Bharatiya Kala Darshan
Author:
Shashiprabha TiwariPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Available
भारत की कला बहुत गहराइयों में ले जाती है। आदमी गहराइयों में उतरता चला जाता है, यह भारतीय कला की विशेषता है। भारत की कला भारतीय संस्कृति की वाहिका है। कला संस्कृति को लेकर चलती है। हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही खड़ा हो जाता है कि कला जिस संस्कृति को लेकर चलती है, वह संस्कृति क्या है? अंग्रेजी में हम लोग उसको कल्चर कहते हैं। कल्चर और संस्कृति दोनों समानार्थी नहीं हैं।
संस्कृति अलग चीज है। संस्कृति का केंद्रबिंदु अलग है। संस्कृति का केंद्रबिंदु जो है, वह भारत में अध्यात्म है। भारत की संस्कृति अध्यात्म को लेकर चलती है।
ISBN: 9789352665556
Pages: 160
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
गीतेश शर्मा जिन्हें हम उनकी अत्यन्त लोकप्रिय पुस्तक ‘धर्म के नाम पर’ के लिए जानते हैं, देश के उन कुछेक चिन्तकों में थे जिन्हें धर्म और ईश्वर की समाज तथा मनुष्य-विरोधी अवधारणाओं पर ख़ामोश रहना कभी स्वीकार नहीं हुआ। आज जब मुख्यधारा के प्रगतिशील चिन्तन ने सर्वधर्म समभाव के नाम पर हर तरह के धार्मिक अनाचार से आँखें फेर ली हैं, और यही प्रगतिशील का प्रमुख लक्षण हो गया है। गीतेश जी का लेखन हमारे लिए मार्गदर्शन की तरह है।
उन्हें यह देखकर अफ़सोस होता था कि हिन्दू कट्टरपन्थ का खुला विरोध करनेवाले लोग भी इस्लाम तथा अन्य धर्मों की धार्मिक-सामाजिक जड़ता पर एकदम चुप हो जाते हैं, और इस घातक तुष्टीकरण को धर्मनिरपेक्षता कहते हैं; लेकिन वह हिन्दुत्ववादियों के इस प्रचार से भी सहमत नहीं कि भारत के मुसलमानों ने अपने देश और समाज के लिए कुछ नहीं किया, कि वे भारतीयता को स्वीकार नहीं करते। तमाम तरह के सुधारवादी आन्दोलनों से गुज़रते हुए हिन्दू धर्म ने एक उदार स्थिति हासिल की है, यह वे मानते थे; लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों के चलते हिन्दू धर्म जिस कट्टरता की ओर बढ़ रहा है, वह ख़तरा भी उनकी निगाह में था। भारतीय संस्कृति की विराट धारा की आन्तरिक जिजीविषा की पहचान उन्हें थी; लेकिन बाज़ार, धर्म, अन्धविश्वास और आर्थिक पिछड़ेपन के घालमेल से बनी गन्दी नाली की मौज़ूदगी भी उन्हें साफ़ दिखाई देती थी।
वे दरअसल तर्क की प्रतिष्ठा चाहते थे, वे चाहते थे कि कोई भी धर्म, कोई भी ईश्वर, कोई भी सम्प्रदाय सवाल करने की उस मूल मानवीय शक्ति ऊपर न हो जिसके बल पर मनुष्य जाति वहाँ पहुँची है जहाँ आज वह है।
इस पुस्तक में उनके समय-समय पर लिखे आलेख संकलित हैं। गीतेश जी बहुत ज़्यादा और लगातार लिखनेवाले लेखकों में नहीं थे। जो भी उन्होंने लिखा वह भीतर के गहरे दबाव पर लिखा। इसलिए भी ये आलेख और ज़्यादा पठनीय हो जाते हैं और इसलिए भी कि इनमें जो चिन्ताएँ ज़ाहिर हुई हैं, वे आज की राजनैतिक-सामाजिक स्थितियों में निर्णायक अहमियत रखती हैं।
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