1857 : Itihas Kala Sahitya
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1857 आधुनिक भारतीय इतिहास की ऐसी परिघटना है जिस पर सैकड़ों पुस्तकें लिखी गई हैं। इसके बावजूद इतिहास, कला और साहित्य के क्षेत्र में पिछले 150 वर्षों के अनुसंधानों पर आधारित नवोन्मेषकारी विवेचनाओं और उद्भावनाओं से हिन्दी-उर्दू भाषी समुदाय की चेतना में मंथन उत्पन्न करनेवाली पुस्तक का नितान्त अभाव है। इसी ज़रूरत को ध्यान में रखकर इस पुस्तक की सम्पूर्ण सामग्री में श्रमसाध्य और नए ढंग के संचयन का प्रयास किया गया है। इस पुस्तक में पूर्व प्रकाशित सामग्री अल्पतम है—सिर्फ़ सन्दर्भ बताने के उद्देश्य से। अंग्रेज़ी और हिन्दी-उर्दू में अभी तक अप्रकाशित अनेक महत्त्वपूर्ण आलेखों और सृजनधर्मी रचनाओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है—इस व्यवस्था में एक वैचारिक अन्विति का होना स्वाभाविक है। चूँकि अन्विति ही वह विधि है जिसके माध्यम से अत्याधुनिक प्रक्रियाओं को समझने और इतिहास से संवाद कर रही कलात्मक और साहित्यिक सृजनशीलता के सन्दर्भ का खुलासा करने में मदद मिलती है। रंगकर्म, फ़िल्म, चित्रकला, उर्दू शायरी तथा हिन्दी साहित्य के परिदृश्यों के विवेचन से इसे समृद्ध किया गया है ताकि इतिहास, कला और साहित्य की परस्पर सम्बद्धता की अन्तःक्रिया भी स्पष्ट हो सके। 1857 पर इतिहास लेखन यद्यपि दो प्रतिध्रुवों में विभक्त रहा, इसके बावजूद सन् सत्तावन की जंगे-आज़ादी को समकालीन समाजवैज्ञानिक, चिन्तक और रचनाकार जिस दृष्टि से देखते हैं, उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का तात्पर्य जिस तर्कव्यवस्था से आलोकित करते हैं—इस पूरी पद्धति के लिहाज से इस संकलन में इरफ़ान हबीब, एजाज़ अहमद, सव्यसाची भट्टाचार्य, सूरजभान, रजत कांत रे, एस.पी. वर्मा, शीरीं मूसवी, पी.के. शुक्ला, देवेन्द्र राज अंकुर, इम्तियाज़ अहमद, अमर फ़ारूक़ी, नुज़हत काज़मी, मुहम्मद हसन, शिवकुमार मिश्र, कमलाकान्त त्रिपाठी, खगेन्द्र ठाकुर, विजेन्द्र नारायण सिंह, सीताराम येचुरी, नलिनी तनेजा, मनमोहन, असद ज़ैदी, संजीव कुमार आदि के आलेख ग़ौरतलब हैं। 1857 के साथ मैत्रेयी पुष्पा, कुमार अंबुज, योगेन्द्र आहूजा, दिनेश कुमार शुक्ल, सुल्तान अहमद, वंदना राग, विमल कुमार का रचनात्मक संवाद अतीत के साथ वर्तमान को भी आन्दोलित करता है। इतिहास, कला और साहित्य की घटनाओं और रचना प्रक्रियाओं का अन्तर्विरोध समझने के लिहाज़ से ही बीसवीं सदी के महान फ़्रांसीसी इतिहासकार मार्क ब्लाख की यह टिप्पणी स्मरणीय है कि ‘राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के क्षेत्र की परिघटनाएँ एक ही वक्र पर उपस्थित हों, यह आवश्यक नहीं है।’ इस पुस्तक के माध्यम से इसे 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध के भारतीय इतिहास और संस्कृति के सन्दर्भ में बख़ूबी समझा जा सकता है। अंग्रेज़ी में प्रकाशित होने से पहले ही अनेक आलेखों को हिन्दी में उपलब्ध कराने के सराहनीय प्रयास के साथ 1857 की जनक्रान्ति पर अभी तक हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों के बीच निस्सन्देह यह पुस्तक अनूठी और विचारोत्तेजक है।
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1857 आधुनिक भारतीय इतिहास की ऐसी परिघटना है जिस पर सैकड़ों पुस्तकें लिखी गई हैं। इसके बावजूद इतिहास, कला और साहित्य के क्षेत्र में पिछले 150 वर्षों के अनुसंधानों पर आधारित नवोन्मेषकारी विवेचनाओं और उद्भावनाओं से हिन्दी-उर्दू भाषी समुदाय की चेतना में मंथन उत्पन्न करनेवाली पुस्तक का नितान्त अभाव है। इसी ज़रूरत को ध्यान में रखकर इस पुस्तक की सम्पूर्ण सामग्री में श्रमसाध्य और नए ढंग के संचयन का प्रयास किया गया है। इस पुस्तक में पूर्व प्रकाशित सामग्री अल्पतम है—सिर्फ़ सन्दर्भ बताने के उद्देश्य से। अंग्रेज़ी और हिन्दी-उर्दू में अभी तक अप्रकाशित अनेक महत्त्वपूर्ण आलेखों और सृजनधर्मी रचनाओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है—इस व्यवस्था में एक वैचारिक अन्विति का होना स्वाभाविक है। चूँकि अन्विति ही वह विधि है जिसके माध्यम से अत्याधुनिक प्रक्रियाओं को समझने और इतिहास से संवाद कर रही कलात्मक और साहित्यिक सृजनशीलता के सन्दर्भ का खुलासा करने में मदद मिलती है। रंगकर्म, फ़िल्म, चित्रकला, उर्दू शायरी तथा हिन्दी साहित्य के परिदृश्यों के विवेचन से इसे समृद्ध किया गया है ताकि इतिहास, कला और साहित्य की परस्पर सम्बद्धता की अन्तःक्रिया भी स्पष्ट हो सके। 1857 पर इतिहास लेखन यद्यपि दो प्रतिध्रुवों में विभक्त रहा, इसके बावजूद सन् सत्तावन की जंगे-आज़ादी को समकालीन समाजवैज्ञानिक, चिन्तक और रचनाकार जिस दृष्टि से देखते हैं, उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का तात्पर्य जिस तर्कव्यवस्था से आलोकित करते हैं—इस पूरी पद्धति के लिहाज से इस संकलन में इरफ़ान हबीब, एजाज़ अहमद, सव्यसाची भट्टाचार्य, सूरजभान, रजत कांत रे, एस.पी. वर्मा, शीरीं मूसवी, पी.के. शुक्ला, देवेन्द्र राज अंकुर, इम्तियाज़ अहमद, अमर फ़ारूक़ी, नुज़हत काज़मी, मुहम्मद हसन, शिवकुमार मिश्र, कमलाकान्त त्रिपाठी, खगेन्द्र ठाकुर, विजेन्द्र नारायण सिंह, सीताराम येचुरी, नलिनी तनेजा, मनमोहन, असद ज़ैदी, संजीव कुमार आदि के आलेख ग़ौरतलब हैं। 1857 के साथ मैत्रेयी पुष्पा, कुमार अंबुज, योगेन्द्र आहूजा, दिनेश कुमार शुक्ल, सुल्तान अहमद, वंदना राग, विमल कुमार का रचनात्मक संवाद अतीत के साथ वर्तमान को भी आन्दोलित करता है। इतिहास, कला और साहित्य की घटनाओं और रचना प्रक्रियाओं का अन्तर्विरोध समझने के लिहाज़ से ही बीसवीं सदी के महान फ़्रांसीसी इतिहासकार मार्क ब्लाख की यह टिप्पणी स्मरणीय है कि ‘राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के क्षेत्र की परिघटनाएँ एक ही वक्र पर उपस्थित हों, यह आवश्यक नहीं है।’ इस पुस्तक के माध्यम से इसे 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध के भारतीय इतिहास और संस्कृति के सन्दर्भ में बख़ूबी समझा जा सकता है। अंग्रेज़ी में प्रकाशित होने से पहले ही अनेक आलेखों को हिन्दी में उपलब्ध कराने के सराहनीय प्रयास के साथ 1857 की जनक्रान्ति पर अभी तक हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों के बीच निस्सन्देह यह पुस्तक अनूठी और विचारोत्तेजक है।
Book Details
-
ISBN9788126714322
-
Pages287
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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लोकतंत्र कैसे ख़त्म होता है? अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए हम क्या कर सकते हैं? इतिहास हमें क्या सिखाता है? इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र जितना ख़तरे में है, पहले कभी नहीं रहा। समूचे इतिहास से सबक लेते हुए—चिली में पिनोशे की ख़ूनी सत्ता से लेकर चुपचाप ढहते तुर्की में एर्दुआं की सरकार तक—हार्वर्ड के प्रोफ़ेसर स्टीवेन लेवित्सकी और डेनियल ज़िब्लाट यह समझाते हैं कि लोकतंत्र क्यों नाकाम हो जाते हैं, ट्रम्प जैसे नेता कैसे उसे नष्ट करते हैं और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए हम में से हर एक व्यक्ति क्या कर सकता है। विशेषज्ञों की राय जो भी लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिन्तित है उसे यह सहज, सरल किताब पढ़नी चाहिए। जो चिन्तित नहीं हैं, उन्हें तो ज़रूर पढ़नी चाहिए। दारोन एसेमोगलू ‘व्हाई नेशंस फ़ेल’ के लेखक और 2024 के नोबेल पुरस्कार विजेता लेवित्सकी और ज़िब्लाट ने कितनी कुशलता से यह दलील रखी है कि हम सबको इस देश के रुझानों पर चिन्तित होना चाहिए, अमेरिकी संविधान का ज़बर्दस्त प्रशंसक होने के नाते मेरे लिए यह पढ़ना हताशाजनक था। ‘यह यहाँ नहीं हो सकता’ वाली धारणा लेवित्सकी और ज़िब्लाट के विश्लेषण में नहीं टिकती...क्या शानदार लिखा है। डेनियल डब्ल्यू. ड्रेज़नर ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ उत्कृष्ट, विद्वत्तापूर्ण, पठनीय, चिन्ताजनक और सन्तुलित निक कोहेन ‘ऑब्ज़र्वर’
Manushya Aur Paryavaran
- Author Name:
S. Irfan Habib +2
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विगत दशकों में पारिस्थितिकी और उससे जुड़े मसलों के प्रति विशेष रुचि दिखाई पड़ी है, ख़ास तौर पर जलवायु-परिवर्तन को लेकर होनेवाली बहसों के सन्दर्भ में इस तरफ़ सुधीजन का ज़्यादा ध्यान गया है। लेकिन पारिस्थितिकी का विमर्श सिर्फ़ जलवायु तक सीमित नहीं है। इसमें जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधों के साथ मनुष्य के रिश्तों के अलावा मनुष्य जाति के सम्मुख प्रकृति द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों का अध्ययन भी शामिल होता है। इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य के साथ इस पुस्तक में पारिस्थितिकी के इतिहास को देखा-समझा गया है।
‘भारत का लोक इतिहास’ परियोजना के तहत प्रकाशित यह पुस्तक भी इस श्रृंखला की अन्य कड़ियों की तरह गहन अध्ययन और प्रामाणिक सामग्री पर आधारित है। मूल स्रोतों के उद्धरणों तथा पारिस्थितिकी, पर्यावरण विज्ञान, वन विज्ञान तथा प्राकृतिक इतिहास पर विशेष टिप्पणियों से समृद्ध इस पुस्तक में विषय से सम्बन्धित अन्य उपयोगी ग्रन्थों का उल्लेख भी किया गया है जिससे पाठक और अधिक लाभान्वित होंगे।
सूचनाओं की सटीकता को बरकरार रखते हुए, पुस्तक को अतिरिक्त तकनीकी विवरणों से मुक्त रखा गया है ताकि इतिहास के छात्रों के अलावा यह सामान्य पाठकों के लिए भी रुचिकर सिद्ध हो।
Prarthna-Pravachan : Vols. 1-2
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
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त्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपे
Sindhu Sabhyata
- Author Name:
S. Irfan Habib +2
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‘भारत का लोक इतिहास’ शृंख्ला की यह दूसरी पुस्तक सिन्धु सभ्यता के बारे में है। इसे इस शृंखला की पहली पुस्तक ‘प्रागैतिहास’ की अगली कड़ी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। सिन्धु सभ्यता के और विस्तृत विवरण के अलावा इसमें अन्य समकालीन और उसके बाद की संस्कृतियों का सर्वेक्षण भी किया गया है। साथ ही भारत के मुख्य भाषा परिवारों के उद्भव पर विमर्श भी इसमें शामिल है। सिन्धु घाटी और सीमावर्ती क्षेत्रों में आरम्भिक कांस्य युग और उसके सांस्कृतिक पहलू तथा सिन्धु सभ्यता की व्यापकता, जनसंख्या, कृषि, हस्तशिल्प, व्यापार, क़स्बों और शहरों की बनावट के साथ इसमें जनता, समाज और राज्यसत्ता आदि का भी प्रमाण-आधारित विश्लेषण किया गया है। तालिकाओं, चित्रों और विस्तृत सन्दर्भ-ग्रन्थ सूचियों के साथ यह पुस्तक शृंखला की अन्य पुस्तकों की ही तरह संग्रहणीय और पठनीय सिद्ध होगी।
RSS : Kaya Aur Maya
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Devanura Mahadeva +1
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अब सौ साल का हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दरअसल है क्या? इसकी काया के पीछे छुपी माया क्या है? अब जबकि संघ से जुड़ी एक पार्टी सत्ता पर मज़बूती से क़ाबिज़ है, यह भारत को किस दिशा में ले जा रहा है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके ग़ौरतलब जवाब देवनूर महादेव ने आर.एस.एस. : काया और माया में दिए हैं। मिथकों को आधुनिकता के और लोकवार्ताओं को गहरी राजनीतिक अन्तर्दृष्टि के बरअक्स रखकर देखने-परखने से हासिल इन जवाबों को पेश करते हुए, अपने ख़ास अन्दाज़ में वे पाठकों से आग्रह करते हैं : जब आर.एस.एस. का मायावी दानव भेष बदलकर हमारे दरवाज़े पर आता है, तब हमें उसकी बातों में नहीं आना चाहिए। ‘आज नक़द कल उधार’ की तर्ज़ पर हमें भी ग्रामवासियों की तरह अपने दरवाज़ों पर ‘नाले बा’ (कल आना) लिख देना चाहिए! कन्नड़ सहित अनेक भाषाओं में बिक्री के कीर्तिमान बना चुकी यह असाधारण किताब सांस्कृतिक आलोचना और ऐतिहासिक व्याख्या के साथ-साथ राजनीतिक कार्रवाई का आह्वान भी है।
Sadak Se Sansad Tak
- Author Name:
Shivanand Tiwari +1
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लोहिया, जेपी, किशन पटनायक, रामानन्द तिवारी, कर्पूरी ठाकुर वाली परम्परा के ही नेता हैं शिवानंद तिवारी। जितना लम्बा उनका राजनीतिक जीवन है आज की राजनीति में कम लोगों का है। वे गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपाई राजनीति करते रहे हैं और सन् पैंसठ के पहले से सक्रिय हैं। बाबा के नाम से विख्यात शिवानन्द जी के पास अनुभव, किस्सों और प्रत्यक्ष देखी घटनाओं का सम्भवत: सबसे बड़ा खजाना है। वे साठ के दशक के आखिर में शुरू हुए अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन वाले दौर से सक्रिय रहे हैं और चौहत्तर के जेपी आन्दोलन के अगुआ लोगों में हैं। उन्होंने किशन पटनायक के साथ लोहिया विचार मंच और समता संगठन की राजनीति की और उनसे अलग होकर भी उनकी वैचारिक और व्यावहारिक राजनीति के पाठ से अलग नहीं हुए। इन भाषणों और टिप्पणियों से उनके चिन्तन का दायरा और दिशा झलकती है। साफ लगता है कि भूमंडलीकरण और साम्प्रदायिक राजनीति उनकी चिन्ता के केन्द्र में है। शिवानंद जी के इन भाषणों में किसानों की आत्महत्या, बुनकरों की भुखमरी और आत्महत्या, पेटेंट रीजीम से होने वाली मुश्किलों और उसकी कानूनी लड़ाई, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश द्वारा गरीबों का भोजन बढ़ाने से महँगाई आने के कुतर्क की आलोचना, किसानों के खेती छोड़ने पर टिप्पणी है। और इसमें से काफी चीजों के लिए नई आर्थिक नीतियों को दोषी बताया गया है। यह आलोचना सही थी और यह किताब का महत्त्व है क्योंकि भूमंडलीकरण के पूरे दौर में कहीं से संसद के अन्दर इन नीतियों की आलोचना नहीं हुई।
Bharat Ka Samvidhan : Sankshipt Parichay
- Author Name:
Subhash Kashyap
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लोकतंत्र में हर नागरिक को अपने देश के संविधान को जानना चाहिए और समझना चाहिए कि हम किस प्रकार शासित हो रहे हैं। भारत के संविधान के मूल कर्तव्य सम्बन्धी भाग के अनुसार देश के हर नागरिक का सबसे पहला कर्तव्य है संविधान का पालन करना। परन्तु उसका पालन करने के लिए संविधान को जानना ज़रूरी है। दुर्भाग्यवश भारत में आज भी भयंकर संवैधानिक निरक्षरता है। ऐसी स्थिति में संविधान के बारे में बुनियादी जानकारी प्राप्त करने के लिए यह किताब अत्यन्त उपयोगी है। भारतीय संविधान के विश्वविख्यात विशेषज्ञ डॉ. सुभाष काश्यप ने सरल और सुगम शब्दों में पुस्तक तैयार की है इसका विशेष उद्देश्य यह है कि पाठक को भारतीय संविधान का संक्षिप्त परिचय मिले तथा वह इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, संविधान निर्माण की प्रक्रिया, तथा वह इसकी संविधान की आत्मा का समुचित ज्ञान प्राप्त सकते हैं।
वस्तुत: यह किताब आधुनिक भारत के इतिहास; एक लोकतंत्र के रूप में भारत के निर्माण और विकास तथा भारत के संविधान में दिलचस्पी रखने वाले हरेक छात्र और सामान्य पाठक के लिए समान रूप से उपयोगी है।
Vidrohi Mahatma
- Author Name:
Nandkishore Acharya
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गाँधी के लिए नैतिक ही आध्यात्मिक है, मनुष्य ईश्वर की साकार प्रतिच्छवि है और जीवन की दैनन्दिनी ही ईश्वर का कार्यकलाप। यही वह चीज है जो गाँधी की आध्यात्मिकता को धार्मिक पाखंड से अलग करके उसे व्यक्ति के नैतिक व आंतरिक उत्तरदायित्व से जोड़ देती है। लौकिक सन्दर्भों में उसे मानवसुलभ और व्यापक बना देती है। इस पुस्तक में नन्दकिशोर आचार्य गाँधी विषयक उन धारणाओं का उन्मूलन करते हैं जो गाँधी-विरोधियों के लिए लगभग फ़ैशन हो चली है। वे आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि कबीर को उनकी आध्यात्मिकता के बावजूद क्रान्तिकारी या विद्रोही मानने वाले विद्वान कबीर के समकक्ष, बल्कि अधिक व्यापक गाँधी की आध्यात्मिकता के चरित्र को क्यों नहीं समझ पाते? इसी तरह मार्क्स समेत अनेक विचारकों द्वारा हिंसा को स्वीकार्य मान लिए जाने के बावजूद, गाँधी द्वारा अहिंसा को एक अस्त्र के ही रूप में प्रस्तुत करना, उसे साधना खुद में एक क्रांतिकारी घटना थी जिसने मनुष्य के निज विवेक को समूह के अचिंतित आवेगों-उद्वेगों से ऊपर और अपेक्षाकृत ज़्यादा शक्तिशाली बताया, जो मानव के रचनात्मक पक्ष की उत्तरजीविता की ज्यादा भरोसेमंद गारंटी देता है। साध्य के मुक़ाबले साधन की पवित्रता पर ज़ोर देना, निर्बलतम के कल्याण को सभ्यता की कसौटी मानना और किसी भी विचार की पहली प्रयोग स्थली अपने ही जीवन और देह को बनाना—इन सबको भले ही आज वाचल और अर्थ-क्षरित जुमलेबाजियों ने घिस-घिसकर बेअसर कर दिया हो, लेकिन अपने मस्तिष्क की सफाई करके देखें तो ये सचमुच ही बड़े और क्रान्तिधर्मी विचार हैं जो हमारी जीवन तथा विश्वदृष्टि को आमूल बदल सकते हैं। गाँधी को एक नए सिरे से जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।
Bisaveen Sadi Ke Tanashah
- Author Name:
Ashok Kumar Pandey
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तानाशाही एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा का नतीजा होती है या कुछ सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ होती हैं जो किसी एक व्यक्ति के रूप में खुद को प्रकट करती हैं? क्या समाजों और राष्ट्रों के जीवन में कोई ऐसा क्षण आता है जब जन-गण स्वयं आत्मघाती हो उठता है और आँख मूँदकर किसी अधिनायक के पीछे चल पड़ता है? आज इक्कीसवीं सदी के इतने पारदर्शी समय में तानाशाही क्या किसी नए रूप की तलाश करेगी; और इन सवालों की रोशनी में हम, जो दुनिया के लोकतान्त्रिक देशों में अग्रणी रहे हैं, खुद को कहाँ देखते हैं! ‘बीसवीं सदी के तानाशाह’ मोटे तौर पर इन्हीं सवालों के जवाब तलाश करती है; कहने की जरूरत नहीं कि आज हमारे सामने मौजूद सबसे अहम सवाल भी यही है। हिटलर, स्तालिन, मुसोलिनी, उत्तरी कोरिया के किम इल-सुंग, चिली के ऑगस्तो पिनोशे और युगांडा के ईदी अमीन पर केन्द्रित इस पुस्तक का हर अध्याय इन नेताओं के समय की आन्तरिक और विश्व-राजनीति के निर्णायक आयामों पर रोशनी डालते हुए बताता है कि ये लोग कैसे उठे, कैसे गिरे और दुनिया ने, दुनिया के विचारकों ने उन्हें कैसे देखा-समझा। इतिहास अध्येता के रूप में अशोक कुमार पाडेय इतिहास के उन अध्यायों को हिन्दी पाठक के समक्ष लाते रहे हैं जिनका सीधा सम्बन्ध हमारी मौजूदा और आवश्यक प्रश्नाकुलताओं से है। इस प्रक्रिया में विचार उनका सहगामी रहा है। यह किताब इस यात्रा का एक और पड़ाव है और पाठकों को निश्चय ही अपने समय को लेकर सोचने और अपना पक्ष चुनने में मदद करेगी।
Chandragupta Maurya Aur Uska Kaal
- Author Name:
Radhakumud Mukherji
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प्रो. राधाकुमुद मुखर्जी की गणना देश के शीर्षस्थ इतिहासकारों में होती है और परम्परागत दृष्टि से इतिहास लिखनेवालों में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. मुखर्जी के वे भाषण हैं, जो उन्होंने सर विलियम मेयर भाषणमाला के अन्तर्गत मद्रास विश्वविद्यालय में दिए थे। इन निबन्धों में भारत के प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन और उसके विजय-अभियानों की चर्चा करते हुए उन सारे कारकों का गहराई से अध्ययन किया गया है जो एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण में और फिर उसे स्थायित्व प्रदान करने में सहायक हुए। चन्द्रगुप्त के कुशल प्रशासन और उसकी सुविचारित आर्थिक नीतियों की परम्परा अशोक के काल तक अक्षुण्ण रहती है। आर्थिक जीवन का राज्य द्वारा नियंत्रण तथा उद्योगों का राष्ट्रीयकरण मौर्यकाल की विशेषता थी। प्रो. मुखर्जी का यह अध्ययन चौथी शताब्दी ई.पू. की भारतीय सभ्यता के विवेचन-विश्लेषण के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसमें कौटिल्य के अर्थशास्त्र की बहुत सारी ऐसी सामग्री का समुचित उपयोग किया गया है, जिसके सम्बन्ध में या तो काफ़ी जानकारी नहीं थी या जिसकी तरफ़ काफ़ी ध्यान नहीं दिया गया था। साथ ही, शास्त्रीय रचनाओं—संस्कृत, बौद्ध एवं जैन ग्रन्थों के मूल पाठों और अशोक के शिलालेखों—जैसे विभिन्न स्रोतों से लिए गए प्रमाणों का सम्पादन और तुलनात्मक अध्ययन भी यहाँ मौजूद है। भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के अन्वेषक विद्वानों ने इस पुस्तक को बहुत ऊँचा स्थान दिया है और यह आज तक इतिहास के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों के लिए एक मानक ग्रन्थ के रूप में मान्य है।
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