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ओड़िया की चर्चित कथाकार यशोधारा मिश्र की ये कहानियाँ जीवन के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं के विषय में हमें अनोखी अन्तर्दृष्टि देती हैं। सामान्यतः उच्च मध्यवर्ग की पृष्ठभूमि में स्थित इन कहानियों में हमें समाज, परिवार और मनुष्य-मन के वे कोने दिखाई देते हैं, जिन्हें हम आमतौर पर नहीं देख पाते।</p> <p>कहानी को बयान करने की उनकी प्रवहमान शैली, परिवेश का विस्तृत चित्रण और अपने पात्रों को बेहद नज़दीक से जानने-समझने का उनका कौशल उनकी कहानियों को निरन्तर पठनीय बनाए रखता है। पात्रों के भूगोल को वे इस बारीकी से चित्रित करती है कि हम अनायास ही कहीं और होने की यात्रावृत्त जैसी अनुभूति से भर उठते हैं।</p> <p>संग्रह की शीर्षक कथा ‘द्वीपांतर’ स्त्री-मन के एक अनछुए प्रान्तर के संधान की कहानी है जिसमें प्रौढ़वय नायिका को घर-परिवार को समर्पित अपने अब तक के लम्बे जीवन के बाद अचानक अपने होने का अहसास होना शुरू होता है, वह भी सुबह की सैर शुरू करने से। डॉक्टर के कहने पर हर सुबह बाहर निकलना उसके लिए ऐसा अनुभव बन जाता है जो सिर्फ़ उसका है, अपना; और, डेढ़-दो किलोमीटर के इस विस्तार में ही जैसे उसे अपना एक अलग द्वीप मिलने लगता है।</p> <p>संग्रह में शामिल अन्य कहानियाँ भी सुख और संतृप्ति के अन्तस में छिपी किसी न किसी टीस का अवगाहन करती हैं। ‘सूर्यास्त के आसपास’ के अतनू और कल्लोला की ज़िन्दगी की दबी-ढँकी कामनाएँ हों,&nbsp; ‘मनोकामना’ के नीलेश और सीमा-सुरेश का ‘सेंस ऑफ़ लॉस’ हो या ‘अपना-अपना प्रेम’ की बढ़ती-बदलती प्रेमकथाएँ, हर कहानी एक टूटन की कथा है जिसे कथाकार ने गहरी संवेदना के साथ लिखा है। संग्रह में कुल दस कहानियाँ शामिल हैं और ये सभी सुख और दुःख के बीच गुम्फित कई विरोधाभासों को हमारे सामने खोलती हैं।

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ISBN
9789391950859
Pages
144
Avg Reading Time
5 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

ओड़िया की चर्चित कथाकार यशोधारा मिश्र की ये कहानियाँ जीवन के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं के विषय में हमें अनोखी अन्तर्दृष्टि देती हैं। सामान्यतः उच्च मध्यवर्ग की पृष्ठभूमि में स्थित इन कहानियों में हमें समाज, परिवार और मनुष्य-मन के वे कोने दिखाई देते हैं, जिन्हें हम आमतौर पर नहीं देख पाते।</p>
<p>कहानी को बयान करने की उनकी प्रवहमान शैली, परिवेश का विस्तृत चित्रण और अपने पात्रों को बेहद नज़दीक से जानने-समझने का उनका कौशल उनकी कहानियों को निरन्तर पठनीय बनाए रखता है। पात्रों के भूगोल को वे इस बारीकी से चित्रित करती है कि हम अनायास ही कहीं और होने की यात्रावृत्त जैसी अनुभूति से भर उठते हैं।</p>
<p>संग्रह की शीर्षक कथा ‘द्वीपांतर’ स्त्री-मन के एक अनछुए प्रान्तर के संधान की कहानी है जिसमें प्रौढ़वय नायिका को घर-परिवार को समर्पित अपने अब तक के लम्बे जीवन के बाद अचानक अपने होने का अहसास होना शुरू होता है, वह भी सुबह की सैर शुरू करने से। डॉक्टर के कहने पर हर सुबह बाहर निकलना उसके लिए ऐसा अनुभव बन जाता है जो सिर्फ़ उसका है, अपना; और, डेढ़-दो किलोमीटर के इस विस्तार में ही जैसे उसे अपना एक अलग द्वीप मिलने लगता है।</p>
<p>संग्रह में शामिल अन्य कहानियाँ भी सुख और संतृप्ति के अन्तस में छिपी किसी न किसी टीस का अवगाहन करती हैं। ‘सूर्यास्त के आसपास’ के अतनू और कल्लोला की ज़िन्दगी की दबी-ढँकी कामनाएँ हों,&nbsp; ‘मनोकामना’ के नीलेश और सीमा-सुरेश का ‘सेंस ऑफ़ लॉस’ हो या ‘अपना-अपना प्रेम’ की बढ़ती-बदलती प्रेमकथाएँ, हर कहानी एक टूटन की कथा है जिसे कथाकार ने गहरी संवेदना के साथ लिखा है। संग्रह में कुल दस कहानियाँ शामिल हैं और ये सभी सुख और दुःख के बीच गुम्फित कई विरोधाभासों को हमारे सामने खोलती हैं।

Book Details

  • ISBN
    9789391950859
  • Pages
    144
  • Avg Reading Time
    5 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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