Lomari Ki Japmala
Author:
Unita SachchidanandPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Available
प्रस्तुत लोककथा संग्रह में जहाँ जानवरों की कहानियाँ हैं, वहीं अध्यात्म और नैतिक मूल्यों से जुड़ी जापान की बहुचर्चित कथाएँ भी।</p>
<p>लेखिका ने स्वयं तोक्यो से दूर जापानी ग्रामीण क्षेत्रों में कहानियों की तलाश के दौरान परम्परागत जापानी कथा–वाचकों की दो कहानियाँ ‘एक एहसान बढ़ा पाँच मान’ और ‘बुज्जा का अंडा’ का अभिलेखन किया है।</p>
<p>‘लुढ़कता खड़ाऊँ’ में हँसी और मज़ाक़ का पुट है, तो ‘लोमड़ी की जपमाला’ में लोमड़ी और मनुष्य के बीच की हास्यास्पद लड़ाई।</p>
<p>सरल बाल–सुलभ भाषा में जापानी कथाओं का यह दूसरा भाग मनोरंजन के साथ बच्चों में नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में सहायक होगा, ऐसी उम्मीद है।
ISBN: 9788126706235
Pages: 76
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
प्रस्तुत कहानियों के रचनाकार मनोज कुमार पांडेय अब तक हिन्दी जगत में अपनी पक्की पहचान बना चुके हैं। इनके पहले के तीन कहानी-संग्रह पुख़्ता सबूत हैं कि इक्कीसवीं सदी के इस युवा रचनाकार ने कहानी का दामन मज़बूती से थाम रखा है। मनोज के लेखन का सबसे ग़ौरतलब पहलू यह है कि ये कहानी–लेखन के ढर्रे और फ़्रेम को लगातार चुनौती देते चलते हैं। ख़ुद तोड़-फोड़ करते हैं और कहानी की कहन को कई क़दम आगे ले जाते हैं।
इन कहानियों की प्रतीक-योजना बड़ी प्रत्यक्ष प्रणाली से उजागर है। लेखक ने हर कहानी में नए सिरे से जोखिम उठाया है। स्थितिगत व्यंग्य की विद्रूपता अन्य किसी प्रणाली से व्यक्त की भी नहीं जा सकती। कहानियों को इस परिप्रेक्ष्य में समझे जाने की ज़रूरत है। इन कहानियों में यदि आख्यान की सादगी है तो कबीर की तरह उद्देश्य की खड़ी चोट भी है। कहानी केवल राजा और प्रजा की नहीं रहती, वरन् यह जन और तंत्र की हो जाती है। इन्हें पढ़कर लगता है कि आज के समय की आँख में उँगली डालकर सच्चाई दिखाने का काम लेखक के ज़िम्मे है। ये कहानियाँ अपनी सरलता में जटिल यथार्थ की दस्तावेज़ हैं। मनोज समय के सघन अँधेरों पर रचनाओं की रोशनी और रोशनाई डाल कर बताते हैं; बचो, बचो, इस फैलते अन्धकार से बचो। यही एक लेखक का कर्तव्य होता है।
–ममता कालिया
गहरे प्रेक्षण, बदलावों को पकड़नेवाली अचूक संवेदनशीलता और समर्थ कथा-भाषा से मनोज कुमार पांडेय ने इक्कीसवीं सदी में उभरे कहानीकारों के बीच अपनी ख़ास पहचान बनाई है। 'पानी' और 'शहतूत' जैसी कहानियों का यह लेखक अपनी रचनाओं के लिए कभी बहुत लम्बा इन्तज़ार नहीं करवाता। बावजूद इसके, हर बार उसके पास कहने के लिए कोई नई बात होती है; साथ ही, कहने की अलग भंगिमा भी। इस बार मनोज जिस स्वर्णदेश की कहानियाँ सुना रहे हैं, वह उनके अब तक के लेखन से इस मायने में बिलकुल जुदा है कि यहाँ क़िस्सागोई वाले अन्दाज़ में एक ऐसा दिक्काल उपस्थित है जो अपनी सूरत में हमारा न होकर भी सीरत में सौ फ़ीसद हमारा है। यह अन्योक्ति वाली युक्ति में गहा हुआ हमारे समय का सार है। पढ़कर हम आश्वस्त होते हैं कि अतीत-प्रेमी राजा ने भले ही स्वर्णदेश की भाषा में घुस आए विजातीय शब्दों की छँटनी करके उसे दिव्यांग बना दिया हो, और लोग कुछ भी बोलने-लिखने में असमर्थ हो चले हों, हमारी भाषा का दमखम अभी बचा हुआ है। यह कथा-शृंखला इसका ज़िन्दा सबूत है।
–संजीव कुमार
Ashtray
- Author Name:
Haider Rizvi
- Book Type:

- Description: एक नहीं दो नहीं सैंकड़ों देंगे देखे हैं मैने... मैने बंगाल की चीख़ती माएँ देखी हैं, मैंने लाहौर की सड़कों पर काट कर गिराए गए स्तन देखे हैं, मैंने बम्बई की झुग्गियों में कई बार अपने पेट से निकलती चीख़ को अपने गले तक आते आते घुट जाते हुए देखा है, मैंने बिहार में अपने पैरों के बीच सर्द लोहे के सलाख़ की ठंडक महसूस की है, मैने चौरासी में गोरी-भरे बदन की पंजाबिनें तलाशती आँखें देखी हैं, मैंने गुजरात में अपने पेट में पड़े बच्चे की हर झटके पर निकलती हुई ख़ामोश चीखें सुनी हैं... मैंने सभी दंगों को देखा है... और अपनी इन्हीं आँखों से देखा है.... क्यूंकि दंगे सिर्फ़ एक औरत ही देख सकती है... औरत के लिए दंगा कोई ख़बर नहीं होता, कोई घटना नहीं होती, और इतिहास तो बिलकुल भी नहीं होता.. दंगा उसके लिए एक वो चीज़ होती है जो हमेशा घटती रहती है, जिसे वो हमेशा जीती रहती है, जिसे वो अच्छी तरह पहचानती है और हाँ, सिर्फ़ वही पहचानती है.... लेकिन मैं क्यों वक़्त रहते नहीं पहचान पायी? - इसी पुस्तक से -
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