग में प्रवेश कर गई। उसके बाद विचार-परिवार ने समन्वय का ऐसा खाका खींचा कि अटल सरकार की कड़वाहट सदा के लिए अतीत के पन्नों में समा गई। संवाद और समन्वय विचार-परिवार का मंत्र बना, तो मोदी ने भी संवाद का मैकेनिज्म बना समन्वय को गति दी। नतीजा हुआ कि अनुकूल सरकार का लाभ उठा, संघ और भाजपा दोनों ने अपना सामाजिक आधार बढ़ाया। यह पुस्तक संघ, सरकार और समन्वय की उन सभी कहानियों की बारीकियों को परत-दर-परत सामने रखती है। 2014 से संघ-भाजपा के बीच समन्वय एक मिसाल है, जिसने दोनों का न सिर्फ आधार बढ़ाया, बल्कि 2014 से भी बड़ी जीत की जमीन तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
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2014 और 2019 के चुनाव नतीजे संघ को सुकून दे रहे थे, क्योंकि तीन पीढ़ी खपाने के बाद उसकी वैचारिक उड़ान को पंख लग गए थे। इस मुकाम तक पहुँचने के लिए संघ को 1998- 2004 में अपनी ही सरकार से टकराव मोल लेना पड़ा था। आर्थिक और राजनैतिक मसलों पर वाजपेयी सरकार के समय लड़ाई सार्वजनिक थी। असमंजस के माहौल में हुए 2004 के आम चुनाव में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई; अगले एक दशक तक पार्टी में जबरदस्त कोहराम मचा। तमाम झंझावातों के बाद 2009 में आडवाणी पी.एम. इन वेटिंग बने। लेकिन कलह ऐसी थी, मानो 15वीं नहीं 16वीं लोकसभा की लड़ाई हो रही हो। इसी बीच संघ में पीढ़ी परिवर्तन हुआ और मोहन भागवत सरसंघचालक बने, फिर विचार-परिवार में भी पीढ़ी परिवर्तन का खाका बना। भाजपा में दूसरी पीढ़ी में जद्दोजहद के बाद विचारधारा के प्रहरी के तौर पर नरेंद्र मोदी उभरे । संघ की सलाह पर पार्टी मोदी युग में प्रवेश कर गई। उसके बाद विचार-परिवार ने समन्वय का ऐसा खाका खींचा कि अटल सरकार की कड़वाहट सदा के लिए अतीत के पन्नों में समा गई। संवाद और समन्वय विचार-परिवार का मंत्र बना, तो मोदी ने भी संवाद का मैकेनिज्म बना समन्वय को गति दी। नतीजा हुआ कि अनुकूल सरकार का लाभ उठा, संघ और भाजपा दोनों ने अपना सामाजिक आधार बढ़ाया। यह पुस्तक संघ, सरकार और समन्वय की उन सभी कहानियों की बारीकियों को परत-दर-परत सामने रखती है। 2014 से संघ-भाजपा के बीच समन्वय एक मिसाल है, जिसने दोनों का न सिर्फ आधार बढ़ाया, बल्कि 2014 से भी बड़ी जीत की जमीन तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
Book Details
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ISBN9789355211279
-
Pages392
-
Avg Reading Time17 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन वस्तुत: आम सहमतियों और व्यापक संयुक्त मोर्चों एवं सम्मिलित जन-आन्दोलन को लेकर राजनीतिशास्त्र की दुनिया में एक ‘नई गतिकी’ को निर्मित करता है, यह विश्व इतिहास में एक नई कड़ी है।
गांधी विमर्श तो न केवल भारत में अपितु पूरे विश्व में बड़े दमख़म के साथ चल रहा है, पर जवाहरलाल के बारे में इस दौर में कुछ ही पुस्तकें बाज़ार में आ रही हैं, गांधी-नेहरू साझा विमर्श एक देर से ही सही लेकिन निहायत ही मौज़ूँ सिलसिला है।
वैश्वीकरण के आक्रामक दौर में नेहरू जो एक स्वतंत्र वैकल्पिक अर्थतंत्र और राज्य सत्ता के स्थपति थे, उन्हें भुला देना अस्वाभाविक नहीं लगता है। इस दौर में मौजूदा राज्य सत्ता से लेकर प्रमुख विपक्ष तक ने वैश्वीकरण और उदारीकरण को स्वीकार कर लिया है। साम्प्रदायिकता की तस्वीर में भी 1992 और 2002 के बाद शताब्दियों से चल रही मुश्तरका संस्कृति में दीमक लग गई है। गांधी को तो वैश्वीकरण के स्टीमरोलर ने बेरहमी से ज़मींदोज़ कर दिया है। ऐसे दौर में गांधी-नेहरू के ऐतिहासिक साझा और उनके कृतित्व पर पुन: रोशनी पड़नी चाहिए।
प्रस्तुत पुस्तक दो महान स्वप्नद्रष्टाओं की यथार्थसम्मत विचारधारा को सप्रमाण रेखांकित करती है।
Kisan Aandolan : Dasha Aur Disha
- Author Name:
Kishan Patnayak +1
- Book Type:

- Description:
किशन पटनायक की यह पुस्तक भारत के किसान आन्दोलन का उसके सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक और कुछ हद तक सांस्कृतिक आयामों में गहराई से विश्लेषण और मूल्यांकन प्रस्तुत करती
है।लेखक की प्रतिष्ठा एक ऐसे समाजवादी चिन्तक और नेता के रूप में है जिसने उदारीकरण-ग्लोबीकरण यानी पूँजीवादी साम्राज्यवाद की सुचिन्तित समीक्षा तथा सतत विरोध किया है। इस पुस्तक में भी किसान आन्दोलन का विश्लेषण मुख्यतः उदारीकरण-ग्लोबीकरण की नीतियों के सन्दर्भ में किया गया है, जिनके चलते भारत की खेती-किसानी तबाही के कगार पर पहुँच गई है और लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसान जीवन पर आए इस अभूतपूर्व संकट के दौर में लेखक ने साम्राज्यवादी पूँजीवाद का प्रतिकार करने के लिए देश में एक स्वतंत्र किसान राजनीति के निर्माण, विकास और संगठन की ज़रूरत पर बल दिया है। किसान राजनीति के अभ्युदय के लिए ज़रूरी वैकल्पिक विचारधारा के सूत्र और संघर्ष के तरीके भी सुझाए हैं।
पुस्तक की यह महत्त्वपूर्ण विशेषता है कि इसमें समाजवादी क्रान्ति के सन्दर्भ में किसान वर्ग की क्रान्तिकारी भूमिका स्वीकार की गई है, जो परम्परागत मार्क्सवादी सिद्धान्त के विपरीत मान्यता है। लेखक का इस विषय का निरूपण पर्याप्त ताज़गी-भरा, प्रेरणाप्रद और प्रामाणिक है, जिससे अध्ययन और शोध की नई ज़मीन तैयार होगी। उदारीकरण-ग्लोबीकरण की सबसे ज़्यादा मार झेल रहे किसानों के पक्ष में जूझनेवाले किसान नेताओं, अन्य परिवर्तनकारी आन्दोलनकारियों और बुद्धिजीवियों के लिए यह एक ज़रूरी किताब है।
Jinna : Ek Punardrishti
- Author Name:
Virendra Kumar Baranwal
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साधारण भारतीयों के मन में जिन्ना की छवि एक निहायत नीरस, अन्तर्मुखी, तार्किक, अधार्मिक, भावना-शून्य, मनहूस, हिसाबी, सिर से पैर तक पश्चिमी सभ्यता में रँगे, चोटी के वकील के साथ एक अपराजेय राजनीतिक सौदेबाज़ की रही है। जिन्ना के व्यक्तित्व की इन विशेषताओं को झुठलाना जहाँ निहायत दुश्वार है, वहीं मात्र इन्हीं विशेषताओं में उन्हें सीमित करना वस्तुतः सच्चाई से मुँह मोड़ना होगा। जिन्ना के जीवन और व्यक्तित्व के कुछ ऐसे पहलू हैं, जो बहुत कम उजागर हो पाए हैं। फलस्वरूप अक्सर उनका एकांगी मूल्यांकन ही हो पाया है। इतिहास मात्र घटनाओं का संकुल और महत्त्वाकांक्षियों की नियति के उतार-चढ़ाव का दस्तावेज़ ही नहीं है। उसके विराट मंच पर उभरे काल-प्रेरित अभिनेताओं के मनोजगत की उथल-पुथल से संरचित व्यक्तित्वों के समझौते-टकराव और घात-प्रतिघात उसकी धारा को प्रभावित करने में निर्णयात्मक भूमिका निभाते हैं। कुछ इसी विश्वास के फलस्वरूप जिन्ना के जीवन पर विहंगम दृष्टि डालते हुए उन्हें उनके महत्त्वपूर्ण समकालीनों के साथ-साथ अलग-अलग समझने-परखने की कोशिश इस किताब में मिलेगी। उनकी पत्नी रत्ती की गहन संवेदनशीलता, तीक्ष्ण मेधा, व्यक्तित्व का अप्रतिम सम्मोहन, समस्त प्राणी-जगत के लिए करुणा विगलित हृदय, गहरे राजनीतिक-सामाजिक सरोकार और धार्मिक बाह्याडम्बर के प्रति वितृष्णा जैसे गुण उन्हें अपने समय का एक अत्यन्त विशिष्ट व्यक्तित्व सिद्ध करते हैं। इस पुस्तक में उनके विषय में भी एक विस्तृत अध्याय रखा गया है। ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपिता बनने के पहले जिन्ना हिन्दुस्तान की धरती के एक महान और सुयोग्य पुत्र थे। उनके लगभग आधी सदी के राजनीतिक जीवन में समय-समय पर उभरे सोच में आज भी ऐसा बहुत कुछ समावेशी और रचनात्मक है, जो अप्रासंगिक नहीं हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि गांधी और नेहरू की तरह जिन्ना भी भारतीय उपमहाद्वीप में समय-समय पर एक पुनर्दृष्टि की माँग करते रहेंगे। इतिहास के अपने ढंग के एक अद्वितीय व्यक्तित्व के नाते यह उनका हक़ है।
Usne Gandhi Ko Kyon Mara
- Author Name:
Ashok Kumar Pandey
- Book Type:

- Description:
यह किताब आज़ादी की लड़ाई में विकसित हुये अहिंसा और हिंसा के दर्शनों के बीच कशमकश की सामाजिक-राजनैतिक वजहों की तलाश करते हुए उन कारणों को सामने लाती है जो गांधी की हत्या के ज़िम्मेदार बने। साथ ही, गांधी हत्या को सही ठहराने वाले आरोपों की तह में जाकर उनकी तथ्यपरक पड़ताल करते हुए न केवल उस गहरी साज़िश के अनछुए पहलुओं का पर्दाफ़ाश करती है बल्कि उस वैचारिक षड्यंत्र को भी खोलकर रख देती है जो अंतत: गांधी हत्या का कारण बना। यह किताब जहाँ एक तरफ़ गांधी पर अफ़्रीका में हुए पहले हमले से लेकर गोडसे द्वारा उनकी हत्या के बीच गांधी के पूरे राजनैतिक जीवन में उन पक्षों पर विस्तार से बात करती है जिनकी वजह से दक्षिणपंथी ताक़तें उनके ख़िलाफ़ हुईं तो दूसरी तरफ़ उन पर हुए हर हमले और अंत में हुई हत्या की साज़िशों का पर्दाफ़ाश करती है। दस्तावेज़ों की व्यापक पड़ताल से यह उन व्यक्तियों और समूहों के साथ-साथ उन कारणों को स्पष्ट रूप से सामने लाती है जिनकी वजह से गांधी की हत्या हुई। यह किताब एक तरफ़ राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन और उसमें गांधी की भूमिका दर्ज करती है तो दूसरी तरफ़ गांधी की पूरी वैचारिक यात्रा की पड़ताल करती है। यह किताब दक्षिणपंथ के गांधी के ख़िलाफ़ होने के कारणों, कांग्रेस के भीतर के अंतर्विरोधों और विभाजन की प्रक्रिया सामने लाती है। इसके अलावा एक पूरा खंड गोडसे द्वारा अदालत में गांधी पर लगाए गए आरोपों के बिंदुवार जवाब का है। इस किताब को पढ़ते हुए हिंदी का पाठक एक ही किताब में गांधी के दर्शन, उनकी वैचारिक यात्रा और उनकी हत्या की साज़िश के राजनीतिक कारणों से परिचित हो सकेगा।.
Indira Files
- Author Name:
Vishnu Sharma
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लेकिन इंदिरा गांधी ही क्यों? आजाद भारत में इंदिरा गांधी वंशवाद का सबसे बड़ा और पहला उदाहरण हैं। वंशवाद का एक ऐसा उत्पाद, जिसको लौह महिला भी कहा जाता है और दूसरी तरफ आपातकाल थोपने के लिए हर साल उनकी तानाशाही को श्रद्धांजलि भी दी जाती है। एक तरफ पाकिस्तान के दो टुकड़े करके इंदिरा गांधी ने भारतीय इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखवा लिया, तो दूसरी तरफ गांधारी की तरह बेटे को अंधा प्रेम कर ‘संजय की मम्मी, बड़ी निकम्मी’ जैसा नारा भी झेला। एक तरफ सिक्किम विलय में अहम भूमिका निभाई तो दूसरी तरफ ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ का दाग उनकी मौत भी नहीं मिटा पाई। एक तरफ परमाणु परीक्षण कर भारत की ताकत और हिम्मत को पर लगा दिए तो दूसरी तरफ पहली ऐसी प्रधानमंत्री बनीं, जिनको हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री पद से ही हटने का आदेश जारी कर दिया। यह पुस्तक किसी भी जागरूक पाठक, शोधार्थी, पत्रकार, नेता, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए काफी तथ्यात्मक हो सकती है। कुछ मुद्दे जो इस पुस्तक में लिखे गए हैं, वे और ज्यादा जगह माँगते थे, लेकिन ज्यादा विषयों को लेने की रणनीति के चलते उन्हें सीमित जगह ही दी गई। शोधार्थी इसको आधार बनाकर और गहन अध्ययन कर सकते हैं।
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