Rajendra Yadav
Author:
Manmohan ThakorePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 556
₹
695
Available
मेरे अनन्य आत्मीय और बड़े भाई मनमोहन ठाकौर आज पंद्रह अगस्त को जीवन-मुक्त हो गए। उनके बिना अपने पिछले पैंतालीस वर्षों को सोच पाना असंभव है। मैं जो कुछ हूँ उसका बहुत महत्त्वपूर्ण हिस्सा उन्हीं का बनाया हुआ है। परिवार क्या होता है, यह मैंने मनमोहन ठाकौर और कमला भाभी के माध्यम से ही जाना है। हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, उर्दू, बंगाली, ब्रज, राजस्थानी में समान अधिकार से लिखने-बोलने वाले ‘ठाकुर साहब’ इतिहास, साहित्य, मार्क्सवाद, ट्रेड यूनियन, विद्यार्थी आंदोलन-सभी से गहराई के साथ जुड़े रहे—भारत का तो शायद ही कोई कोना हो जहाँ वे अनेक बार नहीं गए, महफिलबाज़ और जीवंत साथ घनघोर पढ़ाकू और बुद्धिजीवी एक ऐसा यात्री जो दुनिया भर की भौगोलिक और बौद्धिक यात्राएँ करने के बाद वापस अपने अड्डे पर लौट आता है। कल्पना कर सकना मुश्किल है कि कलकत्ता में उनसे परिचय न हुआ होता तो मेरी जिंदगी क्या होती। मेरा भौतिक और भावनात्मक पता उन्हीं की मार्फ़त था। काश, वे दस-बारह दिन रुक जाते तो अपनी नवीनतम पुस्तक 'राजेन्द्र यादव मार्फत मनमोहन ठाकौर' को भी देख लेते। अब तो इस पुस्तक के अलावा ‘पप्पू’, ‘आवाजें बल्का बस्ती की’, ‘अंतरंग’, ‘एक नास्तिक की तीर्थ यात्रा’, ‘काले पानी का गहराव’ जैसी गद्य-रचनाएँ, ‘सौमित्र संकल्प’ और ‘सेलैक्टेड सौलिलॉकीज़’ जैसी काव्य पुस्तकें ही उनके नाम से जानी जाएँगी।</p>
<p>अजस्र ऊर्जा और उत्साह से भरे रहने वाले ठाकुर साहब अंतिम दो महीनों में बार-बार मृत्यु के हाथों से छूटकर वापस लौट आते थे—मगर अंततः कौन छूटा है उस पकड़ से।
ISBN: 9788171194988
Pages: 192
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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विज्ञान के इस युग में नई तकनीक और भौतिकवाद भले ही अब आम जीवन का आधार हो चला है, लेकिन विज्ञान भी चमत्कार को स्वीकार करता है। ऐसे ही कुछ चमत्कार होते हैं जो अनायास ही छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से होकर, कई बार नियति को भी बदल देते हैं और ईश्वर में विश्वास को हर बार और दृढ़ करते जाते हैं।
‘ऐसी लागी लगन’ ऐसी ही कुछ सूक्ष्म और वृहद् चमत्कारिक घटनाओं को आम जनमानस के सामने रखती है, जो ब्रम्हांड का संचालन करनेवाले उस परमात्मा की उपस्थिति में दृढ़ विश्वास रखने के लिए प्रोत्साहित नहीं बल्कि बाध्य करती हैं।
डॉ. पी. राजेश माहेश्वरी द्वारा लिखी गई यह किताब अपने आप में विज्ञान और विश्वास का संगम है—''सांईं के साथ मेरी लगन कुछ ऐसी लगी कि मुझे अनुभव हुआ, यह सिलसिला अभी से शुरू नहीं हो रहा, वाक़ई कोई बेहद पुराना नाता है। जैसे कोई भूला-बिसरा अत्यन्त आत्मीय कहीं अचानक नज़रों के सामने आ जाए।''
एक डॉक्टर, जो विज्ञान के आधार पर लोगों के जीवन की रक्षा करता है, उसका इन र्ईश्वर के चमत्कारों में इस क़दर दृढ़ विश्वास होना आश्चर्यचकित तो करता ही है, साथ ही पाठक के मन में भी एक ललक और अगाध विश्वास पैदा करता है। लेखक ने इस किताब के माध्यम से अपने निजी तथा सच्चे अनुभवों को साझा किया है, जो किसी चमत्कार से कम नहीं लगते।
सांईं लीलाओं में विश्वास करनेवाले लोगों का भारत में एक बड़ा प्रतिशत है। यह किताब उन सभी लोगों के सांईं बाबा से जुड़े आत्मिक और भौतिक अनुभवों से जोड़ने और सांईं बाबा के प्रति सहज ही आकर्षित करने का काम करती है।
''व्यावसायिक दृष्टि से डॉक्टरी जैसे निष्ठुर पेशे में रहकर अब साल-भर में तीन-चार बार मुझे शिरडी पहुँचने की ललक होने लगी और फिर धीरे-धीरे हर महीने जाने की तलब। जैसे कोई परिन्दा लौट-लौटकर अपने नीड़ में आए...बाबा के समक्ष हमेशा ही मैंने ख़ुद को एक नई ऊर्जा से सराबोर पाया है। इसे व्यक्त करने योग्य शब्द तलाशना अत्यन्त कठिन है। शायद अविश्वसनीय-सा भी लगे...!''
इस किताब में डॉ. माहेश्वरी ने अपने निजी जीवन के अनुभवों को भी साझा किया, और बताया कि, ''बेशक, एक बाबा के प्रति एक डॉक्टर के भीतर जागी इस भक्ति के कारण मेरी अर्धांगिनी डॉ. कल्पना माहेश्वरी को भारी समस्या हुई। उन्होंने मेरी क्षणिक भावना को पागलपन तक कहा, लेकिन समय के साथ उन्हें मेरे भीतर हुए परिवर्तन और अनुभूतियों का अहसास हुआ और उन्होंने शिरडी के प्रति मेरे अनुराग को स्वीकार लिया।''
‘ऐसी लागी लगन’ किताब पूर्णत: सांईं बाबा से जुड़े चमत्कारिक और सकारात्मक अनुभवों पर आधारित है। इसे लिखने में अपने अनुभवों को न केवल डॉ. माहेश्वरी बल्कि उनके कुछ साथियों और अन्य परिचित सांईं भक्तों ने भी साझा किए हैं, जिनमें आमजन से लेकर डॉक्टर्स, पत्रकार, शिक्षक आदि शामिल हैं। किताब पढ़ते समय सांईं बाबा के प्रति श्रद्धा का बढ़ना स्वाभाविक है। कहीं-कहीं पर वृत्तान्तों का विस्तृत विवरण पाठक की दिलचस्पी कम भी करता है, लेकिन प्रमुख घटनाओं के प्रति श्रद्धा और उत्सुकता बरकरार रहती है। सच्चे अनुभवों पर आधारित यह किताब, विश्वास के आधार पर एक बेहतर प्रेरणास्रोत बन सकती है।
Aahatein Sun Raha Hun Yadon Ki
- Author Name:
Kashinath Singh
- Book Type:

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काशीनाथ सिंह कहानियाँ, उपन्यास, नाटक और आलोचना लिखकर और कथाकार के रूप में ख्याति अर्जित कर संस्मरणों की दुनिया में आए। सम्भवत: इसीलिए उनके संस्मरण अन्तत: स्मृति-कथाएँ हैं। कथा, जिसमें गल्प का तत्व कभी भी यथार्थ के सामने निस्तेज और प्रभावहीन नहीं होता। ऐतिहासिक व्यक्तियों और वास्तविक घटनाओं के इर्द-गिर्द बुने जाने पर भी उनमें रचनात्मकता और कल्पना के पहलू ऐसे मिले-जुले होते हैं कि वे कभी भी ‘यथार्थ’ को ‘भारी’, ‘ठोस’ और ‘पत्थर’ सा नहीं बनने देते। यहाँ ‘यथार्थ’ एक जीवित पाखी की तरह ‘गल्प’ के पंख लगाकर जीवन के महा-आकाश में उड़ता है। कहानी-उपन्यास से संस्मरण की ओर आने का एक लाभ यह भी हुआ है कि कहानी-उपन्यास बुनते-गढ़ते हुए जो सीखें कथाकार काशीनाथ सिंह को मिली थीं, वे यहाँ भी काम आ सकी हैं।
काशीनाथ सिंह के संस्मरणों में वास्तविकता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उनमें एक ख़ास तरह की स्पष्टता, साहसिकता और बेबाकी पैदा की है। भोजपुरी की शक्ति, जो उनकी कहानियों में, संयत भाव से प्रकट होती थी, उनके संस्मरणों में खुलकर प्रकट होती है। बनारसीपन ने इन संस्मरणों के गद्य को जीवन का आईना बना दिया। हरिशंकर परसाई और नामवर सिंह—गद्य में काशीनाथ सिंह के आदर्श मालूम पड़ते हैं। इसीलिए उनके संस्मरणों की संरचना में करुणा और व्यंग्य अन्तर्भुक्त हैं। इन दोनों गद्यकारों की तरह उनकी भाषा बतकही के अत्यन्त निकट चली जाती है। छोटे-छोटे वाक्य, कौतुक और खिलंदड़ापन उनकी भाषा में भीतर तक विन्यस्त है। बनारसीपन इन सबको एक नया रंग देता है ।
‘आहटें सुन रहा हूँ यादों की’ स्मृति-कथाओं की किताब है। इस पुस्तक में ‘याद हो कि न याद हो’ के पहले संस्करण के बाद प्रकाशित छोटे-बड़े 18 संस्मरण शामिल हैं। पुस्तक के पहले खंड के संस्मरण निजी जीवन के इर्द-गिर्द घूमते हैं। दूसरे खंड में काशीनाथ सिंह के निकट जनों–गुरु बच्चन सिंह, बड़े भाई नामवर जी के परम मित्र वकील साहेब उर्फ नागेंद्र सिंह, आलोचक-मित्र-संगठक प्रो. कमला प्रसाद, मित्र-कथाकार दूधनाथ सिंह, मित्र–भाषाविज्ञानी श्री राम अधार सिंह और कमउम्र मित्र सिने विशेषज्ञ श्री प्रह्लाद अग्रवाल पर केन्द्रित संस्मरण हैं।
काशीनाथ सिंह के इन संस्मरणों से गुजरते हुए सहज ही आभास होता है कि वास्तविक देश के सामानान्तर स्मृति एक देश है!
Lok Ka Prabhash
- Author Name:
Ramashankar Kushwaha
- Book Type:

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प्रभाष जोशी ने हिन्दी पत्रकारिता को नए मुक़ाम तक पहुँचाया। शब्द और कर्म की एकता के विश्वासी प्रभाष जोशी ने जन-सम्बद्ध पत्रकारिता के एक नए दौर की शुरुआत की। उनके द्वारा सम्पादित 'जनसत्ता' अपने समय की जन-संवेदना का नायाब दस्तावेज़ है।
हिन्दी पत्रकारिता के विकास में ऐतिहासिक भूमिका निभानेवाले प्रभाष जोशी के जीवन की यह कहानी उनके समय की भी कहानी है, क्योंकि उनके लिखने और जीने की एक ही मंज़िल थी—लोक-सम्बद्धता।
इस लोक-सम्बद्ध व्यक्तित्व की जीवन-गाथा के अनेक पड़ाव हैं। इस जीवनी में आपको उन पड़ावों का विस्तृत और प्रामाणिक विवरण मिलेगा। प्रभाष जी के व्यक्तिगत जीवन के अनजाने प्रसंगों से आप रू-ब-रू होंगे। उनके सार्वजनिक जीवन के निर्भय सोच के सन्दर्भों से आप अवगत होंगे।
हिन्दी के जीवनी साहित्य की परम्परा में प्रभाष जी की यह शोधपरक जीवनी एक नई पहल है। प्रभाष जी की लोक-सम्बद्ध जीवन-दृष्टि को समझने और उसका विस्तार करने में यह जीवनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
Swaminathan : Ek Jeewani
- Author Name:
Jitendra Srivastava
- Book Type:

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अप्रतिम व्यक्ति और चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन को यह दुनिया छोड़े हुए कोई पच्चीस वर्ष होने को आए, पर दुनिया ने उनको नहीं छोड़ा है। छोड़ेगी भी नहीं। उनका व्यक्तित्व और कामकाज है ही ऐसा कि जब-जब भारतीय कला की बात होगी, बीसवीं शती की कला की विशेष रूप से, वे याद किए जाएँगे। स्वामीनाथन ने बड़ी गम्भीरता से, साहस से, कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ी है, इस बात की कि कला-रचना के साथ-साथ, कला-चिन्तन, कला-विमर्श, बेहद महत्त्व के हैं, कि बिना प्रश्नांकनों, विचारों, और बहसों के हम वह रचनात्मक वातावरण बना ही नहीं पाएँगे, जिसमें 'रचना' मात्र के प्रति उत्तेजना हो, अनुसन्धानी भाव हो, और हो वह दृष्टि जो बहुत कुछ को सम्यक् ढंग से परख सकती हो। एक कलाकार और कला चिन्तक तथा अत्यन्त जि़न्दादिल, सरस, व्यंग्य-विनोदी, हँसी-ठट्ठा करनेवाले, सबके बीच जानेवाले, सबके साथ रहनेवाले, सबका साथ चाहनेवाले व्यक्ति की जीवनी लिखने में, स्वामी के इन दोनों रूपों को साधने में, एक बड़ी चुनौती पेश आनी ही थी—क्योंकि दोनों एक-दूसरे में गुँथे हुए भी तो हैं। और उन्हें आसपास रखना ही था—दोनों रूपों को। तो, यथासमय, यथास्थान, उनके इन दोनों रूपों को विन्यस्त किया गया है। और उनके जीवन के ज़रूरी तथ्यों के साथ, उनके विचारों के फलित-प्रतिफलित होने की कथा भी कही गई है। यह स्वामी की पहली जीवनी तो है ही, उन पर आनेवाली पहली पुस्तक भी है। जीवनी को किसी क्रमागत रूप में नहीं लिखा गया—वैसा करना असम्भव भी था, स्वामी के अपने व्यक्तित्व और अपनी ही जीवन शैली के कारण—वे शायद उस रूप में जीवनी का लिखा जाना पसन्द भी न करते। सो, एक 'औपन्यासिक' ढंग से, कथा कहनेवाले अन्दाज़ में, उनके जीवन की बहुत-सी बातें कभी सीधे, कभी 'फ़्लैश बैक' में, कभी जो जहाँ उचित लगे जगह बना ले, वाली शैली में दर्ज हुई हैं। उम्मीद है, जीवनी सुधी पाठकों को रुचिकर लगेगी, और उपयोगी भी।
—प्रस्तावना से
''जगदीश स्वामीनाथन मूलत: तमिलभाषी होते हुए भी उत्तर भारत में पले-बसे एक मूर्धन्य भारतीय चित्रकार थे जिन्होंने चित्र बनाए, हिन्दी में कविताएँ लिखीं, अंग्रेज़ी में कलालोचना लिखी। वे अपने समय के लगभग सबसे प्रश्नवाची कला-चिन्तक थे जिन्होंने कला के बारे में मूल प्रश्न उठाए और सामयिक प्रश्न भी। भारत भवन में उन्होंने 'रूपंकर' कला-संग्रहालय की स्थापना और संचालन किया और समकालीनता को रेडिकल ढंग से पुनर्भाषित किया जिसमें सिर्फ़ शहराती ही समकालीन नहीं थे बल्कि लोक और आदिवासी कलाकार भी उतने ही समकालीन ठहराए गए। स्वामीनाथन का जीवन और कला एक-दूसरे से इस क़दर मिले-जुले थे कि एक को दूसरे के बिना समझा नहीं जा सकता। कवि-कलाप्रेमी प्रयाग शुक्ल ने रज़ा फ़ाउंडेशन के एक विशेष प्रोजेक्ट के अन्तर्गत यह जीवनी लिखी है जिसे प्रस्तुत करते हुए हमें प्रसन्नता है।"
—अशोक वाजपेयी
Raag-Anurag
- Author Name:
Ravishankar
- Book Type:

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रज़ा फ़ाउण्डेशन ने हिन्दी लेखकों और कलाकारों की सुशोधित विस्तृत जीवनियाँ लिखाने और प्रकाशित कराने का प्रोजेक्ट बनाया है और उस पर काम चल रहा है : कई जीवनियाँ इस क्रम में प्रकाशित हो गयी हैं। भारत के मूर्धन्य कलाकारों में से बहुत कम ने अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं। इनमें चित्रकार, संगीतकार, रंगकर्मी, नर्तक आदि शामिल हैं। पुस्तकमाला में ऐसी आत्मकथाओं को हम हिन्दी अनुवाद में प्रस्तुत करने का प्रयत्न करते रहे हैं। पण्डित रविशंकर की यह अधूरी आत्मकथा, बाङ्ला से अनूदित, प्रस्तुत करते हमें प्रसन्नता है। एक महान् संगीतकार होने के साथ-साथ उनका बहुत बड़ा योगदान भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व संगीत में मान्यता और उचित स्थान दिलाने का बेहद सर्जनात्मक प्रयत्न रहा है।
—अशोक वाजपेयी
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