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Sarvahara Saamant : D. P. Tripathi

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एक ऐसे व्यक्ति के बारे में लिखना, जो अपने जीवन काल में ही लीजेंड बन चुका हो, वास्तव में दुस्साहस ही कहलाएगा। लेकिन मुझे यह दुस्साहस करना ही था क्योंकि जिस व्यक्ति की शान में मैं ये शब्द कह रहा हूँ, आखिरकार उसी ने तो दुस्साहस करना सिखाया था। मैं जानता हूँ कि मेरे ही शब्द मुझसे छल करेंगे, जब मैं डी. पी. त्रिपाठी को शब्दों की श्रद्धांजलि दूँगा। 17 मार्च, 1983 को लन्दन के हाईगेट कब्रिस्तान में कार्ल मार्क्स की कब्र पर बोलते हुए उनके दोस्त फ्रेडरिक एंजिल्स ने कहा था, “तमाम पीड़ा और पीड़ादायकों की कटु आलोचनाओं को यूँ तो कार्ल मार्क्स अनदेखा ही करते थे। जवाब तभी देते थे जब अत्यन्‍त जरूरी हो जाए। लोगों का प्यार और उनसे मिलनेवाली प्रतिष्ठा के बीच उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। साइबेरिया से लेकर कैलिफोर्निया और यूरोप से लेकर अमेरिका तक में लोगों ने शोक मनाया। मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि उनकी जिन्दगी में उनके हजारों विरोधी थे लेकिन उनमें एक भी उनका व्यक्तिगत शत्रु नहीं था।”  डी. पी. त्रिपाठी के जाने पर भी कुछ ऐसा ही हुआ था। डी. पी. मार्क्स नहीं थे लेकिन दोनों के बीच एक बात में तो साम्य अवश्य है कि डी. पी. त्रिपाठी के जीवन में भी कोई उनका शत्रु नहीं था। वे अजातशत्रु थे। उनके पास विभिन्न संगठनों और राजनीतिक दलों के साथ बेहतर रिश्ता बनाने और कायम रखने का हुनर तो था ही, अपनी प्रतिबद्धताओं और सरोकारों के प्रति हमेशा सचेत रहना भी उन्हें अलहदा दर्जे का अधिकारी बनाता है। विचार और सरोकार को अपने जीवन में साकार करने वाला उनके जैसा विरले होते हैं।  विचार और चिन्तन की उनकी उत्कंठा ने ‘थिंक इंडिया’ जैसे जर्नल को जन्म दिया। विचारों की स्वायत्तता का उनका आग्रह इतना प्रबल था कि जिस विचार से वे सर्वथा इत्तेफाक नहीं रखते थे या यूँ कहें कि जिस विचार के विरोधी होते थे, उस विचार को भी बहस के बीच में ले आने का प्रयत्न करते थे। डी. पी. त्रिपाठी ने राजनीति को अपना ठिकाना तो जरूर बनाया, लेकिन उनका मन कविता में ही रचा रहा। यदि मैं कहूँ कि वे राजनीति की कविता थे, तो शायद गलत नहीं होगा। उनके विरोधी विचार के लोग भी उनकी इज्जत करते थे। सच कहें, तो वे इस युग के धरोहर थे, आज के सुकरात थे। जो भी उनके सम्पर्क में आया, उनसे मुहब्बत कर बैठा। —कुमार नरेंद्र सिंह

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एक ऐसे व्यक्ति के बारे में लिखना, जो अपने जीवन काल में ही लीजेंड बन चुका हो, वास्तव में दुस्साहस ही कहलाएगा। लेकिन मुझे यह दुस्साहस करना ही था क्योंकि जिस व्यक्ति की शान में मैं ये शब्द कह रहा हूँ, आखिरकार उसी ने तो दुस्साहस करना सिखाया था। मैं जानता हूँ कि मेरे ही शब्द मुझसे छल करेंगे, जब मैं डी. पी. त्रिपाठी को शब्दों की श्रद्धांजलि दूँगा।

17 मार्च, 1983 को लन्दन के हाईगेट कब्रिस्तान में कार्ल मार्क्स की कब्र पर बोलते हुए उनके दोस्त फ्रेडरिक एंजिल्स ने कहा था, “तमाम पीड़ा और पीड़ादायकों की कटु आलोचनाओं को यूँ तो कार्ल मार्क्स अनदेखा ही करते थे। जवाब तभी देते थे जब अत्यन्‍त जरूरी हो जाए। लोगों का प्यार और उनसे मिलनेवाली प्रतिष्ठा के बीच उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। साइबेरिया से लेकर कैलिफोर्निया और यूरोप से लेकर अमेरिका तक में लोगों ने शोक मनाया। मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि उनकी जिन्दगी में उनके हजारों विरोधी थे लेकिन उनमें एक भी उनका व्यक्तिगत शत्रु नहीं था।”  डी. पी. त्रिपाठी के जाने पर भी कुछ ऐसा ही हुआ था। डी. पी. मार्क्स नहीं थे लेकिन दोनों के बीच एक बात में तो साम्य अवश्य है कि डी. पी. त्रिपाठी के जीवन में भी कोई उनका शत्रु नहीं था। वे अजातशत्रु थे। उनके पास विभिन्न संगठनों और राजनीतिक दलों के साथ बेहतर रिश्ता बनाने और कायम रखने का हुनर तो था ही, अपनी प्रतिबद्धताओं और सरोकारों के प्रति हमेशा सचेत रहना भी उन्हें अलहदा दर्जे का अधिकारी बनाता है।

विचार और सरोकार को अपने जीवन में साकार करने वाला उनके जैसा विरले होते हैं।  विचार और चिन्तन की उनकी उत्कंठा ने ‘थिंक इंडिया’ जैसे जर्नल को जन्म दिया। विचारों की स्वायत्तता का उनका आग्रह इतना प्रबल था कि जिस विचार से वे सर्वथा इत्तेफाक नहीं रखते थे या यूँ कहें कि जिस विचार के विरोधी होते थे, उस विचार को भी बहस के बीच में ले आने का प्रयत्न करते थे।

डी. पी. त्रिपाठी ने राजनीति को अपना ठिकाना तो जरूर बनाया, लेकिन उनका मन कविता में ही रचा रहा। यदि मैं कहूँ कि वे राजनीति की कविता थे, तो शायद गलत नहीं होगा। उनके विरोधी विचार के लोग भी उनकी इज्जत करते थे। सच कहें, तो वे इस युग के धरोहर थे, आज के सुकरात थे। जो भी उनके सम्पर्क में आया, उनसे मुहब्बत कर बैठा।

—कुमार नरेंद्र सिंह

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2021
Weight
370 grams
ISBN-13
9789390971121
Pages
208
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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