🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Logaan

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

ये वो दिन थे, जब नागभूषण पटनायक को फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी। और उन्होंने जनता के नाम एक क्रान्तिकारी ख़त लिखा था। इस ख़त की प्रतियाँ हमारे साथियों के बीच भी बँटी थीं और इस पर गम्भीर बहस का दौर चला था। उन चर्चाओं और बहस के दौरान ही गोविन्दपुर का एक बूढ़ा मुसहर बोल उठा था—‘हम आपकी बात नहीं समझ पाते, बाबू। देश-समाज में हमारी गिनती ही कहाँ है। सभ्यता और संस्कृति जैसे शब्द हमारे लिए अजनबी हैं। हम तो केवल इतना जानते-समझते हैं कि जिस पैला (बर्तन) में हमें मज़दूरी मिलती है, उसका आधा हिस्सा किसानों ने आटे से भर दिया है। पैला छोटा हो गया है। इससे दी जानेवाली मज़दूरी आधी हो जाती है। जो राज आप बनाना चाहते हैं, उसमें पैला का यह आटा खरोंच कर आप निकाल पाएँगे क्या—हमारे लिए तो यही सबसे बड़ा शोषण और अन्याय है। हम इसके अलावा और कोई बात कैसे समझें?’ बूढ़े मानकी माँझी की शराब के नशे में कही गई यह बात बे-असर नहीं थी। हम उसकी समझ और चेतना देखकर स्तब्ध रह गए थे। मानकी ने यह बात मुसहरी में अपने झोंपड़े के सामने पड़ी खाट पर बैठे-बैठे सहज भाव से कह दी थी। मगर हमारे चेहरे पर एक बड़ा सवालिया निशान उभर आया था। कुछ ऐसी ही पंक्तियाँ बिखरी पड़ी हैं जाबिर हुसेन की इस डायरी के इन पन्नों पर जो आपको इन पन्नों से गुज़रने के लिए आमंत्रित करती हैं।

Read more

₹ 225

180 20% off

Unavailable

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

This Book is out of stock
Frequently bought together
Logaan This book ₹180
Oak Mein Boonden Zabir Hussain ₹299
Ret Ret Lahoo Zabir Hussain ₹300
3 books selected ₹824 ₹779
This Book is out of stock

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

ये वो दिन थे, जब नागभूषण पटनायक को फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी। और उन्होंने जनता के नाम एक क्रान्तिकारी ख़त लिखा था। इस ख़त की प्रतियाँ हमारे साथियों के बीच भी बँटी थीं और इस पर गम्भीर बहस का दौर चला था। उन चर्चाओं और बहस के दौरान ही गोविन्दपुर का एक बूढ़ा मुसहर बोल उठा था—‘हम आपकी बात नहीं समझ पाते, बाबू। देश-समाज में हमारी गिनती ही कहाँ है। सभ्यता और संस्कृति जैसे शब्द हमारे लिए अजनबी हैं। हम तो केवल इतना जानते-समझते हैं कि जिस पैला (बर्तन) में हमें मज़दूरी मिलती है, उसका आधा हिस्सा किसानों ने आटे से भर दिया है। पैला छोटा हो गया है। इससे दी जानेवाली मज़दूरी आधी हो जाती है। जो राज आप बनाना चाहते हैं, उसमें पैला का यह आटा खरोंच कर आप निकाल पाएँगे क्या—हमारे लिए तो यही सबसे बड़ा शोषण और अन्याय है। हम इसके अलावा और कोई बात कैसे समझें?’ बूढ़े मानकी माँझी की शराब के नशे में कही गई यह बात बे-असर नहीं थी। हम उसकी समझ और चेतना देखकर स्तब्ध रह गए थे। मानकी ने यह बात मुसहरी में अपने झोंपड़े के सामने पड़ी खाट पर बैठे-बैठे सहज भाव से कह दी थी। मगर हमारे चेहरे पर एक बड़ा सवालिया निशान उभर आया था।

कुछ ऐसी ही पंक्तियाँ बिखरी पड़ी हैं जाबिर हुसेन की इस डायरी के इन पन्नों पर जो आपको इन पन्नों से गुज़रने के लिए आमंत्रित करती हैं।

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2005
Weight
374 grams
ISBN-13
9788126711116
Pages
206
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp