Sansamaran Aur Shradhanjaliyan
(0)
Author:
Ramdhari Singh DinkarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
795
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संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के संस्मरणात्मक निबन्धों का संकलन है। यह संग्रहणीय इसलिए है कि इन संस्मरणों और श्रद्धांजलियों में देश के प्रख्यात विद्वानों, साहित्यकारों और राजनेताओं के अन्तरंग जीवन की भी झाँकियाँ हैं। उनके व्यक्तित्व के अनेक अनजाने रूप, देश की राजनीति को प्रभावित करनेवाले प्रसंग और वे मानवीय गुण भी उद्घाटित हुए हैं, जिन्होंने इन विभूतियों को सबका श्रद्धास्पद बना दिया।</p> <p>डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, राजर्षि टंडन, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, पं. माखनलाल चतुर्वेदी, महाप्राण निराला, पं. बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', महादेवी जी, पं. बनारसीदास चतुर्वेदी, पं. किशोरीदास वाजपेयी, आचार्य शिवपूजन सहाय, आचार्य रघुवीर के अतिरिक्त कवि दिनकर के और भी अनेक समकालीन साहित्यकार, जिनके संस्मरण रोमांचित ही नहीं करते, मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था भी जगाते हैं।</p> <p>इस संग्रह में समाविष्ट हैं डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन्, डॉ. जाकिर हुसैन, श्री लालबहादुर शास्त्री, श्रीकृष्ण सिन्हा जैसे राजनेताओं के प्रति राष्ट्रकवि दिनकर की विनम्र श्रद्धांजलि और प्रेरक संस्मरण।</p> <p>उल्लेखनीय है कि ये संस्मरण, ये श्रद्धांजलियाँ औपचारिकता नहीं, अपनत्व से भरी हैं। इन्हें पढ़ना देश के अतीत में जाना है। एक ऐसा अतीत जो वर्तमान ही नहीं, भविष्य के लिए भी प्रेरणा का स्रोत सिद्ध होगा।
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संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के संस्मरणात्मक निबन्धों का संकलन है। यह संग्रहणीय इसलिए है कि इन संस्मरणों और श्रद्धांजलियों में देश के प्रख्यात विद्वानों, साहित्यकारों और राजनेताओं के अन्तरंग जीवन की भी झाँकियाँ हैं। उनके व्यक्तित्व के अनेक अनजाने रूप, देश की राजनीति को प्रभावित करनेवाले प्रसंग और वे मानवीय गुण भी उद्घाटित हुए हैं, जिन्होंने इन विभूतियों को सबका श्रद्धास्पद बना दिया।</p>
<p>डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, राजर्षि टंडन, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, पं. माखनलाल चतुर्वेदी, महाप्राण निराला, पं. बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', महादेवी जी, पं. बनारसीदास चतुर्वेदी, पं. किशोरीदास वाजपेयी, आचार्य शिवपूजन सहाय, आचार्य रघुवीर के अतिरिक्त कवि दिनकर के और भी अनेक समकालीन साहित्यकार, जिनके संस्मरण रोमांचित ही नहीं करते, मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था भी जगाते हैं।</p>
<p>इस संग्रह में समाविष्ट हैं डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन्, डॉ. जाकिर हुसैन, श्री लालबहादुर शास्त्री, श्रीकृष्ण सिन्हा जैसे राजनेताओं के प्रति राष्ट्रकवि दिनकर की विनम्र श्रद्धांजलि और प्रेरक संस्मरण।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि ये संस्मरण, ये श्रद्धांजलियाँ औपचारिकता नहीं, अपनत्व से भरी हैं। इन्हें पढ़ना देश के अतीत में जाना है। एक ऐसा अतीत जो वर्तमान ही नहीं, भविष्य के लिए भी प्रेरणा का स्रोत सिद्ध होगा।
Book Details
-
ISBN9789389243109
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: जिन यहूदियों ने भारत को अपना ठिकाना बनाया था, वे यहाँ किसी प्रतिकूल भेदभाव के बिना खूब फले-फूले । इनमे से बगदादी गडरिआ समुदाय की संख्या बहुत कम थी, लेकिन उसने भारत के महानतम समकालीन सिपाहियों में से एक लेफ्टिनेंट जनरल जैकब को पैदा किया | यह पुस्तक उन्हीं की रोमांचकारी कथा है । जैकब का जन्म एक यहूदी कारोबारी परिवार में हुआ था। जब द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ तो 1941 में जैकब अपने परिवार को सूचना दिए बिना नाजियों से लड़ने के लिए सेना में भरती हो गए। उन्हें भारतीय तोपखाने में कमीशन दिया गया था और उन्होंने मध्य-पूर्व, बर्मा एवं सुमात्रा में अनेक कारवाइयों में भाग लिया था। जैकब अत्यंत कुशाग्र बुद्धि थे। उन्होंने इन्फैंट्री एवं आर्टिलरी ब्रिगेडों की कमान सँभाली थी। वे तोपखाना विद्यालय के प्रधानाचार्य रहे और अंत में पूर्वी सेना के कमांडर-इन-चीफ भी रहे। यह एक ऐसे युवा यहूदी अधिकारी की दिलचस्प कहानी है, जिसने कोई समझौता किए बिना अपने सिद्धांतों एवं मान्यताओं के आधार पर चुनौतियों को स्वीकार किया। उन्होंने कुछ ऐसे बहादुर एवं विश्वसनीय लोगों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर काम किया, जो उस समय भारतीय राजनीतिक एवं सैन्य अखाड़े के पहलवान माने जाते थे। उन्होंने ढाका के पतन की सफल रणनीति काररवाइयों का पर्यवेक्षण स्वयं किया और शत्रु को बिना शर्त सार्वजनिक आत्मसमर्पण करने के लिए विवश कर दिया, जो जनरल नियाजी एवं उनके 93,000 सैनिकों द्वारा किया गया इतिहास का एकमात्र बिना शर्त सार्वजनिक आत्मसमर्पण था। अत्यंत सुबोधगम्य शैली में लिखी इस आत्मकथा में एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में जीवन सजीव हो उठा है। यह मात्र एक महान् सैनिक की जीवनगाथा ही नहीं है, अपितु इसमें कुछ उन अत्यंत प्रभावशाली एवं देदीप्यमान व्यक्तित्वों की झलकियाँ भी हैं, जिन्होंने उन अशांत युगों का इतिहास लिखा था।
Match Point - A Shuttler's Story
- Author Name:
Sanjay Sharma
- Rating:
- Book Type:

- Description: Inside these pages lies the story of a shuttler – but not just any shuttler. A sportsman of true grit, he has faced, fought and overcome unimaginable battles. How did a boy rise to become one of the widely known, ace badminton players of India, and smash down hardships that came his way? How did he protect his well-earned reputation from the wrongdoings of the then sports federation? And how has he, years later, kept the sportsman inside him alive, as he goes on to overcome health battles to unbelievable extents? Every word written to inspire, this is the story of a shuttler who never gives up.
S.D. Burman: The Prince Musician
- Author Name:
Balaji Vittal +1
- Book Type:

- Description: SD, or Sachin Dev Burman, is arguably the most mysterious figure in Indian film history, credited with shaping the grammar of Hindi film music. As a young heir of the Tripura royal family, he ventured into cinema and popular music amidst challenging times. His unconventional career choices and marriage to a 'commoner' led to family ostracism, and despite formal training, he faced rejection. This detailed biography honors his artistry and investigates what made his music exceptional. It goes beyond listing hits, revealing little-known stories behind classics like 'Mera sundar sapna beet gaya' (Do Bhai, 1948), 'Thandi hawaein' (Naujawan, 1951), and others. The book offers insights into SD's life, work, and understanding of Hindi cinema. Though he was an outsider with limited Hindi and Urdu, he introduced Sahir Ludhianvi to the world and recognized Kishore Kumar's talent. His adaptability to modern sounds, belief in Lata Mangeshkar's virtuosity, close ties with Dev Anand, and controversies over nepotism and plagiarism highlight his complex persona. S.D. Burman: The Prince-Musician provides unique insights into one of India's greatest composers and a vital chapter in cinematic history, making it essential for every film music enthusiast.
Kanshiram : Bahujanon Ke Nayak
- Author Name:
Badri Narayan
- Book Type:

- Description: एक दलित आइकॉन के रूप में कांशीराम (1934-2006) की प्रतिष्ठा, आज के समय में आंबेडकर के बाद के एकमात्र नेता के रूप में है। यह किताब उनकी पूरी यात्रा पर रोशनी डालती है। कांशीराम के शुरुआती वर्ष ग्रामीण पंजाब में बीते और पुणे में आंबेडकरवादियों के साथ मिलकर ‘बामसेफ’ की नींव डाली, जो व्यापक स्वरूप वाला ऐसा संगठन था जिसने पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट किया और अन्ततोगत्वा 1984 में ‘बहुजन समाज पार्टी’ बनाई। अनगिनत मौखिक और लिखित स्रोतों का सहारा लेकर बद्री नारायण ने दिखाया है कि कैसे कांशीराम ने अपने ठेठ मुहावरों, साइकिल रैलियों और विलक्षण ढंग से स्थानीय नायकों और मिथकों का इस्तेमाल करते हुए व उनके आत्मसम्मान को जगाते हुए दलितों को गोलबन्द किया और कैसे उन्होंने सत्ता पर कब्जा करने के लिए ऊँची जाति की पार्टियों से अवसरवादी गठबन्धन कायम किए। यह किताब कांशीराम की मृत्यु तक मायावती के साथ उनके असाधारण रिश्ते की कहानी भी कहती है। साथ ही उनके सपने को पूरा करने के लिए उनके जीवित रहते और उनकी मृत्यु के बाद मायावती की भूमिका को भी रेखांकित करती है। दो लोगों के बीच के विरोधाभासी नज़रिए को आमने-सामने रखते हुए, नारायण रेखांकित करते हैं कि कैसे कांशीराम ने आंबेडकर के विचारों को भिन्न दिशा दी। जाति का उच्छेद चाहनेवाले आंबेडकर से उलट, कांशीराम ने जाति को दलित पहचान को उभारने के एक आधार और राजनीतिक सशक्तीकरण के एक स्रोत के रूप में देखा। प्राधिकार और पैनी दृष्टि सृजित यह दुर्लभ शब्दचित्र उस आदमी का है, जिसने दलित समाज का चेहरा बदलकर रख दिया और वाकई भारतीय राजनीति का भी।
Nari Kalakar
- Author Name:
Asha Rani Vohra
- Book Type:

- Description: "सभ्यता हमारी भौतिक जरूरत है तो संस्कृति आध्यात्मिक। संस्कृति में शिक्षा, साहित्य, कलाएँ आदि सभी शामिल हैं। कला का काम मात्र मनोरंजन करना नहीं, कलाओं का मूल उद्देश्य मन को स्वस्थ दिशा में मोड़ना या उसका परिष्कार करना होता है। कलाएँ ही सत्यं, शिवं, सुंदरम् के संपर्क में लाकर मानव-मन को संस्कारित करती हैं और मानव की आध्यात्मिक भूख को तृप्त करती हैं। परंतु आज की बाजार-व्यवस्था प्रधान संस्कृति ने कलाओं को धन अर्जित करनेवाला उद्योग बना दिया है। नारी और कला एक-दूसरे की पर्यायवाची हैं। स्पष्ट कहें तो नारी सृष्टि की सबसे खूबसूरत कलाकृति है। अत: ललित व रूपंकर कलाओं से उसका निकट संबंध होना स्वाभाविक है। आदि पाषाण युग से लकर आज तक इतिहास का कोई कालखंड ऐसा नहीं है, जब नारी ने अपनी कलाप्रियता एवं सृजन-कौशल का परिचय न दिया हो। चित्रकारी, गायन, वादन तथा नृत्य जैसे गुण उसमें स्वभावत: पाए जाते हैं। प्रस्तुत पुस्तक का उद्देश्य आधुनिक काल की प्रमुख नारी-साधिकाओं से नई पीढ़ी का परिचय कराना तथा कलाओं के प्रति रुचि जाग्रत् करने के साथ-साथ उसमें सीखने की ललक पैदा करना है। आशा है, सुधी पाठक-पाठिकाएँ एवं कलाप्रेमी जन अपने-अपने समय की श्रेष्ठ कला-साधिकाओं के जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर अपनी कला-साधना को समर्पित होकर उनमें और भी निखार लाएँगे।
Dard Jo Saha Maine
- Author Name:
Aasha Apraad
- Book Type:

-
Description:
‘दर्द जो सहा मैंने...’ आशा आपराद की आत्मकथा है। ‘एक भारतीय मुस्लिम परिवार’ में जन्मी ऐसी स्त्री की गाथा जिसने बचपन से स्वयं को संघर्षों के बीच पाया। संघर्षों से जूझते हुए किस प्रकार आशा ने शिक्षा प्राप्त की, परिवार का पालन-पोषण किया, अपने घर का सपना साकार किया—यह सब इस पुस्तक के शब्द-शब्द में व्यंजित
है।अपनी माँ से लेखिका को जो कष्ट मिले, उनका विवरण पढ़कर किसी का भी मन विचलित हो सकता है। लेकिन पिता का स्नेह इस तपते रेतीले सफ़र में मरुद्यान की भाँति रहा। इस आत्मकथा में आशा आपराद ने जीवन की गहराई में जाकर और भी अनेक रिश्ते-नातों का वर्णन किया है।
सुख-दुःख, मिलन-बिछोह और अभाव-उपलब्धि के धागों से बुनी एक अविस्मरणीय आत्मकथा है ‘दर्द जो सहा मैंने...’
‘मनोगत’ में आशा आपराद ने लिखा है : “मेरी किताब सिर्फ़ ‘मेरी’ नहीं, यह तो प्रातिनिधिक स्वरूप की है, ऐसा मैं मानती हूँ। हमारा देश तो स्वतंत्र हुआ लेकिन यहाँ का इंसान ‘ग़ुलामी’ में जी रहा है। अगर यह सच न होता तो आज भी औरतों को, पिछड़े वर्ग को, ग़रीब वर्ग को अधिकार और न्याय के लिए बरसों तक झगड़ना पड़ता क्या! आज भी स्त्रियों पर अनन्त अत्याचार होते हैं। दहेज के लिए आज भी कितनों को जलना पड़ता है। बेटी पैदा होने से पहले ही उसे गर्भ में ‘मरने का’ तंत्र विकसित हो गया है। मैं चाहती हूँ, जो स्त्री-पुरुष ग़ुलामी का दर्द, अन्याय सह रहे हैं, शोषित हैं, अत्याचार में झुलस रहे हैं, उन सबको अत्याचार के विरोध में लड़ने की, मुक़ाबला करने की शक्ति प्राप्त हो, बल प्राप्त हो।”
निश्चित रूप से यह आत्मकथा प्रत्येक पाठक को प्रेरणा प्रदान करेगी।
मराठी से हिन्दी में अनुवाद स्वयं आशा आपराद ने किया है। जो अपने मराठी आस्वाद के चलते एक अद् भुत पाठकीय अनुभव प्रदान करता है।
Sach, Pyar Aur Thodi Si Shararat
- Author Name:
Khushwant Singh
- Book Type:

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Description:
अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध पत्रकार, स्तम्भकार और कथाकार खुशवंत सिंह की आत्मकथा सिर्फ़ आत्मकथा नहीं, अपने समय का बयान है। एक पत्रकार की हैसियत से उनके सम्पर्कों का दायरा बहुत बड़ा रहा है। इस आत्मकथा के माध्यम से उन्होंने अपने जीवन के राजनीतिक, सामाजिक माहौल की पुनर्रचना तो की ही है, पत्रकारिता की दुनिया में झाँकने का मौक़ा भी मुहैया किया है। भारत के इतिहास में यह दौर हर दृष्टि से निर्णायक रहा है। इस प्रक्रिया में न जाने कितनी जानी-मानी हस्तियाँ बेनक़ाब हुई हैं और न जाने कितनी घटनाओं पर से पर्दा उठा है। ऐसा करते हुए खुशवंत सिंह ने हैरत में डालनेवाली साहसिकता का परिचय दिया है।
खुशवंत सिंह यह काम बड़ी निर्ममता और बेबाकी के साथ करते हैं। ख़ास बात यह है कि इस प्रक्रिया में औरों के साथ उन्होंने ख़ुद को भी नहीं बख़्शा है। वक़्त के सामने खड़े होकर वे उसे पूरी तटस्थता से देखने की कामयाब कोशिश करते हैं। इस कोशिश में वे एक हद तक ख़ुद अपने सामने भी खड़े हैं —ठीक उसी शरारत-भरी शैली में जिससे ‘मैलिस’ स्तम्भ के पाठक बख़ूबी परिचित हैं, जिसमें न मुरौवत है और न संकोच।
उनकी ज़िन्दगी और उनके वक़्त की इस दास्तान में ‘थोड़ी-सी गप है, कुछ गुदगुदाने की कोशिश है, कुछ मशहूर हस्तियों की चीर-फाड़ और कुछ मनोरंजन’ के साथ बहुत कुछ जानकारी भी।
Ulua, Bulua Aur Main
- Author Name:
Ramsagar Prasad Singh
- Book Type:

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Description:
इस ग्लोबलाइज़्ड दुनिया में जहाँ चारों ओर समरूपता का हठ पाँव पसार रहा है, ऐसे में ‘उलुआ, बुलुआ और मैं’ भरी दुपहरी में छाँव की तरह है। आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई यह रचना व्यक्ति के साथ-साथ अपने समय, अंचल और ग्राम्य-संस्कृति की भी कथा कहती है। वैसे तो हर व्यक्ति का जीवन अगर दर्ज हो जाए तो महाकाव्य का विषय है। मुक्तिबोध ने सच ही कहा है कि 'मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में चमकता हीरा है।' इस रचना की चमक इतिहास की धार में बह रहे क़िस्से, शब्द और लोग-बाग हैं जिन्हें लेखक ने शिद्दत के साथ पकड़ने की कोशिश की है। यह रचना आज़ादी के पहले और उसके बाद के कुछ समय के बदलावों का साहित्य रचती है। साहित्य की परम्परा से वाक़िफ़ लोगों को इसमें रेणु, रामवृक्ष बेनीपुरी और शिवपूजन सहाय जैसे मिट्टी के रचनाकारों की छवि दिखाई पड़ सकती है। साथ ही वैसे इतिहास और संस्कृतिकर्मी जो लोगों के सुख-दु:ख, खान-पान, आचार-व्यवहार, लोकगाथाओं आदि को भी इतिहास-अध्ययन का विषय मानते हैं, उनके लिए भी यह रचना फलदायी साबित होगी। शैली के तौर पर यह कभी आपको आत्मकथा, कभी उपन्यास, कभी कहानी तो कभी ललित निबन्ध का अहसास कराती चलती है।
कुल मिलाकर ‘उलुआ, बुलुआ और मैं' अपने समय और समाज के निर्वासित लोगों, शब्दों, गँवई संस्कृति और समय की आपा-धापी में छूट रहे जीवन के विविध राग-रंगों को फिर से साहित्य की दुनिया में पुनर्जीवित करने का एक प्रयास है।
—अरुण कमल
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