Azadi Ke Apurva Anubhav
(0)
Author:
Sachchidanand SinhaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
495
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Available
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यह पुस्तक मानव स्वतंत्रता का एक अध्ययन है। इस स्वतंत्रता सम्बन्धी विचार का विकास विभिन्न मुद्दों को लेकर चल रहे संघर्षों और उनके संस्थानीकरण से हुआ है। प्रारम्भ बिन्दु तो वह विचार ही है जो यह बतलाता है कि आज़ादी जीवन का एक आधारभूत सिद्धान्त है, इसलिए यह मनुष्य के लिए बिलकुल नैसर्गिक चीज़ है, इसे दबाया नहीं जा सकता। इस पुस्तक का लक्ष्य स्वतंत्रता का समावेशी इतिहास लिखना नहीं है, बल्कि इसके विकास की अत्यन्त संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत करना है। इसलिए उन कुछ लिपिबद्ध घटनाओं का वर्णन है जो इसके लक्ष्यों में से कुछेक की सिद्धि के रास्ते में निशान बनाती हैं तथा कुछ उन मूल विचारों का वर्णन है जिनके कारण मानवीय सोच इस दिशा में साकार हो सकी। और इस प्रक्रिया में तथ्यों के साथ विचार को प्रकट करने के लिए फ्रांस की क्रान्ति जैसी इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से कुछेक को केवल स्वीकृत सन्दर्भों के रूप में लिया गया है कि तारतम्य बना रहे। पुस्तक में उन घटनाओं पर भी विचार किया गया है जिन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं के लिए तथा उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के निमित्त आधारवस्तु तैयार की।</p> <p>इस अध्ययन में यूरोपीय देशों में ख़ासकर ब्रिटेन के अनुभवों की विस्तृत चर्चा है। इसका एक कारण यह है कि यूरोप के विकासों का दस्तावेज़ पूरी तरह से लिपिबद्ध है। इसका एक दूसरा कारण भी है कि दुनिया के अनेक हिस्सों में मुक्ति के संघर्ष तो हुए, लेकिन आगे बढ़ने की चाह रखनेवाली मुक्तिधाराओं में से ज़्यादातर धाराएँ काल की रेत में खो गईं। एकमात्र धारा जो आज तक विद्यमान है तथा एक शक्तिशाली नदी का रूप धारण कर चुकी है, वह वही धारा है जिसका उद्भव यूरोप में हुआ था। यही स्रोत कि दूसरे लोगों ने भी यूरोपीय विचारों की रोशनी में ग़ुलामी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और अपनी आज़ादी की फिर से खोज की।</p> <p>आज हम देखते हैं कि उस आज़ादी के संघर्ष को मानवाधिकारों के संयुक्त राष्ट्र चार्टर के द्वारा संकेतित किया गया है। यह चार्टर स्वयं घटनाओं की वक्रगति की पराकाष्ठा है तथा इसने पूरी तरह सत्ताओं की इच्छा के विपरीत वैसा रूप धारण कर लिया है जो इसके सृजन के लिए जवाबदेह थे। निस्सन्देह, यह पुस्तक वैश्विक परिदृश्य में आज़ादी के संघर्ष को विभिन्न काल-खंडों में देखने-समझने की जिस वैचारिक ज़मीन की रचना करती है, वह अपनी प्रक्रिया में अपूर्व अनुभवों की अपूर्व कथा की तरह है।
Read moreAbout the Book
यह पुस्तक मानव स्वतंत्रता का एक अध्ययन है। इस स्वतंत्रता सम्बन्धी विचार का विकास विभिन्न मुद्दों को लेकर चल रहे संघर्षों और उनके संस्थानीकरण से हुआ है। प्रारम्भ बिन्दु तो वह विचार ही है जो यह बतलाता है कि आज़ादी जीवन का एक आधारभूत सिद्धान्त है, इसलिए यह मनुष्य के लिए बिलकुल नैसर्गिक चीज़ है, इसे दबाया नहीं जा सकता। इस पुस्तक का लक्ष्य स्वतंत्रता का समावेशी इतिहास लिखना नहीं है, बल्कि इसके विकास की अत्यन्त संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत करना है। इसलिए उन कुछ लिपिबद्ध घटनाओं का वर्णन है जो इसके लक्ष्यों में से कुछेक की सिद्धि के रास्ते में निशान बनाती हैं तथा कुछ उन मूल विचारों का वर्णन है जिनके कारण मानवीय सोच इस दिशा में साकार हो सकी। और इस प्रक्रिया में तथ्यों के साथ विचार को प्रकट करने के लिए फ्रांस की क्रान्ति जैसी इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से कुछेक को केवल स्वीकृत सन्दर्भों के रूप में लिया गया है कि तारतम्य बना रहे। पुस्तक में उन घटनाओं पर भी विचार किया गया है जिन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं के लिए तथा उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के निमित्त आधारवस्तु तैयार की।</p>
<p>इस अध्ययन में यूरोपीय देशों में ख़ासकर ब्रिटेन के अनुभवों की विस्तृत चर्चा है। इसका एक कारण यह है कि यूरोप के विकासों का दस्तावेज़ पूरी तरह से लिपिबद्ध है। इसका एक दूसरा कारण भी है कि दुनिया के अनेक हिस्सों में मुक्ति के संघर्ष तो हुए, लेकिन आगे बढ़ने की चाह रखनेवाली मुक्तिधाराओं में से ज़्यादातर धाराएँ काल की रेत में खो गईं। एकमात्र धारा जो आज तक विद्यमान है तथा एक शक्तिशाली नदी का रूप धारण कर चुकी है, वह वही धारा है जिसका उद्भव यूरोप में हुआ था। यही स्रोत कि दूसरे लोगों ने भी यूरोपीय विचारों की रोशनी में ग़ुलामी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और अपनी आज़ादी की फिर से खोज की।</p>
<p>आज हम देखते हैं कि उस आज़ादी के संघर्ष को मानवाधिकारों के संयुक्त राष्ट्र चार्टर के द्वारा संकेतित किया गया है। यह चार्टर स्वयं घटनाओं की वक्रगति की पराकाष्ठा है तथा इसने पूरी तरह सत्ताओं की इच्छा के विपरीत वैसा रूप धारण कर लिया है जो इसके सृजन के लिए जवाबदेह थे। निस्सन्देह, यह पुस्तक वैश्विक परिदृश्य में आज़ादी के संघर्ष को विभिन्न काल-खंडों में देखने-समझने की जिस वैचारिक ज़मीन की रचना करती है, वह अपनी प्रक्रिया में अपूर्व अनुभवों की अपूर्व कथा की तरह है।
Book Details
-
ISBN9789388753302
-
Pages139
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: "सभी के लिए कानून आज हमारे पारिवारिक, सामाजिक एवं दिन-प्रतिदिन के जीवन में कानून की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई है। कानून एक ऐसा विषय है, जिसके संबंध में प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य जानकारियाँ होनी ही चाहिए। कानून के संबंध में विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ सभी नागरिकों की आवश्यकता बन गई है। यह पुस्तक अपने पाठकों को सामान्य कानूनों की भरपूर जानकारी प्रदान करेगी। इसमें सरल व सुगम भाषा में तथ्यों को वर्णित किया गया है। इस पुस्तक को पढ़कर पाठकगण—अदालतों के प्रकार, एफ.आई.आर. दर्ज कराने के तरीके, जमानतों के तरीके, अपील के तरीके, सड़क दुर्घटना का मुआवजा, विवाह एवं तलाक, उपभोक्ता कानून, प्रोपर्टी ट्रांसफर, बीमा, टैक्स, चेक के अनादरण, श्रमिक कानून, दहेज, अपराधों के प्रकार और हमारे कानून का संक्षेप में इतिहास—आदि के संबंध में जानकारियाँ प्राप्त करेंगे। इसके माध्यम से पाठक भारतीय दंड संहिता की प्रमुख धाराओं के अंतर्गत शामिल अपराधों और उनकी सजाओं के बारे में भी जान सकेंगे। हमें विश्वास है, प्रस्तुत पुस्तक पाठकों को कानून संबंधी अनेक महत्त्वपूर्ण व उपयोगी जानकारियों से समृद्ध करेगी।
Bhartiya Swadhinta Sangram Ka Itihas
- Author Name:
Ashok Ganguli
- Book Type:

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Description:
यह पुस्तक भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके विरुद्ध हुए भारतीयों के विभिन्न संग्रामों का विवरण है। आरम्भ में अंग्रेज़ों के भारत में सर्वोपरि ताक़त के रूप में उभरने का विवरण है, साथ ही अंग्रेज़ों की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध भारतीय प्रायद्वीप के विभिन्न अंचलों में हुए विद्रोहों का उल्लेख है। तत्पश्चात् 1857 में हुई महान क्रान्ति का व्यापक उल्लेख, भारतीय राष्ट्रवाद की भावना का उदय और उसके बाद हुए आन्दोलनों एवं क्रान्तिकारी गतिविधियों का विशद विवरण है। इस प्रकार पुस्तक से जहाँ एक ओर भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम (1857) और आज़ादी की लड़ाई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य क्रान्तिकारियों की भूमिका के बारे में पता चलता है, वहीं पाठकों को स्थानीय विद्रोहों एवं उनके नायकों जैसे मजनूशाह, वेलु थम्पी, चेनम्मा, तीतू मीर, सीधु व कानू, बिरसा मुंडा आदि के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है। भारत के मध्ययुगीन परम्पराओं से बाहर निकलने एवं नई चेतना के विकास के लिए विभिन्न महापुरुषों के सत्प्रयासों का भी विवरण पुस्तक में है।
भारत की आज़ादी का अनिवार्य प्रसंग है देश का विभाजन। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में पनपे मुस्लिम पृथकतावाद को समझने की कोशिश करते हुए पाकिस्तान के निर्माण के कारणों पर चर्चा पुस्तक का प्रमुख आकर्षण है। साथ ही दोनों विश्वयुद्धों, जिनमें ब्रिटिश मुख्य खिलाड़ी था पर भारत को जबरन उसके दुष्परिणाम भुगतने पड़े, के बारे में भी आवश्यक जानकारियाँ पाठकों तक पहुँचाई गई हैं।
पुस्तक अत्यन्त ही सरल भाषा में लिखी गई है जिसमें अंग्रेज़ों की भारत में उपस्थिति का सारगर्भित वृत्तान्त है। पुस्तक छात्रों, शोधकर्ताओं, इतिहासकारों, लेखकों एवं उन सबके लिए उपयोगी सिद्ध होगी जो भारत की ब्रिटिश साम्राज्यवाद से स्वतंत्रता के बारे में जानने के इच्छुक हैं। यह पुस्तक विशेष तौर पर आज की पीढ़ी के लिए लिखी गई है।
Gandhi aur Nehru
- Author Name:
Deepak Malik
- Rating:
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Description:
भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन वस्तुत: आम सहमतियों और व्यापक संयुक्त मोर्चों एवं सम्मिलित जन-आन्दोलन को लेकर राजनीतिशास्त्र की दुनिया में एक ‘नई गतिकी’ को निर्मित करता है, यह विश्व इतिहास में एक नई कड़ी है।
गांधी विमर्श तो न केवल भारत में अपितु पूरे विश्व में बड़े दमख़म के साथ चल रहा है, पर जवाहरलाल के बारे में इस दौर में कुछ ही पुस्तकें बाज़ार में आ रही हैं, गांधी-नेहरू साझा विमर्श एक देर से ही सही लेकिन निहायत ही मौज़ूँ सिलसिला है।
वैश्वीकरण के आक्रामक दौर में नेहरू जो एक स्वतंत्र वैकल्पिक अर्थतंत्र और राज्य सत्ता के स्थपति थे, उन्हें भुला देना अस्वाभाविक नहीं लगता है। इस दौर में मौजूदा राज्य सत्ता से लेकर प्रमुख विपक्ष तक ने वैश्वीकरण और उदारीकरण को स्वीकार कर लिया है। साम्प्रदायिकता की तस्वीर में भी 1992 और 2002 के बाद शताब्दियों से चल रही मुश्तरका संस्कृति में दीमक लग गई है। गांधी को तो वैश्वीकरण के स्टीमरोलर ने बेरहमी से ज़मींदोज़ कर दिया है। ऐसे दौर में गांधी-नेहरू के ऐतिहासिक साझा और उनके कृतित्व पर पुन: रोशनी पड़नी चाहिए।
प्रस्तुत पुस्तक दो महान स्वप्नद्रष्टाओं की यथार्थसम्मत विचारधारा को सप्रमाण रेखांकित करती है।
Pragaitihas
- Author Name:
S. Irfan Habib
- Book Type:

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Description:
इस पुस्तक में उस युग की कहानी है जिस पर लिखित दस्तावेज़ों से कोई रोशनी नहीं पड़ती। यह पुस्तक ‘भारत का लोक इतिहास’ (पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया) नामक एक बड़ी परियोजना का हिस्सा है, लेकिन इसे एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में भी देखा जा सकता है। तीन अध्यायों की इस पुस्तक के पहले अध्याय में भारत की भूगर्भीय संरचनाओं, मौसम में परिवर्तन तथा प्राकृतिक पर्यावरण (वनस्पति और प्राणी जगत) की उस हद तक चर्चा की गई है, जहाँ तक हमारे प्रागैतिहास और इतिहास को समझने के लिए प्रासंगिक है।
दूसरे अध्याय में मानव जाति की कहानी को पूरी दुनिया के सन्दर्भ में और फिर उसके अन्दर भारत के सन्दर्भ में पेश किया गया है। उसके औज़ार समूहों में परिवर्तन को औज़ार निर्माता लोगों के प्रकार के साथ जोड़कर देखा गया है। तीसरा अध्याय मूल रूप से खेती के विकास और उसके साथ-साथ शोषणकारी सम्बन्धों की शुरुआत का वर्णन करता है।
इस पुस्तक में इस बात की कोशिश की गई है कि ताज़ातरीन सूचनाएँ उपलब्ध प्रामाणिक ग्रन्थों और पत्रिकाओं से ही उद्धृत की जाएँ। यह भी कोशिश की गई है कि चीज़ों को ‘लोक-लुभावन’ तथा आडम्बरपूर्ण बनाए बग़ैर शैली को सरलतम रखा जाए। तकनीकी शब्दों के प्रयोग को न्यूनतम रखा गया है और यह भी प्रयास किया गया है कि प्रत्येक तकनीकी शब्द का प्रयोग करते समय वहीं पर उसकी एक परिभाषा प्रस्तुत कर दी जाए। प्रत्येक अध्याय के अन्त में एक पुस्तक सूची टिप्पणी भी दी गई है जहाँ उस विषय पर और अधिक सूचना देनेवाली महत्त्वपूर्ण पुस्तकों और लेखों को संक्षिप्त टिप्पणियों के साथ दर्ज किया गया है।
Bharat Ka Swarajya Aur Mahatma Gandhi
- Author Name:
Banwari
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- Description: रज़ा के लिए गाँधी सम्भवत: सबसे प्रेरणादायी विभूति थे। 8 वर्ष की कच्ची उम्र में मंडला में गाँधी जी को पहली बार देखने का उन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा था कि 1948 में अपने भाइयों-बहनों और पहली पत्नी के साथ पाकिस्तान नहीं गए थे और अपने वतन—भारत—में ही बने रहे। उन्होंने अपने जीवन का लगभग दो तिहाई हिस्सा फ़्रांस में बिताया, पर अपनी भारतीय नागरिकता कभी नहीं छोड़ी, न ही फ़्रेंच नागरिकता स्वीकार की। अपनी कला के अन्तिम चरण में उन्होंने गाँधी से प्रेरित चित्रों की एक शृंखला भी बनाई। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम गाँधी से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। गाँधी के 150वें वर्ष में हमारी कोशिश यह भी है कि इस पुस्तक माला में गाँधी पर और उनकी विचार-दृष्टि से प्रेरित नई सामग्री भी प्रकाशित हो। इसी सिलसिले में विचारक बनवारी द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशित हो रही है। गाँधी किसी रूढ़ि से बँधे नहीं थे और उनकी अवधारणाओं और उनके आलोक में इतिहास तथा संस्कृति पर विचार भी किसी एक लीक पर नहीं चल सकता। अपने कठिन और उलझाऊ समय में हम आश्वस्त हैं कि यह पुस्तक गाँधी-विचार को नए ढंग से उद्बुद्ध करेगी। रज़ा की इच्छा थी कि गाँधी, विचार के निरन्तर विपन्न होते जा रहे परिसर में, एक महत्त्वपूर्ण और उत्तेजक उपस्थिति बने रहें। —अशोक वाजपेयी
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