Meena Bazar
Author:
Saadat Hasan MantoPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
‘मीना बाज़ार’ उर्दू के सुप्रसिद्ध अफ़सानानिगार सआदत हसन मंटो की बहुचर्चित संस्मरण-कृति है, जिसमें उन्होंने फ़िल्म-जगत की कुछ मशहूर हस्तियों का पारदर्शी चित्रण किया है। ऐसा करते हुए उनका लहज़ा आत्मीय होकर भी बेलौस है। इसमें उनका अपना स्वभाव और नज़रिया तो है ही, वे सामाजिक सच्चाइयाँ भी हैं, जब फ़िल्म-कलाकारों को आज के जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं थी। मंटो ने यहाँ नर्गिस, नसीम, अशोक कुमार, कुलदीप कौर, श्याम, सितारा, बी.एच. देसाई और इस्मत चुगताई जैसी हस्तियों की विशेष रूप से चर्चा की है। इन हस्तियों को वे एक दोस्त की हैसियत से तो देखते ही हैं, कलाकार के नाते भी देखते हैं और उनके निजी तथा व्यावसायिक जीवन को एक ख़ास अदाकारी के साथ हमारे सामने खोलते हैं।</p>
<p>मंटो हिन्दी और उर्दू, दोनों ही भाषाओं की अदबी दुनिया के चहेते रचनाकार हैं। उनके जैसी तरल मानवीय संवेदना और जीवनानुभवों की विविधता बहुत कम लेखकों में दिखाई पड़ती है। निस्सन्देह, ‘मीना बाज़ार’ उनकी उसी संवेदना और रचनात्मक विविधता का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
ISBN: 9788126703197
Pages: 123
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: यह अपने देश के लिए फाँसी का फन्दा चूम लेने वाले एक क्रान्तिकारी की आत्मकथा है। आप इसे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के एक प्रामाणिक दस्तावेज की तरह भी पढ़ सकते हैं। बिस्मिल को काकोरी कांड में फाँसी की सजा मिली थी। यह आत्मकथा उन्होंने गोरखपुर जेल की कालकोठरी में बैठकर लिखी थी। क्रान्तिकारी आन्दोलन में कूदने से पहले भी उन्होंने कठिन जीवन जिया था और क्रान्तिकारी जीवन अपनाने के बाद तो संघर्ष ही उनका जीवन हो गया था। इसकी स्पष्ट झलक इस पुस्तक में दिखाई देती है। बिस्मिल ने इसमें अपने ऊपर पड़े आर्य समाजी प्रभावों और उसकी प्रेरणा से आर्य समाज में किए गए अपने कार्यों के बारे में भी बताया है। कांग्रेस के प्रति आकर्षण और आखिरकार क्रान्तिकारी विचारों को अपने अनुकूल पाकर उस राह पर आगे बढ़ने का संक्षेप में ही लेकिन मानीखेज विवरण दिया है। पुस्तक में 1918-19 के मैनपुरी मामले का भी हवाला है जिसमें बिस्मिल भी शामिल थे। उत्तर भारत में यह एक महत्त्वपूर्ण क्रान्तिकारी कार्रवाई थी जिसमें बंगाल के क्रान्तिकारियों की भूमिका नहीं थी। इस मामले में काफी समय तक भूमिगत रहने के बाद बिस्मिल जब बाहर आए तब हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन की स्थापना में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। इसके बाद ही काकोरी कांड हुआ, जिसमें उन्हें फाँसी की सजा मिली। ये सभी प्रसंग इस पुस्तक में वर्णित हैं। इससे जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है, वह एक क्रान्तिकारी का विकास ही नहीं है, बल्कि उसके विचारों का विकास भी है, जिसमें वह अपने संघर्ष को जन-आन्दोलन बनते देखना चाहता है और उसके लिए साहस के साथ-साथ साहित्य की भूमिका को भी महत्त्वपूर्ण मानता है। आश्चर्य नहीं कि बिस्मिल ने क्रान्तिकारी कार्रवाइयों के साथ-साथ कलम चलाना भी आजीवन जारी रखा। यह आत्मकथा तो उन्होंने अपनी फाँसी के दो दिन पहले पूरी की जो अपने देश से प्यार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए पठनीय और संग्रहणीय है।
Main Sangh Mein aur Mujhmein Sangh
- Author Name:
M.G. Vaidya
- Book Type:

- Description: मा.गो. वैद्य अथवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, परिचय की आवश्यकता से दूर यह ऐसे नाम हैं, जो समाज और मीडिया में सहज ही आकर्षण की, जिज्ञासा की लहर उठाते हैं। ऐसे में इस पुस्तक के अध्यायों से गुजरना आकर्षण की दो सरिताओं में एक साथ डुबकी लगाने जैसा रोमांचक, यादगार अनुभव है। इस पुस्तक में वैद्य कुल के इतिहास, भूगोल, फैलाव आदि का तो पता चलता ही है, मा.गो. वैद्य के व्यक्तिगत जीवन का भी निकट से परिचय मिलता है। निर्णय के कठिन क्षण और असमंजस से बाहर निकलने की राह...व्यक्ति, संगठन और सोच के समन्वय को सामाजिक परिघटनाओं की सच्ची झाँकियों में पिरोकर पाठक के सामने रखा गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीज भाव का साक्षात्कार पुस्तक में हर जगह दिता है। ऐसा भाव, जिससे जुड़ने के बाद ‘मैं’, मैं नहीं रहता...व्यक्ति के स्व, उसके परिवार, समाज और राष्ट्र के दायरों को फलाँगती, किंतु साथ ही उनकी एकात्मकता का बोध कराती पुस्तक एक व्यापक दृष्टिकोण और अनुभव का परिचय कराती है। ऐसा दृष्टिकोण, जिसमें समाज से प्राप्त तीखे-मीठे जमीनी अनुभव हैं और हर स्थिति में जिम्मेदारी का भाव भी। वैद्य उपनाम कहाँ खत्म होता है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहाँ जीवन में व्याप्त होता जाता है, आप पढ़ेंगे तो यह अंतर अनुभव ही नहीं होगा।
An Unsuitable Boy
- Author Name:
Karan Johar +1
- Book Type:

- Description: Karan Johar is synonymous with success, panache, quick wit, and outspokenness, which sometimes inadvertently creates controversy and makes headlines. KJo, as he is popularly called, has been a much-loved Bollywood film director, producer and actor. With his flagship Dharma Production, he has constantly challenged the norms, written and rewritten rules, and set trends. But who is the man behind the icon that we all know? Baring all for the first time in his autobiography, An Unsuitable Boy, KJo reminisces about his childhood, the influence of his Sindhi mother and Punjabi father, obsession with Bollywood, foray into films, friendships with Aditya Chopra, SRK and Kajol, his love life, the AIB Roast, and much more. In his trademark frank style, he talks about the ever-changing face of Indian cinema, challenges and learnings, as well as friendships and rivalries in the industry. Honest, heart-warming and insightful, An Unsuitable Boy is both the story of the life of an exceptional film-maker at the peak of his powers and of an equally extraordinary human being who shows you how to survive and succeed in life.
Sarvahara Saamant : D. P. Tripathi
- Author Name:
Raghavendra Dubey Bhaau
- Book Type:

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Description:
एक ऐसे व्यक्ति के बारे में लिखना, जो अपने जीवन काल में ही लीजेंड बन चुका हो, वास्तव में दुस्साहस ही कहलाएगा। लेकिन मुझे यह दुस्साहस करना ही था क्योंकि जिस व्यक्ति की शान में मैं ये शब्द कह रहा हूँ, आखिरकार उसी ने तो दुस्साहस करना सिखाया था। मैं जानता हूँ कि मेरे ही शब्द मुझसे छल करेंगे, जब मैं डी. पी. त्रिपाठी को शब्दों की श्रद्धांजलि दूँगा।
17 मार्च, 1983 को लन्दन के हाईगेट कब्रिस्तान में कार्ल मार्क्स की कब्र पर बोलते हुए उनके दोस्त फ्रेडरिक एंजिल्स ने कहा था, “तमाम पीड़ा और पीड़ादायकों की कटु आलोचनाओं को यूँ तो कार्ल मार्क्स अनदेखा ही करते थे। जवाब तभी देते थे जब अत्यन्त जरूरी हो जाए। लोगों का प्यार और उनसे मिलनेवाली प्रतिष्ठा के बीच उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। साइबेरिया से लेकर कैलिफोर्निया और यूरोप से लेकर अमेरिका तक में लोगों ने शोक मनाया। मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि उनकी जिन्दगी में उनके हजारों विरोधी थे लेकिन उनमें एक भी उनका व्यक्तिगत शत्रु नहीं था।” डी. पी. त्रिपाठी के जाने पर भी कुछ ऐसा ही हुआ था। डी. पी. मार्क्स नहीं थे लेकिन दोनों के बीच एक बात में तो साम्य अवश्य है कि डी. पी. त्रिपाठी के जीवन में भी कोई उनका शत्रु नहीं था। वे अजातशत्रु थे। उनके पास विभिन्न संगठनों और राजनीतिक दलों के साथ बेहतर रिश्ता बनाने और कायम रखने का हुनर तो था ही, अपनी प्रतिबद्धताओं और सरोकारों के प्रति हमेशा सचेत रहना भी उन्हें अलहदा दर्जे का अधिकारी बनाता है।
विचार और सरोकार को अपने जीवन में साकार करने वाला उनके जैसा विरले होते हैं। विचार और चिन्तन की उनकी उत्कंठा ने ‘थिंक इंडिया’ जैसे जर्नल को जन्म दिया। विचारों की स्वायत्तता का उनका आग्रह इतना प्रबल था कि जिस विचार से वे सर्वथा इत्तेफाक नहीं रखते थे या यूँ कहें कि जिस विचार के विरोधी होते थे, उस विचार को भी बहस के बीच में ले आने का प्रयत्न करते थे।
डी. पी. त्रिपाठी ने राजनीति को अपना ठिकाना तो जरूर बनाया, लेकिन उनका मन कविता में ही रचा रहा। यदि मैं कहूँ कि वे राजनीति की कविता थे, तो शायद गलत नहीं होगा। उनके विरोधी विचार के लोग भी उनकी इज्जत करते थे। सच कहें, तो वे इस युग के धरोहर थे, आज के सुकरात थे। जो भी उनके सम्पर्क में आया, उनसे मुहब्बत कर बैठा।
—कुमार नरेंद्र सिंह
Anasakt Aastik : Jainendra Kumar Ki Jeewani
- Author Name:
Jyotish Joshi
- Book Type:

- Description: जैनेन्द्र कुमार हिन्दी के केवल मूर्धन्य कथाकार ही नहीं है अपितु प्रखर राष्ट्रवादी चिन्तक-विचारक भी है। वे हिन्दी भाषा में सोचने-विचारने वाले अन्यतम व्यावहारिक भारतीय दार्शनिक भी हैं तो भारत सहित वैश्विक राजनीति पर गहरी दृष्टि रखनेवाले प्रबुद्ध राजनैतिक विशेषज्ञ भी। वे स्वाधीनता आन्दोलन के तपोनिष्ठ सत्याग्रही भी रहे जिन्होंने स्वाधीनता मिलने के बाद भी अपने समग्र जीवन और लेखन क्रो सत्याग्रह बनाया। उन्होंने जो लिखा और जिया वह हमेशा एक नई राह की खोज का करण बना। कहानी और उपन्यास को नई भाषा, शिल्प तथा अधुनातन प्रविधियों में ढालकर जैनेन्द्र ने उन विषयों को प्रमुखता दी, जिन पर विचार करने का साहस पहले न किया जा सका। इसमें प्रमुखता से वह स्त्री उभरी, जिसे सदियों से उत्पीड़ित किया जाता रहा है। अपने दर्शन में आत्म को प्रतिष्ठित करनेवाले, विचारों में भारतीय-राष्ट्र-राज्य को अधिकाधिक सर्वोदय में देखनेवाले तथा जीवन में एक गृहस्थ संन्यासी का आदर्श प्रस्तुत करनेवाले जैनेन्द्र कुमार का महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, विनोबा भावे, राधाकृष्णन, जयप्रकाश नारायण, इन्दिरा गाँधी आदि राष्ट्रीय नेताओं से सीधा संवाद था। पर यह संवाद राष्ट्रीय हितों के लिए था, निजी स्वार्थों के लिए नहीं। ऐसे जैनेन्द्र कुमार के विराट व्यक्तित्व को उनकी जीवनी ‘अनासक्त आस्तिक' में देखने और उनके क्रमिक विकास को परखने का एक बड़ा प्रयत्न है, जो निश्चय ही उन्हें नए सिरे से समझने में सहायक होगा। कहना न होगा कि जैनेन्द्र साहित्य के मर्मज्ञ आलोचक ज्योतिष जोशी द्वारा मनोयोग से लिखी गई यह जीवनी पठनीय तो है ही, संग्रहणीय भी है।
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