Asim Hai Asman
(0)
Author:
Narendra JadhavPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
225
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छुआछूत और जातीय अस्पृश्यता का कलंक भारत की 3500 वर्ष पुरानी जाति-व्यवस्था का शाप है, जो दुर्भाग्यवश आज भी जीवित है और समय-समय पर उफन पड़ता है। पर धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अब वह देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक गतिशीलता के सामने अधिक समय तक टिक नहीं सकेगी।</p> <p>‘असीम है आसमाँ’ ऐसे ही एक परिवार की कहानी है, जिसने लगातार जाति-व्यवस्था, निरक्षरता, अज्ञान, अन्धविश्वास तथा ग़रीबी के विरोध में संघर्ष किया।</p> <p>इसमें एक परिवार की तीन पीढ़ियों के संघर्ष की कथा है जिसकी पृष्ठभूमि में भारत के स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक तथा राजनीतिक परिवर्तन की विस्तृत झाँकी मिलती <br>है।</p> <p>सन् 1993 में यह उपन्यास ‘आमचा बाप आणि आम्ही’ शीर्षक से मराठी में प्रकाशित हुआ, जो अत्यन्त लोकप्रिय रहा। तत्पश्चात् अंग्रेज़ी, फ़्रेंच तथा स्पेनिश जैसी विदेशी भाषाओं में तथा गुजराती, तमिल, कन्नड़, उर्दू और पंजाबी जैसे भारतीय भाषाओं में भी इसका अनुवाद प्रकाशित हुआ।
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छुआछूत और जातीय अस्पृश्यता का कलंक भारत की 3500 वर्ष पुरानी जाति-व्यवस्था का शाप है, जो दुर्भाग्यवश आज भी जीवित है और समय-समय पर उफन पड़ता है। पर धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अब वह देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक गतिशीलता के सामने अधिक समय तक टिक नहीं सकेगी।</p>
<p>‘असीम है आसमाँ’ ऐसे ही एक परिवार की कहानी है, जिसने लगातार जाति-व्यवस्था, निरक्षरता, अज्ञान, अन्धविश्वास तथा ग़रीबी के विरोध में संघर्ष किया।</p>
<p>इसमें एक परिवार की तीन पीढ़ियों के संघर्ष की कथा है जिसकी पृष्ठभूमि में भारत के स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक तथा राजनीतिक परिवर्तन की विस्तृत झाँकी मिलती <br>है।</p>
<p>सन् 1993 में यह उपन्यास ‘आमचा बाप आणि आम्ही’ शीर्षक से मराठी में प्रकाशित हुआ, जो अत्यन्त लोकप्रिय रहा। तत्पश्चात् अंग्रेज़ी, फ़्रेंच तथा स्पेनिश जैसी विदेशी भाषाओं में तथा गुजराती, तमिल, कन्नड़, उर्दू और पंजाबी जैसे भारतीय भाषाओं में भी इसका अनुवाद प्रकाशित हुआ।
Book Details
-
ISBN9788126711710
-
Pages239
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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गांधीजी के पास विचारों की अमूल्य संपदा थी। उन्होंने भारत ही नहीं, वरन विश्व मानवता को अजस्र अनुदान दिए हैं। उनकी विचारधारा के प्रभाव से न केवल पश्चिमी क्षितिज पर विचारों का उदय हुआ, बल्कि आज भी पश्चिमी और भारतीय विचारक गांधीजी के विचारों से प्रभावित हो रहे हैं। गांधीजी जहाँ भी जाते थे, लोग उन्हें असीम प्यार देते थे। वह फूल चुनने के लिए कभी कहीं नहीं ठहरे, कर्मरत हो आगे बढ़ चले, फूल राहों में खिलते रहे। वह ऐसे घने वृक्ष थे, जो गरमी सहकर भी दूसरों को छाया देते रहे। गांधीजी कहते थे, ‘‘प्रेम की शक्ति घृणा की शक्ति से हजार गुना प्रभावशाली होती है।’’ तभी तो गांधीजी के विरोधी भी उन्हें प्यार करते थे। वे बेहद शरमीले, संकोची थे। बचपन में यह कोई कह भी नहीं सकता था कि इनके अंदर इतना बड़ा तूफान छिपा है, जो अंग्रेजों को तिनके की तरह उड़ाकर रख देगा। सतह से कोई तरंग भी नहीं उठी कि तूफान का अंदेशा होता। यह सब प्रकृति के रेशमी धागों से बन रही तकदीर थी, जो उन्हें राष्ट्रपिता के पद तक ले गई। विश्व की महान् विभूति महात्मा गांधी को संपूर्ण रूप से जानने-समझने में सहायक एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक।
Banda Singh Bahadur
- Author Name:
Maj Gen Suraj Bhatia
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"बंदा बहादुर ने अपना प्रारंभिक जीवन एक वैरागी के रूप में बिताया। यह लगभग सत्रह वर्ष चला। अधिकांश समय उन्होंने दक्षिण भारत में गोदावरी नदी पर स्थित नंदेड़ नामक नगर में अपने आश्रम में तपश्चर्या करते बिताया। उन्होंने हिंदू शास्त्रों तथा योग एवं प्राणायाम विद्याओं का गहन अध्ययन किया। कुछ लोग मानते हैं कि वे तंत्र विद्या के भी ज्ञाता थे। गुरु गोविंद सिंह ने उन्हें गले से लगाया, उन्हें अमृत छकाकर सिख बनाया, उनका नाम बंदा सिंह बहादुर रखा और उन्हें पंजाब से मुगल राज्य की जड़ें उखाड़ फेंकने की जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद उन्होंने पंजाब में मुगलों के शहर, गढ़ और किले आक्रमण करके अपने अधीन करने का कार्यक्रम शुरू किया। बंदा ने ऐलान किया कि वे जमींदारों को हटाकर सभी जमीन खेतिहर गरीब किसानों में बाँटेंगे। महमूद गजनी और मुहम्मद गौरी के दिनों के बाद इतनी सदियाँ बीत जाने के बाद पहली बार उत्तर भारत में किसी गैर-मुसलमानी शक्ति ने एक बड़े और बेशकीमती भू-भाग पर अपना आधिपत्य जमाया। अंततः मुगलों ने बंदा बहादुर को पकड़कर बेडि़यों में डाल लोहे के पिंजड़े में बंद कर दिया गया। हथकडि़यों और पाँव की साँकलों में बंदा को महीनों तक जेल में बंद रख, मुसलमान जल्लादों के हाथों जो अमानवीय यातनाएँ दी गईं, वे अनुमान और कल्पना से परे हैं। वीर, क्रांतिकारी, हुतात्मा, धर्मपारायण, राष्ट्रनिष्ठ वीर बंदा सिंह बहादुर की जाँबाजी और पराक्रम का गौरवगान करती यह पुस्तक हर राष्ट्राभिमानी के लिए पढ़नी आवश्यक है। "
Sapnon Ka Saudagar | Hindi Translation of Karma's Child Subhash Ghai: The Story of Indian Cinema's Ultimate Showman
- Author Name:
Subhash Ghai::Shri Suveen Sinha
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सुभाष घई भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म निर्माताओं में से एक हैं। 1976 से 2008 के बीच उन्होंने सोलह फिल्में बनाईं, जिनमें से बारह -कालीचरण, कर्ज, विधाता, हीरो, कर्मा, राम लखन, मेरी जंग, सौदागर, खलनायक, परदेस, ताल और यादें- बड़ी हिट रहीं, जबकि बाकी फिल्मों को भी समीक्षकों की सराहना मिली। घई की फिल्मों की विशेषता उनकी दमदार कहानियाँ, यादगार संगीत और भव्यता थी। उन्होंने अपनी फिल्मों में बड़े सितारों के साथ-साथ नए चेहरों को भी मौका दिया, जो आगे चलकर बॉलीवुड में बड़ा नाम बने। अपने अनोखेपन से उन्होंने दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचा, खासकर उस दौर में जब वीडियो पायरेसी अपने चरम पर थी। वे भारत में पहले फिल्म निर्माता थे, जिन्होंने फिल्म का संगीत ऑडियो सीडी पर रिलीज किया। साथ ही उन्होंने हिंदी सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक साधारण पृष्ठभूमि से आकर उन्होंने सफलता की बुलंदियों को छुआ। उन्होंने यह साबित किया कि मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में हर दिन किस्मत बिगड़ती है तो बनती भी है। आज वे व्हिस्लिंग वुड्स फिल्म संस्थान चलाते हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजने लायक विरासत है। सुवीन सिन्हा की लिखी पुस्तक -'सपनों का सौदागर' एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो सुभाष घई की तरह ही अपनी किस्मत लिखना चाहता है।"
Rajpath Se Lokpath Par
- Author Name:
Vijayaraje Scindia
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"मेरे मानस पर अपने जीवनसाथी का ऐसा चित्र उभरता, जो देश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे सूरमाओं में सबसे पहली पंक्ति का तेजपुंज हो।...स्वदेशी आग्रह का माहौल कुछ ऐसा बना कि प्रत्येक नागरिक विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर देशभक्तों की पंक्ति में आ खड़ा होने लगा। इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने प्रतिज्ञा की कि न केवल विदेशी वस्त्र अपितु अन्य कोई विदेशी वस्तु भी प्रयोग में नहीं लाऊँगी। अंग्रेज अधिकारियों के यहाँ जाना-आना रहता था, मैंने निर्णय लिया कि अब उनसे कोई संबंध नहीं रखूँगी। अतः उनके क्लबों, चाय-पार्टियों या भोज-समारोहों में जाना मैं टालने लगी। सफेद घोड़े पर एक लड़का सवार था और काले घोड़े पर एक लड़की। प्राणिउद्यान के एक नौकर ने पूछने पर बताया कि वे जिवाजीराव महाराज और उनकी बहन कमलाराजे थे। अर्थात् स्वयं महाराज सिंधिया अपनी बहन के साथ थे। हम लोगों द्वारा देखे गए उस प्रासाद, किले, उद्यान और उस शेर के भी स्वामी। नानीजी के मानस पर वह दृश्य बिजली की तरह कौंध गया। सहसा उनके मुँह से निकला, ‘‘हमारी नानी (मैं) की उनके साथ कितनी सुंदर जोड़ी लगेगी!’’ इतना सुनते ही मामा और सभी हँस पड़े। किसी के मुँह से निकला, ‘‘कल्पना की उड़ान ऊँची है।’’ मुझे लगा, राजनीतिक जीवन में रहकर सिद्धांतों एवं मूल्यों के संवर्धन के लिए जूझते रहना ही अपना कर्तव्य है। अतः मेरे मन में यह बोध जागा कि सम विचारवाले लोगों के साथ कार्य करना अधिक परिणामकारी होगा। ऐसे लोगों का दल, जिन्हें भ्रष्टाचार की लत नहीं लगी थी, मुझे अपना प्रतीत होने लगा।...वैचारिक दृष्टि से मुझे जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी की रीति-नीति अच्छी लगती थी, अतः दोनों ही दल मुझे करीबी लगते थे। किंतु मैं यह निर्णय नहीं कर पा रही थी कि दल की सदस्य बनूँ। अंततः मैंने दोनों ही दलों के टिकट पर चुनाव लड़ने का निश्चय कर लिया। मध्य प्रदेश विधानसभा के करेरा निर्वाचन क्षेत्र से मैं जनसंघ की प्रत्याशी बन गई। —इसी पुस्तक से तिहाड़ कारागृह नहीं है, यह धरती का नरक-कुंड है। और इस नरक-कुंड में वे लोग धकेल दिए गए थे, जिनके तपोबल से इंदिराजी का सिंहासन डिग रहा था।...तिहाड़ जेल में स्थान-स्थान पर गंदगी का ढेर जमा रहता। दुर्गंधयुक्त वायु में घुटन महसूस होती। भोजन के समय थाली पर से भिनभिनाती मक्खियों को लगातार दूसरे हाथ से उड़ाना पड़ता। कानों में कीट-पतंगों की आवाजें गूँजती रहतीं। अँधेरे में जुगनू का प्रकाश और कानों में झींगुर की झनकार। जीना दूभर था। इन सबके बावजूद हम चैन से थे। किंतु खुली हवा में साँस लेनेवाली इंदिराजी क्या चैन से थीं! उन्हें तो दिन में भी तारे नजर आ रहे थे। अयोध्या ईंट और पत्थर की बनी नगरी नहीं है। यह भारत की आत्मा और राष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक है। इसीलिए जब रथयात्रा निकली तो हिंदू और मुसलमान दोनों इसमें समान रूप से शरीक हुए। राम और रहीम संग-संग चलते रहे। जनसभाओं में भी मुसलमान शिरकत करते रहे। न राग, न द्वेष; एक प्राण दो देह जैसी स्थिति थी। इस राष्ट्र-मिलन से उन मुट्ठी भर लोगों में खलबली मच गई, जो राजनीति की अँगीठी पर स्वार्थ की रोटियाँ सेंका करते थे। बाबरी ढाँचा टूटने का उनका भय और विरोध केवल इसी मात्र के लिए था। एक छोटे परिवार के दायरे से निकलकर विराट् में समाहित होने का सुख, वसुधैव कुटुंबकम् के आदर्श को जीने का प्रतीक था वह आयोजन। मुझसे छोटे से बने सुंदर, किंतु अति विशिष्ट मंदिर की सीढि़यों पर पैर का अँगूठा लगाने के लिए कहा गया। पर करती भी क्या! मजबूरी थी। उस मंदिर में एक ओर मेरे पति स्वर्गीय महाराज की मूर्ति रखी थी तो दूसरी ओर गुरुजी की। बीच में थे मेरे इष्टदेव श्रीकृष्ण। मैंने पाँव का अँगूठा नहीं, अपना माथा उस मंदिर से लगा दिया। इस प्रकार परदादी बनने का सुख मैंने संपूर्ण संघ परिवार के साथ जीया। ईश्वर से संपूर्ण भारतीय समाज के शुभ की कामना करती हूँ। —इसी पुस्तक से "
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