Jan Gopal : Sant Dadu Ke Jivanikar
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हालाँकि आज उन्हें बहुत लोग नहीं जानते, लेकिन जन गोपाल आरम्भिक आधुनिक भारत के एक महत्त्वपूर्ण देशज बुद्धिजीवी थे। ‘जन गोपाल : संत दादू के जीवनीकार’ पुस्तक के लेखकों का कहना है कि ऐसे कई निर्गुण भक्त कवि रहे हैं जिन पर उनकी काव्य-मेधा और ऐतिहासिक अहमियत के बावजूद उतना ध्यान नहीं दिया गया जितने के वे हक़दार थे। उन्नींसवीं सदी के राजस्थानी कवि एवं कथावाचक जन गोपाल भी ऐसी ही प्रतिभा हैं। यह पुस्तक उनके जीवन और कृतित्व पर केन्द्रित एक अभूतपूर्व अध्ययन है। जन गोपाल किसी आम निर्गुणपंथी भक्त के साँचे में पूरी तरह फ़िट नहीं बैठते। उनका जन्म एक व्यापारी परिवार में हुआ; निर्गुण पंथ का चुनाव उन्होंने किसी पारिवारिक या सामाजिक परम्परा के चलते नहीं, बल्कि अपने सचेत निजी निर्णय के आधार पर किया। उन्होंने अपने साहित्य में न केवल छन्दशास्त्र, काव्य-परम्परा और शास्त्रीय हिन्दुस्तानी संगीत के अपने अद्भुत ज्ञान का बल्कि एक नागर तथा प्रगतिशील संवेदना का भी परिचय दिया। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘दादू जनम लीला’ का नाम सबसे पहले आता है जो उनके गुरु और अकबर के समकालीन दादू दयाल की जीवन-गाथा है। भागवत पुराण की कथाओं को भी उन्होंने अपने काव्य में पिरोया जिनमें ‘प्रह्लाद चरित्र’, ‘ध्रुव चरित्र’ और ‘जड़ भरत चरित्र’ मुख्य हैं। इस पुस्तक में स्पष्ट होता है कि जन गोपाल का विशेष महत्त्व इसलिए है कि उन्होंने लोक-प्रचलित पौराणिक कथाओं को अपनी हिन्दी व ब्रज रचनाओं में समकालीनता का एक सूक्ष्म तेवर दिया। साथ ही इन कथाओं के नैतिक पक्ष को नए रूप में रचने की प्रक्रिया में उन्होंने पारम्परिक धर्मशास्त्र के मूल तत्त्व पर भी नई दृष्टि डाली और भक्ति को एक समतावादी और मुक्तिकारी रूप में प्रस्तुत किया। जन गोपाल के जीवन और कृतित्व के विश्लेषण के साथ और भक्ति परम्परा में उन्हें उनका उचित स्थान देते हुए लेखकों ने इस पुस्तक में उनके रचे तीनों चरित्रों (प्रह्लाद, ध्रुव और भरत) के साथ ही उनके बीस पद भी प्रस्तुत किए हैं। देशज बौद्धिक परम्पराओं और निर्गुण भक्ति के अध्ययन के लिए यह पुस्तक निस्सन्देह महत्त्वपूर्ण है।
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हालाँकि आज उन्हें बहुत लोग नहीं जानते, लेकिन जन गोपाल आरम्भिक आधुनिक भारत के एक महत्त्वपूर्ण देशज बुद्धिजीवी थे।
‘जन गोपाल : संत दादू के जीवनीकार’ पुस्तक के लेखकों का कहना है कि ऐसे कई निर्गुण भक्त कवि रहे हैं जिन पर उनकी काव्य-मेधा और ऐतिहासिक अहमियत के बावजूद उतना ध्यान नहीं दिया गया जितने के वे हक़दार थे। उन्नींसवीं सदी के राजस्थानी कवि एवं कथावाचक जन गोपाल भी ऐसी ही प्रतिभा हैं। यह पुस्तक उनके जीवन और कृतित्व पर केन्द्रित एक अभूतपूर्व अध्ययन है।
जन गोपाल किसी आम निर्गुणपंथी भक्त के साँचे में पूरी तरह फ़िट नहीं बैठते। उनका जन्म एक व्यापारी परिवार में हुआ; निर्गुण पंथ का चुनाव उन्होंने किसी पारिवारिक या सामाजिक परम्परा के चलते नहीं, बल्कि अपने सचेत निजी निर्णय के आधार पर किया। उन्होंने अपने साहित्य में न केवल छन्दशास्त्र, काव्य-परम्परा और शास्त्रीय हिन्दुस्तानी संगीत के अपने अद्भुत ज्ञान का बल्कि एक नागर तथा प्रगतिशील संवेदना का भी परिचय दिया। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘दादू जनम लीला’ का नाम सबसे पहले आता है जो उनके गुरु और अकबर के समकालीन दादू दयाल की जीवन-गाथा है। भागवत पुराण की कथाओं को भी उन्होंने अपने काव्य में पिरोया जिनमें ‘प्रह्लाद चरित्र’, ‘ध्रुव चरित्र’ और ‘जड़ भरत चरित्र’ मुख्य हैं।
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जन गोपाल के जीवन और कृतित्व के विश्लेषण के साथ और भक्ति परम्परा में उन्हें उनका उचित स्थान देते हुए लेखकों ने इस पुस्तक में उनके रचे तीनों चरित्रों (प्रह्लाद, ध्रुव और भरत) के साथ ही उनके बीस पद भी प्रस्तुत किए हैं।
देशज बौद्धिक परम्पराओं और निर्गुण भक्ति के अध्ययन के लिए यह पुस्तक निस्सन्देह महत्त्वपूर्ण है।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2024
- Weight
- 400 grams
- ISBN-13
- 9789360863791
- Pages
- 232
- Reading time
- ~8 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14.5 × 22 cm
- Language
- Hindi
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प्रो. हौली पिछले कई दशकों से भक्ति और हिन्दू परम्परा के अन्य पहलुओं पर विचारोत्तेजक काम करते रहे हैं। केनेथ ब्रायंट के साथ मिलकर उन्होंने सूरदास के पदों की प्रामाणिकता और पाठ-निर्धारण पर काम किया है। प्रस्तुत पुस्तक मूल अंग्रेज़ी में 2005 में प्रकाशित हुई थी। इस बीच नई खोजें हुई हैं, भक्ति-विमर्श में नए प्रश्न, नई शब्दावलियाँ आई हैं। प्रो. हौली ने पुस्तक की सामग्री को नई खोजों की रोशनी में अद्यतन किया है, हालाँकि ऐसा करते समय भी वे अपने मूल तर्क, आग्रहों और पद्धति को बनाए रहे हैं। सूरदास रचित पदों की संख्या ठीक-ठीक लाख नहीं तो हजारों में माननेवालों के लिए यह बहुत चौंकानेवाली बात होगी कि प्रो. हौली इनमें से केवल चार सौ तैंतीस को इस अर्थ में प्रामाणिक मानते हैं कि वे सूरदास से सम्बन्धित प्राचीनतम पांडुलिपियों में प्राप्त होते हैं। हौली इस पुस्तक में सूरदास, मीराँ और कबीर से जुड़े विशिष्ट सवालों—समय, रचनाओं की प्रामाणिकता, संवेदना का स्वभाव, लोक-स्मृति में उनका स्थान—आदि पर तो विचार करते ही हैं, वे इनके बहाने भक्ति-संवेदना से जुड़े व्यापक प्रश्नों पर भी विचार करते हैं। वे उस विमर्श में भी हिस्सा लेते हैं, जो भक्ति-संवेदना के ऐतिहासिक और दार्शनिक रूप से अभूतपूर्व पहलुओं को समझने की कोशिश करता रहा है। निर्गुण ही नहीं, यह बात तुलसी, सूर, मीराँ जैसे सगुण कवियों के बारे में भी सच है कि उनकी कविता आचार्यों द्वारा कर दिए गए ब्रह्म-निरूपण का जन-सुलभ मुहावरे में प्रचार करने के लिए नहीं रची गई है। वह सचमुच स्वायत्त और नवाचार सम्पन्न 'निज ब्रह्म विचार' है। इस निज ब्रह्म विचार और इसकी काव्याभिव्यक्ति के तीन सर्वाधिक मनोहर स्वरों को सुनते हुए प्रो. जॉन स्ट्रैटन हौली बहुत ही विचारोत्तेजक निष्कर्षों तक पहुँचे हैं, जिनमें से कुछ इस पुस्तक के माध्यम से आपके सामने मौजूद हैं।
Bharat Aur Uske Virodhabhas
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Jean Dreze +2
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नब्बे के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था ने सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के लिहाज़ से अच्छी प्रगति की है। उपनिवेशवादी शासन तले जो देश सदियों तक एक निम्न आय अर्थव्यवस्था के रूप में गतिरोध का शिकार बना रहा और आज़ादी के बाद भी कई दशकों तक बेहद धीमी रफ़्तार से आगे बढ़ा, उसके लिए यह निश्चित ही एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन ऊँची और टिकाऊ वृद्धि दर को हासिल करने में सफलता अन्तत: इसी बात से आँकी जाएगी कि इस आर्थिक वृद्धि का लोगों के जीवन तथा उनकी स्वाधीनताओं पर क्या प्रभाव पड़ा है। भारत आर्थिक वृद्धि दर की सीढ़ियाँ तेज़ी से तो चढ़ता गया है लेकिन जीवन-स्तर के सामाजिक संकेतकों के पैमाने पर वह पिछड़ गया है—यहाँ तक कि उन देशों के मुक़ाबले भी जिनसे वह आर्थिक वृद्धि के मामले में आगे बढ़ा है। दुनिया में आर्थिक वृद्धि के इतिहास में ऐसे कुछ ही उदाहरण मिलते हैं कि कोई देश इतने लम्बे समय तक तेज़ आर्थिक वृद्धि करता रहा हो और मानव विकास के मामले में उसकी उपलब्धियाँ इतनी सीमित रही हों। इसे देखते हुए भारत में आर्थिक वृद्धि और सामाजिक प्रगति के बीच जो सम्बन्ध है, उसका गहरा विश्लेषण लम्बे अरसे से अपेक्षित है। यह पुस्तक बताती है कि इन पारस्परिक सम्बन्धों के बारे में समझदारी का प्रभावी उपयोग किस तरह किया जा सकता है। जीवन-स्तर में सुधार तथा उनकी बेहतरी की दिशा में प्रगति और अन्तत: आर्थिक वृद्धि भी इसी पर निर्भर है।
Asahmati Ki Aawazein
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Romila Thapar +1
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असहमति भारतीय जनजीवन का हमेशा से हिस्सा रही है लेकिन इन दिनों किसी भी असहमति को भारत-विरोधी ठहरा दिया जाता है। भारतीय अतीत को दोषमुक्त मानने वाले लोग असहमति की अवधारणा को विदेशी मानते हैं और असहमतिपूर्ण विचारों की ज़रूरत को नकारते हैं। लेकिन ‘असहमति की आवाज़ें’ बतलाती है कि भारतीय उपमहाद्वीप में असहमति का लम्बा इतिहास रहा है, भले ही सदियों में इसके रूप विकसित या परिवर्तित हो गए हैं। लेखक असहमति की अभिव्यक्ति और उसके अहिंसक रूपों पर विचार करते हुए इसे भारतीय ऐतिहासिक अनुभव के अंग के रूप में समय के विभिन्न बिन्दुओं और सन्दर्भों से जोड़ती हैं। प्राचीन वैदिक काल से शुरू करते हुए जैन, बौद्ध, आजीविक आदि समूहों के उद्भव और इससे आगे, मध्यकाल के भक्ति सन्तों और अन्य के विचारों को परखती हुई वह हमें असहमति के उस प्रमुख बिन्दु, महात्मा गांधी के सत्याग्रह, तक ले जाती हैं जिसने आज़ाद और लोकतांत्रिक भारत की स्थापना में मदद की। वह इस बात पर बल देती हैं कि किस तरह धर्म ने हमेशा सामाजिक परिवर्तन को प्रतिबिम्बित किया है, और वर्तमान में धर्म के राजनीतिकरण के साथ अपनी बात पूरी करती हैं। वह असहमति के विशेष रूपों पर जन-प्रतिक्रिया को रेखांकित करते हुए सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ शाहीनबाग़ जैसे शान्तिपूर्ण विरोध का हवाला देती हैं। इसमें यह प्रश्न निहित है कि धर्म का मुहावरा ज़रूरी है या नहीं। उनके अनुसार, हमारे वक़्त में असहमति सुनने लायक, स्पष्ट, अन्याय-विरोधी और लोकतांत्रिक अधिकारों का समर्थक होनी चाहिए। संवाद के ज़रिये असहमति और बहस की अभिव्यक्ति ही समाज में सकारात्मक बदलाव लाती है। भारत की शीर्षस्थ जन-बुद्धिजीवी की यह किताब उन सबके लिए एक आवश्यक पाठ है, जो न सिर्फ़ भारत के अतीत को बल्कि भारतीय समाज और राष्ट्र की दिशा को भी उसके सही परिप्रेक्ष्य में जानना-समझना चाहते हैं।
Kabir Granthawali : Parimarjit Paath
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Kabir +2
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कबीर-पंथियों में जो स्थान ‘बीजक’ का है, अकादमिक हलक़ों में वही स्थान श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित ‘कबीर-ग्रंथावली’ का है। तमाम विवादों और असहमतियों के बावजूद आज भी कबीर के प्रामाणिक पाठ के लिए अध्येता ‘ग्रंथावली’ का ही सहारा लेते हैं। ऐसे में अगर यह पता चले कि ‘ग्रंथावली’ में संकलित कबीर भले ही अन्य संग्रहों के मुक़ाबले ज़्यादा पूरे हों, लेकिन जो पाठ यहाँ प्रकाशित है, उसमें अनेक ऐसी भूलें हैं, जो अर्थ का अनर्थ ही नहीं कर रहीं, बल्कि कवि के मंतव्य को ही उलट दे रही हैं, तो क्या हो... आश्चर्य नहीं कि लगभग एक सदी से अनेक संस्करणों में व्यवहृत ‘ग्रंथावली’ के इस पक्ष पर प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की निगाह रुकी और उन्होंने अपने विशद अध्ययन और कबीर के प्रति अपने असाधारण प्रेम के चलते इसके परिमार्जन का बीड़ा उठाया। यह संस्करण उसी परिमार्जित एवं शुद्धतम पाठ की प्रस्तुति है जिसका आरम्भ उनकी एक सुदीर्घ भूमिका से होता है। इस भूमिका में प्रो. अग्रवाल ने पाठ-परिमार्जन की इस पूरी श्रम-साध्य प्रक्रिया पर तो प्रकाश डाला ही है, कबीर पर अपने अब तक के अध्ययन से प्राप्त अद्यतन धारणाओं को भी सूत्र रूप में दे दिया है। पाठकों को ज्ञात ही है कि ‘अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’ (2009) में उन्होंने कबीर के बहाने उस मध्यकाल में भारत की आधुनिकता की पहचान की थी, जो औपनिवेशिक आधुनिकता से पहले ही भारत के लोकवृत्त में प्रकट हो चुकी थी। ‘कबीर-ग्रंथावली’ की इस प्रस्तुति में वे न सिर्फ़ कबीर की वाणी को शुद्धतम रूप में हमें दे रहे हैं, बल्कि कबीर-अध्ययन के इतिहास की गुत्थियों को सुलझाते हुए उन्हें ठीक से पढ़ने-जानने की समझ भी हमें प्रदान कर रहे हैं।
Krishna Ki Leelabhumi : 21vin Sadi Mein Vrindavan
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John Stratton Hawley +1
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कृष्ण की लीलाभूमि : 21वीं सदी में वृन्दावन एक अत्यन्त प्यारे स्थान के बारे में है—कई लोग इसे भारत की आध्यात्मिक राजधानी भी कहते हैं। दिल्ली से कोई सौ मील की दूरी पर यमुना नदी के एक नाटकीय मोड़ पर स्थित वृन्दावन वह स्थान है जहाँ माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने अपना बचपन और युवावस्था बिताई थी। हिन्दुओं के लिए यह युवावस्था का प्रतीक रहा है—प्रेम और सुन्दरता का एक क्षेत्र जो दुनिया के बोझ और कठोरता को त्यागने में सक्षम बनाता है। हालाँकि, अब दुनिया वृन्दावन को निगल रही है। दिल्ली का महानगरीय फैलाव दिन-ब-दिन करीब आ रहा है—आधा शहर एक विशाल अचल सम्पत्ति के रूप में विकसित हो चुका है—और यमुना का पानी पीने तो क्या नहाने के लिए भी सुरक्षित नहीं है। मन्दिर अब खुद को थीम पार्क के रूप में बदल रहे हैं और कृष्ण के स्वर्गिक चरागाह में दुनिया की सबसे ऊँची धार्मिक इमारत निर्माणाधीन है। क्या होता है जब एंथ्रोपोसीन युग हर चीज को वर्चुअल बना देता है? क्या होता है जब स्वर्ग को जोता जाता है? हमारे इस पूरे दौर की तरह, वृन्दावन शक्तिशाली ऊर्जा से सराबोर है, लेकिन क्या खतरे के संकेत धीरे-धीरे सामने नहीं आ रहे?
Interview Mein Safalta Ke Gurumantra "इंटरव्यू में सफलता के गुरुमंत्र" | Rules For Success in Interview | Key to Success in Interview, Useful For Crack All interviews | Book in Hindi
- Author Name:
Ashok Kumar
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Awating description for this book
Meera Aur Mahatma
- Author Name:
Sudhir Kakkar +1
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सन् 1925; भारत का स्वतंत्रता संग्राम बिखरी हुई हालत में था, नेताओं के बीच मतभेद पैदा हो रहे थे, और पूरे देश में साम्प्रदायिक वैमनस्य की घटनाएँ हो रही थीं। इस दौरान, सक्रिय राजनीति से अलग-थलग बापू गांधी साबरमती आश्रम में अपने जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण गतिविधि में संलग्न थे। वे आत्मानुशासन, सहनशीलता और सादगी के उच्चतर मूल्यों को समर्पित एक समुदाय की रचना में व्यस्त थे। बापू की इसी दुनिया में पदार्पण हुआ एक ब्रितानी एडमिरल की बेटी मेडलिन स्लेड का जो बाद में मीरा के नाम से जानी गईं। गांधी के लिए जहाँ वास्तविक आध्यात्मिकता का अर्थ था आत्मानुशासन और समाज के प्रति पूर्ण समर्पण, वहीं मीरा मानती थीं कि सत्य और सम्पूर्णता का रास्ता मानव रूप में साकार शाश्वत आत्मा के प्रति समर्पण में है, और यह आत्मा उन्हें गांधी में दिखाई दी। इस प्रकार दो भिन्न आवेगों से परिचालित इन दो व्यक्तियों के मध्य एक असाधारण साहचर्य का सूत्रपात हुआ। विख्यात मनोविश्लेषक-लेखक सुधीर कक्कड़ ने बापू और मीरा के 1925 से लेकर 1930 तथा फिर 1940-42 तक के समय को इस उपन्यास का आधार बनाया है, जिस दौरान, लेखक के अनुसार वे दोनों ज़्यादा क़रीब थे। ऐतिहासिक तथ्यों की ईंटों और कल्पना के गारे से चिनी गई इस कथा की इमारत में लेखक ने बापू और मीरा के आत्मकथात्मक लेखों, पत्रों, डायरियों और अन्य समकालीनों के संस्मरणों का सहारा लिया है। राष्ट्रपिता को ज़्यादा पारदर्शी और सहज रूप में प्रस्तुत करती एक अनूठी कथाकृति।
Khaki Mein Insan
- Author Name:
Ashok Kumar +1
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'खाकी में इंसान' किताब में ग्रामीण परिवेश से उठकर आई.आई.टी. दिल्ली से शिक्षा प्राप्त कर भारतीय पुलिस सेवा में आए एक अधिकारी द्वारा कुछ वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानियों के ज़रिए यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि अच्छी पुलिस व्यवस्था से सचमुच ग़रीब व असहाय लोगों की ज़िन्दगी में फ़र्क़ लाया जा सकता है। पुस्तक में आज के समय के ज्वलन्त मुद्दों, जैसे—आतंकवाद, अमीर-ग़रीब के बीच बढ़ती खाई, महिलाओं के प्रति अपराध, समय के साथ बदलते व टूटते हुए मानवीय मूल्य, भू-माफ़ियाओं का बढ़ता हुआ जाल, अपराधियों के बढ़ते हुए हौसले आदि का सटीक एवं यथार्थ चित्रण किया गया है। पुस्तक में दर्शाया गया है कि यद्यपि वर्तमान व्यवस्था में कुछ ख़ामियाँ आ गई हैं, फिर भी यदि ऊँचे पदों पर बैठे लोगों में दृढ़ इच्छाशक्ति हो, इंसानियत के नज़रिए से सोचने की क्षमता हो और कुछ कर दिखाने का जज़्बा हो तो यही व्यवस्था, यही सिस्टम लोगों की मदद करने में बहुत ही कारगर सिद्ध हो सकता है। भारतीय पुलिस की जड़ें ब्रिटिश साम्राज्य की इम्पीरियल पुलिस से निकली हैं। पुस्तक में थानों की कार्यप्रणाली में बदलाव लाकर जन-समस्याओं की जड़ तक पहुँचने और पुलिस व्यवस्था को लोकतंत्र की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप बनाने के तौर-तरीक़ों का भी जीवन्त उल्लेख किया गया है।
Padmavat : Manush Pem Bhaeu Bainkunthi
- Author Name:
Purushottam Agrawal +1
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एक थी रानी पद्मिनी जिसे लोक-मन की कल्पनाओं ने गढ़ा और इतिहास में स्थापित कर दिया। राजपूताना के सम्मान और शान के रूप में लोग उसकी कथा कहते-सुनते रहे। एक थी ‘पद्मावत’ जिसे मलिक मुहम्मद जायसी ने अवधी में लिखा, और जिसमें उन्होंने स्त्री, प्रकृति और प्रेम के सौन्दर्य की एक अमर छवि गढ़ी। छात्र उसके अंशों को पाठ्यक्रम में पढ़ते और कोर्स में लगी हर सामग्री की तरह रट-रट कर भूल जाते। फिर एक फ़िल्म बनी, जिससे पता चला कि लोग न पद्मिनी को जानते हैं, न ‘पद्मावत’ को; कि वे एक मिथक को सच की तरह पढ़ रहे हैं और जो चीज़ वास्तव में पढ़ने योग्य है, उसे पढ़ ही नहीं रहे। इसलिए यह किताब। नवोन्मेषकारी विचार और सृजनात्मक आलोचकीय मेधा के धनी प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल अपनी इस किताब में 'पद्मावत' को भारत के आरम्भिक आधुनिक काल की रचना कहते हैं जिसके केन्द्र में एक स्त्री है, एक ऐसा काव्य जिसमें चरित्रों का मूल्यांकन उनके व्यक्तिगत कार्यों और गुणों के अनुसार होता है, उनकी धार्मिक, जातिगत या सामाजिक पहचान से नहीं। यह एक प्रेम कविता है। श्रेष्ठ कविता जो स्त्रीत्व का जश्न मनाती है और शृंगार रस जिसका महत्त्वपूर्ण अंग है। ‘पद्मावत’ और उसकी इस मीमांसा से हम जान पाते हैं कि जायसी की संवेदना में इस्लामी परम्परा के ज्ञान और सूफ़ी आस्था के साथ-साथ हिन्दू पुराण कथाओं, मान्यताओं और अवध के लोकजीवन की गहरी जानकारी और लगाव एक साथ अनुस्यूत है। पुरुषोत्तम जी खुद इस किताब को ‘जायसी की कविता के नशे में बरसों से डूबे एक पाठक द्वारा’ अपनी एक प्रिय रचना का पाठ कहते हैं जो स्पष्ट है, सिर्फ़ आलोचना नहीं है, भारत की अपनी, उपनिवेश-पूर्व, आधुनिकता की सौन्दर्य-चेतना और काव्यबोध से सम्पन्न एक क्लासिक कृति का रचनात्मक अवगाहन है।
Majbuti Ka Naam Mahatma Gandhi
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
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आक्रामकता किसी भी कीमत पर खुद को बचाए रखने की प्रेरणा से उत्पन्न होती है और यही प्रेरणा कायरता का भी स्रोत है। यदि आप दूसरे को ध्वस्त करके स्वयं को नहीं बचा सकते तो भागकर बचाते हैं। कायरता और अहिंसा पर्यायवाची नहीं हैं, हिंसा और कायरता एक-दूसरे की पूरक हैं। इसलिए गांधी की अहिंसा न कायरता है, न मजबूरी; वह एक सचेत संकल्प है ताकत, हिंसा और अविवेक की आँधी के सामने अचल खड़े रहने का। गांधी नामक भाव के आधारभूत मूल्यों, खासतौर पर अहिंसा को लेकर पुरुषोत्तम अग्रवाल लम्बे समय से सोचते रहे हैं। इसी चिन्तन का नतीजा है वह सूत्र जो इस पुस्तक का शीर्षक है ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी’ जिसने हर खासो-आम में स्वीकृत उस मुहावरे को एकदम पलट दिया जिसके मुताबिक महात्मा गांधी एक मजबूरी का नाम हैं। वे कहते हैं कि वे अगर मजबूरी हैं तो सिर्फ उन लोगों के लिए जिनके पास गांधी की मजबूती की कोई काट नहीं है, जो उनसे नफरत करते हुए भी उनको अनदेखा नहीं कर सकते। वे इस तथ्य पर भी जोर देते हैं कि गांधीजी की अहिंसा धार्मिक परम्पराओं में बताई गई अहिंसा नहीं है, वह उनकी मौलिक जीवन-दृष्टि है जो करुणा और संयम पर टिकी है। उनके लिए वह ऐसा मूल्य है जो किसी भी परिस्थिति में त्याज्य नहीं है, क्योंकि उससे मनुष्य का भविष्य जुड़ा है। ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’ शीर्षक जो व्याख्यान पुरुषोत्तम अग्रवाल ने 2005 में गांधी- जयन्ती के अवसर पर दिया था, और अपनी मौलिक दृष्टि के चलते जो बार-बार सुधीजन का ध्यान खींचता रहा है, इस पुस्तक में उसके अलावा उनके वे आलेख भी संकलित हैं जो उन्होंने गांधी-विचार के अन्य पहलुओं पर सोचते हुए समय-समय पर लिखे हैं। देश और धर्म दोनों को हिंसा से ही व्याख्यायित करने को व्याकुल हमारे इस समय में गांधी की अहिंसा के अर्थ को खोलने वाली यह किताब एक जरूरी हस्तक्षेप है।
Pratinidhi Kavitayen : Kunwar Narain
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Kunwar Narayan +1
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शुरू से लेकर अब तक की कविताएँ सिलसिलेवार पढ़ी जाएँ तो कुँवर नारायण की भाषा में बदलते मिज़ाज को लक्ष्य किया जा सकता है। आरम्भिक कविताओं पर नई कविता के दौर की काव्य-भाषा की स्वाभाविक छाप स्पष्ट है। इस छाप के बावजूद छटपटाहट है—कविता के वाक्य-विन्यास को आरोपित सजावट से मुक्त कर सहज वाक्य-विन्यास के निकट लाने की। आगे चलकर यह वाक्य-विन्यास कुँवर नारायण की कविता के लिए स्वभाव-सिद्ध हो गया है। लेकिन उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने सहज वाक्य-विन्यास को बोध के सरलीकरण का पर्याय अधिकांशत: नहीं बनने दिया। सहज रहते हुए सरलीकरण से बचे रहना, साधना के कठिन अभ्यास की माँग करता है। 'सहज-सहज सब कोई कहै—सहज न चीन्हे कोय!' बाल-भाषा में 'प्रौढ़ व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति' देने की चुनौती को कुँवर नारायण ने बहुत गहरे में लिया और जिया है। परम्परा की स्मृति और 'सैकड़ों नए-नए' पहलुओं को धारण करनेवाली काव्य-भाषा सम्भव करने के लिए जो साधना उन्होंने की होगी, उसका अनुमान ही किया जा सकता है। कुँवर नारायण इस महत्त्वपूर्ण सचाई के प्रति सजग हैं कि ‘कलाकार-वैज्ञानिक के लिए कुछ भी असाध्य नहीं।’ वे इस गहरी सचाई से भी वाक़िफ़ हैं कि चिन्तन चाहे दार्शनिक प्रश्नों पर किया जाए चाहे वैज्ञानिक तथ्यों पर, काव्यात्मक भाषा ही प्रत्यक्ष दिखने वाले विरोधों के परे जाकर मूलभूत सत्यों को धारण करने का हौसला कर पाती है। —पुरुषोत्तम अग्रवाल
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