Sainik Sannyasi Swami Vivekanand
(0)
Author:
Indranath ChoudhuriPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं में विश्वास रखते हुए भी यदि अपने में विश्वास नहीं है तो तुम्हें नास्तिक ही माना जाएगा।–यह कहकर स्वामी विवेकानन्द ने हमारे सामने कर्म और इहलौकिक सक्रियता का आह्वान किया था। मानव-मन में जीवन के प्रति उठनेवाली उमंग की राह में सबसे बड़ी बाधा मृत्यु का भय है। यह सोचकर कि अन्ततः एक दिन हम यहाँ नहीं होंगे, कितने ही प्रयास संकुचित रह जाते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने इसी संकोच को विशेष तौर पर सम्बोधित किया और मृत्यु से, मृत्यु के भय से प्रेम करने को कहा ताकि जीवन के रूप में जितना समय हमारे पास है, उसका उपयोग वृहद् मनुष्यता और उसके भविष्य के लिए उत्सर्ग किया जा सके। यही विवेकानन्द का सैनिक भाव है–मृत्यु को साक्षात् देखते हुए जीवन की आराधना। इसीलिए रोम्याँ रोलाँ ने उन्हें ‘वारियर प्रोफेट’ कहा था। धर्म को व्यापक मानवीय अनुभव के रूप में परिभाषित करते हुए उन्होंने अध्यात्म को कर्मपथ पर अग्रसर देखना चाहा। इस पुस्तक में विवेकानन्द के जीवन और दर्शन को कथा की सी सहजता के साथ प्रस्तुत करते हुए उनके दार्शनिक-वैचारिक विकास की प्रक्रिया और उनके विचारों, विश्वासों तथा भारतीय मनीषा में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। भारत और विश्व की उनकी यात्राओं के रोचक विवरण और इस दौरान राष्ट्रवाद, धर्म और मानव-कल्याण के सन्दर्भ में चल रही उनकी भीतरी खोज-यात्रा के विभिन्न पड़ाव भी इसमें सँजोए गए हैं। विभिन्न विषयों, व्यक्तियों, सामाजिक समस्याओं और प्रश्नों पर उनके विचारों की प्रस्तुति इसका विशेष आकर्षण है जिससे विवेकानन्द के भावी अध्येता एक सम्पूर्ण बोध के साथ अपनी यात्रा शुरू कर सकते हैं।
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तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं में विश्वास रखते हुए भी यदि अपने में विश्वास नहीं है तो तुम्हें नास्तिक ही माना जाएगा।–यह कहकर स्वामी विवेकानन्द ने हमारे सामने कर्म और इहलौकिक सक्रियता का आह्वान किया था। मानव-मन में जीवन के प्रति उठनेवाली उमंग की राह में सबसे बड़ी बाधा मृत्यु का भय है। यह सोचकर कि अन्ततः एक दिन हम यहाँ नहीं होंगे, कितने ही प्रयास संकुचित रह जाते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने इसी संकोच को विशेष तौर पर सम्बोधित किया और मृत्यु से, मृत्यु के भय से प्रेम करने को कहा ताकि जीवन के रूप में जितना समय हमारे पास है, उसका उपयोग वृहद् मनुष्यता और उसके भविष्य के लिए उत्सर्ग किया जा सके। यही विवेकानन्द का सैनिक भाव है–मृत्यु को साक्षात् देखते हुए जीवन की आराधना। इसीलिए रोम्याँ रोलाँ ने उन्हें ‘वारियर प्रोफेट’ कहा था। धर्म को व्यापक मानवीय अनुभव के रूप में परिभाषित करते हुए उन्होंने अध्यात्म को कर्मपथ पर अग्रसर देखना चाहा। इस पुस्तक में विवेकानन्द के जीवन और दर्शन को कथा की सी सहजता के साथ प्रस्तुत करते हुए उनके दार्शनिक-वैचारिक विकास की प्रक्रिया और उनके विचारों, विश्वासों तथा भारतीय मनीषा में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। भारत और विश्व की उनकी यात्राओं के रोचक विवरण और इस दौरान राष्ट्रवाद, धर्म और मानव-कल्याण के सन्दर्भ में चल रही उनकी भीतरी खोज-यात्रा के विभिन्न पड़ाव भी इसमें सँजोए गए हैं। विभिन्न विषयों, व्यक्तियों, सामाजिक समस्याओं और प्रश्नों पर उनके विचारों की प्रस्तुति इसका विशेष आकर्षण है जिससे विवेकानन्द के भावी अध्येता एक सम्पूर्ण बोध के साथ अपनी यात्रा शुरू कर सकते हैं।
Book Details
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ISBN9788183619912
-
Pages262
-
Avg Reading Time9 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: "अत्याचार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठानेवाली, असहाय और निर्बल का संरक्षण करनेवाली, सामाजिक कुरीतियों को ध्वस्त करनेवाली, भ्रष्टाचार के विरुद्ध शंखनाद करनेवाली, किसी एक भारतीय महिला का नाम लें, तो वह होगा—वरिष्ठ पुलिस अधिकारी डॉ. किरण बेदी। अपने सेवाकाल और उसके बाद भी जो निरंतर सामाजिक उत्थान के लिए कृतसंकल्प रहीं और तनमनधन से सकारात्मक कार्य करके समाज में आदर्श और अनुकरणीय बनीं, उन डॉ. किरण बेदी की प्रेरणाप्रद जीवनगाथा है यह पुस्तक। हमारा विश्वास है कि यह पुस्तक समाज में चेतना जाग्रत् करने, महिलाओं में सुरक्षा का भाव पैदा करने, निर्बलों में साहस पैदा करने और भ्रष्टाचारियों के दिलों में डर पैदा करने में सफल होगी।"
Purab Ki Betiyaan
- Author Name:
Shailja Pathak
- Book Type:

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Description:
‘पूरब की बेटियाँ’ किताब जिस पूरब को हमारे सामने लाती है, वह कोई दिशा नहीं, एक भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्र है। उसकी सामाजिक संरचना में बेटियों के क्या मायने हैं, क्या दर्जा है, शैलजा पाठक कथेतर विधा की अपनी पहली किताब में बहुत महीन ढंग से परत-दर-परत खोलती हैं।
बचपन से बुढ़ापे तक का स्त्री-जीवन ही नहीं, तीन पीढ़ियों की स्त्री-दशा कम-से-कम शब्दों में जीवन्त कर देती हैं।
शैलजा अपनी दृश्य-भाषा में बाइस्कोप दिखाती हैं जैसे; पूरब के क़स्बाई जीवन की सामूहिकता से लेकर मुम्बई के महानगरीय एकाकीपन तक के त्रास का। उस ‘स्त्री’ का जिसे ‘विमर्श’ की किसी परिभाषा में अँटा देना अभी सम्भव नहीं हो सका है।
शैलजा स्मृतियाँ लिखती हैं डायरी की तरह, बात कहती हैं आमने-सामने हुई मुलाक़ात की तरह। उनकी लिखत की भाषा कहन-सुनन के लहजे में है। एक ही साथ भावप्रवण, यथार्थपरक, ईमानदार, कठोर और गुलाबजल भिंगोया रुई का फाहा। यह किताब हँसाते हुए रूलाती है और रूलाते हुए सवालों से बेधती है। सवाल कि तमाम रिश्तों के बीच एक स्त्री का अपना जीवन कहाँ है? बन्धुत्व और मैत्री—स्त्री के जीवन में क्या मायने रखते हैं? सुना जाना—कितना बड़ा जीवन-मूल्य है उसके लिए?
‘पूरब की बेटियाँ’ को पढ़ते हुए हमारे मानस की पीढ़ियों की नींद में खलल पड़ती है। अपने किरदार को परखने और स्त्री-मन को महसूसने के लिए पढ़ी जाने वाली एक संवेदनात्मक स्मृति-कथा!
Rasyatra : Meri Sangeet Yatra
- Author Name:
Pt. Mallikarjun Mansur
- Book Type:

- Description: जिस महान गायक को ‘जयपुर-अतरौली घराने का सरताज’, ‘शुद्ध संगीत का आख़िली पुरोधा’ और इसके अलावा भी बहुत कुछ कहा जाता था, ‘रसयात्रा’ उन्हीं पं. मल्लिकार्जुन मंसूर की आत्मकथा है। ऐसा लगता है कि वे सिर्फ़ गाने के लिए ही पैदा हुए थे। महज़ दस साल की छोटी उम्र से लेकर 82 साल की उम्र तक, अपने जीवन के आख़िरी दिनों तक उन्होंने गाया। उनका जन्म धारवाड़ के पास मंसूर नाम के एक छोटे से गाँव में हुआ। संगीत की शिक्षा उन्होंने दो प्रमुख घरानों—ग्वालियर और जयपुर-अतरौली में प्राप्त की। उनकी गायकी इसीलिए अनोख़ी थी कि उन्होंने इन दोनों घरानों को सफलतापूर्वक मिलाया और अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी गायकी के पीछे सिर्फ़ इन दो घरानों की दो प्रणालियाँ ही नहीं, बल्कि उनके तीन गुरुओं—ग्वालियर घराने के पं. नीलकंठ बुआ अलुरमठ, उस्ताद मंज़ी ख़ान और जयपुर-अतरौली घराने के उस्ताद बुर्जी ख़ान की वैचारिक शैलियाँ भी थीं। वह अप्रचलित रागों का भंडार थे, जिन्हें उन्होंने अपनी कई महफ़िलों में पेश किया जिससे सैकड़ों श्रोताओं को अविस्मरणीय आनन्द मिला, जो आज भी उनके प्रदर्शन को याद करते हैं। अपने कई चाहने वालों के आग्रह पर उन्होंने 1980 में अपनी संगीत-यात्रा को दर्ज किया और इसे ‘रसयात्रा’ नाम दिया। इस पुस्तक को 1984 में कन्नड़ भाषा की ‘बेस्ट बुक’ के रूप में सम्मानित किया जा चुका है। उनके बेटे, पं. राजशेखर मंसूर ने अपनी छात्रा डॉ. चन्द्रिका कामथ के साथ मिलकर इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया और अब यह हिन्दी में आपके सामने है। यह एक ऐसे इनसान की दिल छू लेने वाली कहानी है जिसे सच में जीनियस कहा जा सकता है, फिर भी वह हमेशा एक निराडम्बर और सामान्य व्यक्ति के रूप में ही रहे। वे ख़ुद को संगीत में कुछ बड़ा हासिल करने वाला नहीं बल्कि सुर और लय का एक सच्चा ‘साधक’ मानते थे। यह हमारे देश के संगीत-इतिहास का एक ज़रूरी और अनोखा दस्तावेज़ है।
Bharat Se Pyar
- Author Name:
R.M. Lala
- Book Type:

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Description:
जमशेत जी नुसीरवान जी टाटा का जन्म 1889 में हुआ था। उनके जीवनकाल में भारत अंग्रेज़ों के शिकंजे में कसा रहा। फिर भी उनके द्वारा परिकल्पित परियोजनाएँ देश के आज़ाद हो जाने पर उसके विकास का आधार बनीं। अपनी प्रकृति से असाधारण होते हुए भी ये संस्थान अपने-अपने क्षेत्रों में दूसरों के लिए आदर्श बने हुए हैं। उनकी ढेर सारी उपलब्धियों में देश के कुछ बेहतरीन वैज्ञानिकों को तैयार करनेवाला बेंगलूर का इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस; जमशेदपुर स्थित टाटा इस्पात संयंत्र, जो कि देश के व्यापार से विनिर्माण में संक्रमण करने का द्योतक है; उनकी पथ-प्रदर्शक पनबिजली परियोजना और दुनिया के लाजवाब होटलों में से एक मुम्बई का ताजमहल होटल शामिल है।
अपने हाथ में लिए अन्य कामों की भाँति जमशेत जी ने इन परियोजनाओं में एक ऐसे व्यक्ति की अमोघ नैसर्गिक वृत्ति को प्रकट किया जिसे पता था कि पराधीन राष्ट्र के गौरव की बहाली कैसे की जाए। उन्होंने देश की आज़ादी के बाद उसे दुनिया के अग्रणी राष्ट्रों में स्थान पाने में मदद की।
ये परियोजनाएँ जिस बड़े पैमाने की थीं, उसके लिए बहुत दम-गुर्दे की आवश्यकता थी। कुछ मामलों में तो बस लगे रहने की ज़िद थी जो कि रंग लाई—जैसे कि इस्पात परियोजना के लिए उपयुक्त जगह की तलाश करने का मामला असीम धैर्य के कारण हल हुआ। दूसरे मामलों में, जैसे—इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस में मान-मनुहार करने का उनका लाजवाब कौशल और धैर्य ही था जिसने आख़िरकार शंकालु वाइसराय लॉर्ड कर्जन से उन्हें मंजूरी दिलवाई।
‘भारत से प्यार’ में आर.एम. लाला ने जमशेत जी और उनके समय के जीवन्त चित्रण के लिए लन्दन की इंडिया ऑफ़िस लाइब्रेरी और दूसरे अभिलेखागारों की नवीन सामग्री के साथ-साथ उनके पत्रों का उपयोग किया। यह एक महत्त्वपूर्ण लेखा-जोखा है जो स्पष्ट कर देता है कि जशमेत जी की उपलब्धि वाक़ई मानीखेज़ थी और उनकी मृत्यु के सौ साल बाद भी ऐसा क्यों जान पड़ता है कि वे अपने समय से बहुत आगे थे।
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