Manzil Ab Bhi Door
Author:
Gangadhar ChitneesPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Unavailable
‘मंज़िल अब भी दूर’ मुम्बई के कर्मठ साम्यवादी नेता और ट्रेड यूनियन आन्दोलन के अगुआ व्यक्तित्व—गंगाधर चिटणीस द्वारा लिखित मराठी पुस्तक ‘मंज़िल अजून दूरच!’ का स्वतंत्र हिन्दी अनुवाद है।
स्व. कॉ. चिटणीस ने अपने 50-60 वर्षों के अनुभवों के आधार पर स्थिति का आकलन कर भारत के ट्रेड यूनियन आन्दोलन में एटक, मुम्बई गिरणी कामगार यूनियन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के योगदान, कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा समय-समय पर की गई ग़लतियों, राजनीति का आकलन करने में हुई भूलों, कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन और इन सबके कारण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, एटक, वामपंथी आन्दोलन, ट्रेड यूनियन आन्दोलन और भारतीय राजनीति पर हुए विपरीत प्रभावों; पार्टी द्वारा आपातकाल को दिए गए समर्थन, उसके पार्टी पर हुए विपरीत प्रभावों, मुम्बई की मिलों में हुई डॉ. दत्ता सामन्त की ऐतिहासिक असफल हड़ताल आदि तमाम घटनाओं का निष्पक्ष विवेचन, समालोचन व आकलन किया है।
आत्मकथा के रूप में लिखी इस पुस्तक में लेखक ने अपने स्वयं के पिछले साठ वर्षों के अनुभवों के आधार पर समय-समय पर होनेवाली घटनाओं जिसमें भारत में ट्रेड यूनियन आन्दोलन, कम्युनिस्ट आन्दोलन, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय घटनाएँ, विशेषकर मुम्बई के साथ-साथ भारत के एक समय के वैभवशाली टेक्सटाइल उद्योग व उसके श्रम आन्दोलन, स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक की सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक स्थिति का एक ईमानदार लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है।
कॉ. चिटणीस पक्के आशावादी थे। ‘मंज़िल’ दूर होते हुए भी उन्हें पक्का विश्वास था कि एक न एक दिन इस देश का संघर्षरत अवाम मंज़िल पर ज़रूर पहुँचेगा। समाज की भलाई के लिए उसे पहुँचना ही होगा।
यह किताब इन सारी घटनाओं का प्रामाणिक दस्तावेज़ है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह कम्युनिस्ट विचारधारा में विश्वास रखता हो या विरोधी हो, ज़रूर पढ़ना चाहिए।
ISBN: 9788126721023
Pages: 176
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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आज़ाद भारत के साथ ही राजकपूर की सृजन-यात्रा भी शुरू होती है। उन्होंने 6 जुलाई, 1947 को ‘आग’ का मुहूर्त किया था और 6 जुलाई, 1948 को ‘आग’ प्रदर्शित हुई थी। भारत की आज़ादी जब उफक पर खड़ी थी और सहर होने को थी, तब राजकपूर ने अपनी पहली फ़िल्म बनाई थी। ‘आग’ आज़ादी की अलसभोर की फ़िल्म थी, जब ग़ुलामी का अँधेरा हटने को था और आज़ादी की पहली किरण आने को थी। ‘आग’ में भारत की व्याकुलता है, जो सदियों की ग़ुलामी तोड़कर अपने सपनों को साकार करना चाहता है। राजकपूर की आख़िर फ़िल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ 15 अगस्त, 1985 को प्रदर्शित हुई। इस फ़िल्म में राजकपूर ने उस कुचक्र को उजागर किया है, जो कहता है कि पैसे से सत्ता मिलती है और सत्ता से पैसा पैदा होता है। इस तरह राजकपूर ने अपनी पहली फ़िल्म ‘आग’ से लेकर अन्तिम फ़िल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ तक भारत के जनमानस के प्रतिनिधि फ़िल्मकार की भूमिका निभाई है।
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‘लखनऊ से लाहौर तक’ में श्रीमती प्रकाशवती पाल ने ऐसी अनेक ऐतिहासिक घटनाओँ और व्यक्तियों के संस्मरण प्रस्तुत किए हैं जिनसे उनका प्रत्यक्ष और सीधा सम्पर्क रहा है। संस्करण क्रम-बद्ध रूप में 1929 से शुरू होते हैं। उस वर्ष सरदार भगत सिंह ने देहली असेम्बली में बम फेंका था। लाहौर कांग्रेस में आज़ादी का प्रस्ताव भी उसी वर्ष पास हुआ था।
क्रान्तिकारी आन्दोलन में प्रकाशवती जी किशोरावस्था में ही शामिल हो गई थीं। अनेक संघर्षों और ख़तरनाक स्थितियों के बीच में चन्द्रशेखर आज़ाद, भगवती चरण, यशपाल आदि क्रान्तिकारियों के निकट सम्पर्क में आईं। एक अभूतपूर्व घटना के रूप में 1936 में उनका विवाह बन्दी यशपाल से जेल के भीतर सम्पन्न हुआ।
इन और ऐसी अनेक स्मृतियों को समेटते हुए ये संस्मरण आज़ादी की लड़ाई और बाद के अनेक अनुभवों को ताज़ा करते हैं, साथ ही अनेक राजनीतिज्ञों, क्रान्तिकारियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों के जीवन पर सर्वथा नया प्रकाश डालते हैं। यह पुस्तक पिछले पैंसठ वर्षों के दौरान राजनीति और साहित्य के कई अल्पविदित पक्षों का आधिकारिक, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और पठनीय दस्तावेज़ है।
Abra Kya Chiz Hai? Hawa Kya Hai?
- Author Name:
Krishna Baldev Vaid
- Book Type:

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कृष्ण बलदेव वैद की डायरियों की जो पुस्तकें इससे पहले प्रकाशित हुई हैं, उन्हें अपनी बेबाकी, लेखक के निर्मम आत्मालोचन, व्यक्तियों और घटनाओं पर तात्कालिक प्रतिक्रियाओं, अनेक देशी-विदेशी लेखकों और कृतियों के आस्वादन और प्रासंगिक आकलन के लिए याद किया जाता है। उनका अनौपचारिक गद्य, फिर भी, एक बड़े लेखक का गद्य है और ये डायरियाँ अपने समय-समाज-साहित्य आदि को देखने, गुनने का एक लेखकीय उपक्रम। उसके वितान में मित्र, लेखक, कलाकार आदि सब आते हैं और उसमें आपबीती रोचक ढंग से परबीती बनती जान पड़ती है।
—अशोक वाजपेयी
It's Not That Hard
- Author Name:
Manas Shalini Mukund
- Rating:
- Book Type:

- Description: When 16-year-old Manas complains of back pain, his parents assume it to be a result of his back-to-back cricket matches. Little do they know that this is going to turn out to be a malignant tumour which leads to partial paralysis. The Covid pandemic also sets in, adding its own complications to the mix. What kind of battle are this life-loving, strong-willed teenager and his family compelled to face? This boy's journey full of determination and courage provokes a question: How rock solid does one need to be to go through a tunnel this deep and walk out to be able to say, 'It's not that hard'?
Maharishi Dayanand
- Author Name:
Yaduvansh Sahay
- Book Type:

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महर्षि दयानन्द के सामने बड़ा सवाल था कि भारतीय संस्कृति के परस्पर-विरोधी तत्त्वों का समाधान किस प्रकार हो। उन्होंने देखा कि एक ओर जहाँ इस संस्कृति में मानव-जीवन और समाज के उच्चतम मूल्यों की रचनाशीलता परिलक्षित होती है, वहीं दूसरी ओर उसमें मानवता-विरोधी, समाज के शोषण को समर्थन देनेवाले, अन्धविश्वासों का पोषण करनेवाले विचार भी पाए जाते हैं। अतः उनके मन को उद्वेलित करनेवाली बात यह थी कि हमारी सांस्कृतिक मूल्य-दृष्टि की प्रामाणिकता क्या है? सत्य के लिए, मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए प्रामाणिकता की आवश्यकता क्या है?
गांधी को अपने सत्य के लिए किसी धर्म-विशेष के ग्रन्थ की प्रामाणिकता की आवश्यकता नहीं हुई। लेकिन दयानन्द के युग में पश्चिमी संस्कृति की बड़ी आक्रामक चुनौती थी। स्वतः यूरोप में 19वीं शती से विज्ञान और नए मानववाद के प्रभाव से मध्ययुगीन धर्म की उपेक्षा की जा रही थी, और मध्ययुगीन आस्था के स्थान पर बुद्धि और तर्क का आग्रह बढ़ा था; परन्तु भारत में यूरोप के मध्ययुगीन धर्म को विज्ञान और मानववाद के साथ आधुनिक कहकर रखा जा रहा था। धर्म को अपने प्रभाव को बढ़ाने और सत्ता को स्थायी बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा था। अतः भारतीय संस्कृति की ओर से इस चुनौती को स्वीकार करने में भारतीय अध्यात्म के वैज्ञानिक तथा मानवतावादी स्वरूप की स्थापना आवश्यक थी। फिर भारतीय अध्यात्म को इस रूप में विवेचित करने के लिए आधार-रूप प्रामाणिकता की अपेक्षा थी और इस दिशा में महर्षि दयानन्द ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। यह पुस्तक हमें उसकी पूरी विचार-यात्रा से परिचित कराती है और उनके प्रेरणादायी जीवन के अहम पहलुओं से भी अवगत कराती है।
Wo Tere Pyar Ka Gam
- Author Name:
Ishmadhu Talwar
- Book Type:

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दान सिंह का निधन मैलोडी के लिए बड़ा नुक़सान है। मैं उन्हें मूल्यों और गरिमा में गहरा विश्वास रखनेवाले इनसान के रूप में याद करता हूँ।
—गुलज़ार; मशहूर गीतकार
दान सिंह जी की धुनों से सजा गीत—‘वो तेरे प्यार का गम’—मेरे पिताजी (मुकेश) के गाये सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक था।
—नितिन मुकेश; प्रसिद्ध गायक
वरिष्ठ संगीतकार दान सिंह जी ने ‘माइ लव' के रूप में फ़िल्मी संगीत को ऐसा तोहफ़ा दिया है जिसकी चमक कोहिनूर हीरे जैसी है। जब भी अच्छे और पायेदार फ़िल्मी संगीत की बात होगी तो ‘माइ लव’ के संगीत को शायद नहीं भूला जाएगा। दान सिंह जी उन ख़ुशनसीबों में से थे जो बहुत कम समय फ़िल्म जगत में रहकर और बहुत कम काम करके अमर हो गए।
—इरशाद कामिल; मशहूर फ़िल्म गीतकार
जयपुर के पत्रकार ईशमधु तलवार ने किसी ज़माने में ख्याति पाए संगीतकार दान सिंह, जिनके मृत होने की अफ़वाह थी, को जीवित खोज निकाला और तनहा गुमशुदा-सी ज़िन्दगी के अँधेरों से वे बाहर आए।
—जयप्रकाश चौकसे; प्रसिद्ध फ़िल्म समीक्षक
दान सिंह जी के संगीत की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वो अपने समय के सभी दिग्गजों के बीच अपनी अलग धारा चले, पक्की और मधुर धुनों के साथ-साथ दान सिंह ने कविता की ऊँचाई को भी क़ायम रखा।
—यूनुस ख़ान; मशहूर रेडियो एनाउंसर, विविध भारती, मुम्बई
Pinjre ki maina
- Author Name:
Chandrakiran Sonrexa
- Book Type:

- Description: हिन्दी की उत्कृष्ट आत्मकथाओं में स्वीकृत ‘पिंजरे की मैना’ सिर्फ़ एक स्त्री की नहीं, पूरे एक युग की कथा है जो 1857 के आसपास के समय से शुरू होकर आज़ाद भारत तक आती है और सामाजिक-राजनीतिक इतिहास के पतले गलियारों से गुज़रते हुए एक परम्परानिष्ठ लेकिन अत्यन्त प्रतिभावान स्त्री की पीड़ा का लोमहर्षक चित्र सामने लाती है।औपन्यासिक वितान में रची गई इस आत्मकथा में संयुक्त परिवार, उसमें स्त्री की स्थिति और दाम्पत्य जीवन के जैसे चित्र अंकित किए गए हैं, उनका समाजशास्त्रीय महत्त्व है। एक रचनाशील और स्वातंत्र्यबोध से सम्पन्न शिक्षित स्त्री पारम्परिक- पारिवारिक रूढ़ियों, आर्थिक समस्याओं और पुरुष-कुंठाओं के बावजूद कैसे अपनी सृजनात्मकता को बचाए रहती है, और आनेवाली अपनी पीढ़ी के लिए किस तरह एक उदार और मानवीय वातावरण का निर्माण करती है, इस आत्मकथा में निर्मम तटस्थता के साथ चन्द्रकिरण जी ने उसका विस्तृत और दैनंदिन ब्योरा दिया है।चन्द्रकिरण सौनरेक्सा सक्षम कथाकार रही हैं। अपने समय, समाज और सामाजिक-पारिवारिक जीवन की तमाम गुत्थियों को जानने-समझने वाली एक सजग मेधा जिन्हें स्त्रीत्व की मध्यवर्गीय सीमाओं से लगातार लोहा लेना पड़ा। लेकिन उन्होंने न अपनी लेखनी को रुकने दिया और न अपने भीतर की मनुष्यता को फीका पड़ने दिया, और न ही अपने किसी दायित्व से ही मुँह मोड़ा।उनकी कहानी कला को लेकर कथाकार-उपन्यासकार विष्णु प्रभाकर का कहना था, ‘महादेवी को जो प्रसिद्धि कविता के क्षेत्र में प्राप्त हुई है, वही चन्द्रकिरण जी ने कहानी के क्षेत्र में पाई। मध्यवर्ग की नारी का जितना यथार्थ-चित्रण आपकी कहानियों में हुआ है, शायद ही किसी कथाकार की कृतियों में हुआ हो।’इस आत्मकथा में भी उनका कथाकार अपनी पूरी क्षमता के साथ मौजूद है। अपने परदादा की पीढ़ी से लेकर आज तक की अपनी कहानी को उन्होंने सभी प्रसंगों और पात्रों के साथ एक विराट कलेवर में प्रस्तुत किया है।
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