Apani Dhun Mein
Author:
Ruskin BondPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 399.2
₹
499
Available
यह ज़िन्दगी का ऐसा सुचिंतित और भावपूर्ण आख्यान है, जिसमें प्रकृति की उत्कृष्ट छवियाँ हैं, और छोटे-बड़े लोगों की गर्मजोशी से भरी यादें टँकी हुई हैं।
- दि इंडियन एक्सप्रेस
बॉन्ड अपनी ज़िन्दगी और हमारे आसपास की दुनिया के प्रति ऐसा सद्भावपूर्ण नज़रिया रखते हैं कि पढ़नेवालों को महसूस होने लगता है कि आख़िरकार यह दुनिया इतनी ख़राब जगह भी नहीं है!
—दि ट्रिब्यून
पिछले सात दशकों से, बड़े-छोटे शहरों, गाँव और क़स्बों में आबाद हर उम्र के बेशुमार पढ़नेवालों के लिए रस्किन बॉन्ड बेहतरीन साथी रहे हैं। अपनी किताबों और कहानियों से वह हमें रिझाते आए हैं। उनकी जादुई क़िस्सागोई सम्मोहन जगाती है। कभी-कभार डराती भी है और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की ख़ूबसूरती और प्रकृति के टटके सौन्दर्य से हमारा परिचय कराती है। उनकी इस अनूठी आत्मकथा में आप उस पृष्ठभूमि को जान पाएँगे जहाँ से उन्होंने वे कहानियाँ और क़िस्से उठाए हैं।
एक पुरअसर सपने से शुरुआत करके पाठकों को वह अरब सागर के किनारे बसे जामनगर में अपने ख़ुशनुमा बचपन में ले जाते हैं, जहाँ उन्होंने अपनी पहली कविता लिखी और फिर 1940 के दशक की नई दिल्ली में, जहाँ हुए तज़ुर्बों के हवाले से उन्होंने अपनी पहली कहानी लिखी थी। यह उनकी ख़ुशियों का मुख़्तसर-सा दौर था, जो उनके माता-पिता के अलगाव और बेहद अज़ीज़ पिता की असामयिक मृत्यु के साथ ख़त्म हो गया था।
बेहद आत्मीयता और साफ़गोई के साथ, वे शिमला में अपने बोर्डिंग स्कूल के दिनों और देहरादून में सर्दियों की उन छुट्टियों को याद करते हैं, जब उन्होंने अपने अकेलेपन से उबरने की कोशिश की, दोस्त बनाए और उन्हें खोया भी, महत्त्वपूर्ण किताबें खोजीं और अपनी ज़िन्दगी का मक़सद भी तलाश किया। लेखक बनने के अपने मज़बूत इरादे के साथ उन्होंने इंग्लैंड में मुश्किल-भरे चार साल बिताए। वहाँ की अपनी एकाकी ज़िन्दगी और दिल टूटने के वाक़ियों के बारे में उन्होंने ख़ासा मर्मस्पर्शी आख्यान रचा है। मगर इस सबके बावजूद उन्होंने अपना संकल्प नहीं छोड़ा और एक उपन्यास, ‘द रूम ऑन द रूफ़’ लिखकर लेखक बनने की दिशा में पहला निर्णायक क़दम उठाया। किशोरवय का यह क्लासिक उपन्यास भारत के प्रति उनके लगाव को दर्शाता है।
आत्मकथा के आख़िरी खंड में वह अपने भटकाव से छुटकारे और मसूरी की पहाड़ियों में आबाद होने के बाद ज़िन्दगी में आए ठहराव के बारे में लिखते हैं। मसूरी, जहाँ चारों तरफ़ हरियाली है, धूप और धुंध है, परिन्दों का कलरव और मायावी तेन्दुए हैं, नए दोस्तों और विलक्षण लोगों की सोहबत है, और एक ऐसा परिवार भी है जो धीरे-धीरे उनका अपना परिवार बन गया। दूसरे विश्वयुद्ध के समय भारत का माहौल और स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय देश के दिनोंदिन बदलते हालात के कुछ दुर्लभ विवरण भी आप इस आत्मकथा में पाते हैं।
ISBN: 9789360861674
Pages: 328
Avg Reading Time: 11 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: कथाकार मोहन राकेश के साथ बिताए अपने समय को लेकर अनीता राकेश के संस्मरणों की दो पुस्तकें हिन्दी पाठकों की प्रिय पुस्तकों में पहले से शामिल हैं—'चन्द सतरें और' तथा 'सतरें और सतरें'। उसी शृंखला में यह उनकी अगली पुस्तक है जिसे उन्होंने 'अन्तिम सतरें' नाम दिया है। इस पुस्तक में उन्होंने जितना अपने बीते समय का अवलोकन किया है, उतने ही चित्र अपने वर्तमान से भी प्रस्तुत किए हैं। बीते दिनों की यादों में जहाँ राकेश के साथ हुई कुछ झड़पें उन्हें याद आती हैं, वहीं राकेश की माताजी के साथ गुजरे अपने सबसे पूर्ण, सबसे आर्द्र क्षणों को भी वे याद करती हैं। बहैसियत लेखक राकेश जब अपने पति और पिता रूप के साथ लगभग नाइंसाफ़ी पर उतर आते, तब उन्हें अपने सिर पर अम्मा का ही साया मिलता, राकेश जब अपने कमरे का दरवाज़ा बन्द कर इनसानी रिश्तों की पेचीदगियों को सुलझाने की लेखकीय कोशिशें कर रहे होते, अनीता जी अम्मा के स्नेह के उसी साये तले रहतीं, खातीं-पीतीं, सोतीं, बीमार होतीं और फिर ठीक होतीं। इस समय वे अपने एक बेटे के साथ दिल्ली में रहती हैं। इस पुस्तक में राकेश और अम्मा के अलावा सबसे ज्यादा जगह उसी को मिली है। यह पुस्तक राकेश के व्यक्तित्व के कुछ पहलुओं से हमें परिचित कराती है, लेकिन उससे ज़्यादा इस समय में जबकि साहित्य और पुस्तकों का बाज़ार बाक़ी बाज़ारों से मुक़ाबला करने के लिए तरह-तरह की मुद्राओं से लगभग खिजा रहा है, लेखकों और लेखकों के आश्रितों की स्थिति पर हमें सोचने पर विवश करती है।
Manavata Ke Praneta : Maharshi Arvind
- Author Name:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'
- Book Type:

- Description: महर्षि अरविंद एक महान् दार्शनिक, महान् स्वाधीनता सेनानी, प्रकांड विद्वान्, अद्भुत कवि, राजनेता व लेखक थे। उन्होंने सुप्त भारतीय जनमानस को जगाने का सफलतम प्रयास किया और उनके भीतर एक नए आत्मविश्वास का संचार करने में सफलता पाई। वे भारतीय राजनीति यानी भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में 1905 से 1910 तक केवल पाँच वर्ष रहे और इतनी अल्पावधि में देश के जनमानस को राजनीतिक रूप से इतना समर्थ बना दिया कि वह अपनी वास्तविक हस्ती को पहचान सके और अपने अतीत की खोई गरिमा और महिमा को पुनः अर्जित करने के लिए समर्पित हो। महर्षि अरविंद पहले एक राजनीतिज्ञ, क्रांतिकारी नेता थे लेकिन दैवीय विधान के चलते वे अध्यात्म की ओर मुड़ गए, क्योंकि उन्होंने यह जाना कि आध्यात्मिक उत्थान के बगैर भारत की स्वतंत्रता अर्थहीन है। इसीलिए उन्होंने भारत को आध्यात्मिक रूप से एक करने के लिए वेद, उपनिषद् व भारतीय ज्ञान-परंपरा की पताका विश्वभर में फैलाई ताकि भारतीयों में अपने ज्ञान के प्रति गौरव-महसूस हो सके। जनसांख्यकीय लाभांश के चलते भारत युवा देश है। आज के परिदृश्य में भारत को उसका पुराना वैभव दिलाने और देश को ज्ञान-आधारित महाशक्ति बनाने हेतु श्रीअरविंद के विचार अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। नवभारत के निर्माण की जिम्मेदारी हमारी युवाशक्ति पर है। देश के शिक्षा मंत्री द्वारा इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर यह पुस्तक लिखी गई है।
Bhagwan Budh : Jeewan Aur Darshan
- Author Name:
Damodar Dharmanand Kosambi
- Book Type:

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Description:
इस ग्रन्थ के मूल लेखक धर्मानन्द कोसम्बी पालि भाषा और साहित्य के प्रकांड पंडित थे। बौद्ध धर्म-सम्बन्धी तमाम मौलिक साहित्य का गहरा अध्ययन करके वे अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के विद्वान बने। लेकिन उनका सारा प्रयास केवल विद्वत्ता पाने के लिए नहीं था। वे बुद्ध भगवान के अनन्य भक्त थे। इसीलिए उन्होंने जो कुछ पाया, जो कुछ किया और साहित्य-प्रवृत्ति द्वारा जो कुछ दिया, वह सब का सब ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ था।
धर्मानन्द कोसम्बी द्वारा लिखित यह चरित्र शायद पहला ही चरित्र ग्रन्थ है, जो किसी भारतीय व्यक्ति ने मूल पालि बौद्ध ग्रन्थ ‘त्रिपिटिक’ तथा अन्य आधार-ग्रन्थों का चिकित्सापूर्ण दोहन करके, उसी के आधार पर लिखा हो। इस प्राचीन मसाले में भी जितना हिस्सा बुद्धि-ग्राह्य था उतना ही उन्होंने लिया। पौराणिक चमत्कार, असम्भाव्य वस्तु सब छोड़ दी, और जो कुछ भी लिखा, उसके लिए जगह-जगह मूल प्रमाण भी दिए। इस तरह बौद्ध-साहित्य में उनके काल की सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक जो कुछ भी जानकारी मिल सकती थी, उससे लाभ उठाकर इस ग्रन्थ में बुद्ध भगवान के काल की परिस्थिति पर नया प्रकाश डाला गया है। भगवान बुद्ध के बारे में प्रामाणिक जानकारी देनेवाली महत्त्वपूर्ण कृति।
Rachna Ka Antrang
- Author Name:
Devendra
- Book Type:

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Description:
अर्थशास्त्र जाननेवाले कहते हैं कि गाँव की तरक़्क़ी हो गई है। समाजशास्त्र के विद्वान कहते हैं कि रिश्तों में दरार आ गई है। गाँव के लोग कहते हैं कि अब वह बात नहीं रहीं। बहुत उदास-उदास लगता है। यहाँ रहने का मन नहीं होता। लब्बोलुबाब यह कि इतनी उदास, मनहूस और क़र्ज़ में डूबी तरक़्क़ी। बैंकों की मदद से हमारे गाँव में तीन लोगों ने ट्रैक्टर ख़रीदे और तीनों के आधे खेत बिक गए। ट्रैक्टर औने-पौने दाम में बेचने पड़े। पता नहीं क़र्ज़ चुकता हुआ कि नहीं? पंचायती राज में लोकतंत्र को गाँवों तक ले जाने का कार्यक्रम बना। फिर तो, अपहरण, हत्याएँ और मुकदमेबाज़ी। सारे के सारे गाँव थानों और कचहरियों में जाकर क़ानून की धाराएँ रटने लगे।...
—'अस्सी की एक शाम' से
Loknayak Samarthguru Ramdass
- Author Name:
Sachchidanand Parlikar
- Book Type:

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Description:
डॉ. सच्चिदानंद परळीकर ने अत्यन्त तटस्थता से और बिना किसी पूर्वग्रह के समर्थगुरु रामदास का चरित्र प्रस्तुत किया है। इसके पहले लिखी गई समर्थ रामदास की जीवनियों में उनके राजनीतिक सम्बन्धी विचारों एवं कार्य की इतने विस्तार से चर्चा नहीं की गई है। इस ग्रन्थ के सातवें अध्याय में समर्थ रामदास के समग्र काव्य का जो सरसरी निगाह से परिचय करा दिया है, वह इस ग्रन्थ की एक अनोखी विशेषता मानी जा सकती है। इसके दसवें अध्याय में समर्थ रामदास के समन्वयात्मक दृष्टिकोण की जो सोदाहरण चर्चा की गई है, उस प्रकार की चर्चा समर्थ रामदास पर लिखे गए मराठी, अंग्रेज़ी या हिन्दी के चरित्रग्रन्थों में कहीं भी नहीं की गई है। इस चर्चा को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए लेखक ने बहुत ही समीचीन सन्दर्भ प्रस्तुत किए हैं। आठवें तथा नौवें अध्याय में समर्थ रामदास के भक्तिमार्ग एवं दार्शनिक विचारों का विवेचन करते समय लेखक ने बड़ी ख़ूबी से दिखाया है कि महाराष्ट्र के अन्य सन्तों के इस विषय में सम्बन्धित विचारों में बहुतांश में मतैक्य पाया जाता है।
एक महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति।
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