Himyug Mein Prem
(0)
Author:
Ratneshwar Kumar SinghPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
400
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Available
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जिन्दा रहने के संघर्ष के साथ 32000 साल पहले मनुष्य के होंठों ने खाने और बोलने केअलावा होंठ-चुंबन किया। सहवास की अवधारणा के साथ संसार का पहला प्रेम और पहले परिवार की परिकल्पना भी शुरू हुई। संसार के पहले राज्य जंबू की स्थापना हुई और संसार को पहला सम्राटद्वय मिला। इसके राज गल्फ ऑफ खंभात (गुजरात) की गहराइयों में आज भी छुपे हुए हैं, जहाँ हिमयुग में नगर होने के संकेत मिले हैं। संसार में अब तक मिली नगरीय सभ्यताओं में यह सबसे पुराना नगर होने का अनुमान है। विज्ञानियों-पुराविदों के नवीन शोध और खोज को केंद्र में रखकर महायुग उपन्यास-त्रयी लिखा गया है। ‘हिमयुग में प्रेम’ तीन उपन्यासों की शृंखला का दूसरा उपन्यास है। होमो इरेक्टस और अन्य प्रजातियों के संघर्ष के बीच उन दिनों संसार में सांस्कृतिक विकास केे साथ कई नवीन प्रयोग हुए। इन्हीं लोगों ने पहली बार पालनौका, हिमवाहन और चक्के के साथ विविध अस्त्रों का निर्माण किया। परग्रहियों ने होमो सेपियंस के डीएनए का पुनर्लेखन किया। क्रोनोवाइजर सिद्धांत के आधार पर कुछ विज्ञानियों और पुराविदों ने समुद्र की गहराइयों से जीरो पॉइंट फील्ड में संरक्षित ध्वनियों को संगृहीत कर उसे फिल्टर किया। कड़ी मेहनत के बाद उनकी भाषा को डिकोड किया गया और उसे इंडस अल्ट्रा कंप्यूटर पर चित्रित किया गया। उनकी आवाजों से ही बत्तीस हजार साल पहले भारत के प्रथम ज्ञात पूर्वज की पूरी कहानी सामने आई।
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जिन्दा रहने के संघर्ष के साथ 32000 साल पहले मनुष्य के होंठों ने खाने और बोलने केअलावा होंठ-चुंबन किया। सहवास की अवधारणा के साथ संसार का पहला प्रेम और पहले परिवार की परिकल्पना भी शुरू हुई। संसार के पहले राज्य जंबू की स्थापना हुई और संसार को पहला सम्राटद्वय मिला।
इसके राज गल्फ ऑफ खंभात (गुजरात) की गहराइयों में आज भी छुपे हुए हैं, जहाँ हिमयुग में नगर होने के संकेत मिले हैं। संसार में अब तक मिली नगरीय सभ्यताओं में यह सबसे पुराना नगर होने का अनुमान है। विज्ञानियों-पुराविदों के नवीन शोध और खोज को केंद्र में रखकर महायुग उपन्यास-त्रयी लिखा गया है। ‘हिमयुग में प्रेम’ तीन उपन्यासों की शृंखला का दूसरा उपन्यास है।
होमो इरेक्टस और अन्य प्रजातियों के संघर्ष के बीच उन दिनों संसार में सांस्कृतिक विकास केे साथ कई नवीन प्रयोग हुए। इन्हीं लोगों ने पहली बार पालनौका, हिमवाहन और चक्के के साथ विविध अस्त्रों का निर्माण किया।
परग्रहियों ने होमो सेपियंस के डीएनए का पुनर्लेखन किया। क्रोनोवाइजर सिद्धांत के आधार पर कुछ विज्ञानियों और पुराविदों ने समुद्र की गहराइयों से जीरो पॉइंट फील्ड में संरक्षित ध्वनियों को संगृहीत कर उसे फिल्टर किया। कड़ी मेहनत के बाद उनकी भाषा को डिकोड किया गया और उसे इंडस अल्ट्रा कंप्यूटर पर चित्रित किया गया। उनकी आवाजों से ही बत्तीस हजार साल पहले भारत के प्रथम ज्ञात पूर्वज की पूरी कहानी सामने आई।
Book Details
-
ISBN9789355214911
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
मज़दूरों का विस्थापन न तो अकेले भारत में हो रहा है, न आज पहली बार। सभ्यता के प्रारम्भ से ही कामगारों-व्यापारियों का आवागमन चलता रहा है, लेकिन आज भूमंडलीकरण के दौर में भारत में मज़दूरों को प्रवासी बनानेवाली स्थितियाँ और वजहें बिलकुल अलग क़िस्म की हैं। उनका स्वरूप इस क़दर अलग है कि उनसे एक नए घटनाक्रम का आभास होता है। ज्ञात इतिहास में शायद ही कभी, लाखों नहीं, करोड़ों की संख्या में मज़दूर अपना घर-बार छोड़कर कमाने, पेट पालने और अपने आश्रितों के भरण-पोषण के लिए बाहर निकल पड़े हों।
देश के सबसे पिछड़े राज्य बिहार और सबसे विकसित राज्य पंजाब के बीच मज़दूरों की आवाजाही आज सबसे अधिक ध्यान खींच रही है। यह संख्या लाखों में है। पंजाब की अर्थव्यवस्था, वहाँ के शहरी-ग्रामीण जीवन में बिहार के 'भैया' मज़दूर अनिवार्य अंग बन गए हैं और बिहार के सबसे पिछड़े इलाक़ों के जीवन और नए विकास की सुगबुगाहट में पंजाब की कमाई एक आधार बनती जा रही है। यह पुस्तक इसी प्रवृत्ति, इसी बदलाव, इसी प्रभाव के अध्ययन की एक कोशिश है। इस कोशिश में लेखक के साल-भर गहन अध्ययन, लम्बी यात्राओं और मज़दूरों के साथ बिताए समय से पुस्तक आधिकारिक दस्तावेज़ और किसी रोचक कथा जैसी बन पड़ी है।
पंजाब और बिहार के बीच शटल की तरह डोलते मज़दूरों की जीवन-शैली की टोह लेती यह कथा कभी पंजाब का नज़ारा पेश करती है तो कभी बिहार के धुर पिछड़े गाँवों का। शैली इतनी रोचक और मार्मिक है कि लाखों प्रवासी मज़दूरों और पंजाब पर उनके असर के तमाम विवरणों का बखान करती यह पुस्तक कब ख़त्म हो जाती है, पता ही नहीं चलता।
Revri Ya Haq : Samajik Suraksha Par Ek Nazaria
- Author Name:
Reetika Khera
- Book Type:

- Description: इज़्ज़त से जीना रेवड़ी नहीं, हक़ है। इस सहज पुस्तक को पढ़कर न केवल आपकी समझ बढ़ेगी, आपका दिल भी बढ़ेगा। —ज्याँ द्रेज़ पिछले बीस सालों में रीतिका खेरा और उनकी टीम ने देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक नीतियों के ज़मीनी हालात पर कई प्राथमिक सर्वेक्षण किये हैं, इस पुस्तक का आधार वही सर्वेक्षण हैं। सामाजिक नीतियों का दायरा तय करना आसान नहीं है, लेकिन इनके दायरे में स्कूली शिक्षा, सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएँ, आँगनवाड़ियाँ, स्कूलों में मध्याह्न भोजन, राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (नरेगा), जन-वितरण प्रणाली, वृद्धावस्था, विधवा और विकलांगता पेंशन एवं मातृत्व लाभ ज़रूर आते हैं। इस किताब में जन्म से मृत्यु तक हमारे सहारे के लिए बनी इन सामाजिक नीतियों का आकलन किया गया है। चर्चा के मुख्य बिन्दुओं में इन योजनाओं का क्रियान्वयन, उसमें रह गईं त्रुटियाँ, उपलब्धियाँ और राज्यों के बीच इनके स्वरूप में जो अन्तर देखने को मिले, उन पर चर्चा की गई है। इस किताब का मक़सद है कि पाठक भारत की सामाजिक नीतियों से परिचित हों, वे इस ढाँचे को पहचानें और उसके पीछे के तर्क को समझें। उनके सामने यह बात स्पष्ट हो कि वे क्या नैतिक और आर्थिक सिद्धान्त हैं जिनके आधार पर न केवल भारत में, बल्कि दुनिया-भर में सरकारें इस तरह के हस्तक्षेप करती हैं? और हमें क्यों इन सामाजिक नीतियों को लोगों के हक़ के रूप में देखना चाहिए, न कि ‘माई-बाप सरकार’ की कृपा या ‘रेवड़ी’ के रूप में। ‘रेवड़ी या हक़ ’ पुस्तक को यह रूप देने और अपने निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए विविध पृष्ठभूमियों और नज़रियों के लोगों और संस्थाओं से भी संवाद किया गया। शोध के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के जीवन-संघर्ष को तो सर्वेक्षणकर्ता ने नज़दीक से देखा ही, नई पीढ़ी के इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के छात्रों से भी बातें हुईं और शहरी मध्यवर्ग से आने वाले मित्र-परिवारों से इन सामाजिक नीतियों को लेकर उनकी सोच क्या है, वह भी जाना। कह सकते हैं कि यह किताब सामाजिक नीतियों पर, इन विभिन्न समूहों और अपने नज़रिये के बीच एक संवाद की कोशिश है।
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