Murshidabad Ki Mallika
(0)
Author:
Rajgopal Singh VermaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Historical-fiction₹
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राजगोपाल सिंह वर्मा इतिहास मर्मज्ञ तो हैं ही, वे इतिहास के अनूठे, लीक से हटकर चले महिला पात्रों को अपने कथा-साहित्य का विषय बनाते रहे हैं। वे महीन से महीन तथ्यों की कीलों पर कथा की बारीक मनोवैज्ञानिक जरदोजी करते हैं। कथा है तो मन और उसके खेल भी होंगे। यह मन और मस्तिष्क अकसर ऐतिहासिक उपन्यासों में अनुपस्थित मिलता है, लेकिन राजगोपाल सिंह वर्मा तथ्यों के घटनाक्रमों के चक्र में भी मुन्नी बेगम के अन्तर्द्वन्द्व और बौद्धिक-राजनैतिक दाँव-पेंच, व्यवहारकुशलता के चलते ईस्ट इंडिया कम्पनी के अफसरों से सौहार्द के दृश्य इस उपन्यास को जीवन्त बनाते हैं। मुन्नी बेगम, मीर जाफर की पत्नी रही है, गद्दारी के इतिहास की सियाही मुन्नी के हिस्से भी आ सकती थी, मगर वह व्यवहारकुशल रही। लेखक स्वीकार करते हैं कि मुन्नी बेगम राष्ट्रभक्त किसी तरह भी नहीं थी। सो, नायिका होने के वे उदात्त तत्व उसमें न हों, मगर एक अनाथ, बंजारा नर्तकी के पहले बेमन से मीर जाफर की पत्नी बनने, फिर अपने वजूद को पहचानने, जाफर की मृत्यु के बाद अपने अस्तित्व को बनाए रखने की कूटनीतिक व्यवहारकुशलता उसे नायिका बनने की सलाहियत जरूर देती है। एक ऐसी स्त्री जिसे लेकर ब्रिटिश संसद में भारत के सर्वशक्तिशाली, सम्पन्न और कार्यकुशल गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स जैसे व्यक्ति पर महाभियोग चला हो, मुन्नी बेगम के नाम की गूँज उठी हो; उसमें कुछ खास तो होगा ही। —मनीषा कुलश्रेष्ठ
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राजगोपाल सिंह वर्मा इतिहास मर्मज्ञ तो हैं ही, वे इतिहास के अनूठे, लीक से हटकर चले महिला पात्रों को अपने कथा-साहित्य का विषय बनाते रहे हैं। वे महीन से महीन तथ्यों की कीलों पर कथा की बारीक मनोवैज्ञानिक जरदोजी करते हैं। कथा है तो मन और उसके खेल भी होंगे। यह मन और मस्तिष्क अकसर ऐतिहासिक उपन्यासों में अनुपस्थित मिलता है, लेकिन राजगोपाल सिंह वर्मा तथ्यों के घटनाक्रमों के चक्र में भी मुन्नी बेगम के अन्तर्द्वन्द्व और बौद्धिक-राजनैतिक दाँव-पेंच, व्यवहारकुशलता के चलते ईस्ट इंडिया कम्पनी के अफसरों से सौहार्द के दृश्य इस उपन्यास को जीवन्त बनाते हैं।
मुन्नी बेगम, मीर जाफर की पत्नी रही है, गद्दारी के इतिहास की सियाही मुन्नी के हिस्से भी आ सकती थी, मगर वह व्यवहारकुशल रही। लेखक स्वीकार करते हैं कि मुन्नी बेगम राष्ट्रभक्त किसी तरह भी नहीं थी। सो, नायिका होने के वे उदात्त तत्व उसमें न हों, मगर एक अनाथ, बंजारा नर्तकी के पहले बेमन से मीर जाफर की पत्नी बनने, फिर अपने वजूद को पहचानने, जाफर की मृत्यु के बाद अपने अस्तित्व को बनाए रखने की कूटनीतिक व्यवहारकुशलता उसे नायिका बनने की सलाहियत जरूर देती है।
एक ऐसी स्त्री जिसे लेकर ब्रिटिश संसद में भारत के सर्वशक्तिशाली, सम्पन्न और कार्यकुशल गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स जैसे व्यक्ति पर महाभियोग चला हो, मुन्नी बेगम के नाम की गूँज उठी हो; उसमें कुछ खास तो होगा ही।
—मनीषा कुलश्रेष्ठ
Book Details
-
ISBN9789347043666
-
Pages208
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ಲೇಖಕಿ ಗಾಯತ್ರಿ ರಾಜ್ ಅವರ ಆಮ್ರಪಾಲಿ-ಎಂಬುದು ಐತಿಹಾಸಿಕ ಕಾದಂಬರಿ. ವೈಶಾಲಿನಗರದ ಅತ್ಯಂತ ಸುಂದರ ಯುವತಿ ಆಮ್ರಪಾಲಿ ವೈಶಾಲಿನಗರದ ರಾಜ ಮನುದೇವ ಆಕೆಯನ್ನು ಕಾಮುಕ ಕಣ್ಣಿನಿಂದ ನೋಡಿ ವರಿಸಲು ಹಾತೊರೆಯುತ್ತಾನೆ. ಆಮ್ರಪಾಲಿಯ ಪ್ರೇಮಿ ಪುಷ್ಪಕುಮಾರರನ್ನು ಮದುವೆಯಾದ ದಿನವೇ ಕೊಲ್ಲಿಸುತ್ತಾನೆ. ಆದರೂ, ಆತನ ಪ್ರಯತ್ನ ಕೈಗೊಡಲಿಲ್ಲ ನಗರದ ವಧುವನ್ನಾಗಿಸಲು ಸಂಚು ಹೂಡುತ್ತಾನೆ. ಈ ಮಧ್ಯೆ, ಮಗದ ರಾಜ್ಯದ ಅರಸ ಬಿಂಬಸಾರನು ವಿಣೆ ಕಲಿಸುವ ನೆಪದಲ್ಲಿ ವೇಷ ಮರೆಸಿಕೊಂಡು ಆಮ್ರಪಾಲಿ ಹತ್ತಿರ ಇರುತ್ತಾನೆ. ಅವರ ಮಧ್ಯೆ ಪ್ರೇಮಾಂಕುರವಾಗಿ ಮಗು ಸಹ ಜನಿಸುತ್ತದೆ. ಆದರೆ, ಆಮ್ರಪಾಲಿ, ಮಗದ ರಾಜ್ಯಕ್ಕೆ ತೆರಳು ನಿರಾಕರಿಸುತ್ತಾಳೆ. ಇದನ್ನು ತಂದೆಗೆ ಮಾಡಿದ ಅವಮಾನ ಎಂದು ತಿಳಿದ ಬಿಂಬಸಾರನ ಮಗನು ವೈಶಾಲಿ ರಾಜ್ಯದ ಮೇಲೆ ದಂಡೆತ್ತಿ ನಾಶಪಡಿಸುತ್ತಾನೆ. ಆ ಮಗನೂ (ಅಜಾತಶತ್ರು) ಸಹ ಆಮ್ರಪಾಲಿಯ ಮೇಲೆ ಮನಸು ಮಾಡುತ್ತಾನೆ. ಆದರೆ, ಆಮ್ರಪಾಲಿ ಒಪ್ಪುವುದಿಲ್ಲ. ಕೊನೆಗೆ ಬುದ್ಧನ ಶಿಷ್ಯೆಯಾಗಿ ಹೊರಟು ಹೋಗುತ್ತಾಳೆ ಎಂಬುದು ಆಮ್ರಪಾಲಿಯ ಕಥೆ. ಈ ಅಂಶವನ್ನೇ ಸಾಹಿತ್ಯವಾಗಿಸಿದ ಕಾದಂಬರಿ ಇದು.
Ek Kishori Ki Diary
- Author Name:
Anne Frank
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- Description: अने फ़्रांक की लिखी 'एक किशोरी की डायरी' विश्व की श्रेष्ठ कृतियों में गिनी जाती है। जर्मनी में जन्मी अने ने यह ‘डायरी’ 1942 से 1944 के दौरान लिखी। इसमें युद्ध के बाद जर्मन क़ब्ज़े के दौरान डच लोगों की पीड़ा का आँखों-देखा विवरण है। एक 15 वर्षीय किशोरी ने समाज की उथल-पुथल और अपने मन की कशमकश को बहुत ही ईमानदारी से व्यक्त किया है। जन्मदिन के उपहार स्वरूप मिली एक डायरी को जिस समय उन्होंने अपना सच्चा मित्र बनाया था, उस समय ख़ुद उन्होंने भी कल्पना नहीं की होगी कि एक दिन यह डायरी विश्व की महानतम कृतियों में शुमार होगी। डायरी की प्रविष्टियों में जहाँ स्कूल की बातें हैं, तो सहेलियों की ईर्ष्या, मनपसन्द खिलौनों की चाह, छुट्टियों में बिताए समय के साथ देश में तेज़ी से बदलते हालात का भी वर्णन है। कैसे जर्मनी में रहनेवाले यहूदियों की ज़िन्दगी एक सनक-भर से जहन्नुम हो गई थी, लेकिन जीने की उत्कट इच्छा आख़िरी समय तक भी हार मानने को तैयार नहीं हुई। अने का बाल-मन कहीं न कहीं मानता है कि एक दिन सब सही हो जाएगा और वो वापस अपने परिवार के साथ एक सामान्य जीवन जी पाएगी। एक किशोरी की यह मार्मिक डायरी सिर्फ़ उसी की न रहकर सीधे पाठक के दिल में घर कर जाती है।
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