Chandrashekhar Ke Bare Mein
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Author:
HarivanshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
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‘चन्द्रशेखर के बारे में’ पुस्तक अपने समय के महत्त्वपूर्ण लेखकों-पत्रकारों, राजनीतिज्ञों और समाज-विज्ञानियों द्वारा किए गए आत्मीय और तटस्थ विश्लेषणों का एक संकलन है। यह संकलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह चन्द्रशेखर की राजनीतिक और रचनात्मक यात्रा के विभिन्न पड़ावों का एक विश्वसनीय लेखा-जोखा है। इन लेखों को पढ़ते हुए आजादी के बाद की भारतीय राजनीति का संक्षिप्त सफरनामा और उसमें चन्द्रशेखर के जरूरी योगदान से हमारा परिचय होता जाता है।<br>संकलित आलेखों के क्रम में भले ही हमें कथासूत्र की तरह का कोई संयोजन नहीं मिलता है, मगर यही इस संकलन की खासियत भी है। हम कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति के विविध-रंगी चित्रों और उसमें चन्द्रशेखर के राजनीतिक, सामाजिक व रचनात्मक सरोकारों का एक कोलाज है यह संकलन–और इसलिए इसकी सिर्फ राजनीतिक और सामयिक ही नहीं, रचनात्मक और साहित्यिक महत्ता भी है।<br>नामवर सिंह, भोला चटर्जी, प्रभाष जोशी, केदारनाथ सिंह, उदयन शर्मा, तवलीन सिंह और एम.जे. अकबर सहित अनेक सुविख्यात कलमकारों ने चन्द्रशेखर के बारे में समय-समय पर लिखा। गांधी और जयप्रकाश नारायण के बाद शायद चन्द्रशेखर ही ऐसे राजनेता हैं, जिनके बारे में सभी धाराओं के अग्रणी लोगों ने सृजनात्मक राय रखी। युवा तुर्क की हैसियत के जमाने में और इमर्जेंसी के बाद चन्द्रशेखर के बारे में काफी कुछ लिखा गया। यह पुस्तक इस लेखन का एक प्रतिनिधि संकलन है।
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‘चन्द्रशेखर के बारे में’ पुस्तक अपने समय के महत्त्वपूर्ण लेखकों-पत्रकारों, राजनीतिज्ञों और समाज-विज्ञानियों द्वारा किए गए आत्मीय और तटस्थ विश्लेषणों का एक संकलन है। यह संकलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह चन्द्रशेखर की राजनीतिक और रचनात्मक यात्रा के विभिन्न पड़ावों का एक विश्वसनीय लेखा-जोखा है। इन लेखों को पढ़ते हुए आजादी के बाद की भारतीय राजनीति का संक्षिप्त सफरनामा और उसमें चन्द्रशेखर के जरूरी योगदान से हमारा परिचय होता जाता है।<br>संकलित आलेखों के क्रम में भले ही हमें कथासूत्र की तरह का कोई संयोजन नहीं मिलता है, मगर यही इस संकलन की खासियत भी है। हम कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति के विविध-रंगी चित्रों और उसमें चन्द्रशेखर के राजनीतिक, सामाजिक व रचनात्मक सरोकारों का एक कोलाज है यह संकलन–और इसलिए इसकी सिर्फ राजनीतिक और सामयिक ही नहीं, रचनात्मक और साहित्यिक महत्ता भी है।<br>नामवर सिंह, भोला चटर्जी, प्रभाष जोशी, केदारनाथ सिंह, उदयन शर्मा, तवलीन सिंह और एम.जे. अकबर सहित अनेक सुविख्यात कलमकारों ने चन्द्रशेखर के बारे में समय-समय पर लिखा। गांधी और जयप्रकाश नारायण के बाद शायद चन्द्रशेखर ही ऐसे राजनेता हैं, जिनके बारे में सभी धाराओं के अग्रणी लोगों ने सृजनात्मक राय रखी। युवा तुर्क की हैसियत के जमाने में और इमर्जेंसी के बाद चन्द्रशेखर के बारे में काफी कुछ लिखा गया। यह पुस्तक इस लेखन का एक प्रतिनिधि संकलन है।
Book Details
-
ISBN9788126704682
-
Pages219
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह किताब कश्मीर के उथल-पुथल भरे इतिहास में कश्मीरी पंडितों के लोकेशन की तलाश करते हुए उन सामाजिक-राजनैतिक प्रक्रियाओं की विवेचना करती है जो कश्मीर में इस्लाम के उदय, धर्मान्तरण और कश्मीरी पंडितों की मानसिक-सामाजिक निर्मिति तथा वहाँ के मुसलमानों और पंडितों के बीच के जटिल रिश्तों में परिणत हुईं। साथ ही, यह किताब आज़ादी की लड़ाई के दौरान विकसित हुए उन अन्तर्विरोधों की भी पहचान करती है जिनसे आज़ाद भारत में कश्मीर, जम्मू और शेष भारत के बीच बने तनावपूर्ण सम्बन्धों और इस रूप से कश्मीर घाटी के भीतर पंडित-मुस्लिम सम्बन्धों ने आकार लिया।
Kashmir Aur Kashmiri Pandit : Basne Aur Bikharne Ke 1500 Saal
Ashok Kumar Pandey
20% off₹ 499
₹ 399.2
Available
Prarthna-Pravachan : Vols. 1-2
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
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त्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपे
Bharat Ka Samvidhan : Sankshipt Parichay
- Author Name:
Subhash Kashyap
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लोकतंत्र में हर नागरिक को अपने देश के संविधान को जानना चाहिए और समझना चाहिए कि हम किस प्रकार शासित हो रहे हैं। भारत के संविधान के मूल कर्तव्य सम्बन्धी भाग के अनुसार देश के हर नागरिक का सबसे पहला कर्तव्य है संविधान का पालन करना। परन्तु उसका पालन करने के लिए संविधान को जानना ज़रूरी है। दुर्भाग्यवश भारत में आज भी भयंकर संवैधानिक निरक्षरता है। ऐसी स्थिति में संविधान के बारे में बुनियादी जानकारी प्राप्त करने के लिए यह किताब अत्यन्त उपयोगी है। भारतीय संविधान के विश्वविख्यात विशेषज्ञ डॉ. सुभाष काश्यप ने सरल और सुगम शब्दों में पुस्तक तैयार की है इसका विशेष उद्देश्य यह है कि पाठक को भारतीय संविधान का संक्षिप्त परिचय मिले तथा वह इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, संविधान निर्माण की प्रक्रिया, तथा वह इसकी संविधान की आत्मा का समुचित ज्ञान प्राप्त सकते हैं।
वस्तुत: यह किताब आधुनिक भारत के इतिहास; एक लोकतंत्र के रूप में भारत के निर्माण और विकास तथा भारत के संविधान में दिलचस्पी रखने वाले हरेक छात्र और सामान्य पाठक के लिए समान रूप से उपयोगी है।
Vidrohi Mahatma
- Author Name:
Nandkishore Acharya
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गाँधी के लिए नैतिक ही आध्यात्मिक है, मनुष्य ईश्वर की साकार प्रतिच्छवि है और जीवन की दैनन्दिनी ही ईश्वर का कार्यकलाप। यही वह चीज है जो गाँधी की आध्यात्मिकता को धार्मिक पाखंड से अलग करके उसे व्यक्ति के नैतिक व आंतरिक उत्तरदायित्व से जोड़ देती है। लौकिक सन्दर्भों में उसे मानवसुलभ और व्यापक बना देती है। इस पुस्तक में नन्दकिशोर आचार्य गाँधी विषयक उन धारणाओं का उन्मूलन करते हैं जो गाँधी-विरोधियों के लिए लगभग फ़ैशन हो चली है। वे आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि कबीर को उनकी आध्यात्मिकता के बावजूद क्रान्तिकारी या विद्रोही मानने वाले विद्वान कबीर के समकक्ष, बल्कि अधिक व्यापक गाँधी की आध्यात्मिकता के चरित्र को क्यों नहीं समझ पाते? इसी तरह मार्क्स समेत अनेक विचारकों द्वारा हिंसा को स्वीकार्य मान लिए जाने के बावजूद, गाँधी द्वारा अहिंसा को एक अस्त्र के ही रूप में प्रस्तुत करना, उसे साधना खुद में एक क्रांतिकारी घटना थी जिसने मनुष्य के निज विवेक को समूह के अचिंतित आवेगों-उद्वेगों से ऊपर और अपेक्षाकृत ज़्यादा शक्तिशाली बताया, जो मानव के रचनात्मक पक्ष की उत्तरजीविता की ज्यादा भरोसेमंद गारंटी देता है। साध्य के मुक़ाबले साधन की पवित्रता पर ज़ोर देना, निर्बलतम के कल्याण को सभ्यता की कसौटी मानना और किसी भी विचार की पहली प्रयोग स्थली अपने ही जीवन और देह को बनाना—इन सबको भले ही आज वाचल और अर्थ-क्षरित जुमलेबाजियों ने घिस-घिसकर बेअसर कर दिया हो, लेकिन अपने मस्तिष्क की सफाई करके देखें तो ये सचमुच ही बड़े और क्रान्तिधर्मी विचार हैं जो हमारी जीवन तथा विश्वदृष्टि को आमूल बदल सकते हैं। गाँधी को एक नए सिरे से जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।
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