Swami Ramtirth : Jivan Aur Darshan
Author:
Jairam MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 319.2
₹
399
Available
स्वामी रामतीर्थ जैसी दिव्य आध्यात्मिक विभूतियाँ शताब्दियों में यदा-कदा ही अवतीर्ण हुआ करती हैं। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में स्वामी रामतीर्थ ने अपने आध्यात्मिक तेज से समस्त संसार को अभिभूति कर दिया था। वे मंत्र-द्रष्टा ऋषि और वेदान्त के मूर्तिमान स्वरूप थे। उनकी जीवन-कहानी भारतीय दर्शन और साधना-प्रणाली की जीवन्त कहानी है। तैंतीस वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने जैसी साधना की, वह बहुत कम जीवनों में देखने को मिलती है। वे निष्काम कर्मयोग, राजयोग, भक्तियोग एवं अद्वैत वेदान्त के साकार विग्रह थे। उनके ह्रदय में देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति एवं मानव-सेवा की त्रिवेणी अजस्र रूप में प्रवाहित होती थी। उन्होंने अपने व्यक्तित्व की अप्रतिम गरिमा से भारत का गौरव समस्त संसार की दृष्टि में बहुत ऊँचा उठाया। इसमें रंचमात्र सन्देह नहीं कि उनके जीवन, साधना-प्रणाली और आदर्शों से भारत 'श्रेयस' और 'प्रेयस' दोनों प्राप्त कर सकता है। हमारे देश के नवयुवक स्वामी रामतीर्थ के विचारों, उपदेशों एवं शिक्षाओं से बलवती प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं, ऐसी हमारी दृढ़ धारणा है।
ISBN: 9789352210299
Pages: 389
Avg Reading Time: 13 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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गोस्वामी तुलसीदास का जीवन-चरित प्राय: उनके जीवनकाल से ही लिखा जाता रहा है। इसमें सन्देह नहीं कि उन्होंने अपनी दीर्घायु के बीच पर्याप्त ख्याति अर्जित कर ली थी और मुग़ल सम्राट अकबर, राजा मानसिंह, अछल रहीम खानखाना, मीराँबाई, राजा टोडर आदि ने उनकी श्रीरामभक्ति के प्रति पर्याप्त श्रद्धा और सम्मान अर्पित किया था। साहित्य की परम्परा में उनकी कालजयी कृति श्रीरामचरितमानस की चर्चा भक्ति एवं रीतिकाल से ही बराबर होती चली रही है।
गोस्वामी तुलसीदास की जीवनगाथा की मूल समस्या है कि इन पाँच सौ वर्षों के अवशेषों में बाबा को कहाँ खोजा जाए? यहाँ बाबा तुलसीदास की खोज का आधार उनकी कृतियाँ तथा पाठ हैं। प्रत्येक सर्जक अपनी कृति के पाठ में वर्ण से लेकर उसकी समग्र प्रबन्ध रचना तक व्याप्त रहता है—कण-कण में व्याप्त निर्गुण ब्रह्म की भाँति। साधक के लिए, अणु-अणु में व्याप्त ब्रह्म से आत्मसाक्षात्कार करके, उसे समाधि चित्त में उतारना बड़ी दुर्लभ समस्या है। ठीक उसी प्रकार, तुलसी की कृतियों में सर्वत्र व्याप्त महात्मा तुलसीदास का आत्मसाक्षात्कार करके उन्हें स्वानुभूति एवं सृजन के स्तर पर उतारना लेखक की वर्षपर्यन्त तक की चेष्टा रही है। इसे औपन्यासिक कृति का रूप देने के लिए ‘क्वचिदन्यतोपुपि’ का भी उसे आधार लेना पड़ा है—किन्तु चेष्टा यही रही है कि कृतियों का सृजन करके उन्हीं में विलीन गोस्वामी तुलसीदास को शब्दों से कैसे रेखांकित किया जाए। जो बन पड़ा, वह सामने है।
इस कृति के प्रकाशन में आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए अयोध्या शोध-संस्थान, अयोध्या-फ़ैज़ाबाद के निदेशक डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह तथा रजिस्ट्रीकरण अधिकारी व विशेष कार्याधिकारी डी.ए.पी. गौड़ का प्रकाशक हृदय से आभार व्यक्त करता है।
Uchakka
- Author Name:
Laxman Gaikwad
- Book Type:

- Description: यह आत्मकथा बिना आत्मदया या किसी क़िस्म की आत्मश्लाघा के हमारे सामाजिक यथार्थ को सामने लाती है। दलित लेखकों की परम्परागत कथा से अलग, यह ऐसा आत्म–वृत्तान्त है जो समाज के छोटे–छोटे अपराधों पर परवरिश पाते एक समूह का प्रतिनिधित्व करता है ‘‘मैं तब मराठी की पहली कक्षा में ही पढ़ रहा था। तब जिस किसी पुस्तक का पहला पृष्ठ खोलता उस पर लिखा होता, ‘भारत मेरा देश है। सारे भारतीय मेरे बन्धु हैं। मुझे इस देश की परम्परा का अभिमान है।’ मुझे लगता है कि अगर यह सब कुछ सही–सही है तो फिर हमें बिना अपराध के पीटा क्यों जाता है? माँ को पुलिस क्यों पीटती है? उसकी साड़ी खींचकर यह क्यों कहती है ‘चल साड़ी खोल के दिखा, तूने चोरी की है न!’ मुझे लगता है अगर भारत मेरा देश है, तो फिर हमारे साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया जाता है? अगर सभी भारतीय भाई–भाई हैं, तो फिर हम जैसे भाइयों को काम क्यों नहीं दिया जाता? हमें खेती के लिए ज़मीन क्यों नहीं दी जाती? रहने के लिए हमें अच्छा मकान क्यों नहीं मिलता? अगर हम सब भाई हैं, तो मेरे भाइयों को, घर का खर्चा चलाने के लिए या पुलिस को रिश्वत देने के लिए, चोरी क्यों करनी पड़ती है?’ ऐसे कई प्रश्न हैं, जिन्हें यूँ ही ख़ारिज नहीं किया जा सकता। बिना किसी दुराव–छिपाव के लेखक सहजतापूर्वक बारी–बारी से कई सवालों से जूझता है। बेबाक और अहम साहित्यिक कृति होने के साथ–साथ यह एक महत्त्वपूर्ण व संग्रहणीय दस्तावेज़ है।
Patanjali
- Author Name:
Bhagwatilal Rajpurohit
- Book Type:

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Description:
महर्षि पतंजलि भारतीय वाड़्मय के अप्रतिम प्रवक्ता थे। उन्होंने ‘निदानसूत्रम्’ की रचना की तो ‘परमार्थसारम्’ जैसा दार्शनिक ग्रन्थ भी रचा। संस्कृत भाषा और व्याकरण सम्बन्धी ‘महाभाष्य’ लिखा तो परम्परागत योग की धारा को समेटकर उसे ‘योगसूत्रम्’ के माध्यम से दार्शनिक धरातल पर भी प्रतिष्ठित किया। कहा यह भी जाता है कि उन्होंने ‘चरक संहिता’ का भी संस्कार किया था। उनके जो भी ग्रन्थ ज्ञात हैं, वे अपने-अपने विषय के आधार ग्रन्थ हैं जिनकी सामग्री आगे चलकर उस विषय में मार्गदर्शक सिद्ध हुई है।
विवरणों से यह भी ज्ञात होता है कि काव्य के क्षेत्र में भी उनका अनूठा योगदान रहा। उनकी जीवन-कथा के कई रूप मिलते हैं। उनके देशकाल के विषय में सर्वाधिक उपयोगी उनका महाभाष्य ही माना गया है। इस तथा अन्य ग्रन्थों में आए तथ्यों के अनुसार कहा जा सकता है कि पतंजलि सेनापति शुंग के समकालीन रहे थे जिनके शासनकाल को इतिहासकारों ने ईसवी पूर्व 185 से 149 तक निश्चित किया है।
इस पुस्तक में उनके जीवन, समय तथा कृतित्व का परिचय देते हुए उनकी उपलब्ध रचनाओं—‘योगसूत्रम्’, ‘महाभाष्यम्’, ‘निदानसूत्रम्’ तथा ‘परमार्थसारम्’ का पाठ सानुवाद दिया गया है।
Indradhanush Ke Pichhe Pichhe
- Author Name:
R. Anuradha
- Book Type:

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Description:
लगभग छह साल पहले एक रोज़ अचानक लेखिका को पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है। कैंसर जैसी बीमारी ट्यूमर चौथे स्टेज में और उसका विस्तार बगल के लिंफ नोड्स में भी। मृत्यु से इससे निकट का साक्षात्कार शायद और कुछ नहीं हो सकता। इस बीमारी ने लेखिका की दुनिया बदल दी, लेकिन उन्होंने इस जीवन का अन्त मानने से इनकार कर दिया।
लेखिका की राय में कैंसर को दुश्मन मानकर उससे किसी बाहरी संक्रमण की तरह नहीं लड़ा जा सकता। आख़िर यह एक ऐसी बीमारी है जो बाहर से नहीं आती। इसके कारण हमारे-आपके शरीर के अन्दर होते हैं।
यह किताब मृत्यु पर जीवन की विजय की कहानी है और असम्भव मान ली गई स्थितियों में जीने का सलीक़ा सिखाती है। कैंसर का पता चलने से लेकर इलाज के दौरान हुए प्रसंगों और अनुभवों को इसमें समेटा गया है। इसके सभी पात्र और घटनाएँ वास्तविक हैं, लेकिन पहचान छिपाने के लिए कुछ पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं।
Inside Chhattisgarh: A Political Memoir
- Author Name:
Ilina Sen
- Book Type:

- Description: For thirty years, until his conviction in 2010 by the High Court, pediatrician Binayak Sen and his sociologist wife Ilina worked among people in Chhattisgarh's tribal heartland. They came here seeking fresh ideas for change—and stayed on. This fascinating memoir illuminates their journey and how their world imploded. Ilina vividly describes their years at the trade union CMSS, led by the iconic Shankar Guha Niyogi, where Binayak and three doctors started a hospital and she organized workers' education, joined the feisty women mine-workers' struggles and discovered the rich local history, cultural and farming traditions. These experiences later found expression in Rupantar, their own NGO and when the new state's government sought their advice for its women's policy and for Mitanan, a precursor of the national rural health mission. Candid and deeply felt, the book celebrates Chhattisgarh but also laments the lost opportunity for its inclusive and violence-free development.
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