Atmakatha
About the book
यह अपने देश के लिए फाँसी का फन्दा चूम लेने वाले एक क्रान्तिकारी की आत्मकथा है। आप इसे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के एक प्रामाणिक दस्तावेज की तरह भी पढ़ सकते हैं। बिस्मिल को काकोरी कांड में फाँसी की सजा मिली थी। यह आत्मकथा उन्होंने गोरखपुर जेल की कालकोठरी में बैठकर लिखी थी। क्रान्तिकारी आन्दोलन में कूदने से पहले भी उन्होंने कठिन जीवन जिया था और क्रान्तिकारी जीवन अपनाने के बाद तो संघर्ष ही उनका जीवन हो गया था। इसकी स्पष्ट झलक इस पुस्तक में दिखाई देती है। बिस्मिल ने इसमें अपने ऊपर पड़े आर्य समाजी प्रभावों और उसकी प्रेरणा से आर्य समाज में किए गए अपने कार्यों के बारे में भी बताया है। कांग्रेस के प्रति आकर्षण और आखिरकार क्रान्तिकारी विचारों को अपने अनुकूल पाकर उस राह पर आगे बढ़ने का संक्षेप में ही लेकिन मानीखेज विवरण दिया है। पुस्तक में 1918-19 के मैनपुरी मामले का भी हवाला है जिसमें बिस्मिल भी शामिल थे। उत्तर भारत में यह एक महत्त्वपूर्ण क्रान्तिकारी कार्रवाई थी जिसमें बंगाल के क्रान्तिकारियों की भूमिका नहीं थी। इस मामले में काफी समय तक भूमिगत रहने के बाद बिस्मिल जब बाहर आए तब हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन की स्थापना में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। इसके बाद ही काकोरी कांड हुआ, जिसमें उन्हें फाँसी की सजा मिली। ये सभी प्रसंग इस पुस्तक में वर्णित हैं। इससे जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है, वह एक क्रान्तिकारी का विकास ही नहीं है, बल्कि उसके विचारों का विकास भी है, जिसमें वह अपने संघर्ष को जन-आन्दोलन बनते देखना चाहता है और उसके लिए साहस के साथ-साथ साहित्य की भूमिका को भी महत्त्वपूर्ण मानता है। आश्चर्य नहीं कि बिस्मिल ने क्रान्तिकारी कार्रवाइयों के साथ-साथ कलम चलाना भी आजीवन जारी रखा। यह आत्मकथा तो उन्होंने अपनी फाँसी के दो दिन पहले पूरी की जो अपने देश से प्यार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए पठनीय और संग्रहणीय है।
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About the Book
यह अपने देश के लिए फाँसी का फन्दा चूम लेने वाले एक क्रान्तिकारी की आत्मकथा है। आप इसे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के एक प्रामाणिक दस्तावेज की तरह भी पढ़ सकते हैं।
बिस्मिल को काकोरी कांड में फाँसी की सजा मिली थी। यह आत्मकथा उन्होंने गोरखपुर जेल की कालकोठरी में बैठकर लिखी थी। क्रान्तिकारी आन्दोलन में कूदने से पहले भी उन्होंने कठिन जीवन जिया था और क्रान्तिकारी जीवन अपनाने के बाद तो संघर्ष ही उनका जीवन हो गया था। इसकी स्पष्ट झलक इस पुस्तक में दिखाई देती है। बिस्मिल ने इसमें अपने ऊपर पड़े आर्य समाजी प्रभावों और उसकी प्रेरणा से आर्य समाज में किए गए अपने कार्यों के बारे में भी बताया है। कांग्रेस के प्रति आकर्षण और आखिरकार क्रान्तिकारी विचारों को अपने अनुकूल पाकर उस राह पर आगे बढ़ने का संक्षेप में ही लेकिन मानीखेज विवरण दिया है।
पुस्तक में 1918-19 के मैनपुरी मामले का भी हवाला है जिसमें बिस्मिल भी शामिल थे। उत्तर भारत में यह एक महत्त्वपूर्ण क्रान्तिकारी कार्रवाई थी जिसमें बंगाल के क्रान्तिकारियों की भूमिका नहीं थी। इस मामले में काफी समय तक भूमिगत रहने के बाद बिस्मिल जब बाहर आए तब हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन की स्थापना में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। इसके बाद ही काकोरी कांड हुआ, जिसमें उन्हें फाँसी की सजा मिली। ये सभी प्रसंग इस पुस्तक में वर्णित हैं।
इससे जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है, वह एक क्रान्तिकारी का विकास ही नहीं है, बल्कि उसके विचारों का विकास भी है, जिसमें वह अपने संघर्ष को जन-आन्दोलन बनते देखना चाहता है और उसके लिए साहस के साथ-साथ साहित्य की भूमिका को भी महत्त्वपूर्ण मानता है। आश्चर्य नहीं कि बिस्मिल ने क्रान्तिकारी कार्रवाइयों के साथ-साथ कलम चलाना भी आजीवन जारी रखा। यह आत्मकथा तो उन्होंने अपनी फाँसी के दो दिन पहले पूरी की जो अपने देश से प्यार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए पठनीय और संग्रहणीय है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2025
- Weight
- 170 grams
- ISBN-13
- 9789348229236
- Pages
- 158
- Reading time
- ~5 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 13 × 20 cm
- Language
- Hindi
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