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Agnileek Kee Aginkatha

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हृषीकेश सुलभ ने लगभग 1975 से लेखन शुरू किया। उनके लगभग 40 वर्षों के परिश्रम, अनुभव, आस-पास की सामाजिक उथल-पुथल पर पैनी दृष्टि और उससे जुड़ा रचनाकार का दायित्वबोध आदि के बाद उपन्यास ‘अग्निलीक’ आया। आलोचक रचनाकार की उस मनःस्थिति की पड़ताल कर पाया है या करता है, जिसने इस रचना को जन्म दिया और जो पूरी रचना- प्रक्रिया में साथ चला या अपनी टिप्पणी रखते समय समीक्षक/आलोचक भी अपनी मनःस्थिति और मान्यताओं की कसौटी से निर्देशित हो जाता है? यह प्रश्न इसलिए कि इन समीक्षाओं के संकलन में एक ही शिल्प, शैली, ट्रीटमेंट, घटनाओं की प्रस्तुति, उनके विस्तार और उनके स्वरूप पर अलग-अलग और कभी-कभी परस्पर विरोधी राय/ऑब्ज़र्वेशन देखने को मिले हैं। यह संकलन, इसलिए, रचनाकार को आलोचकों की चिन्ता और समय-समय पर व्यक्त उनके निदेशों के सम्मान के बाद भी अपनी तपस्या, अपने अनुभव और स्वतःस्फूर्त पर सजग चेतना पर चलने का स्वर देता है। ये आलेख ‘अग्निलीक’ उपन्यास को समझने और व्याख्यायित करने में सहायक तो हैं ही, उपन्यास ने ग्रामीण सामाजिक संरचना में होते जिन परिवर्तनों और उसके साथ-साथ स्थापित जिन वैचारिक जड़ताओं को कथा-सूत्र में पिरोया है, ये उसे और आगे ले जाते हैं। इसलिए इनका अध्ययन आवश्यक है। स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-पश्चात गाँवों की विडम्बनाओं को इन समीक्षकों, आलोचकों ने इस उपन्यास के बहाने गम्भीरता से देखा-परखा और अभिव्यक्त किया है। इन आलेखों को समग्रता में देखना साहित्यिक उद्देश्य की पूर्ति करता है, यही कारण है कि इन्हें एक साथ रखकर प्रस्तुत करने की यह कोशिश की गई है। किसी रचना पर टिप्पणी सिर्फ़ उस रचना का भला या बुरा नहीं करती, यह उस विधा की समझ को भी विस्तार देती है। समीक्षाओं का यह संकलन इन्हीं उद्देश्यों से सामने रखा गया है। —इस पुस्तक की भूमिका से­

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हृषीकेश सुलभ ने लगभग 1975 से लेखन शुरू किया। उनके लगभग 40 वर्षों के परिश्रम, अनुभव, आस-पास की सामाजिक उथल-पुथल पर पैनी दृष्टि और उससे जुड़ा रचनाकार का दायित्वबोध आदि के बाद उपन्यास ‘अग्निलीक’ आया। आलोचक रचनाकार की उस मनःस्थिति की पड़ताल कर पाया है या करता है, जिसने इस रचना को जन्म दिया और जो पूरी रचना- प्रक्रिया में साथ चला या अपनी टिप्पणी रखते समय समीक्षक/आलोचक भी अपनी मनःस्थिति और मान्यताओं की कसौटी से निर्देशित हो जाता है? यह प्रश्न इसलिए कि इन समीक्षाओं के संकलन में एक ही शिल्प, शैली, ट्रीटमेंट, घटनाओं की प्रस्तुति, उनके विस्तार और उनके स्वरूप पर अलग-अलग और कभी-कभी परस्पर विरोधी राय/ऑब्ज़र्वेशन देखने को मिले हैं। यह संकलन, इसलिए, रचनाकार को आलोचकों की चिन्ता और समय-समय पर व्यक्त उनके निदेशों के सम्मान के बाद भी अपनी तपस्या, अपने अनुभव और स्वतःस्फूर्त पर सजग चेतना पर चलने का स्वर देता है।

ये आलेख ‘अग्निलीक’ उपन्यास को समझने और व्याख्यायित करने में सहायक तो हैं ही, उपन्यास ने ग्रामीण सामाजिक संरचना में होते जिन परिवर्तनों और उसके साथ-साथ स्थापित जिन वैचारिक जड़ताओं को कथा-सूत्र में पिरोया है, ये उसे और आगे ले जाते हैं। इसलिए इनका अध्ययन आवश्यक है। स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-पश्चात गाँवों की विडम्बनाओं को इन समीक्षकों, आलोचकों ने इस उपन्यास के बहाने गम्भीरता से देखा-परखा और अभिव्यक्त किया है। इन आलेखों को समग्रता में देखना साहित्यिक उद्देश्य की पूर्ति करता है, यही कारण है कि इन्हें एक साथ रखकर प्रस्तुत करने की यह कोशिश की गई है। किसी रचना पर टिप्पणी सिर्फ़ उस रचना का भला या बुरा नहीं करती, यह उस विधा की समझ को भी विस्तार देती है। समीक्षाओं का यह संकलन इन्हीं उद्देश्यों से सामने रखा गया है।

—इस पुस्तक की भूमिका से­

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2025
Weight
360 grams
ISBN-13
9789348229427
Pages
208
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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