Nyay Ka Ganit
Author:
Arundhati RoyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
<span style="font-weight: 400;">किसी लेखक की दुनिया कितनी विशाल हो सकती है</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">इस संग्रह के लेखों से उसे समझा जा सकता है। ये लेख विशेषकर तीसरी दुनिया के समाज में एक लेखक की भूमिका का भी मानदंड कहे जा सकते हैं। अरुंधति रॉय भारतीय अंग्रेजी की उन विरल लेखकों में से हैं जिनका सारा रचनाकर्म अपने सामाजिक सरोकार से उपजा है। इन लेखों को पढ़ते हुए जो बात उभरकर आती है</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">वह यह कि वही लेखक वैश्विक दृष्टिवाला हो सकता है जिसकी जड़ें अपने समाज में हों। यही वह स्रोत है जो किसी लेखक की आवाज को मजबूती देता है और नैतिक बल से पुष्ट करता है। क्या यह अकारण है कि जिस दृढ़ता से मध्य प्रदेश के आदिवासियों के हक में हम अरुंधति की आवाज सुन सकते हैं</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">उसी बुलन्दी से वह रेड इंडियनों या आस्ट्रेलिया के आदिवासियों के पक्ष में भी सुनी जा सकती है। तात्पर्य यह है कि परमाणु बम हो या बोध का मसला</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">अफगानिस्तान हो या इराक</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">जब वह अपनी बात कह रही होती हैं</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">उसे अनसुना-अनदेखा नहीं किया जा सकता। वह ऐसी विश्व-मानव हैं जिसकी प्रतिबद्धता संस्कृति</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">धर्म</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">सम्प्रदाय</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">राष्ट्र और भूगोल की सीमाओं को लाँघती नजर आती है। ये लेख भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान से लेकर सर्वशक्तिमान अमरीकी सत्ता प्रतिष्ठान तक के निहित स्वार्थों और क्रिया-कलापों पर समान ताकत से आक्रमण करते हुए उनके जन विरोधी कार्यों को उद्घाटित कर असली चेहरे को हमारे सामने रख देते हैं। एक रचनात्मक लेखक के चुटीलेपन</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">संवेदनशीलता</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">सघनता व दृष्टि-सम्पन्नता के अलावा इन लेखों में पत्रकारिता की रवानगी और उस शोधकर्ता का-सा परिश्रम और सजगता है जो अपने तर्क को प्रस्तुत करने के दौरान शायद ही किसी तथ्य का इस्तेमाल करने से चूकता हो।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह मात्र संयोग है कि संग्रह के लेख पिछली सदी के अन्त और नई सदी के शुरुआती वर्षों में लिखे गए हैं। ये सत्ताओं के दमन और शोषण की विश्वव्यापी प्रवृत्तियों</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">ताकतवर की मनमानी व हिंसा तथा नव-साम्राज्यवादी मंशाओं के उस बोझ की ओर पूरी तीव्रता से हमारा ध्यान खींचते हैं जो नई सदी के कन्धों पर जाते हुए और भारी होता नजर आ रहा है। अरुंधति रॉय इस अमानुषिक और बर्बर होते खतरनाक समय को मात्र चित्रित नहीं करती हैं</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">उसके प्रति हमें आगाह भी करती हैं : यह समय मूक दर्शक बने रहने का नहीं है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">–</span><span style="font-weight: 400;">पंकज बिष्ट</span>
ISBN: 9788126711154
Pages: 227
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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