Baat Un Dino Ki Hai
(0)
Author:
Sriprakash Mani TripathaiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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बात उन दिनों की है पुस्तक संस्मरण भी है और आत्मीय ग्रामबोध का आख्यान भी। पुस्तक में ग्रामीण जीवन की सहज, सरल और मुक्त प्रकृति का चित्र खींचा गया है। इन चित्रों की रचना में लेखक स्वयं भी सम्मिलित है इसलिए इसकी शैली और शिल्प में एक विशेष प्रकार की चुम्बकीयता है।</p> <p>पुस्तक में यद्यपि व्यक्तिव्यंजक निबंध अंकित हैं, पर है यह गंवई सहजता का शब्दचित्र। ये शब्दचित्र छोटे-छोटे प्रसंगों में बांध कर रचे गए हैं। गाँव के विद्यालय, मेले, नदी-नाले ये सब पुस्तक में रोचक प्रसंग बनकर उभरे हैं। ग्रामीण खानपान का रसीला चित्र भी मिलेगा - नेनुआ की पनीली तरकारी के साथ गरम-गरम भात, होरहा, गट्टा, भुनी मटर हमें लोक जीवन का असली स्वाद चखाते हैं। कुछ व्यक्ति-चित्र और कुछ अतीत की वस्तुएँ जैसे बाइस्कोप, आनंद की सृष्टि करनेवाले हैं।</p> <p>आनंद का भाव पूरी पुस्तक में व्याप्त है। वास्तव में यही ग्राम जीवन का स्थायी भाव है। गाँव का यह आनंदी स्वभाव इस पुस्तक की आत्मा है। तीस प्रसंगों में प्रस्तुत यह पुस्तक अत्यंत पठनीय है। लेखक के आत्मीय भाव ने प्रसंगों की संवेदना को दोबाला कर दिया है। इस आत्मीयता के कारण पूरी पुस्तक की शैली कहीं भी शिथिल नहीं होती, बल्कि पाठक को अपने साथ बहाये लिए जाती है। यह प्रवाहमयता इस पुस्तक के गद्य की विशिष्टता है।
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बात उन दिनों की है पुस्तक संस्मरण भी है और आत्मीय ग्रामबोध का आख्यान भी। पुस्तक में ग्रामीण जीवन की सहज, सरल और मुक्त प्रकृति का चित्र खींचा गया है। इन चित्रों की रचना में लेखक स्वयं भी सम्मिलित है इसलिए इसकी शैली और शिल्प में एक विशेष प्रकार की चुम्बकीयता है।</p>
<p>पुस्तक में यद्यपि व्यक्तिव्यंजक निबंध अंकित हैं, पर है यह गंवई सहजता का शब्दचित्र। ये शब्दचित्र छोटे-छोटे प्रसंगों में बांध कर रचे गए हैं। गाँव के विद्यालय, मेले, नदी-नाले ये सब पुस्तक में रोचक प्रसंग बनकर उभरे हैं। ग्रामीण खानपान का रसीला चित्र भी मिलेगा - नेनुआ की पनीली तरकारी के साथ गरम-गरम भात, होरहा, गट्टा, भुनी मटर हमें लोक जीवन का असली स्वाद चखाते हैं। कुछ व्यक्ति-चित्र और कुछ अतीत की वस्तुएँ जैसे बाइस्कोप, आनंद की सृष्टि करनेवाले हैं।</p>
<p>आनंद का भाव पूरी पुस्तक में व्याप्त है। वास्तव में यही ग्राम जीवन का स्थायी भाव है। गाँव का यह आनंदी स्वभाव इस पुस्तक की आत्मा है। तीस प्रसंगों में प्रस्तुत यह पुस्तक अत्यंत पठनीय है। लेखक के आत्मीय भाव ने प्रसंगों की संवेदना को दोबाला कर दिया है। इस आत्मीयता के कारण पूरी पुस्तक की शैली कहीं भी शिथिल नहीं होती, बल्कि पाठक को अपने साथ बहाये लिए जाती है। यह प्रवाहमयता इस पुस्तक के गद्य की विशिष्टता है।
Book Details
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ISBN9788119133994
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Pages176
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: "सुविख्यात साहित्यकार श्री मदनगोपाल सिंहल एक सिद्धहस्त एवं कर्मठ व्यक्ति हैं। उन्होंने समाज को अपनी अनेकों प्रसिद्ध पुस्तकों के माध्यम से राष्ट्रीय प्रेरणा दी है। मुझे श्री सिंहलजी की नवीनतम कृति ‘हमारी गौरव गाथाएँ’ देखने का अवसर मिला। मैं रुग्ण हूँ तथा अस्वस्थ होने के कारण मुझ पर अधिक पढ़ने पर भी प्रतिबंध है, किंतु जब मैंने ‘हमारी गौरव गाथाएँ’ पुस्तक की स्वर्णिम गाथाओं को पढ़ना प्रारंभ किया तो बीच में न छोड़ सका। भारत के इतिहास की एक-एक पंक्ति में हमारा स्वर्णिम अतीत छिपा हुआ है। हमारे इतिहास में समस्त विश्व को प्रेरणा देने की महान् सामर्थ्य विद्यमान है। जगद्गुरु भारत से ही समस्त विश्व के कोने-कोने में ज्ञान, बलिदान एवं शौर्य की ज्योतिर्मय किरणें पहुँच पाई हैं। श्री सिंहलजी ने भारत के इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों की कुछ गाथाओं को इस पुस्तक में सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। 1857 वीरांगना लक्ष्मीबाई, क्रांतिकारी बालक एवं ‘हिंदू एशिया’ जैसी महान् पुस्तकों के रचयिता श्री सिंहलजी की यह नवीन कृति भी आदर पाने योग्य है। अपनी सभ्यता-संस्कृति की उपेक्षा करके पाश्चात्य-संस्कृति पर गर्व करनेवाले तथाकथित भारतीयों को यह गाथाएँ प्रेरणा प्रदान करेंगी, ऐसी मुझे पूर्ण आशा है। —वि.दा. सावरकर
Yug-Pravartak Dularelal Bhargava
- Author Name:
Dr. Pushpa Dwivedi
- Book Type:

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Description:
ब्रिटिश काल में जब उर्दू बाहुल्य वातावरण था ऐसे में युगान्तकारी हिन्दी प्रकाशक के रूप में दुलारेलाल जी उभरकर सामने आये। उनका संपूर्ण जीवन हिन्दी साहित्य की अभिवृद्धि करने में व्यतीत हुआ। तत्कालीन हिन्दी की लब्धप्रतिष्ठ पत्रिकाएँ 'सुधा', 'माधुरी' आदि का सम्पादन इनके द्वारा किया गया। सम्पादन क्यों हो? किसका हो? इन सभी प्रश्नों के उत्तर उनकी पत्रिकाएँ स्वतः दे देती है। साहित्यिक गतिविधियों के अतिरिक्त सामाजिक, राजनैतिक संचेतना, आर्थिक स्थिति तथा मनोविज्ञान तक की सीमाओं को उन्होंने अपनी पत्रिकाओं द्वारा संस्पर्श किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि भार्गव जी केवल साहित्यकार नहीं थे, न उनके प्रोत्साहक, वे बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। जीवन के हर कोने में उन्होंने झाँककर उसकी मर्म छवियाँ अपनी पत्रिकाओं में चित्रित कीं। चित्र से लेकर विचित्र तथ्यों की खोज और प्रकाशन उनके सम्पादन का लक्ष्य था।
पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी ने स्पष्ट लिखा है कि श्री दुलारेलाल भार्गव जी ने हिन्दी की जो सेवा की है, उसका मूल्य निर्धारित करना मेरी शक्ति से बिलकुल बाहर है। "सुधा" और "माधुरी" में बराबर आप नवीन लेखकों को प्रोत्साहित करते रहे हैं, कितनी ही महिला- लेखिकाएँ तैयार कीं। यह क्रम हिन्दी की किसी भी पत्रिका में नहीं रहा। इस प्रोत्साहन-कार्य में भार्गव जी का स्थान सबसे पहले है।
Udayer Pathe-Pathe
- Author Name:
Shankarlal Bhattacharya
- Book Type:

- Description: उदय शंकर, जिन्हें नृत्य का देवता माना गया, यह पुस्तक उनके विषय में है। उनके जीवन, स्वभाव, नृत्यकला, उनकी उपलब्धियों और ख्याति को रेखांकित करने के लिए यहाँ विभिन्न स्रोतों से जुटाई गई सामग्री को संकलित किया गया है। पुस्तक का आरम्भ बिमल मुखोपाध्याय द्वारा खींचे गए चित्रों के, उनकी नृत्य-यात्रा के, प्रस्तुतीकरण से होता है। इस ऐतिहासिक और सुविस्तृत आलेख को शोधकर्ता लेखक शंकरलाल भट्टाचार्य ने लिखा है। बिमल मुखोपाध्याय एक असाधारण फ़ोटोग्राफ़र थे जो साइकिल लेकर विश्व-पर्यटन पर निकल गए थे, और अपने चित्रों के माध्यम से ही अपनी आजीविका अर्जित करते थे। उदय शंकर से भेंट होने के पश्चात् उनका क़ैमरा जैसे उनकी देह-गति पर ही केन्द्रित हो गया। यूरोप में हुए उनकी विभिन्न प्रस्तुतियों में लिए गए ये चित्र ही शंकरलाल जी के विवेचन के केन्द्र में हैं। यह निश्चय ही एक दुर्लभ प्रस्तुति है। दूसरा आलेख पं. रविशंकर द्वारा लिखित एक संस्मरण है जिसमें उन्होंने उदय शंकर के व्यक्तित्व को निज अनुभवों के प्रकाश में आलोकित किया है। यही बात अमला शंकर के संस्मरणात्मक आलेख के बारे में कही जा सकती है, जिसे उन्होंने उनकी जीवन-संगिनी और सहचरी नर्तकी के रूप में लिखा है। सत्यजित चौधुरी का विवेचन उदय शंकर द्वारा रचित फ़िल्म 'कल्पना' के विषय में है जिसका निर्माण 1998 में हुआ था। ढाई घंटे की इस नृत्य-केन्द्रित फ़िल्म को पहली भारतीय आधुनिक फ़िल्म कहा जाता है। “भारतीय प्रदर्शनकारी कलाओं के आधुनिक इतिहास में उदय शंकर का ऐतिहासिक और स्मरणीय अवदान रहा है। वे अपने समय की एक किंवदन्ती बन गए थे। उन पर सुलिखित और पर्याप्त सामग्री, दुर्भाग्य से, कम है। परम्परा की समझ और उसका पुनराविष्कार उनके नवाचार का अनिवार्य अंग था। इस नृत्यशिल्पी का जीवनालेख्य शंकरलाल भट्टाचार्य ने बहुत जतन से तैयार किया है और हमारे आग्रह पर उसका मूल बाङ्ला से हिन्दी में अनुवाद वरिष्ठ विद्वान्, साहित्यकलाप्रेमी और अनुवादक डॉ. रामशंकर द्विवेदी ने किया है। एक गौरवस्थानीय नृत्यशिल्पी पर यह दुर्लभ सामग्री रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत प्रस्तुत करते हुए हमें प्रसन्नता है।” —अशोक वाजपेयी
Bhimrao Ambedkar : Ek Jeevani
- Author Name:
Christophe Jaffrelot
- Book Type:

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Description:
भीमराव आंबेडकर हिन्दुओं में पहले दलित या निम्न जाति नेता थे जिन्होंने पश्चिम जाकर पीएच-डी. जैसे सर्वोच्च स्तर तक की औपचारिक शिक्षा हासिल की थी। अपनी इस अभूतपूर्व उपलब्धि के बावजूद वह अपनी जड़ों से जुड़े रहे और तमाम उम्र दलित अधिकारों के लिए लड़ते रहे। भारत के सबसे प्रखर और अग्रणी दलित नेता के रूप में आंबेडकर का स्थान निर्विवाद है। निम्न जातियों को एक अलग औपचारिक और क़ानूनी पहचान दिलाने के लिए आंबेडकर सालों तक भारत के सवर्ण हिन्दू वर्चस्व वाले समूचे राजनीतिक प्रतिष्ठान से अकेले लोहा लेते रहे। स्वतंत्र भारत की पहली केन्द्र सरकार में आंबेडकर को क़ानून मंत्री और संविधान का प्रारूप तैयार करनेवाली समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इन पदों पर रहते हुए उन्हें भारतीय राजनय पर गांधीवादी प्रभावों पर अंकुश लगाने में उल्लेखनीय सफलता मिली।
क्रिस्तोफ़ जाफ़्रलो ने उनके जीवन को समझने के लिए तीन सबसे महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला है : एक समाज वैज्ञानिक के रूप में आंबेडकर; एक राजनेता और राजनीतिज्ञ के रूप में आंबेडकर; तथा सवर्ण हिन्दुत्व के विरोधी एवं बौद्धधर्म के एक अनुयायी व प्रचारक के रूप मे आंबेडकर।
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