Thalchar
(0)
Author:
Kumar AmbujPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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'यह एक मारक क्षण है। इस बार अधिक सख़्त और बेधक निगाहों के साथ। मैं इसके सामने हूँ। इसके निशाने पर। यह क्षण एक निर्णायक फ़ैसला चाहता है। यह एक अपराजेय क्षण है। मेरे भीतर से ही निकला हुआ। शक्तिशाली और अबोधता से भरा। यह किसी उलझन में नहीं है। यह मैं हूँ जो इसे उलझन में डालने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन यह भुलावे में नहीं आ रहा है। 'जैसा मैं हूँ और जो मुझे होना चाहिए' को यह तेज़ धार से काटकर, दो टूक और दो भागों में कर देना चाहता है। यह क्रूर होते हुए भी आकर्षक है और अकाट्य भी। यह ख़ुद एक तर्क है, अपने आपमें एक औचित्य। एक स्वयंसिद्ध काया और विचार। इसका सम्मोहन ज़बर्दस्त है। जानता हूँ यह अवसाद नहीं है। निराशा नहीं है। खिन्नता तो क़तई नहीं। यह एक आदिम आकांक्षा है जो अब अपना आधिपत्य चाहती है। यह हरेक सर्जक में प्रसुप्त रहती है। जब वह जागती है तो पूरा जीवन माँगती है। अपना ही रक्त चाहती है।</p> <p>रचनाकार एक तरह की अस्वस्थता में, बुख़ार में और अपने रक्त में कैंसर की कोशिकाएँ लिए ही, सक्रिय और व्यथित रहने के लिए अभिशप्त है। जैसे वह तेज़ गति से मृत्यु की तरफ़ यात्रा कर रहा है लेकिन उसकी चाल में एक उफान है और शमित न हो सकनेवाला उद्वेग। अपने भीतर टाइम-बम को छिपाए हुए, जिसमें लगी घड़ी की टिक-टिक आवाज़ उसे सुनाई देती है लेकिन नहीं पता कि उसके पास कितना समय है। वह बस इतना जानता है कि उसका अन्त एक विस्फोट में होगा। इससे अधिक सांघातिक और क्या हो सकता है। यह पल मुझे साथ लेकर जीवन की किसी नई यात्रा पर ले जाने की ज़िद पर अड़ गया है। इसका बढ़ा हुआ हाथ मेरे सामने है।</p> <p>—इसी संग्रह से
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'यह एक मारक क्षण है। इस बार अधिक सख़्त और बेधक निगाहों के साथ। मैं इसके सामने हूँ। इसके निशाने पर। यह क्षण एक निर्णायक फ़ैसला चाहता है। यह एक अपराजेय क्षण है। मेरे भीतर से ही निकला हुआ। शक्तिशाली और अबोधता से भरा। यह किसी उलझन में नहीं है। यह मैं हूँ जो इसे उलझन में डालने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन यह भुलावे में नहीं आ रहा है। 'जैसा मैं हूँ और जो मुझे होना चाहिए' को यह तेज़ धार से काटकर, दो टूक और दो भागों में कर देना चाहता है। यह क्रूर होते हुए भी आकर्षक है और अकाट्य भी। यह ख़ुद एक तर्क है, अपने आपमें एक औचित्य। एक स्वयंसिद्ध काया और विचार। इसका सम्मोहन ज़बर्दस्त है। जानता हूँ यह अवसाद नहीं है। निराशा नहीं है। खिन्नता तो क़तई नहीं। यह एक आदिम आकांक्षा है जो अब अपना आधिपत्य चाहती है। यह हरेक सर्जक में प्रसुप्त रहती है। जब वह जागती है तो पूरा जीवन माँगती है। अपना ही रक्त चाहती है।</p>
<p>रचनाकार एक तरह की अस्वस्थता में, बुख़ार में और अपने रक्त में कैंसर की कोशिकाएँ लिए ही, सक्रिय और व्यथित रहने के लिए अभिशप्त है। जैसे वह तेज़ गति से मृत्यु की तरफ़ यात्रा कर रहा है लेकिन उसकी चाल में एक उफान है और शमित न हो सकनेवाला उद्वेग। अपने भीतर टाइम-बम को छिपाए हुए, जिसमें लगी घड़ी की टिक-टिक आवाज़ उसे सुनाई देती है लेकिन नहीं पता कि उसके पास कितना समय है। वह बस इतना जानता है कि उसका अन्त एक विस्फोट में होगा। इससे अधिक सांघातिक और क्या हो सकता है। यह पल मुझे साथ लेकर जीवन की किसी नई यात्रा पर ले जाने की ज़िद पर अड़ गया है। इसका बढ़ा हुआ हाथ मेरे सामने है।</p>
<p>—इसी संग्रह से
Book Details
-
ISBN9788183618250
-
Pages164
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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नामवर सिंह अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका बोला-बताया अब भी ऐसा बहुत कुछ है जो सामने आना बाकी है। लम्बे समय तक उन्होंने व्यवस्थित ढंग से कुछ नहीं लिखा था; व्याख्यानों और वक्तव्यों के रूप में ही उन्होंने आलोचना के नए-नए पैमाने तोड़े और बनाए। युवाओं, वरिष्ठों, छात्रों-पत्रकारों और समकालीन रचनाकारों को दिए साक्षात्कारों में भी उन्होंने सदैव एक उत्तरदायी आलेचकीय चेतना को अभिव्यक्ति दी। उनकी आश्चर्यजनक स्मृति, वैचारिक स्पष्टता और आस्वादपरक समीक्षा के चलते व्याख्यानों की तरह उनके साक्षात्कार भी सदैव चर्चित रहे। इस पुस्तक में उनके ऐसे साक्षात्कारों को संकलित किया गया है जो अब तक किसी और पुस्तक में नहीं आए थे। कई वरिष्ठ और कनिष्ठ रचनाकारों और सम्पादकों के साथ हुए ये वार्तालाप उनकी आलोचना-दृष्टि, समकालीन रचनात्मकता पर उनके विचारों और सरोकारों को रेखांकित करते हैं। इनमें से कुछ साक्षात्कार इसलिए और भी दिलचस्प है कि इनमें उन्होंने किसी एक ही रचनाकार या कृति पर केन्द्रित प्रश्नों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। मसलन स्वयं प्रकाश, त्रिलोचन, काशीनाथ सिंह का ‘काशी का अस्सी’ आदि पर केन्द्रित बातचीत। साक्षात्कारकर्ताओं में भी अलग-अलग पीढ़ियों के लोग हैं; जिन्होंने अपने-अपने ढंग से उनसे अपनी जिज्ञासाओं पर विचार-विनिमय किया है।
Chaitanya Mahaprabhu
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Amritlal Nagar
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चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव वैष्णव धर्म के विकास में एक चमत्कारी घटना है। एक गहरे आवेश और भावनात्मकता के साथ सारे जनसामान्य तक वैष्णव धर्म को पहुँचाने का काम पहले बंगाल में और बाद में सम्पूर्ण देश में, चैतन्य महाप्रभु ने किया। मधुर भाव की नाम–संकीर्तन पद्धति चैतन्य की देन है। इसी के साथ वैष्णव धर्म ने एक नए युग में प्रवेश किया। प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार चैतन्य के व्यक्तित्व के इस योगदान को सम्पूर्णता के साथ उजागर किया गया है।
लेकिन इस पुस्तक का उद्देश्य मात्र इतना ही नहीं है। विद्वान लेखक ने चैतन्य के व्यक्तित्व को तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों में भी रखकर देखा है। अपने समय के इतिहास में चैतन्य का व्यक्तित्व एक चुनौती की तरह उभरा और पराजित हिन्दू जाति को एक नई आस्था और नए आलोक से संयुक्त करने का काम भी चैतन्य ने किया।
उपन्यासकार नागर जी की लेखनी से प्रस्तुत चैतन्य की यह जीवनी पढ़ने पर एक उपन्यास का मज़ा तो देती है, साथ ही वैष्णव धर्म के उदार पथ के विकास में उनका महत्त्वपूर्ण और अद्वितीय योगदान भी सामने लाती है।
Khamosh Logon Ki Or Se By Dalai Lama
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Dalai Lama
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परम पूज्य दलाई लामा – खामोश लोगों की ओर से यह पुस्तक परम पूज्य दलाई लामा की आत्मकथात्मक कृति Voice for the Voiceless का हिंदी अनुवाद है। इसमें उन्होंने तिब्बत और तिब्बती लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए चीन के विरुद्ध अपने सात दशकों के शांतिपूर्ण संघर्ष को आत्मीयता से वर्णित किया है। पुस्तक में उन प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं जो चीन द्वारा तिब्बत और तिब्बतीयों को लेकर खड़े किए जाते हैं- और जो पाठकों के मन में भी स्वाभाविक रूप से उठते हैं। इसके साथ ही, अगली दलाई लामा की घोषणा और उससे जुड़ी जटिलताओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई है, जो वर्तमान में चीन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में गंभीर बहस का विषय बना हुआ है। इसकी भाषा और शैली प पू दलाई लामा के व्यक्तित्व की तरह ही सहज और सरल है।
Boskiyana
- Author Name:
Gulzar +1
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गुलज़ार से बातें...'माचिस' के, 'हू-तू' के, 'ख़ुशबू', 'मीरा' और 'आँधी' के बहुरंगी लेकिन सादा गुलज़ार से बातें...फ़िल्मों में अहसास को एक किरदार की तरह उतारनेवाले और गीतों-नज़्मों में ज़िंदगी के जटिल सीधेपन को अपनी विलक्षण उपमाओं और बिम्बों में खोलनेवाले गुलज़ार से उनकी फ़िल्मों, उनकी शायरी, उनकी कहानियों और उस मुअम्मे के बारे में बातें जिसे गुलज़ार कहा जाता है। उनके रहन-सहन, उनके घर, उनकी पसंद-नापसंद और वे इस दुनिया को कैसे देखते हैं और कैसे देखना चाहते हैं, इस पर बातें...यह बातों का एक लम्बा सिलसिला है जो एक मुलायम आबोहवा में हमें समूचे गुलज़ार से रू-ब-रू कराता है। यशवंत व्यास गुलज़ार-तत्त्व के अन्वेषी रहे हैं। वे उस लय को पकड़ पाते हैं जिसमें गुलज़ार रहते और रचते हैं। इस लम्बी बातचीत से आप उनके ही शब्दों में कहें तो 'गुलज़ार से नहाकर' निकलते हैं।
Mera Pariwar
- Author Name:
Mahadevi Verma
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प्रस्तुत पुस्तक में महादेवी वर्मा जी ने कुछ विशिष्ट मानवेतर प्राणियों के प्रति अपनी जिस सहज, सौहाद्र और एकांत आत्मीयता की अभिव्यंजना का जो अपूर्व कला-कौशल अपने इन चित्रों में व्यक्त किया है, वह केवल उनकी अपनी ही कला की विशिष्टता की दृष्टि से नहीं वरन् संसार-साहित्य की इस कोटि की कला के समग्र क्षेत्र में भी बेमिसाल और बेजोड़ हैं। ये कृतियाँ मानवीय भावज्ञता, संवेदना और कलात्मक प्रतिभा के अपूर्व निदर्शन की दृष्टि से शाब्दिक अर्थ में अपूर्व ओर अद्भुत कलात्मक चमत्कार के नमूने हैं।
Jeete Jee Allahabad
- Author Name:
Mamta Kaliya +1
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जीते जी इलाहाबाद सिर्फ संस्मरणात्मक कृति नहीं है, एक यात्रा है जिसमें हमें अनेक उन लोगों के शब्दचित्र मिलते हैं जिनके बिना आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास नहीं लिखा जा सकता और जो उस समय के इलाहाबाद के मन-प्राण होते थे।
Shri Rambhakt : Shaktipunj Hanuman
- Author Name:
Jairam Mishra +1
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‘मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम’ ने कहा है—लोक पर जब कोई विपत्ति आती है तब वह त्राण पाने के लिए मेरी अभ्यर्थना करता है परन्तु जब मुझ पर कोई संकट आता है तब मैं उसके निवारणार्थ पवनपुत्र का स्मरण करता हूँ। अवतार श्रीराम का यह कथन हनुमानजी के महान व्यक्तित्व का बहुत सुन्दर प्रकाशन कर देता है। श्रीराम का कितना अनुग्रह है उन पर कि वे अपने लौकिक जीवन के संकटमोचन के श्रेय का सौभाग्य सदैव उन्हीं को प्रदान करते हैं और कैसे शक्तिपुंज हैं हनुमान कि जो श्रीराम तक के कष्ट का तत्काल निवारण कर सकते हैं। भगवान श्रीराम के प्रति अपनी अपूर्व, अद्भुत, अप्रतिम, एकान्त भक्ति के कारण अन्य की इसी प्रकार की भक्ति का आलम्बन बन जानेवाला हनुमान जैसा कोई अन्य उदाहरण विश्व में नहीं। यही कारण है कि संस्कृत से लेकर समस्त मध्यकालीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं में श्री हनुमान में परम पावन चरित्र का गान किया गया है और उनके मन्दिर भारतवर्ष के प्रत्येक कोने में पाए जाते हैं। इस पुस्तक की रचना में ‘वाल्मीकीय रामायण’, ‘अध्यात्म रामायण’ तथा ‘आनन्द रामायण’ से विशेष सहायता ली गई है। ‘स्कंदपुराण’, ‘पद्मपुराण’ आदि एवं ‘महाभारत’ (वनपर्व) भी रचना में सहायक सिद्ध हुए हैं। गोस्वामी तुलसीदास की कृतियों—‘रामचरितमानस’, ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’ एवं ‘कम्बन’ रचित ‘कम्ब रामायण’ (तमिल रचना) से भी यत्र-तत्र सहायता ग्रहण की गई है। इनके अतिरिक्त श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ रचित ‘आंजनेय' कल्याण पत्रिका के ‘हनुमानांक’ (1975 ई.) तथा डॉ. गोविन्दचन्द्र राय की पुस्तक ‘हनुमान के देवत्व और मूर्ति का विकास’ आदि से भी यथावसर सामग्री प्राप्त की गई है।
Joothan-2
- Author Name:
Omprakash Valmiki
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जूठन’ ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा है। इसका पहला भाग बरसों पहले प्रकाशित होकर, आज हिन्दी दलित साहित्य और खासकर आत्मकथाओं की शृंखला में एक विशेष स्थान प्राप्त कर चुका है। वाल्मीकि जी अब हमारे बीच नहीं हैं, अपने जीवन-काल में उन्होंने 'जूठन’ के बाद साहित्य, समाज और संवेदना के दायरों में एक लम्बी यात्रा पूरी की। कई कथात्मक और आलोचनात्मक कृतियों के साथ उनके काव्य-संग्रह भी आए। 'जूठन’ का यह दूसरा भाग उनके उसी दौर का आख्यान है। आत्मकथा के इस दूसरे भाग की शुरुआत उन्होंने देहरादून की आर्डिनेंस फैक्ट्री में अपनी नियुक्ति से की है। नई जगह पर अपनी पहचान को लेकर आई समस्याओं के साथ-साथ यहाँ मजदूरों के साथ जुड़ी अपनी गतिविधियों का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी साहित्यिक सक्रियता का भी विस्तार से उल्लेख किया है। सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय भाषा में लिखी गई यह पुस्तक देहरादून से जबलपुर और वहाँ से पुन: देहरादून की यात्रा करती हुई शिमला उच्च अध्ययन संस्थान और फिर उनके अस्वस्थ होने तक जाती है। दलित साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में 'जूठन’ के इस दूसरे भाग को पढ़ना एक अलग अनुभव है।
Tumhare Naam : Jan Nisar Akhtar ko Safia Akhtar ke khat
- Author Name:
Safia Akhtar
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जाँ निसार अख़्तर और उनकी शरीके-हयात सफ़िया अख़्तर को साथ रहने का मौक़ा बहुत कम मिला। उस ज़माने में जब औरतों के लिए घर से बाहर जाकर काम करना बहुत आम बात नहीं थी, वे स्कूल में अपनी नौकरी करती रहीं और न सिर्फ़ अपनी और अपने बच्चों, बल्कि मुम्बई की फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी ज़मीन तलाश रहे जाँ निसार साहब के लिए भी सम्बल जुटाती रहीं।
ये ख़त उन्होंने इसी संघर्ष के दौरान लिखे, लेकिन ये ख़त सिर्फ़ उनके हाल-अहवाल की सूचना-भर नहीं देते, बल्कि वे एक बड़े सृजक की क़लम से उतरे शाहकार की तरह हमारे सामने आते हैं। ज़िन्दगी उन्हें कुछ और वक़्त देती तो निश्चय ही वे साहित्य की दुनिया को कुछ बड़ा देकर जातीं। इन ख़तों में उनकी मुहब्बत और हिम्मत के साथ-साथ उनकी और बेशक जाँ निसार अख़्तर की ज़िन्दगी खुलती जाती है, साथ ही उनका अपना दौर भी अपने तमाम स्याह-सफ़ेद के साथ रौशन होता जाता है। ये ख़त प्यार और हौसले से भरे एक दिल की अक़्क़ासी करते हैं। ये जादू की तरह असर करते हैं; इनका बेहद ताक़तवर और सधा हुआ ‘प्रोज़’ कहीं आपको रुकने नहीं देता, और इनकी तुर्श मिठास में डूबे-डूबे बारहा आपकी आँखें भर आती हैं।
उनके निधन के बाद जाँ निसार साहब ने उनके इन ख़तों को दो जिल्दों में प्रकाशित कराया—’हर्फ़े-आश्ना’ और ‘ज़ेरे-लब’। इस किताब में इन दोनों जिल्दों में संकलित ख़तों को दे दिया गया है।
Tumhare Naam : Jan Nisar Akhtar ko Safia Akhtar ke khat
Safia Akhtar
20% off₹ 199
₹ 159.2
Available
Yugon Ka Yatri : Nagarjun Ki Jeewani
- Author Name:
Taranand Viyogi
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मिथिला के बन्द समाज से बाहर निकलकर नागार्जुन ने अपनी तमाम रचनाओं और सहज सुलभ व्यक्तित्व से एक ऐसा जागरण किया जिसकी आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है। वे सच्चे अर्थों में क्लैसिकल मॉडर्न थे। तारानन्द वियोगी की यह जीवनी पाठक को नागार्जुन के अन्त:करण में प्रवेश कराने में सक्षम है। उनके घने साहचर्य में जो रहे हैं, वे इसे पढ़कर बाबा की उपस्थिति फिर से अपने भीतर महसूस करेंगे। अपनी सशक्त लेखनी से तारानन्द ने बाबा नागार्जुन को पुनर्जीवित कर दिया है। यहाँ तथ्य और सत्य का सन्तुलित समन्वय है। बाबा से जुड़े शताधिक जनों के अनुभव उन्होंने बड़ी सहृदयता से अन्तर्ग्रथित किए हैं। बाबा नागार्जुन को संसार से विदा हुए बीस वर्ष से ज़्यादा हुए। इस बीच हिन्दी-मैथिली की जो तरुण पीढ़ी आई है, वह भी इस कृति से बाबा नागार्जुन का सम्पूर्ण साक्षात्कार कर सकेगी। बाबा के बारे में एक जगह लेखक ने लिखा है, 'स्मृति, दृष्टान्त और अनुभव का ज़खीरा था उनके पास।' तारानन्द की इस जीवनी में भी ये तीनों बातें आद्यन्त मौजूद हैं। बाबा के जीवन-सृजन पर यह बहुत रचनात्मक, ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य सम्पन्न हो सका है। मैं इतना ही कहूँगा कि बाबा की ऐसी प्रामाणिक जीवनी मैं भी नहीं लिख पाता। ‘युगों का यात्री' हिन्दी की कुछ सुप्रसिद्ध जीवनियों की शृंखला की अद्यतन सशक्त कड़ी है। —वाचस्पति, वाराणसी (दशकों तक नागार्जुन के क़रीब रहे अध्येता समीक्षक)
Sutradhar
- Author Name:
Sanjeev
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अपनी रचनात्मक ज़मीन और लेखकीय दायित्व की तलाश करते हुए एक ईमानदार लेखक प्रायः स्वयं को भी रचने की कोशिश करता है। अनुपस्थित रहकर भी वह उसमें उपस्थित रहता है; और सहज ही उस देश-काल को लाँघ जाता है जो उसे आकार देता रहा है। समकालीन कथाकारों में संजीव की मौजूदगी को कुछ इसी तरह देखा जाता है। आकस्मिक नहीं कि हिन्दी की यथार्थवादी कथा-परम्परा को उन्होंने लगातार आगे बढ़ाया है। ‘सूत्रधार’ संजीव का नया उपन्यास है, और उनकी शोधपरक कथा-यात्रा में नितान्त चुनौतीपूर्ण भी। केन्द्र में हैं भोजपुरी गीत-संगीत और लोकनाट्य के अनूठे सूत्रधार भिखारी ठाकुर। वही भिखारी ठाकुर, जिन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा था और उनके अभिनन्दनकर्ताओं ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र। लेकिन भिखारी ठाकुर क्या सिर्फ़ यही थे? निश्चय ही नहीं, क्योंकि कोई भी एक बड़ा किसी दूसरे बड़े के समकक्ष नहीं हो सकता। और यों भी भिखारी का बड़प्पन उनके सहज सामान्य होने में निहित था, जिसे इस उपन्यास में संजीव ने उन्हीं के आत्मद्वन्द्व से गुज़रते हुए चित्रित किया है। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी धूपछाँही कथा-यात्रा है, जिसे हम भिखारी जैसे लीजेंडरी लोक कलाकार और उनके संगी-साथियों के अन्तर्बाह्य संघर्ष को महसूस करते हुए करते हैं। काल्पनिक अतिरेक की यहाँ कोई गुंजाइश नहीं। न कोई ज़रूरत। ज़रूरत है तो तथ्यों के बावजूद रचनात्मकता को लगातार साधे रखने की, और संजीव को इसमें महारत हासिल है। यही कारण है कि ‘सूत्रधार’ की शक्ल में उतरे भिखारी ठाकुर भोजपुरी समाज में रचे-बसे लोकराग और लोकचेतना को व्यक्त ही नहीं करते, उद्दीप्त भी करते हैं। उनकी लोकरंजकता भी गहरे मूल्यबोध से सम्बलित है; और उसमें न सिर्फ़ उनकी, बल्कि हमारे समाज और इतिहास की बहुविध विडम्बनाएँ भी समाई हुई हैं। अपने तमाम तरह के शिखरारोहण के बावजूद भिखारी अगर अन्त तक भिखारी ही बने रहते हैं तो यह यथार्थ आज भी हमारे सामने एक बड़े सवाल की तरह मौजूद है। कहने की आवश्यकता नहीं कि देश, काल, पात्र की जीवित-जाग्रत् पृष्ठभूमि पर रचा गया यह जीवनीपरक उपन्यास आज के दलित-विमर्श को भी एक नई ज़मीन देता है। तथ्यों से बँधे रहकर भी संजीव ने एक बड़े कलाकार से उसी के अनुरूप रससिक्त और आत्मीय संवाद किया है। —रामकुमार कृषक
Bageshwar Dham Sarkar: Pt. Dheerendra Krishna Shastri Ki Adbhut Yatra
- Author Name:
Sachin Choudhary
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“बागेश्वर धाम सरकार – पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अद्भुत यात्रा” सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है—एक युवा साधक से लेकर राष्ट्र की आस्था के केंद्र बन चुके पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तक की प्रेरणादायी गाथा। इस पुस्तक में लेखक सचिन चौधरी ने न सिर्फ बागेश्वर धाम सरकार से अपनी पहली मुलाकात, बल्कि पिछले चार वर्षों में उनके साथ हुए अनुभवों, संवादों और आत्मीय क्षणों को सच्चाई और श्रद्धा के साथ शब्दों में पिरोया है। किताब में वर्णित है कि कैसे एक सामान्य से गाँव गढ़ा से शुरू होकर, बाबा का तेज, ज्ञान और दिव्य दृष्टि लोगों के जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन लेकर आए। यह पुस्तक इस बात की साक्षी है कि कैसे बुंदेलखंड की धरती से निकला एक युवा आज करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का प्रतीक बन गया है। बागेश्वर धाम सरकार की महिमा, श्रद्धालुओं की अडिग भक्ति, खजुराहो जैसे क्षेत्रों पर इसका सामाजिक-आर्थिक प्रभाव, और बाबा के अनदेखे पहलुओं को उजागर करती यह पुस्तक—हर उस व्यक्ति के लिए पठनीय है जो आस्था, अध्यात्म और आत्मबल की शक्ति को समझना चाहता है।
Main Barbad Hona Chahti Hoon
- Author Name:
Malika Amar Shaikh +1
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मलिका अमर शेख उस समय मात्र उन्नीस बरस की थीं जब वे मराठी के युग-प्रवर्तक कवि नामदेव ढसाल के साथ विवाह-बन्धन में बँध गईं। लेकिन जल्द ही यह शादी टूट गई। दलित पैंथर्स के सह-संस्थापक नामदेव न तो एक पति के रूप में, न पिता के रूप में, और न ही एक पुरुष के रूप में वैसे निकले जैसी उम्मीद मलिका ने की थी। यह मुख्यतः उस विवाह की कहानी है, जिसमें हम उस स्त्री से मिलते हैं जो एक पुरुष-संसार में अपनी जगह ढूँढ़ने की कोशिश में है। लेकिन यह कहानी मराठी दलित आन्दोलन के अन्तर्विरोधों, मुम्बई शहर, उसके कवियों और एक्टिविस्टों की कहानी भी है। मूल रूप से मराठी में प्रकाशित यह आत्मकथा छपते ही एक सनसनी बन गई थी। व्यक्तिगत बनाम राजनीतिक, वाम विचारधारा बनाम दलित आन्दोलन और अपने पति के प्रति प्रेम और घृणा के बीच फँसी एक स्त्री की यह आत्मकथा कई मायनों में एक दस्तावेज़ की हैसियत रखती है।
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