Cyber Encounters
(0)
Author:
Ashok Kumar, IPS::O.P. ManochaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
300
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जैसे-जैसे तकनीक विकसित हुई, वैसे-वैसे अपराध ने भी तरक्की कर ली। डिजिटल तकनीकें अपने साथ ऑनलाइन किए जानेवाले अनेक अपराधों को लेकर आई हैं, जिनमें भोले-भाले लोगों से करोड़ों रुपए ठगे जाते हैं, नकली वेबसाइटों पर झूठे विज्ञापनों का झाँसा दिया जाता है, पेमेंट गेटवे के माध्यम से संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने के लिए उकसाया जाता है, और उन ऐप्स को डाउनलोड कराया जाता है, जिससे दूर बैठे अपराधी उनके उपकरण तक अपनी पहुँच बना लेते हैं। क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी से लेकर फिशिंग तक की यह सूची अंतहीन है। ‘साइबर एनकाउंटर्स’ पुस्तक साइबर अपराध की गहराइयों में जाकर बारह रोचक कहानियाँ आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं। उत्तराखंड पुलिस के डीजीपी अशोक कुमार राज्य में साइबर अपराध के विरुद्ध योजनाबद्ध लड़ाई लडऩे का अनुभव रखते हैं, और ओ.पी. मनोचा डी.आर.डी.ओ. के पूर्व वैज्ञानिक हैं। दोनों हर कहानी में एक खास किस्म के साइबर अपराध के बारे में बताते हैं, जो एक सच्ची घटना पर आधारित होती है। अपराध, उसकी जाँच और अपराधियों की गिरफ्तारी के बारे में जानकारी से भरपूर, आँखें खोल देनेवाली यह पुस्तक सभी को अवश्य पढऩी चाहिए।
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जैसे-जैसे तकनीक विकसित हुई, वैसे-वैसे अपराध ने भी तरक्की कर ली। डिजिटल तकनीकें अपने साथ ऑनलाइन किए जानेवाले अनेक अपराधों को लेकर आई हैं, जिनमें भोले-भाले लोगों से करोड़ों रुपए ठगे जाते हैं, नकली वेबसाइटों पर झूठे विज्ञापनों का झाँसा दिया जाता है, पेमेंट गेटवे के माध्यम से संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने के लिए उकसाया जाता है, और उन ऐप्स को डाउनलोड कराया जाता है, जिससे दूर बैठे अपराधी उनके उपकरण तक अपनी पहुँच बना लेते हैं। क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी से लेकर फिशिंग तक की यह सूची अंतहीन है।
‘साइबर एनकाउंटर्स’ पुस्तक साइबर अपराध की गहराइयों में जाकर बारह रोचक कहानियाँ आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं। उत्तराखंड पुलिस के डीजीपी अशोक कुमार राज्य में साइबर अपराध के विरुद्ध योजनाबद्ध लड़ाई लडऩे का अनुभव रखते हैं, और ओ.पी. मनोचा डी.आर.डी.ओ. के पूर्व वैज्ञानिक हैं। दोनों हर कहानी में एक खास किस्म के साइबर अपराध के बारे में बताते हैं, जो एक सच्ची घटना पर आधारित होती है।
अपराध, उसकी जाँच और अपराधियों की गिरफ्तारी के बारे में जानकारी से भरपूर, आँखें खोल देनेवाली यह पुस्तक सभी को अवश्य पढऩी चाहिए।
Book Details
-
ISBN9789390372409
-
Pages216
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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"मेरे मानस पर अपने जीवनसाथी का ऐसा चित्र उभरता, जो देश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे सूरमाओं में सबसे पहली पंक्ति का तेजपुंज हो।...स्वदेशी आग्रह का माहौल कुछ ऐसा बना कि प्रत्येक नागरिक विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर देशभक्तों की पंक्ति में आ खड़ा होने लगा। इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने प्रतिज्ञा की कि न केवल विदेशी वस्त्र अपितु अन्य कोई विदेशी वस्तु भी प्रयोग में नहीं लाऊँगी। अंग्रेज अधिकारियों के यहाँ जाना-आना रहता था, मैंने निर्णय लिया कि अब उनसे कोई संबंध नहीं रखूँगी। अतः उनके क्लबों, चाय-पार्टियों या भोज-समारोहों में जाना मैं टालने लगी। सफेद घोड़े पर एक लड़का सवार था और काले घोड़े पर एक लड़की। प्राणिउद्यान के एक नौकर ने पूछने पर बताया कि वे जिवाजीराव महाराज और उनकी बहन कमलाराजे थे। अर्थात् स्वयं महाराज सिंधिया अपनी बहन के साथ थे। हम लोगों द्वारा देखे गए उस प्रासाद, किले, उद्यान और उस शेर के भी स्वामी। नानीजी के मानस पर वह दृश्य बिजली की तरह कौंध गया। सहसा उनके मुँह से निकला, ‘‘हमारी नानी (मैं) की उनके साथ कितनी सुंदर जोड़ी लगेगी!’’ इतना सुनते ही मामा और सभी हँस पड़े। किसी के मुँह से निकला, ‘‘कल्पना की उड़ान ऊँची है।’’ मुझे लगा, राजनीतिक जीवन में रहकर सिद्धांतों एवं मूल्यों के संवर्धन के लिए जूझते रहना ही अपना कर्तव्य है। अतः मेरे मन में यह बोध जागा कि सम विचारवाले लोगों के साथ कार्य करना अधिक परिणामकारी होगा। ऐसे लोगों का दल, जिन्हें भ्रष्टाचार की लत नहीं लगी थी, मुझे अपना प्रतीत होने लगा।...वैचारिक दृष्टि से मुझे जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी की रीति-नीति अच्छी लगती थी, अतः दोनों ही दल मुझे करीबी लगते थे। किंतु मैं यह निर्णय नहीं कर पा रही थी कि दल की सदस्य बनूँ। अंततः मैंने दोनों ही दलों के टिकट पर चुनाव लड़ने का निश्चय कर लिया। मध्य प्रदेश विधानसभा के करेरा निर्वाचन क्षेत्र से मैं जनसंघ की प्रत्याशी बन गई। —इसी पुस्तक से तिहाड़ कारागृह नहीं है, यह धरती का नरक-कुंड है। और इस नरक-कुंड में वे लोग धकेल दिए गए थे, जिनके तपोबल से इंदिराजी का सिंहासन डिग रहा था।...तिहाड़ जेल में स्थान-स्थान पर गंदगी का ढेर जमा रहता। दुर्गंधयुक्त वायु में घुटन महसूस होती। भोजन के समय थाली पर से भिनभिनाती मक्खियों को लगातार दूसरे हाथ से उड़ाना पड़ता। कानों में कीट-पतंगों की आवाजें गूँजती रहतीं। अँधेरे में जुगनू का प्रकाश और कानों में झींगुर की झनकार। जीना दूभर था। इन सबके बावजूद हम चैन से थे। किंतु खुली हवा में साँस लेनेवाली इंदिराजी क्या चैन से थीं! उन्हें तो दिन में भी तारे नजर आ रहे थे। अयोध्या ईंट और पत्थर की बनी नगरी नहीं है। यह भारत की आत्मा और राष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक है। इसीलिए जब रथयात्रा निकली तो हिंदू और मुसलमान दोनों इसमें समान रूप से शरीक हुए। राम और रहीम संग-संग चलते रहे। जनसभाओं में भी मुसलमान शिरकत करते रहे। न राग, न द्वेष; एक प्राण दो देह जैसी स्थिति थी। इस राष्ट्र-मिलन से उन मुट्ठी भर लोगों में खलबली मच गई, जो राजनीति की अँगीठी पर स्वार्थ की रोटियाँ सेंका करते थे। बाबरी ढाँचा टूटने का उनका भय और विरोध केवल इसी मात्र के लिए था। एक छोटे परिवार के दायरे से निकलकर विराट् में समाहित होने का सुख, वसुधैव कुटुंबकम् के आदर्श को जीने का प्रतीक था वह आयोजन। मुझसे छोटे से बने सुंदर, किंतु अति विशिष्ट मंदिर की सीढि़यों पर पैर का अँगूठा लगाने के लिए कहा गया। पर करती भी क्या! मजबूरी थी। उस मंदिर में एक ओर मेरे पति स्वर्गीय महाराज की मूर्ति रखी थी तो दूसरी ओर गुरुजी की। बीच में थे मेरे इष्टदेव श्रीकृष्ण। मैंने पाँव का अँगूठा नहीं, अपना माथा उस मंदिर से लगा दिया। इस प्रकार परदादी बनने का सुख मैंने संपूर्ण संघ परिवार के साथ जीया। ईश्वर से संपूर्ण भारतीय समाज के शुभ की कामना करती हूँ। —इसी पुस्तक से "
Diyasalai
- Author Name:
Kailash Satyarthi
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‘दियासलाई’ नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित और भारत समेत पूरे विश्व में बच्चों के प्रति संवेदना को एक आवश्यक लोकतांत्रिक मूल्य के रूप में स्थापित करनेवाले कैलाश सत्यार्थी की आत्मकथा है। अपनी इस आत्मकथा में वे हमें अपने संघर्षपूर्ण जीवन की कथा भी बताते हैं और अपने उन प्रयासों की भी जानकारी देते हैं जो उन्होंने भारत और विश्व-भर के बच्चों की मुक्ति और कल्याण के लिए किए। वे ही थे जिन्हें ‘ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर’ जैसे महा-आन्दोलन का विचार आया और जिसके तहत उन्होंने दुनिया के 186 देशों की यात्रा करते हुए लाखों बच्चों से सम्पर्क किया और उन्हें आजादी के विचार से अवगत कराया।शिक्षा के लिए भी उन्होंने विश्व-स्तर पर कैम्पेन चलाया। अपने मानवीय और सामाजिक कार्यों के लिए उन्हें अनेकों बार पुरस्कृत भी किया गया लेकिन अपना वास्तविक पुरस्कार वे उन बच्चों की मुस्कराहट को मानते हैं, जो उन्होंने हर ओर से निराश और समाज के क्षुद्र स्वार्थों की भेंट चढ़े बच्चों को दी। सहज और सम्प्रेषणीय भाषा में लिखी हुई उनकी यह आत्मकथा हमें प्रेरित भी करती है, संवेदनशील भी बनाती है और उन भीषण तथ्यों से भी परिचित कराती है जाे हमारे सामने दुनिया के विराट नक़्शे पर बिलखते बच्चों का पता देते हैं।
Sirhane Gramshi
- Author Name:
Arun Maheshwari
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फासिस्टों के नर-मेघी यातना और मृत्यु शिविरों से लेकर साइबेरिया के निर्वासन शिविरों और अमेरिकी जेल-औद्योगिक गठजोड़ वाले क़ैदखानों तक की कमोबेश एक ही कहानी है। नागरिक स्वतंत्रता की प्रमुख अमेरिकी कार्यकर्ता एंजिला डेविस की शब्दावली में—आज भी जारी दास प्रथा की कहानी। सुधारगृह कहे जानेवाले भारतीय जेल इनसे शायद ही अलग हैं। इटली में फासिस्टों के जेल में बीस साल के लिए सज़ायाफ़्ता मार्क्सवादी विचारक और कम्युनिस्ट नेता अन्तोनिओ ग्राम्शी ने सज़ा के दस साल भी पूरे नहीं किए कि उनके शरीर ने जवाब दे दिया। मृत्यु के एक महीना पहले उन्हें रिहा किया गया था। लेकिन जेल में बिताए इन चंद सालों के आरोपित एकान्त का उन्होंने इटली के इतिहास, उसकी संस्कृति, मार्क्सवादी दर्शन तथा कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में गहरे विवेचन के लिए जैसा इस्तेमाल किया, उसने उनकी जेल डायरी को दुनिया के श्रेष्ठतम जेल-लेखन के समकक्ष रख दिया। ख़ास तौर पर कम्युनिस्ट पार्टियों में शामिल लोगों के लिए तो इसने जैसे सोच-विचार के एक पूरे नए क्षेत्र को खोल दिया। ग्राम्शी का यह पूरा लेखन कम्युनिस्टों को, किसी भी मार्क्सवादी के लिए अपेक्षित, तमाम वैचारिक जड़ताओं से मानसिक तौर पर उन्मुक्त करने का एक चुनौती भरा लेखन है। एक ऐसे विचारक के साथ जेल में बिताए चंद दिनों की यह डायरी किसी भी पाठक के लिए, ख़ास तौर पर राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए बहुत उपयोगी अनुभव साबित हो सकती है। इसकी पारदर्शी भाषा, अन्त:स्थित सूक्ष्म वेदना और स्वच्छन्द विचार-प्रवाह ने इस पुस्तक को अपने प्रकार की एक अनूठी कृति का रूप दिया है।
Ghumakkad Swami
- Author Name:
Rahul Sankrityayan
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‘घुमक्कड़ स्वामी’ बाबा हरिशरणानन्द का जीवन-वृत्त है जिसे राहुल सांकृत्यायन ने जीवनी के साथ-साथ यात्रा-वृत्तान्त का रूप देते हुए लिखा है। स्वामी हरिशरणानन्द का जन्म 1889 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ जो कानपुर में व्यापार करता था। मात्र पन्द्रह वर्ष की उम्र में उन्होंने कुछ साधुओं के साथ गृह-त्याग कर दिया जो एक अथक, खोजी और जिज्ञासु यात्रा का आरम्भ था। योग-साधना से शुरू होकर उनका यह सफ़र स्वतंत्रता-आन्दोलन में भागीदारी से होते हुए आयुर्वेद में शोध तक चलता रहा, फिर 1941 में बावन वर्ष की आयु में वे गृहस्थ हुए। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी स्वामी हरिशरणानन्द ने हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों की यात्राएँ भी कीं। वे एक विज्ञान-प्रेमी और दृष्टिवान सन्त थे। रूढ़िवादी कर्मकांड और पंडों आदि के पाखंड को उजागर करते हुए उन्होंने ज्ञान के मार्ग का अवगाहन किया। इस प्रसिद्ध पुस्तक में राहुल जी उनकी जीवन-यात्रा को उस समय के नगरों, व्यवसायों, आध्यात्मिक परम्पराओं, साधु-सन्तों की जीवनचर्या, आश्रमों-मठों के वातावरण और आयुर्वेद की गहरी जानकारियाँ साझा करते हुए लिखते हैं। 19वीं-20वीं सदी का भारत इसमें अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहलुओं के साथ साक्षात दिखता है।
Mohan Rakesh : Adhoore Rishton Ki Poori Dastan
- Author Name:
Jaidev Taneja
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मोहन राकेश अपने आत्मानुभव के आधार पर बिलकुल सहज, सरल और स्वाभाविक शब्दों में केवल इतना ही कहते हैं, ‘आओ, प्यार करें, बिना ये जाने कि प्यार क्या है?’ उनके लिए प्यार सीखने की नहीं, करने की कला है। राकेश के प्यार का दायरा केवल व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक मानवीय सम्बन्धों तक ही सीमित नहीं है। उनका प्यार पशु-पक्षियों, पहाड़ों, नदियों, झरनों, समुद्र तटों, पेड़-पौधों, जंगलों, चाँद-सितारों, सृष्टि और प्रकृति के लघु-विराट् और अनन्त रूपों तक फैला है।
इस पुस्तक का विषय राकेश के जीवन में अनेक बार आया प्यार और उस प्यार की आलम्बन रही स्त्रियों से उनके आधे-अधूरे रिश्तों के ज्ञात इकतरफा सच को, अनेक स्रोतों एवं सूत्रों से प्राप्त दूसरी तरफ के अल्पज्ञात सच के बरक्स रखकर, अपेक्षाकृत पूरे सच की तलाश पर केन्द्रित है।
अपनी भावनात्मक ज़रूरतों और ‘घर’ की तलाश में राकेश आजीवन छटपटाते-भागते रहे। कई स्त्रियाँ उनके जीवन में आईं, लेकिन फिर भी उनके जीवन का वह मूल प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है कि वह स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के मामले में कभी भी पूरी तरह सुखी और सन्तुष्ट क्यों नहीं हो पाए?
अधूरे रिश्तों का यह सवाल राकेश के सन्दर्भ में अपेक्षाकृत अधिक जटिल, गम्भीर और महत्त्वपूर्ण है, खासतौर से तब जब हम यह जानते हैं कि इसका वास्तविक सम्बन्ध राकेश के अपने अन्तर्विराेधों तथा उनकी शर्तों एवं लगभग असम्भव अपेक्षाओं से है।
‘किसी विशिष्ट स्त्री’ की तलाश ही शायद वह मूल कारण रहा होगा जिसके लिए मोहन राकेश को अपने जीवन में कई स्त्रियों से होकर गुज़रना पड़ा।
इस पुस्तक में आत्मकथा, जीवनी, संस्मरण, साक्षात्कार, इतिहास, आत्मालोचना और किसी हद तक नाटक एवं कथा, आदि विधाओं के भी कई तत्त्व समाहित हैं। इन्हीं के सहारे यह पुस्तक आधुनिक हिन्दी साहित्य और रंगकर्म के सम्मोहक तथा विवादास्पद मिथक पुरुष के व्यक्तित्व के रहस्यमय नेपथ्य-लोक की अन्तर्यात्रा करने का प्रयास करती है।
Jo Aage hain
- Author Name:
Jabir Husain
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दियरा की बलुआही ज़मीन हो या टाल की रेतीली धरती, दक्षिण का सपाट, मैदानी इलाक़ा हो या उत्तर की नदियाई भूमि, बिहार के गाँव का अतीत जाने बग़ैर कैसे कोई बिहार के वर्तमान को समझने का दावा कर सकता है!
न जाने कितने दशक बिहार की मेहनतकश आबादियाँ अपने अधिकारों से वंचित रही हैं। थोड़े-से असरदार लोगों ने सत्ता और समाज को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर रखा है। हाशिए पर पड़ी कमज़ोर इंसानी ज़िन्दगियाँ काली ताक़तों से मुक़ाबला करने की हिम्मत जुटाती रही हैं।
बिहार के गाँव की इस तल्ख़ सच्चाई से रू-ब-रू हुए बिना कोई इसकी तक़दीर लिखने की कोशिश करे, तो यह कोशिश कैसे कामयाब होगी!
हाल के वर्षों में, बिहार के गाँव में बदलाव की जो बयार चली है, उसे शीत-भवनों में बैठकर नहीं आँका जा सकता। शीत-भवनों में तैयार किए गए गणित ज़मीन से कटे होने पर, अख़बार की सुर्खियों में या टेलीविज़न के पर्दे पर थोड़ी देर के लिए ज़रूर जगह पा सकते हैं, मगर ये गणित सच्चाई का रूप नहीं ले सकते।
सच्चाई का रूप तो ये तभी लेंगे, जब इसके गणितकार कमज़ोर तबक़ों की हक़मारी का अपना सदियों पुराना राग अलापना छोड़ दें।
जाबिर हुसेन ने जो भी लिखा है, अपने संघर्षपूर्ण सामाजिक सरोकारों की आग में तपकर लिखा है।
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