Patthar Aur Parchhaiyan
(0)
Author:
Dr. Girish Rastogi, MarkandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
250
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इस एकांकी-संग्रह में आठ एकांकी हैं जिनके द्वारा मार्कण्डेय की आन्तरिक और बाह्य दोनों द्वन्द्वों और चिन्ताओं को समझा जा सकता है<strong>।</strong> इन एकांकियों में भी कहानियों की तरह सामाजिक पृष्ठभूमि में हमारा आज का जीवन और समस्याएँ हैं<strong>।</strong> बड़ी विशेषता यह है कि वह नाटक—बल्कि एकांकी-जैसी विधा को गाँव की ओर ले जाते हैं<strong>!</strong> क्योंकि मार्कण्डेय यह महसूस करते थे कि ग्रामीण जीवन-सन्दर्भों में परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत धीमी या नहीं के बराबर ही रही है, इसलिए ग्राम-चेतना अपने प्राचीन अवदानों से चिपकी है<strong>।</strong> उसने अनेक कारणों से वाचिक पद्धति द्वारा ही अपनी संस्कृति को अपनी आगामी पीढ़ी तक सम्प्रेषित किया है<strong>।</strong></p> <p>एकांकी को गाँव की ओर ले जाने से उनके सामने चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं—विषय की, नाट्य-शिल्प की, भाषा की, रंग-शैली की, पात्र, कथानक सबकी<strong>।</strong> आज जो सवाल उठे हुए हैं—गाँव के, जनता के, आम आदमी और जनचेतना के, क्या ये एकांकी उन सवालों को पूरा कर पाएँगे? लोकभाषा, लोकनाटक, लोकमंत्र, नुक्कड़ नाटक जैसी स्थितियों से भी वह गुज़रना चाहते हैं हालाँकि वह हिन्दी रंगमंच की स्थिति को भी अच्छी तरह समझ ही रहे थे<strong>।</strong></p> <p>1956 में पहली बार प्रकाशित ‘पत्थर और परछाइयाँ’ पुस्तक में छह एकांकी ‘डंका बुआ’ और ‘रसोईघर’ जोड़े गए हैं। उम्मीद है कि पाठकों के ऊपर यह एकांकी-संग्रह अलग अन्तर्वस्तु और भाषा-शैली के साथ छाप छोड़ने में सफल होगा<strong>।</strong>
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इस एकांकी-संग्रह में आठ एकांकी हैं जिनके द्वारा मार्कण्डेय की आन्तरिक और बाह्य दोनों द्वन्द्वों और चिन्ताओं को समझा जा सकता है<strong>।</strong> इन एकांकियों में भी कहानियों की तरह सामाजिक पृष्ठभूमि में हमारा आज का जीवन और समस्याएँ हैं<strong>।</strong> बड़ी विशेषता यह है कि वह नाटक—बल्कि एकांकी-जैसी विधा को गाँव की ओर ले जाते हैं<strong>!</strong> क्योंकि मार्कण्डेय यह महसूस करते थे कि ग्रामीण जीवन-सन्दर्भों में परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत धीमी या नहीं के बराबर ही रही है, इसलिए ग्राम-चेतना अपने प्राचीन अवदानों से चिपकी है<strong>।</strong> उसने अनेक कारणों से वाचिक पद्धति द्वारा ही अपनी संस्कृति को अपनी आगामी पीढ़ी तक सम्प्रेषित किया है<strong>।</strong></p>
<p>एकांकी को गाँव की ओर ले जाने से उनके सामने चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं—विषय की, नाट्य-शिल्प की, भाषा की, रंग-शैली की, पात्र, कथानक सबकी<strong>।</strong> आज जो सवाल उठे हुए हैं—गाँव के, जनता के, आम आदमी और जनचेतना के, क्या ये एकांकी उन सवालों को पूरा कर पाएँगे? लोकभाषा, लोकनाटक, लोकमंत्र, नुक्कड़ नाटक जैसी स्थितियों से भी वह गुज़रना चाहते हैं हालाँकि वह हिन्दी रंगमंच की स्थिति को भी अच्छी तरह समझ ही रहे थे<strong>।</strong></p>
<p>1956 में पहली बार प्रकाशित ‘पत्थर और परछाइयाँ’ पुस्तक में छह एकांकी ‘डंका बुआ’ और ‘रसोईघर’ जोड़े गए हैं। उम्मीद है कि पाठकों के ऊपर यह एकांकी-संग्रह अलग अन्तर्वस्तु और भाषा-शैली के साथ छाप छोड़ने में सफल होगा<strong>।</strong>
Book Details
-
ISBN9788180317675
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Book Type:

- Description:
जूठन’ ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा है। इसका पहला भाग बरसों पहले प्रकाशित होकर, आज हिन्दी दलित साहित्य और खासकर आत्मकथाओं की शृंखला में एक विशेष स्थान प्राप्त कर चुका है। वाल्मीकि जी अब हमारे बीच नहीं हैं, अपने जीवन-काल में उन्होंने 'जूठन’ के बाद साहित्य, समाज और संवेदना के दायरों में एक लम्बी यात्रा पूरी की। कई कथात्मक और आलोचनात्मक कृतियों के साथ उनके काव्य-संग्रह भी आए। 'जूठन’ का यह दूसरा भाग उनके उसी दौर का आख्यान है। आत्मकथा के इस दूसरे भाग की शुरुआत उन्होंने देहरादून की आर्डिनेंस फैक्ट्री में अपनी नियुक्ति से की है। नई जगह पर अपनी पहचान को लेकर आई समस्याओं के साथ-साथ यहाँ मजदूरों के साथ जुड़ी अपनी गतिविधियों का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी साहित्यिक सक्रियता का भी विस्तार से उल्लेख किया है। सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय भाषा में लिखी गई यह पुस्तक देहरादून से जबलपुर और वहाँ से पुन: देहरादून की यात्रा करती हुई शिमला उच्च अध्ययन संस्थान और फिर उनके अस्वस्थ होने तक जाती है। दलित साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में 'जूठन’ के इस दूसरे भाग को पढ़ना एक अलग अनुभव है।
Tumhare Naam : Jan Nisar Akhtar ko Safia Akhtar ke khat
- Author Name:
Safia Akhtar
- Book Type:

- Description:
जाँ निसार अख़्तर और उनकी शरीके-हयात सफ़िया अख़्तर को साथ रहने का मौक़ा बहुत कम मिला। उस ज़माने में जब औरतों के लिए घर से बाहर जाकर काम करना बहुत आम बात नहीं थी, वे स्कूल में अपनी नौकरी करती रहीं और न सिर्फ़ अपनी और अपने बच्चों, बल्कि मुम्बई की फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी ज़मीन तलाश रहे जाँ निसार साहब के लिए भी सम्बल जुटाती रहीं।
ये ख़त उन्होंने इसी संघर्ष के दौरान लिखे, लेकिन ये ख़त सिर्फ़ उनके हाल-अहवाल की सूचना-भर नहीं देते, बल्कि वे एक बड़े सृजक की क़लम से उतरे शाहकार की तरह हमारे सामने आते हैं। ज़िन्दगी उन्हें कुछ और वक़्त देती तो निश्चय ही वे साहित्य की दुनिया को कुछ बड़ा देकर जातीं। इन ख़तों में उनकी मुहब्बत और हिम्मत के साथ-साथ उनकी और बेशक जाँ निसार अख़्तर की ज़िन्दगी खुलती जाती है, साथ ही उनका अपना दौर भी अपने तमाम स्याह-सफ़ेद के साथ रौशन होता जाता है। ये ख़त प्यार और हौसले से भरे एक दिल की अक़्क़ासी करते हैं। ये जादू की तरह असर करते हैं; इनका बेहद ताक़तवर और सधा हुआ ‘प्रोज़’ कहीं आपको रुकने नहीं देता, और इनकी तुर्श मिठास में डूबे-डूबे बारहा आपकी आँखें भर आती हैं।
उनके निधन के बाद जाँ निसार साहब ने उनके इन ख़तों को दो जिल्दों में प्रकाशित कराया—’हर्फ़े-आश्ना’ और ‘ज़ेरे-लब’। इस किताब में इन दोनों जिल्दों में संकलित ख़तों को दे दिया गया है।
Tumhare Naam : Jan Nisar Akhtar ko Safia Akhtar ke khat
Safia Akhtar
20% off₹ 199
₹ 159.2
Available
Yugon Ka Yatri : Nagarjun Ki Jeewani
- Author Name:
Taranand Viyogi
- Book Type:

- Description:
मिथिला के बन्द समाज से बाहर निकलकर नागार्जुन ने अपनी तमाम रचनाओं और सहज सुलभ व्यक्तित्व से एक ऐसा जागरण किया जिसकी आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है। वे सच्चे अर्थों में क्लैसिकल मॉडर्न थे। तारानन्द वियोगी की यह जीवनी पाठक को नागार्जुन के अन्त:करण में प्रवेश कराने में सक्षम है। उनके घने साहचर्य में जो रहे हैं, वे इसे पढ़कर बाबा की उपस्थिति फिर से अपने भीतर महसूस करेंगे। अपनी सशक्त लेखनी से तारानन्द ने बाबा नागार्जुन को पुनर्जीवित कर दिया है। यहाँ तथ्य और सत्य का सन्तुलित समन्वय है। बाबा से जुड़े शताधिक जनों के अनुभव उन्होंने बड़ी सहृदयता से अन्तर्ग्रथित किए हैं। बाबा नागार्जुन को संसार से विदा हुए बीस वर्ष से ज़्यादा हुए। इस बीच हिन्दी-मैथिली की जो तरुण पीढ़ी आई है, वह भी इस कृति से बाबा नागार्जुन का सम्पूर्ण साक्षात्कार कर सकेगी। बाबा के बारे में एक जगह लेखक ने लिखा है, 'स्मृति, दृष्टान्त और अनुभव का ज़खीरा था उनके पास।' तारानन्द की इस जीवनी में भी ये तीनों बातें आद्यन्त मौजूद हैं। बाबा के जीवन-सृजन पर यह बहुत रचनात्मक, ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य सम्पन्न हो सका है। मैं इतना ही कहूँगा कि बाबा की ऐसी प्रामाणिक जीवनी मैं भी नहीं लिख पाता। ‘युगों का यात्री' हिन्दी की कुछ सुप्रसिद्ध जीवनियों की शृंखला की अद्यतन सशक्त कड़ी है। —वाचस्पति, वाराणसी (दशकों तक नागार्जुन के क़रीब रहे अध्येता समीक्षक)
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