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Ve Bhi Din The

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‘वे भी दिन थे’ शिवनाथ जी की आत्मकथात्मक डोगरी पुस्तक 'ओह बी दिन हे' का अनुवाद है। शिवनाथ बतौर व्यक्ति और लेखक, ऐसी शख़्सियत थे, जिनकी दृष्टि सूक्ष्म और सुदूर दोनों बिन्दुओं पर समान एकाग्रता से रहती थी। इस पुस्तक में उन्होंने 1950 में भारतीय डाक सेवा ज्वाइन करने के बाद से अपने संस्मरण, अनुवाद और विचार अंकित किए हैं। उनके विवरण की विशेषता यह है कि जहाँ-जहाँ वे रहे, उस शहर के वातावरण, साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों और महत्त्वपूर्ण स्थलों को उन्होंने गहरी नज़र से देखा, जिसका वर्णन भी वे इस पुस्तक में देते हैं। साथ ही डाक विभाग की कार्य-प्रक्रिया, संचार के इस देश-व्यापी संजाल की दिक़्क़तों और सम्भावनाओं की भी जानकारी देते चलते हैं। वे जिज्ञासु, ज्ञान-पिपासु और सेवा-भावी व्यक्ति थे। कर्तव्यनिष्ठा को उनके व्यक्तित्व से एक नया ही अर्थ मिलता था, जिसकी झलक हमें इस पुस्तक में भी मिलती है। कुछ स्थानों और व्यक्तियों का विवरण देखते ही बनता है। पुस्तक में डैनिश साधु शून्यता से उनकी पहली मुलाक़ात का वर्णन भी है। उनकी मैत्री 1952 से शुरू होकर 1982 तक चली। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने उनके पत्रों पर केन्द्रित एक पुस्तक 'शून्यता' का सृजन भी किया। डोगरी को स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दिलाने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई, इसका ज़िक्र भी उन्होंने विस्तार से किया है।   “हिन्दी में आत्मकथाएँ और जीवनियाँ कम ही हैं। लेखकों की आत्मकथाएँ तो और भी बहुत कम, लगभग गिनती की। शिवनाथ डोगरी के एक बड़े लेखक होने के अलावा सिविल सेवक भी थे। उनकी यह आत्मकथा उनके निरभिमानी व्यक्तित्व, लम्बे सार्वजनिक जीवन, उसके उतार-चढ़ावों और लेखकीय संघर्ष की, बिना किसी नाटकीयता के, तथा कथा है। हमें उसे प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता है।" —अशोक वाजपेयी

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About the Book

‘वे भी दिन थे’ शिवनाथ जी की आत्मकथात्मक डोगरी पुस्तक 'ओह बी दिन हे' का अनुवाद है। शिवनाथ बतौर व्यक्ति और लेखक, ऐसी शख़्सियत थे, जिनकी दृष्टि सूक्ष्म और सुदूर दोनों बिन्दुओं पर समान एकाग्रता से रहती थी। इस पुस्तक में उन्होंने 1950 में भारतीय डाक सेवा ज्वाइन करने के बाद से अपने संस्मरण, अनुवाद और विचार अंकित किए हैं। उनके विवरण की विशेषता यह है कि जहाँ-जहाँ वे रहे, उस शहर के वातावरण, साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों और महत्त्वपूर्ण स्थलों को उन्होंने गहरी नज़र से देखा, जिसका वर्णन भी वे इस पुस्तक में देते हैं। साथ ही डाक विभाग की कार्य-प्रक्रिया, संचार के इस देश-व्यापी संजाल की दिक़्क़तों और सम्भावनाओं की भी जानकारी देते चलते हैं। वे जिज्ञासु, ज्ञान-पिपासु और सेवा-भावी व्यक्ति थे। कर्तव्यनिष्ठा को उनके व्यक्तित्व से एक नया ही अर्थ मिलता था, जिसकी झलक हमें इस पुस्तक में भी मिलती है। कुछ स्थानों और व्यक्तियों का विवरण देखते ही बनता है।

पुस्तक में डैनिश साधु शून्यता से उनकी पहली मुलाक़ात का वर्णन भी है। उनकी मैत्री 1952 से शुरू होकर 1982 तक चली। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने उनके पत्रों पर केन्द्रित एक पुस्तक 'शून्यता' का सृजन भी किया। डोगरी को स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दिलाने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई, इसका ज़िक्र भी उन्होंने विस्तार से किया है।

 

“हिन्दी में आत्मकथाएँ और जीवनियाँ कम ही हैं। लेखकों की आत्मकथाएँ तो और भी बहुत कम, लगभग गिनती की। शिवनाथ डोगरी के एक बड़े लेखक होने के अलावा सिविल सेवक भी थे। उनकी यह आत्मकथा उनके निरभिमानी व्यक्तित्व, लम्बे सार्वजनिक जीवन, उसके उतार-चढ़ावों और लेखकीय संघर्ष की, बिना किसी नाटकीयता के, तथा कथा है। हमें उसे प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता है।"

—अशोक वाजपेयी

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2019
Weight
1000 grams
ISBN-13
9789388753050
Pages
135
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
15 × 220 cm
Language
Hindi

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