Patthar Aur Parchhaiyan
(0)
Author:
MarkandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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इस एकांकी-संग्रह में आठ एकांकी हैं जिनके द्वारा मार्कण्डेय की आन्तरिक और बाह्य दोनों द्वन्द्वों और चिन्ताओं को समझा जा सकता है<strong>।</strong> इन एकांकियों में भी कहानियों की तरह सामाजिक पृष्ठभूमि में हमारा आज का जीवन और समस्याएँ हैं<strong>।</strong> बड़ी विशेषता यह है कि वह नाटक—बल्कि एकांकी-जैसी विधा को गाँव की ओर ले जाते हैं<strong>!</strong> क्योंकि मार्कण्डेय यह महसूस करते थे कि ग्रामीण जीवन-सन्दर्भों में परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत धीमी या नहीं के बराबर ही रही है, इसलिए ग्राम-चेतना अपने प्राचीन अवदानों से चिपकी है<strong>।</strong> उसने अनेक कारणों से वाचिक पद्धति द्वारा ही अपनी संस्कृति को अपनी आगामी पीढ़ी तक सम्प्रेषित किया है<strong>।</strong></p> <p>एकांकी को गाँव की ओर ले जाने से उनके सामने चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं—विषय की, नाट्य-शिल्प की, भाषा की, रंग-शैली की, पात्र, कथानक सबकी<strong>।</strong> आज जो सवाल उठे हुए हैं—गाँव के, जनता के, आम आदमी और जनचेतना के, क्या ये एकांकी उन सवालों को पूरा कर पाएँगे? लोकभाषा, लोकनाटक, लोकमंत्र, नुक्कड़ नाटक जैसी स्थितियों से भी वह गुज़रना चाहते हैं हालाँकि वह हिन्दी रंगमंच की स्थिति को भी अच्छी तरह समझ ही रहे थे<strong>।</strong></p> <p>1956 में पहली बार प्रकाशित ‘पत्थर और परछाइयाँ’ पुस्तक में छह एकांकी ‘डंका बुआ’ और ‘रसोईघर’ जोड़े गए हैं। उम्मीद है कि पाठकों के ऊपर यह एकांकी-संग्रह अलग अन्तर्वस्तु और भाषा-शैली के साथ छाप छोड़ने में सफल होगा<strong>।</strong>
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इस एकांकी-संग्रह में आठ एकांकी हैं जिनके द्वारा मार्कण्डेय की आन्तरिक और बाह्य दोनों द्वन्द्वों और चिन्ताओं को समझा जा सकता है<strong>।</strong> इन एकांकियों में भी कहानियों की तरह सामाजिक पृष्ठभूमि में हमारा आज का जीवन और समस्याएँ हैं<strong>।</strong> बड़ी विशेषता यह है कि वह नाटक—बल्कि एकांकी-जैसी विधा को गाँव की ओर ले जाते हैं<strong>!</strong> क्योंकि मार्कण्डेय यह महसूस करते थे कि ग्रामीण जीवन-सन्दर्भों में परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत धीमी या नहीं के बराबर ही रही है, इसलिए ग्राम-चेतना अपने प्राचीन अवदानों से चिपकी है<strong>।</strong> उसने अनेक कारणों से वाचिक पद्धति द्वारा ही अपनी संस्कृति को अपनी आगामी पीढ़ी तक सम्प्रेषित किया है<strong>।</strong></p>
<p>एकांकी को गाँव की ओर ले जाने से उनके सामने चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं—विषय की, नाट्य-शिल्प की, भाषा की, रंग-शैली की, पात्र, कथानक सबकी<strong>।</strong> आज जो सवाल उठे हुए हैं—गाँव के, जनता के, आम आदमी और जनचेतना के, क्या ये एकांकी उन सवालों को पूरा कर पाएँगे? लोकभाषा, लोकनाटक, लोकमंत्र, नुक्कड़ नाटक जैसी स्थितियों से भी वह गुज़रना चाहते हैं हालाँकि वह हिन्दी रंगमंच की स्थिति को भी अच्छी तरह समझ ही रहे थे<strong>।</strong></p>
<p>1956 में पहली बार प्रकाशित ‘पत्थर और परछाइयाँ’ पुस्तक में छह एकांकी ‘डंका बुआ’ और ‘रसोईघर’ जोड़े गए हैं। उम्मीद है कि पाठकों के ऊपर यह एकांकी-संग्रह अलग अन्तर्वस्तु और भाषा-शैली के साथ छाप छोड़ने में सफल होगा<strong>।</strong>
Book Details
-
ISBN9788180317675
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: यह आत्मकथा बिना आत्मदया या किसी क़िस्म की आत्मश्लाघा के हमारे सामाजिक यथार्थ को सामने लाती है। दलित लेखकों की परम्परागत कथा से अलग, यह ऐसा आत्म–वृत्तान्त है जो समाज के छोटे–छोटे अपराधों पर परवरिश पाते एक समूह का प्रतिनिधित्व करता है ‘‘मैं तब मराठी की पहली कक्षा में ही पढ़ रहा था। तब जिस किसी पुस्तक का पहला पृष्ठ खोलता उस पर लिखा होता, ‘भारत मेरा देश है। सारे भारतीय मेरे बन्धु हैं। मुझे इस देश की परम्परा का अभिमान है।’ मुझे लगता है कि अगर यह सब कुछ सही–सही है तो फिर हमें बिना अपराध के पीटा क्यों जाता है? माँ को पुलिस क्यों पीटती है? उसकी साड़ी खींचकर यह क्यों कहती है ‘चल साड़ी खोल के दिखा, तूने चोरी की है न!’ मुझे लगता है अगर भारत मेरा देश है, तो फिर हमारे साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया जाता है? अगर सभी भारतीय भाई–भाई हैं, तो फिर हम जैसे भाइयों को काम क्यों नहीं दिया जाता? हमें खेती के लिए ज़मीन क्यों नहीं दी जाती? रहने के लिए हमें अच्छा मकान क्यों नहीं मिलता? अगर हम सब भाई हैं, तो मेरे भाइयों को, घर का खर्चा चलाने के लिए या पुलिस को रिश्वत देने के लिए, चोरी क्यों करनी पड़ती है?’ ऐसे कई प्रश्न हैं, जिन्हें यूँ ही ख़ारिज नहीं किया जा सकता। बिना किसी दुराव–छिपाव के लेखक सहजतापूर्वक बारी–बारी से कई सवालों से जूझता है। बेबाक और अहम साहित्यिक कृति होने के साथ–साथ यह एक महत्त्वपूर्ण व संग्रहणीय दस्तावेज़ है।
Indradhanush Ke Pichhe Pichhe
- Author Name:
R. Anuradha
- Book Type:

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Description:
लगभग छह साल पहले एक रोज़ अचानक लेखिका को पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है। कैंसर जैसी बीमारी ट्यूमर चौथे स्टेज में और उसका विस्तार बगल के लिंफ नोड्स में भी। मृत्यु से इससे निकट का साक्षात्कार शायद और कुछ नहीं हो सकता। इस बीमारी ने लेखिका की दुनिया बदल दी, लेकिन उन्होंने इस जीवन का अन्त मानने से इनकार कर दिया।
लेखिका की राय में कैंसर को दुश्मन मानकर उससे किसी बाहरी संक्रमण की तरह नहीं लड़ा जा सकता। आख़िर यह एक ऐसी बीमारी है जो बाहर से नहीं आती। इसके कारण हमारे-आपके शरीर के अन्दर होते हैं।
यह किताब मृत्यु पर जीवन की विजय की कहानी है और असम्भव मान ली गई स्थितियों में जीने का सलीक़ा सिखाती है। कैंसर का पता चलने से लेकर इलाज के दौरान हुए प्रसंगों और अनुभवों को इसमें समेटा गया है। इसके सभी पात्र और घटनाएँ वास्तविक हैं, लेकिन पहचान छिपाने के लिए कुछ पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं।
Jamsetji Tata
- Author Name:
Harish Bhat +1
- Rating:
- Book Type:

- Description: Jamsetji Tata pioneered modern Indian industry. He has been a key catalyst in the economic growth and development of the country. From Empress Mills to the Iron and Steel Plant, from the establishment of Indian Institue of Science to the building of the Taj Mahal Hotel, Jamsetji’s vision made India stand tall. In this carefully researched account, R Gopalakrishnan and Harish Bhat provide insights into the entrepreneurial principles of Jamsetji that helped create such a successful and enduring enterprise. His contribution and that of his successors has led to the institutionalization of Tata values. Over the decades, through hard work, determination, and a consistent vision, he and his successors have embedded these values in the organization, which has stood the test of time and has consistently contributed to the country’s industrial development. The book takes readers into the heart of this amazing story and what has made it possible. Interwoven with engaging real-life stories about iconic leaders of the Tata Group, and interesting anecdotes that went into the making of India’s popular brands such as Tata Tea, Tata Steel, Tata Motors and Tanishq, this unique account brings alive the vision of Jamsetji Tata and tells us what we can learn from it.
Anam Yogi Ki Diary
- Author Name:
Deepak Yogi
- Book Type:

- Description: सत्य और असत्य क्या है, इसको बताया नहीं जा सकता। समय और परिस्थिति के अनुसार यह परिवर्तित होता रह सकता है। ईश्वर का अस्तित्व अनाम है, कोई धर्मशास्त्र या धर्मशास्त्री उसे नहीं जान सका। फिर भी यह खोज चलती रहती है। ऐसी ही एक खोज का नतीजा है यह पुस्तक। एक साधारण व्यक्ति को एक दिन सहसा अपने दैनंदिन जीवन की निरर्थकता का भान होता है और यह हिमालय की यात्रा को चल पड़ता है। मकसद है उस सम्पूर्ण की उपलब्धि जिसके लिए हर युग का मनुष्य अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़कर भटका और जो युगों-युगों से हमारे आधे-अधूरे अस्तित्व को आकर्षित करता रहा। अपनी इस यात्रा के मोड़ों, बाधाओं, पड़ावों और उपलब्धियों का लेखा-जोखा लेखक ने अपनी इस डायरी में प्रस्तुत किया है। हिमालय की बर्फ़ीली चोटियों, घाटियों और कन्दराओं में बसे साधुओं-वैरागियों और इस क्षेत्र के जनजीवन के दृश्यों के साथ अपनी इस डायरी में लेखक ने अपने भीतर के ‘व्यक्ति’ से मुठभेड़ के ब्यौरे भी दर्ज किए हैं। एक भिन्न बोध की पुस्तक।
Maharishi Dayanand
- Author Name:
Yaduvansh Sahay
- Book Type:

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Description:
महर्षि दयानन्द के सामने बड़ा सवाल था कि भारतीय संस्कृति के परस्पर-विरोधी तत्त्वों का समाधान किस प्रकार हो। उन्होंने देखा कि एक ओर जहाँ इस संस्कृति में मानव-जीवन और समाज के उच्चतम मूल्यों की रचनाशीलता परिलक्षित होती है, वहीं दूसरी ओर उसमें मानवता-विरोधी, समाज के शोषण को समर्थन देनेवाले, अन्धविश्वासों का पोषण करनेवाले विचार भी पाए जाते हैं। अतः उनके मन को उद्वेलित करनेवाली बात यह थी कि हमारी सांस्कृतिक मूल्य-दृष्टि की प्रामाणिकता क्या है? सत्य के लिए, मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए प्रामाणिकता की आवश्यकता क्या है?
गांधी को अपने सत्य के लिए किसी धर्म-विशेष के ग्रन्थ की प्रामाणिकता की आवश्यकता नहीं हुई। लेकिन दयानन्द के युग में पश्चिमी संस्कृति की बड़ी आक्रामक चुनौती थी। स्वतः यूरोप में 19वीं शती से विज्ञान और नए मानववाद के प्रभाव से मध्ययुगीन धर्म की उपेक्षा की जा रही थी, और मध्ययुगीन आस्था के स्थान पर बुद्धि और तर्क का आग्रह बढ़ा था; परन्तु भारत में यूरोप के मध्ययुगीन धर्म को विज्ञान और मानववाद के साथ आधुनिक कहकर रखा जा रहा था। धर्म को अपने प्रभाव को बढ़ाने और सत्ता को स्थायी बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा था। अतः भारतीय संस्कृति की ओर से इस चुनौती को स्वीकार करने में भारतीय अध्यात्म के वैज्ञानिक तथा मानवतावादी स्वरूप की स्थापना आवश्यक थी। फिर भारतीय अध्यात्म को इस रूप में विवेचित करने के लिए आधार-रूप प्रामाणिकता की अपेक्षा थी और इस दिशा में महर्षि दयानन्द ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। यह पुस्तक हमें उसकी पूरी विचार-यात्रा से परिचित कराती है और उनके प्रेरणादायी जीवन के अहम पहलुओं से भी अवगत कराती है।
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